Thursday, September 27, 2018

पद पर बैठा शख्स झूठ बोले और आप बचाएं गरिमा


सिक्किम में एयरपोर्ट के उदघाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब उपलब्धियों का बखान करने लगे तो बोल गए कि मोदी सरकार में सालाना 9 नए एयरपोर्ट बने हैं। जबकि तथ्य ये है कि पिछले चार सालों में मात्र चार नए एयरपोर्ट बने हैं। ये तमाम वो एयरपोर्ट हैं जिनकी बुनियाद मनमोहन सिंह सरकार में रखी गई। नए एयरपोर्ट बनने में अमूमन 6-7 साल लगते हैं। कहने को हम कह सकते हैं कि ये तथ्यों को रखने में मोदी से हुई चूक है। लेकिन ये कहना एक बड़ी चूक होगी। क्योंकि जिस प्रधानमंत्री पद की गरिमा को लेकर हमारा देश गला फाड़ने लगता है उस गरिमा को गलत तथ्यों अथवा झूठ से नहीं बचाया जा सकता। और उस पद पर बैठा आदमी लगातार गलत तथ्य पेश करता रहेगा तो हमारे-आपके गला फाड़ने से पद की गरिमा नहीं बचेगी। जिसे कुछ लोग दुनिया में डंका बजना बता रहे हैं दरअसल वो दुनिया भर में झूठ के तौर पर देखा जाने लगा है। सिक्किम में बोला गया झूठ पद की गरिमा को लांछित करता है। और हमें ये खुलकर स्वीकारना होगा।


सिक्किम में बोला गया झूठ मोदी जी की तरफ से बोला गया पहला झूठ नहीं है। मुझे याद है कर्नाटक के कलबुर्गी में मोदी ने कहा था कि 1948 की लड़ाई के दौरान फील्ड मार्शल केएम करियप्पा और जनरल थिमय्या का नेहरू और कांग्रेस ने अपमान किया था। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए मोदी का कर्नाटक में बोला गया ये झूठ मामूली नहीं था। सच ये है कि 1948 के युद्ध के दौरान भारतीय सेना के जनरल सर फ्रांसिस बूचर थे, न कि थिमय्या और केएम करियप्पा तो नेहरू के बेहद खास थे।
कलबुर्गी के बाद भी कई बड़े झूठ बोले गए। 2013 के कई बड़े झूठ चर्चों में रहे। जुलाई 2013 में ही अहमदाबद मे मोदी ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि आजादी के समय एक डॉलर की कीमत एक रूपए के बराबर थी। जबकि सच ये है कि उस समय एक रूपए की क़ीमत 30 सेंट के बराबर थी और उस समय एक रुपया एक पाउंड के बराबर था।
लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा कि चीन अपनी जीडीपी का 20 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। हकीकत ये है कि चीन अपनी जीडीपी का सिर्फ 3.93 प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च करता है। जबकि भारत में अटल सरकार में शिक्षा पर जीडीपी का 1.6 प्रतिशत खर्च हुआ और यूपीए सरकार में 4.04 प्रतिशत। मेरठ की एक रैली में भी मोदी ने बड़ा झूठ बोला। मोदी ने कहा के 1857 की आजादी की पहली लड़ाई को कांग्रेस ने तरजीह नहीं दी। कांग्रेस की वजह से 1857 की लड़ाई कमजोर पड़ गई। मोदी का ये बयान किसी अनगढ़-अनपढ़ का बयान था या जानबूझ कर बोला गया बड़ा झूठ ये वही जानें। क्योंकि, 1857 में कांग्रेस थी ही नहीं। कांग्रेस का गठन तो 1885 में हुआ। प्रधानमंत्री पद की गरिमा की फिक्र में दुबले होते लोगों को इस बात की भी फिक्र होनी चाहिए कि उस पद पर बैठा व्यक्ति सत्ता के लिए पद की गरिमा को धूल में न मिटाए। प्रधानमंत्री ही झूठ पर झूठ बोलता जाएगा तो फिर पद की गरिमा का मतलब भी वही होगा जो स्टेशन पर लटकी बाल्टियों का होता है, जिसमें भरा तो बालू होता है लेकिन उसपर आग लिखा होता है। और वो बाल्टी पान का पीक थूकने के काम आती है।

Wednesday, September 26, 2018

राहुल शिव भक्त, बीजेपी राम भक्त, जनता बजाए घंटा


बीते गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मंदिरमार्गी हुए जनेऊधारी राहुल गांधी कैलास भ्रमण के बाद अमेठी पहुंचे..अमेठी में राहुल गांधी का स्वागत कांवड़ियों ने किया.. तो फिर मंदिर-मंदिर घूमती सियासत के मायने भी तलाशे जाने चाहिए। ऐसा पहली बार हुआ जब बीजेपी की पारंपरिक राजनीति को कांग्रेस ने नरमी से डील करने की कोशिश की है और बीजेपी की हिंदुवादी राजनीति में सेंध लगा दी है..जाहिर है बीजेपी को परेशान होना था..हुई भी.. और झट से मेरी शर्ट सफेद बाकियों की गंदी वाले तर्क पर उतर आई

    सॉफ्ट हिंदुत्व की ये सियासत कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचाएगी ये भविष्य के गर्भ में है..लेकिन बीजेपी और कांग्रेस की ये सियासत देश को पीछे धकेलने वाली ही है.. क्योंकि मुद्दों को धकिया कर राम को आगे कर चुनाव लड़ना बीजेपी की फितरत रही है और अब बीजेपी को काउंटर करती कांग्रेस शिव को आगे कर चुनावी माहौल गढ़ती दिख रही है
     बीजेपी की कोशिश यही भर होगी कि राहुल की शिवभक्ति या फिर पाकिस्तान से जुड़े किसी मसले को हवा दी जाती रहे..क्योंकि राफेल से जुड़े विवाद की हवा फैली तो बीजेपी का नुकसान तय है.. और उसे रोकने के लिए पाकिस्तान, राम मंदिर या फिर इस किस्म के कई मसले उछालते रहना उसकी मजबूरी है.. और कांग्रेस बीजेपी की उस जमीन पर खुद को खड़ा करने की बेचैनी में दिख रही है..जिस ज़मीन के आसरे बीजेपी के कई नेता खुद को हिंदुवादी बताते रहे हैं.. और देश की बहुसंख्यकों की भावना को पार्टी से जोड़ते रहे हैं

Tuesday, September 25, 2018

कांग्रेस का यूपी प्लान तो नायाब निकला


चाहिए अगर सत्ता तो फेंटिए पत्ता..क्योंकि गठबंधन के दौर में जो प्रचंड बहुमत लेकर घूम रहे हैं वो भी विशाल गठबंधन का हिस्सा हैं और जो हार के हरकारे से हाहाकार कर रहे हैं वो गठबंधन का ही किस्सा हैं.. और यूपी से गुजरती दिल्ली सल्तनत वाली सड़क पर रेस में शामिल रहना है तो गठबंधन इनकी भी ज़रूरत है और उनकी भी..जो सत्ता में हैं उनके लिए गठबंधन सुविधाओं का समीकरण है और जो सत्ता के लिए जंग में उतरने वाले हैं उनके लिए गठबंधन मजबूरी का सौदा है..तभी तो बीएसपी वाली मायावती ने एक झटके में कांग्रेस को अंगूठा दिखा दिया था और सपा वाले अखिलेश कांग्रेस को भाव ही नहीं दे रहे..लिहाजा ए प्लान के धाराशायी होने की आशंकाओं के बीच कांग्रेस ने बी प्लान तैयार कर लिया है.. और खबर है कि अखिलेश से नाराज होकर सपा में दरार डालकर.. चचा शिवपाल चुनाव में चलेंगे कांग्रेस का पंजा थाम कर..

   लेकिन बात इतनी भर से बनेगी नहीं..क्योंकि सपा के यादव-मुस्लिम समीकरण में शिवपाल यादव कितनी सेंध लगा पाएंगे इसका ठीकठीक आंकलन अभी संभव नहीं है..ऐसे में कांग्रेस अकेले शिवपाल को लेकर मोर्चे पर आना नहीं चाहेगी..इसलिए प्लान बी में पश्चिमी यूपी को साधने की तैयारी भी है..और इसके लिए राष्ट्रीय लोकदल वाले हैंडपंप से वोटों के पानी का जुगाड़ करने की तैयारी है..क्योंकि सपा-बसपा गठबंधन में आरएलडी को भी बहुत भाव मिलता दिख नहीं रहा है..जाहिर है सीटों के मोलभाव में चौधरी साहब अपनी चौधराहट बरकरार रखने की पूरी कोशिश करेंगे.. और सपा-बसपा ने भाव नहीं दिया तो शिवपाल यादव से अपने पुराने रिश्तों को और गहराई देने में कोई गुरेज नहीं करेंगे...
    शिवपाल की कोशिशें कांग्रेस से गठबंधन करवा गईं तो फिर पीस पार्टी को भी न्यौता देने में किसी को कोई तकलीफ नहीं होगी..तो फिर जो नया समीकरण होगा वो कांग्रेस, शिवपाल यादव का मोर्चा, आरएलडी और पीस पार्टी का होगा.. यूपी की जातीय राजनीति की ज़मीन पर ये समीकरण नतीजे को प्रभावित करने वाला तो होगा ही.. क्योंकि सच ये है कि अब ना तो कोई लहर है और ना ही उम्मीदों के पंद्रह लखिया पंख.. तो फिर इंतजार कीजिए यूपी की बिसात पर एक नए गठबंधन का   

राफेल सौदा: चोर के शोर में बेशर्म सियासत


गिरो, गिरो रुपये की तरह गिरो, इतना गिरो की फिर पेट्रोल की कीमतों वाली ऊंचाई ना छू सको..गिरने के सारे रिकॉर्ड तोड़ दो..क्योंकि इस गिरावट में ही राजनीति का फायदा है..क्योंकि आपके गिरने के स्तर से असली मसले पर मलबा पड़ जाएगा.. आप गिरने के सारे रिकॉर्ड तोड़ देंगे और राफेल का सच कहीं गिर कर दम तोड़ देगा..बात शुरू हुई थी राफेल डील में हुई गड़बड़झाले से...चोर होते हुए ये बात बेशर्मी तक पहुंच गई.. चोर और बेशर्मों की जमात बनती गई.. राफेल पर बहस का ज़रूरत खत्म होती गई

        मुद्दा तो राफेल डील का है.. जिसका प्रस्ताव अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने रखा था.. सरकार गई तो फिर मनमोहन सरकार ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया.. तब 126 राफेल विमानों के लिए 54 हजार करोड़ का सौदा तय हुआ..लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की शर्त पर बात अटक गई.. मोदी सरकार आई तो डील हो गई.. 126 की जगह महज 36 विमानों पर बात पक्की हुई लेकिन कीमतों में भारी अंतर हो गया..तब 126 विमान 54 हजार करोड़ के थे अब महज 36 विमान 58 हजार करोड़ के हैं.. मुद्दा तो असली यही है.. और असली मुद्दा है हिंदुस्तन एरो नॉटिकल लमिटेड से राफेल का काम वापस लेकर अनिल अंबानी की उस कंपनी को काम देना जो डील से महज 10 दिन पहले बनी और जिसने कभी विमान का एक पुर्जा तक नहीं बनाया...लेकिन असली मुद्दे पर बात करे कौन..सो बेशर्म होती राजनीति चोर-चोर का शोर मचाने लगी
    अब हम और आप बेशर्म और चोर के शोर में शामिल हो जाएंगे.. राफेल डील पर बात इसी शोर में दब जाएगी.. राजनीति शोर मचावाएगी...अवाम शोर मचाएगी.. और मीडिया चोर-बेशर्म में उलझ कर असली मुद्दों से किनारा कर लेगा.. इस देश की राजनीति को और चाहिए क्या

Sunday, September 23, 2018

सेना प्रमुख जी, आप राजनीति मत कीजिए


          संस्थाओं के कमजोर होने की गवाही है सेना प्रमुख का बयान। 
सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के बयान से हैरान हूं। जनरल रावत ने पाकिस्तान के संदर्भ में कहा है कि आतंकवाद और बातचीत दोनों एक साथ नहीं हो सकते। जनरल रावत का ये बयान बताता है कि देश के तमाम संस्थान कमजोर हो चुके हैं। वरना जनरल ये बयान क्यों देते। मौजूदा परिस्थितियों में पाकिस्तान से बातचीत होगी या नहीं ये कौन तय करेगा ? हमारी चुनी हुई सरकार या सेना का जनरल ? सेना के अधिकारी जब हमारी विदेश नीतियां तय करेंगे तो फिर विदेश मंत्रालय क्या करेगा ? सेना प्रमुख का ये बयान गंभीरता से लेना चाहिए। आपका काम सीमा पर दुश्मनों से देश की सुरक्षा है। आपका काम ये नहीं कि आप ये तय करें कि किससे कब बातचीत होगी। सेना प्रमुख से जवाब-तलब होना चाहिए। उन्हें हिदायत दी जानी चाहिए। अगर ये सब नहीं किया गया तो फिर मुझे ये कहने में गुरेज नहीं होगा कि ये सरकार बेहद कमजोर है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को देश को ये एहसास करवाना होगा कि वही विदेश मंत्री हैं।

  संस्थाओं के रेंगने की ये कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कर्नाटक विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा के वक्त ये देखा गया। ऐसा लगा निर्वाचन आयोग बीजेपी का चुनाव सेल है। बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने जब चुनाव के तारीखों की घोषणा ट्वीटर पर कर दी तब निर्वाचन आयोग ने उन्हीं तारीखों पर चुनाव करवाने की पुष्टि की।
 सुप्रीम कोर्ट को भी इसी तरह की संस्था बनाने के दावे बीजेपी कर रही है। यूपी के एक बीजेपी विधायक ने हाल ही में कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर बन कर रहेगा। विधायक ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी हमारा ही है और फैसला मंदिर के पक्ष में ही आएगा।
 एक-दो नहीं ऐसे कई उदाहरण हैं जो बता रहे हैं कि देश की तमाम संस्थाएं या तो खुद रेंगने लगीं हैं या फिर उन्हें रेंगने पर मजबूर कर दिया गया है। लेकिन, सेना प्रमुख का आगे बढ़कर सरकार होने की कोशिश करना खतरनाक संकेत है। सेना प्रमुख हमारी विदेश नीतियां नहीं तय कर सकते। इस काम के लिए हमने सरकार चुनी है। भारत को पाकिस्तान बनाने की कोशिश मत कीजिए। भारत में फैसला संसद करती है और वही करेगी भी।    

Saturday, September 15, 2018

मस्जिद में मोदी: ये जंतर बांध लीजिए

ये तस्वीर भर नहीं है। ये एक जंतर है। इस जंतर को गिरिराज सिंह, साक्षी महाराज जैसे बीजेपी नेताओं को बांध लेना चाहिए। हिंदू राष्ट्र के नारे बुलंद करने वालों को ये जंतर अपनी जेब में डाल लेना चाहिए। जिस हिंदू का खून ना खौला खून नहीं वो पानी है कहने वालों को अपने गले में इसे लटका लेना चाहिए। जो ये कहते फिर रहे हैं कि मोदी के पीएम बनते ही राहुल गांधी मंदिर जाने लगे उन्हें ये भी कहना चाहिए कि राहुल के मंदिर जाने से मोदी मस्जिद जाने लगे। क्योंकि सच ये है कि ये भारत का प्रधानमंत्री होने की मजबूरी है। मुसलमानों के बीच हाथ जोड़ कर खड़े होने वाला ये कोई बीजेपी नेता भर नहीं है। मस्जिद में जाकर खुद को मुसलमानों के बीच का बताने वाला ये कोई वो नेता नहीं है जो राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार था। खुद को मुसलमानों के बीच का बताना वाला ये शख्स भारत का प्रधानमंत्री है। और यही प्रधानमंत्री होने की मजबूरी है।
इसलिए इस जंतर को सत्ता का मंतर समझिए और धारण कर लीजिए। क्योंकि सत्ता के लिए सबके बीच हाथ जोड़ कर खड़े होना राजनेताओं की मजबूरी होती है। और मौजूदा दौर में ये मजबूरी और बड़ी हो गई है। एसएसी एक्ट संशोधन से नाराज सवर्ण, नोटबंदी से नाराज व्यापारी और महंगाई से नाराज मिडिल क्लास के बीच हाथ जोड़ कर खड़े होने की स्थिति बची नहीं है। तो फिर ऐसे में शिया मुसलमानों के बीच अटल राह से गुजरना होगा। अटल बिहारी बाजपेयी ने शिया मुसलमानों से जो रिश्ता जोड़ा था उस रिश्ते की गहराई में उतरना होगा। और हां इसे नारा भर मत मानिए ये भारत की सच्चाई है 'सबका साथ-सबका विकास' । दुर्भाग्य से अब तक आपलोग से इसे जुमला ही समझते रहे। लेकिन मोदी जी भीड़ नहीं हैं मोदी जी भीड़ को खड़ा करने वाले हैं। और भीड़ खड़ा करने वाले नेता को मालूम होता है कि जुमलों से आगे ज़मीन भी तैयार करनी होती है। वो इस जंतर के जरिए वही काम रह रहे हैं। इसलिए आप भी इस जंतर को अपने पास संभाल कर रखिए। और वो जो आपलोगों के पुराने नारे हैं न उन्हें पायताने रख दीजिए। और गला फाड़कर बेलिए सबका साथ-सबका विकास।

Friday, September 14, 2018

'राम' चूक गए अब बीजेपी को रावण का आसरा


तो रावण रिहा हो गया.. भीम आर्मी का संस्थापक..दलित विद्रोह का नायक..सहारनपुर हिंसा का आरोपी और कानून की भाषा में देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका चंद्रशेखर उर्फ रावण रिहा गया.. रिहाई हुई भी तो सरकार की मेहरबानी से.. वही सरकार जो कभी चंद्रशेखर को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताती थी.. अब चंद्रशेखर पर दया दिखाने लगी है.. सहारनपुर में ठाकुर-दलित हिंसा का केंद्र रहे रावण पर हुई सरकारी मेहरबानी का मतलब क्या है.. अचानक उमड़ी दया के मायने क्या हैं.. अचानक हुई रिहाई का रहस्य क्या है.. इस राज़ से भी पर्दा उठेगा..इन सवालों के जवाब भी खोजे जाएंगे..

     तो रिहाई, राज़, रहस्य से पहले जो सबकी आंखों के सामने है वो देखिए.. यूपी के दलित वोटबैंक पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती की सबसे मजबूत दखल है..और यूपी के सवर्ण वोट बैंक पर बीजेपी की जबर्दस्त पकड़ है.. एससी-एसटी ऐक्ट संशोधन विधेयक के बाद भी दलित वोटबैंक की गोलबंदी बीजेपी की तरफ होती नहीं दिख रही..लेकिन गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग कर और एससी-एसटी ऐक्ट में बिना जांच गिरफ्तारी वाले प्रावधानों का विरोध कर मायावती ने सवर्णों पर जाल फेंक दिया है.. 2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ कर मायावती ने यूपी की सत्ता हासिल की थी.. मतलब ये कि मायावती अगर दलित-सवर्ण कार्ड खेलती हैं तो एससी-एसटी एक्ट संशोधन से नाराज सवर्णों का बड़ा हिस्सा अपने पाले कर सकती हैं.. तो फिर बीजेपी का होगा क्या.. जाहिर है बीजेपी भी ऐसी संभावनाओं-आशंकाओं को देख रही है.. तो बिसात की ये चाल समझ सकते हैं.. 2017 के अप्रैल और मई महीने में शब्बीरपुर गांव से भड़की हिंसा ने  सहारनपुर के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में लिया था.. और इस घटना ने यूपी के बड़े हिस्से में ठाकुरों और दलितों को आमने-सामने कर दिया था.. हिंसा की आग भड़काने का आरोप भीम आर्मी पर लगा और मुख्य आरोपी बनाये गए चंद्रशेखर को जेल हुई..हाई कोर्ट से जब जमानत मिली तो सरकार ने चंद्रशेखर पर रासुका लगा दिया...और चंद्रशेखर की रिहाई रुक गई....रासुका लगने के बाद सहारनपुर के कई ठाकुर बहुल गांवों में जश्न मनाया गया।
मतलब ये कि चंद्रशेखर और सवर्ण संघर्ष को सत्ता-सियासत ने खूब खाद-पानी दिया। और मतलब ये भी कि चंद्रशेखर जिसके साथ होंगे सवर्ण उनके साथ जाने से कतराएंगे.. तो फिर सवर्ण वहीं खड़े मिलेंगे जहां वो 2014 या फिर 2017 में खड़े थे..क्योंकि सहारनपुर हिंसा के बाद मायावती को कोस चुके चंद्रशेखर अचानक माया राग अलापने लगे हैं.. और राग से ही बिसात की ये चाल थोड़ी ही सही समझ में आने लगी है
     तो फिर रिहाई को सियासी मानिए या चुनावी.. मानने को इससे अलग भी कुछ मानिए..लेकिन ये भी मानिए कि ये रिहाई चुनाव पर असर डालेगी ज़रूर
  
  

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...