Tuesday, June 20, 2017

प्रेम बीज भर है

 बीते इन सालों में
तुमने मुझे थोड़ा-थोड़ा भुलाया होगा
फिर भी कहीं किसी कोने में
मैं थोड़ा सा बचा रहा होऊंगा
मन के सिमटते अलापों में
उस थोड़े से मुझ को तुमने गुनगुनाया होगा
मेरे आदि को, मेरे अंत को
मेरी यादों के अनंत को कहीं बचाया होगा, कहीं छुपाया होगा
ये जो प्रेम है न वो बीज है
थोड़ी नमी पाकर ही अंकुरित होता है
बीते उन सालों में जो मुझे भुलाने में गुजरे होंगे
तुमने हर मोड़ पर मुझे पाया होगा
बस ये मत पूछना कि बीते उन्हीं सालों को
मैने कैसे बिताया होगा



....19-06-17....कानपुर

Wednesday, May 17, 2017

चौथी नज़र: ये मीडिया का कुकुर काल है !

चौथी नज़र: ये मीडिया का कुकुर काल है !

ये मीडिया का कुकुर काल है !



मीडिया की साख पर जैसा संकट इस वक्त खड़ा है वैसा पहले कभी था क्या ? बहुत सारे लोग आपातकाल के दौरान की मीडिया पर सवाल खड़े करते हैं। लेकिन आपाताकाल का जितना विरोध तब की मीडिया ने किया था वैसा विरोध सरकार के किसी फैसले का शायद ही कभी हुआ हो। राजनीति  में मर्यादाओं की चर्चा होगी तो आपातकाल की भी चर्चा होगी। तब इंद्र कुमार गुजराल सूचना-प्रसारण मंत्री हुआ करते थे। कहा जाता है कि संजय गांधी ने तब उनसे कहा था कि दूरदर्शन और आकाशवाणी पर सरकार विरोधी खबरों की संख्या कम करवाएं। इंद्र कुमार गुजराल ने तत्काल अपना इस्तीफा टाइप करवाया और इंदिरा गांधी के पास भेज दिया था। इस्तीफे की चिट्ठी मिलते ही गुजराल तलब किए गए। इस्तीफे की वजह पूछी गई। गुजराल ने तब कहा था कि आपातकाल से तो देश बाहर निकल जाएगा लेकिन मीडिया पर सरकारी नियंत्रण हुआ तो लोकतंत्र का दम घुट जाएगा। इंदिरा मनाती रहीं, उनके सामने ही संजय गांधी को डांटा भी लेकिन गुजराल ने इस्तीफा वापस नहीं लिया। ये थी तब की राजनैतिक मर्यादा। आज इतनी हिम्मत किसी मंत्री में नहीं कि वो प्रधानमंत्री के फैसले के खिलाफ चूं तक बोल पाए, इस्तीफा तो बहुत दूर की बात है। हलांकि तमाम बिदिशों के बावजूद तब के पत्रकार और संपादकों ने नागिन डांस नहीं किया और आपातकाल के खिलाफ खूब लिखा, खूब बोला और फिर जेपी आंदोलन में शामिल होकर इंदिरा सरकार की चूलें भी हिलाईं। आज मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वो सरकारी नीतियों, फैसलों की आलोचना कर सके या फिर उनसे हो रहे नुकसान की चर्चा कर सके। सरकार तो छोड़िए आलम ये है कि आज का मीडिया उस पार्टी का भोंपू बन गया लगता है जिसकी सरकार है। और जैसा कि प्रकृति का नियम है अपने मालिक के लिए दुम हिलाने वाले या भौंकने वाले को टुकड़ा मिलता है वैसे टुकड़े उछाले भी जा रहे हैं। इसी के साथ बेहद चालाकी से सारी नाकामी का ठीकरा मीडिया पर फोड़ा जा रहा है। आम आदमी के सवालों का तोप मीडिया की तरफ है। पहले महंगाई बढ़ने पर सरकार से सवाल पूछे जाते थे। अब मीडिया से पूछा जा रहा है कि 60 साल क्या सस्ते दिन थे जो अब महंगाई की बात हो रही है ? बेरोजगारी के मसले पर भी सवाल मीडिया से ही पूछे जा रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि पिछले 60 साल में सबको रोजगार मिल गया था क्या जो अब बेरोजगारी पर खबर चला रहे हो ? इसी तरह के सवाल तमाम मसलों पर मीडिया से पूछे जाने लगे हैं। बेहद चालाकी से सरकार ने, सरकार चला रहे सियासी दल ने आम आदमी के तमाम सवालों को मीडिया की तरफ मोड़ दिया है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जैसे महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, अस्पतालों की बदहाली के लिए मीडिया ही जिम्मेदार है । और मीडिया का काम सवाल पूछना है ही नहीं बस सरकार की चाकरी करना है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जिसमें सरकार से सवाल पूछने वाला देशद्रोही है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जिसमें सरकार को कुछ करना न पड़े और उसकी नाकामी का ठीकरा या तो पिछले 60 वर्षों पर फूट जाए या फिर मीडिया पर।  बेहद चतुराई से तमाम असहमतियों को मीडिया की तरफ मोड़कर सरकार जवाबदेही मुक्त होती दिख रही है। मेरा मानना है कि ख़बर किसी के पक्ष या खिलाफ़ में नहीं होती है। खबर बस खबर होती है। मसलन लखनऊ में एक गाड़ी में रात भर किसी लड़की से हुआ बलात्कार खबर ही है। ये योगी सरकार की मुखालिफत नहीं है। नोटबंदी के बाद देश में बढ़ी बेरोजगारी खबर भर है किसी सरकार का विरोध नहीं है। लेकिन मौजूदा माहौल में ये सरकार विरोधी ख़बरें बताई जा रहीं हैं और ऐसी ख़बरे लिखने-बोलने वाले देशद्रोही बताए जा रहे हैं। तो मीडिया के लिए जो दौर अभी चल रहा है वैसा दौर पहले कभी रहा तो बताइएगा ज़रूर। मेरी जानकारी में इजाफा होगा और शायद तब मैं कुछ अच्छा लिख पाने के काबिल बन पाऊंगा। फिलहाल लोग मीडिया को भांड, दल्ला और न जाने और क्या-क्या कह रहे हैं।

Sunday, April 23, 2017

वो भी बाबर तुम भी बाबर



 बाबर ने तुड़वा दिया मंदिर
तुड़वा दी सीता रसोई भी
तुड़वा दी करोड़ों लोगों की अस्था
तुड़वा दिया राजा के न्याय का भ्रम भी
जब टूटा होगा मंदिर तब फैली होगी दहशत
करोड़ों लोगों की आंखों में फैली होगी वहशत
तब हुआ होगा एहसास रियाया होने का
तब राजा की ताक़त के सामने
जनता की लाचारी, बेबसी साबित हुई होगी
और फिर राजा होने के दंभ से
जब चुनी गई होगी मस्जिद की दीवार
तब और बड़ी हुई होगी दहशत
तब और पसर गई होगी वहशत
ठीक वैसे ही जैसे पसरी 6 दिसंबर 1992 को
ठीक वैसे ही जब भीड़ की ताक़त ने
गिरा दी थी मस्जिद बहुसंख्यक होने के एहसास के साथ
और बताई गई अल्पसंख्यक को उसकी औकात
उसकी डरी आंखों में देखे गए अपनी जीत के आंसू
आबादी में उसके कम होने को समझा गया उसकी कमज़ोरी
ठीक वैसे जैसे बाबर ने ढहाया होगा मंदिर
वैसे ही तो गिराई थी मस्जिद भी
तो फिर बाबर को ग़लत बताने वाले
उतने ही ग़लत हैं जितना बाबर रहा होगा
तो फिर बताइए आप बाबर से अलग कहां हैं
बाबर लुटेरा था तो लुटेरा हैं आप भी
बाबर आक्रांता था तो आक्रांता हैं आप भी
बाबर आतातायी था तो आतातायी हैं आप भी
बाबर नें मंदिर गिराया था तो मस्जिद गिरा गए आप भी

Wednesday, April 12, 2017

अब भरम रह गए

तुम न तुम रह गए,  हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए
साथ चलकर भी मंजिल वो पा न सके
जिनके पीछे सफर में कदम रह गए
न खुशी रह गई, न गम रह गए
तुम न दुश्मन बने, न सनम रह गए....
तुम न तुम रह गए, हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए
अब तो एहसासों के बस कफन रह गए
मोहब्बत में कैसे कहें क्या मिला
चंद यादों के दिल में जख्म रह गए
तुम न तुम रह गए, हम न हम रह गए

अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए.

Friday, April 7, 2017

राजा राष्ट्रवाद पगुराता है

जन-गण-मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता है
भूखी जनता रोटी मांगे
राजा राष्ट्रवाद पगुराता है
कहे विदर्भ जब पानी-पानी
जब मराठवाड़े की सूखी जवानी
भूखे बुंदेलों का रोना
राष्ट्रद्रोह कहलाता है
राजा राष्ट्रवाद पगुराता है
जंगल छीनी, बेघर कबूतरा
जल-ज़मीन से वंचित बिरसा
झारखंड का पाहन रोता है, चिल्लाता है
राजा राष्ट्रवाद पगुराता है
छत्तीसगढ़ का निजाम बेरहम
आदिवासियों पर जुल्म-ओ-सितम
आंध्र का सलवा-जुडूम हत्यारा
असम-बंग को दंगों ने मारा
असहमत हर सवाल पाक परस्त कहलाता है

राजा राष्ट्रवाद पगुराता है

Thursday, March 23, 2017

एंटी रोमियो

60 वर्षों तक वामपंथी इतिहासकारों ने रोमियो और जूलियट की झूठी कहानी सुनाकर-सुनाकर देश को कांग्रेसियों के हाथ का खिलौना बनाए रखा। पहली बार देश में राष्ट्रवादियों की सरकार आई तो रोमियो-जूलियट की असली कहानी सामने आई। कहानी पढ़िए....
देववृंद (जिसे वामपंथियों ने देवबंद बना रखा है) नामक नगर में गोल बकर नाम के ब्राह्मण रहा करते थे। नगर के लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा गोल बकर के घर पहुंचा दिया करते और उनका आशीर्वाद लिया करते थे। ब्राह्मण और ब्राह्मणी इस नगर में बेहद खुश थे बाक़ियों के बारे पता नहीं। आनंद पूर्वक जीवन जी रहे इस जोड़े को माघ अमावस्य़ा की रात पुत्री की प्राप्ति हुई। अगली सुबह ही नगर वासियों को कह दिया गया कि गोल बकर पंडित के घर संतान उत्पति की खुशी में नगर में भोज का आयोजन होना चाहिए। नगर वासियों ने जिसके घर में जो था वो सब एक जगह जमा किया और भोज का आयोजन किया। खाना बन ही रहा था कि इसी बीच 4 साल का एक बच्चा आया और इलायची के पौधे से एक इलायची तोड़कर खीर में डाल कर दौड़ने लगा। नगरवासी परेशान हो गए। बच्चे ने न आचमन किया, न शुद्धीकरण और इलायची खीर में डाल दी। बात गोल बकर तक पहुंची। गोल बकर ने बच्चे को शाप दिया कि एक दिन ये बच्चा द्वेष, वैमनस्य के लिए तरसेगा और प्रेम के महाजाल में फंस जाएगा। धीरे-धीरे दिन बीतते गए। खीर में इलायची डालने वाले बच्चे का नाम रोमियो रखा गया और इधर गोल बकर ने अपनी बेटी का नाम जूलियट रखा। पांच साल की उम्र में ही जूलियट ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण सीख लिया और 9 साल का रोमियो फूलों और तितलियों के बीच अपना समय बर्बाद करता रहा। लेकिन ज्यों-ज्यों दोनों बड़े होते गए दोनों के बीच दोस्ती बढ़ती गई। जूलियट पूजा-पाठ के लिए रोज़ाना रोमियो को बाग़ में फूल तोड़ने लगी। दोनों पहले बाग़ में खेलते-कूदते थे फिर खुद रोमियो अपने हाथों लगाए पौधों से फूल तोड़ कर जूलियट को दे देता था। धीरे-धीरे नगर में ये बात पसरने लगी कि ब्राह्मण गोल बकर की बेटी एक मामूली लड़के के साथ खेलती-कूदती है। जब ये बात गोल बकर तक पहुंची तो उन्होंने बेटी के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी। लेकिन दोनों की गहरी रोस्ती खत्म नहीं हुई। रोमियो एक पेड़ की टहनी पर चढ़ जाता था और जूलियट खिड़की से उसे देखा करती थी। गोल बकर ने खिड़की हटवा कर वहां दीवार चुनवा दी। अब रोमियो गीत गाने लगा और तितलियों के ज़रिए संदेशा भिजवाने लगा। जैसे ही जूलियट की मां उसे खाना देने के लिए घर का दरवाज़ा खोलती एक फतिंगा घर में दाखिल हो जाता और रोमियो का संदेशा पहुंचा जाता। गोल बकर बेहद परेशान रहने लगा। रोमियो के संहार के लिए वो तपस्या करने लगा। एक दिन जब वो खा-पीकर ताड़ के पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा था तभी एक सियार वहां पहुंचा। सियार ने परेशान ब्राह्मण को देखा और बोला हे ब्राह्मण तुम नदी उस पार बसे बकलोलपुरी जाओ। वहां महाबली साबर बकर रहते हैं। उनके बल का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार वो सूर्य को अपनी जेब में रख कर फरार हो गए थे। इतना ही नहीं प्रशांत महासागर को पूरी तरह से पी गए थे। हिमालय पर्वत को तो अपनी अंगूठी का नग बनाकर पहन लिया था। तुम उन्हीं के पास जाओ वही इस रोमियो नाम के प्रेम प्राणी का संहार कर दुनिया में घृणा भाव की रक्षा करने में सक्षम है। गोल बकर चल पड़े। महाबली साबर बकर ने गोल बकर की पीड़ा सुनी तो आहत हो गए। एक तो अपनी जाति का मामला और दूसरा प्रेम जैसा अपराध। महाबली चल पड़े। अपनी पूरी घृणा सेना के साथ उन्होंने रोमियो पर हमला कर दिया। आज भी ये युदध जारी है। महाबली की घृणा सेना को रोमियो प्रेम से जवाब दे रहा है।

Friday, March 17, 2017

सत्ता का 'माया'जाल और वोटर का मोहभंग

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी का सूपड़ा साफ होना इस बात का संकेत है कि महज जातीय अस्मिता के सहारे सत्ता की सियासत नहीं चल सकती। दलित अस्मिता का जो मतलब हाल के दिनों में कुमारी मायावती ने विकसित किया वो इतना बस था कि नौकरशाही में बैठे दलित समुदाय के ठेकेदार, सियासी जमात में जमे-जमाए दलित और खाए-अघाए दलित समुदाय के वे लोग जो बौद्धिक जुगाली कर सकते हों। मायावती ये भूल गईं कि गांवों के दक्खिन टोलों में सबसे ज्यादा दलित बसते हैं।
वो टोले जहां मायावती की मूर्ति लगाई गईं हैं, जहां मायावती को किसी तारणहार से कम नहीं समझा जाता। उन गांवों में कांशीराम की मूर्तियां नहीं हैं, बाबा साहब की भी नहीं हैं, संत रविदास बाबा की भी नहीं हैं लेकिन मायावती की हैं। उस मायावती की जो कभी इन गांवों में कभी गईं ही नहीं।
मायावती ये भी भूल गईं कि जिस ज़मीन पर वो सत्ता की इमारत खड़ी करती रहीं हैं वो ज़मीन उनकी है ही नहीं। वो ज़मीन कांशीराम ने तैयार की थी। यूपी के किसी भी गांव की दलित बस्ती में चले जाइए आपको लोगों की आंखों में कांशीराम की यादें तैरती मिल जाएंगी। साइकिल से पहुंचे कांशीराम के क़िस्से सुनाते लोग और जिस घर में रुके वो घर दिखाते लोग ज्यादातर गांवों में मिल जाएंगे।
बहुजन समाज पार्टी को खड़ा करने से पहले कांशीराम ने राजनीति में दलितों को खड़ा होने का हुनर सिखाया। एक दिन में 60 से 80 किलोमीटर साइकिल चलाने वाले लोग इस दौर में नहीं मिल सकते। कांशीराम साइकिल से चलते थे। मायावती चार्टर्ड प्लेन से चलतीं हैं। कांशीराम तालाब, कुंओं का पानी पीते थे, मायावती मिनरल वाटर से पैर धोतीं हैं। कांशीराम ने दलित समाज को सत्ता-समाज से जोड़ा, मायावती ने सत्ता हासिल करने के लिए दलित समाज का इस्तेमाल किया। कांशीराम पिछड़े गांवों में बदबूदार नालियों के नजदीक चटाई और खाट पर सो कर दलित समाज को समझते और समझाते रहे थे, मायावती शानदार इमारत में तमाम सुविधाओं के बीच रहतीं हैं।
मायावती ने दलितों के लिए कभी संघर्ष किया हो ये उनको भी याद नहीं होगा। मायावती से किसी गांव का ग़रीब दलित कभी जाकर मिल ले ये सोचा भी नहीं जा सकता। गांवों में मुफलिसी की हालत में जी रहे दलित लोगों के साथ मायावती अपना कुछ मिनट भी बिता सकें ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता। यहीं मायावती हार गईं। हारना तो उन्हें बहुत पहले था। लेकिन कांशीराम की विरासत पर उनके कब्जे ने उनको अबतक बनाए रखा था। वो इकलौती ऐसी नेता रहीं जो कांशीराम की जमा-पूंजी का इस्तेमाल करतीं रहीं। लेकिन जमा की गई पूंजी कब तक खर्च की जा सकती है और चार्टर्ड प्लेन से कब तक गांव के दक्खिन टोलों से जुड़ा रहा जा सकता है ? तो मायावती की ये हार सबसे बड़ी हार नहीं है। यही आलम रहा तो मायावती को इससे भी बड़ी हार झेलनी होगी। मायावती का मौजूदा स्वरूप हारेगा तो दलित अस्मिता जीतेगी।
कांशीराम को क़िस्से और कहानियों में समेटने वाली हर कोशिश दलित विरोधी होगी। दलित अस्मिता की राजनीति करने वालों को ये समझना होगा कि बाबा साहब और कांशीराम के नाम के आसरे दलित भावनाओं को दलित बनाए रखने से पूरे समाज का नुकसान है। दलित समुदाय को सत्ता में, आरक्षण में, शिक्षा में, नौकरियां समेत तमाम क़िस्म के विकासवादी रास्तों पर बराबर की हिस्सेदारी देनी होगी। दलित समाज के भीतर एक सवर्ण खड़ा कर बाक़ी दलितों को बरगलाया नहीं जा सकता। गांव में दो-चार दलितों को तमाम सुविधाएं देकर बाक़ी दलितों को वोट के तौर पर इस्तेमाल करने का वक़्त खत्म तो होगा ही। दलितों को समानता के साथ समग्रता से समझने का नज़रिया अगर मायावती विकसित नहीं करेंगी तो कोई और कर लेगा।

Thursday, February 16, 2017

सत्ता


सत्ता तुम किस कदर
घृणास्पद होते गए..
किस कदर तुमने बदला
अपना रूप
विद्रूपताओं से जनमा, तुम्हारा अत्याचार
कहां-कहां नहीं बरपा....
तुम्हारे लिए सब
गिराते रहे मंदिरों को, मस्जिदों को
करवाते रहे दंगे लूटते रहे अस्मत....
और तुम....
हंसते रहे विवश होकर......

सत्ता सच बताना..
विद्रूपताओं पर अट्ट्हास करना
विरुपता का परिचायक नहीं क्या..
क्या कुछ और होता है
हिंस्र जानवर होना.....

सत्ता क्या ये सच नहीं
तुम एक मात्र कारण हो
अब तक के समस्त संघर्षों का...
तुम्हारे लिए ही क्या नहीं हुई
दुनिया की सारी जघन्यतम नरसंहारें.....
सत्ता तुम देखना
एक दिन तुम हो जाओगे इतने भयावह
कि लोग चाहेंगे मुक्ती तुमसे
चाहेंगे उपर उठना तुमसे भी
फिर टूटेगा तुम्हारा दर्प,
फिर टूटेगा तुम्हारा अहम
और मिट कर रह जाएगा तुम्हारा अस्तित्व

वक्त का तकाजा


वक़्त का तक़ाज़ा है, चलना ही पड़ेगा
जो नाग फन लहरा रहे, कुचलना ही पड़ेगा
न्याय की देवी, अब गुमान मत कर
तेरी आंखों की पट्टी को अब उतरना ही पड़ेगा

संसद के सत्ताधीश, कुनबों के मठाधीश
चाल-चरित्र, चेहरा बदलना ही पड़ेगा
हर रोटी की गोटी, जो हैं सेट कर रहे
मुर्दों की भांति उन्हें जलना ही पड़ेगा

हर वोट के लिए नोट, हर जन के लिए धन
संभलो ईमान को बदलना ही पड़ेगा
फूंक डालो महापंचायत को, आग लगा दो
एक रोटी का जुगाड़ जो कर नहीं पाया
उस पूरे सिस्टम को निगलना ही पड़ेगा

उठो गाण्डीव संभाल लो, हे भारत के लाड़लों
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अब लड़ना ही पड़ेगा
वक्त का तकाजा है, चलना ही पड़ेगा
जो नाग फन लहरा रहे, कुचलना ही पड़ेगा