Friday, April 13, 2018

अपनी बहन-बेटियों के लिए ही सही अब नागरिक की हैसियत में वापस लौटिए


कठुआ, उन्नाव और समस्तीपुर में हुई बलात्कार के बाद हत्या और बलात्कार की घटनाओं पर मचा शोर थोड़ा कम हुआ है। अब ज़रूरी है कि हम खुद से कुछ सवाल पूछें। सोशल मीडिया पर ये सवाल उठाया गया कि कठुआ में मुस्लिम लड़की की बलात्कार के बाद हत्या की गई तो मीडिया ने बहुत शोर मचाया और समस्तीपुर में हिंदू लड़की की रेप के बाद हत्या पर मीडिया ने कोई शोर नहीं मचाया। इस बेहूदा सवाल से भागना ठीक नहीं होगा। जिम्मेदार लोग फकीर नहीं होते जो सवालों से मुंह छुपाने कि लिए झोला उठाकर भाग जाएं। जिम्मेदार लोगों को जवाब देना होता है। बेहूदगी से भरे इस सवाल का जवाब नहीं दीजिएगा तो बेहूदगी बढ़ती जाएगी। कठुआ और समस्तीपुर की घटनाओं में समानता नहीं है इसलिए दोनों को एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। समस्तीपुर में बच्ची के साथ एक युवक रेप करता है और उसकी हत्या कर देता है। घटना सामने आते ही समाज और प्रशासन दोनों अपना काम करते हैं। जबकि, कठुआ में एक मंदिर में एक लड़की के साथ कई दिनों तक गैंगरेप होता है, पुलिस गैंगरेप करने वालों के बचाती रहती है और फिर अंत में लड़की की हत्या कर शव छुपाने की योजना भी पुलिस ही बनाती है। कहा तो ये भी जा रहा है कि एक पुलिस अधिकारी ने ये तक कहा कि अभी मत मारना मुझे भी मज़े ले लेने दो। क्या समस्तीपुर में भी ऐसा कुछ हुआ था ? नहीं न। तो फिर दोनों घटनाओं को  मीडिया में बराबर स्पेस कैसे मिल जाता ? समस्तीपुर की घटना के बाद क्या किसी मुस्लिम संगठन ने बलात्कारी के पक्ष में रैली निकाली ? नहीं, लेकिन कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ कई दिनों तक मंदिर में गैंगरेप होता रहा, उसकी हत्या की गई और हिंदूवादी संगठन ने बलात्कारियों के पक्ष में रैली की। इस रैली में जय श्री राम के नारे लगे। ऐसा इस देश में पहली बार हुआ जब बलात्कारियों के पक्ष में उन्मादी धार्मिक गोलबंदी करने की कोशिश की गई। हाथ में तिरंगा लेकर, जुबान पर जय श्री राम लेकर बलात्कारियों के पक्ष में भीड़ खड़ी दिखी। इसलिए समस्तीपुर और कठुआ की घटनाओं को आप एक चश्मे से न देखें। कठुआ में बलात्कारियों के समर्थकों के हाथों में लहराता तिरंगा कितना गौरवान्वित हुआ होगा ये तिरंगा ही जाने, बलात्कारी-हत्यारों के जुबान से जय श्री राम के नारे सुन राम कितने फूले समाए होंगे ये राम ही जानें। मेरी समझ में यह तिरंगे का घोर अपना था और राम की मर्यादाओं के साथ बलात्कार था। वैसे पहले भी ये तबका राम के जयकारे उनकी भक्ति में नहीं लगाता रहा है। पहले भी राम के जयकारे सत्ता की भूख में लगते रहे हैं और अब जिस्म की भूख में लगने लगे हैं। इसलिए हर घटना में हिंदू-मुस्लिम करने वाले इस वक्त अपने घर में अपनी मां-बहन के साथ बैठें और जरा उनसे स्त्री देह की गरिमा समझने की कोशिश करें।
   अब बात उन्नाव वाली घटना की। उन्नाव वाली घटना इतनी बड़ी नहीं होती अगर सत्ता-प्रतिष्ठान ने ठीक से काम किया होता। सत्ता-प्रतिष्ठान ने एक आरोपी को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लड़की को खामोश करने की पूरी किशिशें हुईं, लड़की के पिता की हत्या सत्ता-समाज ने की और फिर किस्म-किस्म के बेहूदा तर्क सत्ता-समाज ने गढ़े। डीजीपी ने कहा कि आरोपी विधायक के खिलाफ इतने साक्ष्य नहीं कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सके लेकिन, वहीं डीजीपी ये नहीं बता पाया कि पीड़ित लड़की के पिता के खिलाफ कौन से साक्ष्य थे कि उनको गिरफ्तार कर लिया और फिर पीट-पीट कर मार डाला।   
   आप कोसिए, सबको कोसिए। सरकार को, पुलिस को, राजनेता को कोसते-कोसते अगर आप खुद को भी नहीं कोस रहे हैं तो यकीन मानिए आप ईमानदार नहीं हैं। बलात्कार को हिंदू-मुस्लिम के खांचे में धकेलने वाला समाज बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकता है। बलात्कार के पक्ष में रैलियां करने वाला समाज बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकता है। बलात्कारी नेता के पक्ष में कुतर्क गढ़ने वाली भीड़ बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकती है। बलात्कार के पक्ष में खड़ी राजनैतिक विचारधारा बलात्कारी ही हो सकती है।
     इसलिए ज़रूरी है कि अभी भी आप समर्थक और भक्त की हैसियत से ऊपर उठ कर आम नागरिक की हैसियत में वापस लौटिए, हिंदू-मुस्लिम के सिकुड़े दायरे से बाहर निकलिए और दूसरों की बहन बेटियों कि फिक्र तो दूर की बात, अपनी ही बहन-बेटियों को इन उन्मादियों से बचा लीजिए।   

Wednesday, February 21, 2018

न तो नीरव कोई पहला किस्सा है और ना ही देश की लूट कोई पहली कहानी


पशुपालन घोटाले में लालू प्रसाद का नाम आने से वो घोटाला बहुत बड़ा हो गया। वरना उनसे बड़े घपले-घोटाले कर के आईपीएल वाले ललित मोदी, किंगफिशर वाले विजय माल्या और मुकेश अंबानी के रिश्तेदार नीरव मोदी ऐश ही तो कर रहे हैं। दरअसल लालू राजनीति की चुनौती थे, माल्या मोदी राजनीति के मददगार हैं। लालू प्रसाद को घोटाले के बाद मीडिया ट्रायल का जैसा सामना उन्हें करना पड़ा वैसा मोदी-माल्या को नहीं करना पड़ा। लालू प्रसाद के मामले में राजनीति ने जितनी ताकत लगाई उतनी मोदी-माल्याओं में कभी भी नहीं लगाएगी क्योंकि, लालू प्रसाद को कमजोर कर सत्ता हासिल करने की तमाम गुंजाइश हैं लेकिन, मोदी-माल्याओं को कमजोर कर पार्टियां खुद का कुबेर कमजोर नहीं कर सकतीं।
      भारत में सार्वजनिक संपत्ति की लूट का इतिहास बहुत पुराना है। लेकिन राजनीति बड़ी ही होशियारी से सिर्फ कुछ राजनेताओं से जुड़े घोटालों को मसला बनाकर बड़ी लूट को छुपाती रही है। ये सिर्फ भारत में ही नहीं हुआ है वरन पूरी दुनिया में हुआ है।
    अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान जैसे पूंजीपति देशों के चंद पूंजीपतियों ने गरीब और विकासशील देशों के कुछ व्यापारियों को मिलाकर दुनिया की बड़ी आबादी को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएं इसी मकसद से खड़ी ही की गईं कि इनके जरिए दुनिया की बड़ी आबादी पर आर्थिक शासन थोपा जा सके।
   भारत समेत एशिया के ज्यादातर देशों की बड़ी आबादी उसी आर्थिक गुलामी का शिकार है। मालिकों के लिए मुनाफा पैदा करने वाली ये भीड़ पूंजवादी मुनाफे के लिए अपनी हड्डियां गलाती रहे इसके लिए सरकारें पूंजीपतियों के सामने खड़ी नजर आती हैं।  
  आपको ये जान कर बेहद हैरानी होगी कि दुनिया की 85 फीसदी संपदा महज 20 फीसदी लोगों के पास है। बाकी की 15 फीसदी संपदा में दुनिया की 80 फीसदी आबादी जैसे-तैसे जीने के लिए अपनी हड्डियां गला रही है। वर्ल्ड इंस्टिट्युट ऑफ डेवलपमेंट इकॉनामिक रिसर्च के मुताबिक दुनिया के महज 1 फीसदी अमीरों ने दुनिया की 40 फीसदी सपंदा हथिया ली है। दुनिया की 85 फीसदी संपदा पर 10 फीसदी अमीरों का कब्जा है।
   अब बात भारत की। प्रत्यक्ष विश्व बैंक के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के 86 फीसदी लोगों की एक दिन की कमाई 80 रुपये से भी कम है और महज 1 फीसदी संपदा के सहारे कुल आबादी के 30 फीसदी लोगों को जीना पड़ रहा है।
   इसलिए किसी एक माल्या या मोदी के घोटाले कर लेने भर से देश बर्बाद हुआ है ये सिर्फ और सिर्फ प्रौपेगंडा है। ये प्रौपेगंडा वो खड़े करते हैं जिनको पूंजीपतियों ने अपने पैसों के बल पर खड़ा किया है और जिनको इसी किस्म के प्रौपेगंडा के लिए वो पालता रहा है। इसमें मीडिया, राजनीतिक दल और कॉर्पोरेटर शामिल होते हैं।
   हमें मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को समझने की कोशिशें करनी होंगी। पहले विश्व युद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तहस-नहस हो गई थी। तब यूरोप में जनक्रांति की तमाम संभावनाएं थीं लेकिन जनता ने न कोई क्रांति की और ना ही कोई विरोध हुआ। ऐसा क्यों हुआ ? दरअसल सत्ताधारी वर्ग सिर्फ उत्पादन पर ही नियंत्रण नहीं रखता वो विचारधारा पर भी पूरी तरह से नियंत्रण रखता है। वो अपने हित की बात को ही राष्ट्र और धर्म से जोड़ता है और फिर उसी को विचारधारा के तौर पर जनता पर थोप देता है। ऐसे ही सत्ताधारी वर्ग संस्कृति को अपने नियंत्रण में लेता है और फिर जन समान्य की श्रद्धा का अपने हिसाब से प्रबंधन करने लगता है।
  इसलिए आप सिर्फ किसी मोदी या माल्या में मत उलझ जाइए। देश की कुल संपदा में आपकी हिस्सेदारी कितनी है और पांच बड़े अमीरों की हिस्सेदारी कितनी है इसका आकलन कीजिए और फिर व्यवस्था से पूछिए कि आपका बाकी का हिस्सा है कहां। क्योंकि, जान लीजिए तमाम किस्म के राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक प्रौपेगंडा इसीलिए खड़े किए जाते रहें हैं ताकि आप उसमें उलझे रहें और किसी भी दिन अपना हिस्सा न मांग सकें।        

Monday, February 19, 2018

एक खत, हर आतंकवादी के नाम



प्रिय बुरहान वानी,
मुझे तुम्हारे मारे जाने का दुख है। लेकिन जी कर भी तुम क्या करते सिवाय बगुनाहों के कत्ल के । दुख है कि देश का एक नवजवान पहले रास्ता भटका और अब मारा गया। चलो अच्छा ही हुआ। वैसे तुम जिंदा होते तो शायद किसी दिन ये समझ पाते कि जो रास्ता तुमने चुना वो तुम्हारे अल्लाह ताला के खिलाफ बग़ावत का रास्ता है, वो इस्लाम के ख़िलाफ बग़ावत का रास्ता है। तुम ज़िंदा होते तो शायद किसी दिन ये देख पाते कि तुम इंसानियत का दुश्मन हो गए थे, तुम अल्लाह ताला की बसाई दुनिया उजाड़ रहे थे। फिर तुम एक दिन भटके लोगों को रास्ता दिखाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तुम उसी फौज की गोली का शिकार हो गए जिस फौज पर तुम्हें आतंकी बनाने का आरोप है। बताया जा रहा है कि तुम अपने भाई के मारे जाने के बाद बदले की भावना का शिकार हो गए। 
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    बुरहान, तुम्हारे कश्मीर से ही लाखों कश्मीरी पंडितों को उजड़ना पड़ा था। जिस वक्त वो उजड़ रहे थे उस वक्त उनकी दुनिया उजड़ रही थी। उस वक्त न जाने कितनों के भाई, पिता, बेटे मारे गए थे। क्या कोई कश्मीरी पंडित मिलिटेंट बना? वो बदला लेने निकला? नहीं न। तुम भी नहीं निकलते। जानते हो तुम क्यों मिलिटेंट बने ? तुम इसलिए मिलिटेंट बने क्योंकि कोई तु्म्हें, तुम जैसे भारतीय नवजवानों को मिलिटेंट बनाना चाहता था, आज भी चाहता है। वो लगातार हिंदुस्तानियों के खिलाफ हिंदुस्तानियों के हाथ में बंदूक थामाता जा रहा है और लगातार हिंदुस्तानियों के हाथों हिंदुस्तानियों का क़त्ल करवाता जा रहा है। तुम उसके बहकावे में आ गए। तुम्हारे जैसे हमारे हजारों नवजावन उनके बहकावे में आते रहे हैं। घाटी में ऐसे हज़ारों दलाल बेठै हैं जो तुम जैसे नवजवानों को अपने मुल्क के खिलाफ, कौम के खिलाफ और इंसानियत के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं। 
     बुरहान, कौम के नाम पर जिस शख्स ने तुम्हें हथियार उठाने के लिए उकसाया था क्या उसका बेटा बाग़ी है क्या? क्या उसने खुद हथियार उठाए हैं? क्या तुमने कभी ये जानने की कोशिश की ? क्या तुमने कभी ये सवाल पूछा कि ये लोग देखते-देखते अमीर कैसे हो गए? क्या तुमने कभी ये सोचा कि जिस सरज़मीं पर खुदा ने तुम्हे पैदा किया है तुम उसी सरज़मीं को खुदा के बंदों के खून से रंग रहे हो?
   निश्चित तौर तुमने न तो कभी ये सवालात उठाए न सोच पाए। तुम तो गोलियों में भरोसा करने लगे थे। तुम तो खुदा की बनाई दुनिया को उजाड़ने में लगे रहे। तुम तो अपने मुल्क के दुश्मनों के हाथ का खिलौना बने रहे।
   बुरहान, तुमने कभी किसी उस मां का सामना किया है जिस मां के बेटे की मौत तुम्हारी गोलियों से हुई हो? कभी उस मासूम से मिले हो जिसे तुमने यतीम किया हो? कभी उस बेवा से मिले हो जिसका शौहर तुम्हारी गोलियों का शिकार हुआ हो? 
   बुरहान, जिस इस्लाम के नाम पर तुम गोलियां बरसाते रहे उसी इस्लाम की राह पर कभी चल पाए तुम? तुम जब मारे गए उस वक्त तुमने जमकर शराब पी थी। शराब तो हराम है न? तो क्या जवाब दोगे अपने अल्लाह ताला को? 
हम तो यही दुआ करेंगे कि अल्लाह तुम्हें माफ करें।

बिसात पर अंबेडकर और हाशिए पर दलित

मन में अंबेडकर, मिजाज में अंबेडकर, दिल में अंबेडकर, दिमाग़ में अंबेडकर, राह में अंबेडकर, आह में अंबेडकर, लेकिन उद्दश्यों में अंबेडकर नहीं हैं। उद्देश्य तो सत्ता प्राप्ति की है, चाह तो सत्ता की है और इस चाह में अंबेडकर समा नहीं सकते। तो फिर अंबेडकर को प्रतीक बनाना पड़ा। भारत की राजनीति प्रतीकों के सहारे चलती रही है। कभी गांधी प्रतीक थे, कभी राम प्रतीक बने और आज अंबेडकर बनाए जा रहे हैं। तभी तो हिंदू धर्म के आडंबरों को खारिज कर बौद्ध बने अंबेडकर उन लोगों को भी भाने लगे हैं जो हिंदू राष्ट्र के सपने देखा करते हैं और जिनके लिए बुद्ध और कबीर हिंदू विरोधी हैं।
Copyright Holder: ASIT NATH TIWARI
तो झंडों और डंडों पर हैं अंबेडकर, मंचों और नारों में हैं अंबेडकर। और अंबेडकर का समाज, वो तो आज भी उसी गंदी बस्ती में है जिससे निकालने के लिए अंबेडकर ने संघर्ष किया और सबके निशाने पर आए। वो आज भी अपनी ही धर्म व्यवस्था का शिकार है और हाशिए पर खड़ा गांव के दक्खिन वाली बस्ती में जीने की विवशता की गवाही दे रहा है। नारों, झंडों में अंबेडकर को ढोने वाले मंचों के रास्ते शाही दरबार तक पहुंच गए, शहंशाह हुए और दलित समाज को वहीं का वहीं खड़ा रखा जहां से निकालने का संघर्ष अंबेडकर ने खड़ा किया था।
तो सच ये है कि अंबेडकरवाद को भी गांधीवाद और लोहियावाद जैसे लबादे में लपेट कर राजनीति की बिसात पर रख दिया गया है। जहां मकसद अंबेडकर को पाना नहीं, अंबेडकर के नाम पर सत्ता पाना है। अहिंसा के इस पुजारी के नाम खड़ा संगठन भीम आर्मी लोगों से हथियार उठाकर हमलावर होने की खतरनाक अपील कर रहा है तो समाज का संघर्ष खड़ा करने वाले अंबडेकर के नाम राजनीति करने वाले नेता पूरे दलित समाज को सिर्फ और सिर्फ वोटबैंक की दलदल बनाए रखने की तमाम कवायदें करते दिख रहे हैं।

Sunday, February 18, 2018

भूख: दूर तक फैला हुआ बेबसी का इक समंदर

उत्तर प्रदेश के सीतापुर में 70 साल की एक बुजुर्ग महिला पड़ोसियों के रहम-ओ-करम पर जिंदा हैं। जिले के इमलिया सुल्तानपुर के तिहार गांव की ये महिला विधवा भी हैं और बेऔलाद भी। गांव में एक जर्जर झोपड़ी है जिसमें सिर छुपाने की जगह मिल जाती है। जब तक सेहतमंद थीं मजदूरी का आसरा था लेकिन अब बूढ़ी हड्डियां साथ नहीं देतीं। लिहाजा गांव वालों ने सिस्टम की बुनियादी खराबियों और गरीबी के अधिकारों का इस्तेमाल कर इनका नाम गीरीबी रेखा वाली सूची में डलवाया। उम्मीद थी हर महीने इन्हें सस्ता राशन मिल जाएगा और बूढ़े बदन को जिंदा रखने की खातिर चार रोटियां मिल जाएंगी। गांव वालों की उम्मीदें धरी की धरी रह गईं और ढिंढोरा वाली योजनाओं का राशन बाजार में बिकता गया।
       कोटेदार ने इस बूढ़ी महिला को पिछले डेढ़ साल से छटांक भर अनाज नहीं दिया है। शहर होता तो ये महिला भूख की मौत मर चुकी होती। गांव है तो गांव वाले हैं, गंवई रवायत है और पड़ोस में पकने वाली रोटियों में इस मां की हिस्सेदारी भी है। रोज़ाना कोई न कोई दो-चार रोटियां दे जाता है और बूढ़े बदन में झुरझुरी आ जाती है। देश भर में भारत माता की जय के नारों के बीच कई बूढ़ी माताएं भूख से बिलख रहीं हैं। 
     सीतापुर के तिहार की इस बूढ़ी माता को नारों का मतलब समझ में नहीं आता, ये आधार और पैन कार्ड नहीं जानतीं। इनके पास एक राशन कार्ड है। इनको बताया गया था कि राशन कार्ड बनने के बाद कोटे से राशन मिलेगा लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। राशन कार्ड लेकर ये बार-बार कोटेदार के पास जाती रहीं और कोटेदार इनको अब तक लौटाता ही रहा है। बताया जा रहा है कि कोटेदार के पास जो सूची है उसमें इनका नाम नहीं है। ये भारत को वो सच है जिसका जिक्र लाल किले से नहीं किया जाता। ये भारत का वो सच है जो नारों में नहीं दिखता है। बेबसी का ये समंदर दूर तक फैला हुआ है। 

वंशवाद: सवाल सिर्फ कांग्रेस से ही क्यों ?

दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय से निकली बात गुजरात के धरमपुर पहुंचते-पहुंचते मुगलिया सल्तनत तक पहुंच गई। राहुल की ताजोपशी का रास्ता क्या साफ हुआ तुलना औरंगजेब की ताजपोशी से हो गई। लेकिन मुगलिया सल्तनत की नजीर पेश करने वाले ये भूल गए कि सत्ता की विरासत वंश की विरासत तक सिर्फ मुगलों ने नहीं पहुंचाई, राजा दशरथ की विरासत भी उनके बेटे रामचंद्र ने ही संभाली थी। लेकिन, ये बातें राजतंत्र की हैं। उस प्रजातंत्र की नहीं जिसके बारे में बताया गया कि ये जनता के लिए, जनता द्वारा जनता का शासन है। तो फिर इस खांचे में मौजूदा जनतंत्र कहां फिट होता है? कांग्रेस में नेहरु-गांधी परिवार की ताजोपशी पर हर बार सवाल उठे हैं लेकिन, एक बड़ा सच ये है कि देश की जनता ने हर बार कांग्रेस के नेहरु-गांधी परिवार को सिर-आंखों पर बैठाया है। चाहे वो दौर मोतीलाल नेहरु का रहा हो या फिर जवाहर लाल का, दौर इंदिरा गांधी का रहा हो या राजीव गांधी का। देश ने देखा कि कैसे सोनिया गांधी के नेतृत्व पर भरोसा जताकर देश ने अटल बिहारी बाजपेयी जैसे नेता को सत्ता से दूर कर दिया। तो मतलब साफ है कि विरोधियों को हर बार कांग्रेस के वंशवाद ने नहीं देश की जनता ने जवाब दिया है। तो याद कीजिए कांग्रेस में सीताराम केसरी का दौर। नेहरु-गांधी परिवार से इतर पार्टी का नेतृत्व जब भी गया है देश की जनता ने कांग्रेस को नकार दिया है। तो सच ये भी है कि लोकतंत्र के ढांचे में कांग्रेस का नेहरु-गांधी परिवार वंशवाद नहीं जनता के भरोसे का प्रतीक रहा है।
और सच ये है कि परिवारवाद हर जगह देखने को मिलता है। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर ही बनना चाहता है, बिजनसमैन का बेटा बिजनसमैन। ऐसा माना जाता है कि लोकतन्त्र में वंशवाद के लिये कोई जगह नहीं है लेकिन, फिर भी विरासत की सियासत भारतीय राजनीति का अटूट हिस्सा बन गई है। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद का नामांकन भरते ही एक बार फिर वंशवाद की बहस ने जोर पकड़ लिया है। राजनीतिक हलकों में एक बार फिर सियासत में विरासत को लेकर हलचल मच गई है। एक तरफ राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हो गई है। राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने को राजनीतिक विरासत के तौर पर देखा जा रहा है। यूं तो देश की 130 साल पुरानी पार्टी कांग्रेस को हमेशा से ही वंशवाद का तमगा हासिल हुआ है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पं.नेहरु, इंदिरा से लेकर सोनिया-राहुल तक सब विरासत की सियासत में लिपटे नजर आते हैं। सच्चाई तो ये है कि देश में अगर वामपंथी दलों के छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई दल ऐसा हो जो वंशवाद से अछूता हो। पूरब से लेकर पश्चिम तक उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश की सियासत में विरासत के रंग साफ तौर पर देखने को मिलते हैं। भारत के बड़े राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक और दक्षिण से लेकर पंजाब तक परिवारवाद की हनक दिखाई देती है। तो फिर सिर्फ कांग्रेस पर ही वंशवाद के आरोप लगाना कहां तक जायज है? और सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो ये है कि कांग्रेस पर वंशवाद के आरोप वो लगा रहे हैं जिनके दामन खुद सियासत की विरासत के रंग में रंगे हैं। देश की सभी सियासी पार्टियां परिवारवाद के आगोश में लिपटी हैं। भारतीय राजनीति के कई बड़े चेहरे, कई बड़े दल इसी वंशवाद की चपेट में हैं। ऐसा क्यों है कि अक्सर सियासी हलकों में बहस सिर्फ गांधी परिवार को लेकर ही उठती दिखाई देती है? यकीनन राहुल का जन्म देश के सबसे शक्तिशाली सियासी परिवार में हुआ है लेकिन, राहुल गांधी की हैसियत का अंदाजा क्या सिर्फ इससे लगाना ठीक होगा कि उनका जन्म गांधी परिवार में हुआ। नहीं... आज राहुल को भारतीय राजनीति का परिपक्व और बड़ा चेहरा माना जाता है। गांधी परिवार से इतर देश की सियासत में राहुल की अपनी अलग पहचान है।
देश की राजनीति में हावी वंशवाद को देखिएगा तो नेहरु-गांधी परिवार से अलग कई उदाहरण सामने होंगे।
दक्षिण का सियासी कुनबा
दक्षिण भारत की सियासत में भी वंशवाद हावी है। तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी डीएमके में भी वंशवाद की जड़ें गहरी हैं। करुणानिधि की पार्टी में उनके परिवार के लोग पूरी तरह से काबिज हैं। मौजूदा समय में डीएमके की कमान करुणानिधि के बेटे स्टालिन के हाथों में है। उनके नाती दयानिधि मारन और बेटी कनिमोरी का पार्टी में दबरदस्त दबदबा है।
महाराष्ट्र में ठाकरे राज
महाराष्ट्र की सियासत में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना में पूरी तरह से परिवारवाद का कब्जा है। बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना बनाई थी। बालासाहेब ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव ठाकरे को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपी थी और अब उद्धव ने अपने बेटे आदित्य को युवाओं के नेतृत्व की कमान सौंप दी है
वंशवाद से अछूता नहीं कश्मीर
जम्मू-कश्मीर की दोनों प्रमुख पार्टियों में वंशवाद की जड़ें गहरी हैं। जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कॉन्फ्रेंस की तीसरी पीढ़ी उमर अब्दुला के हाथों में पार्टी की कमान है। उमर के पिता फारुक अब्दुला सांसद हैं। मुफ्ती मुहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी की कमान उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में है, महबूबा मुफ्ती मौजूदा समय में जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री हैं।
पंजाब का सियासी विरासत
पंजाब की सियासत में सियासी घराने ही अहम भूमिका निभा रहे हैं। पंजाब की सियासत में अकाली दल और कैप्टन अमरिंदर सिंह का वर्चस्व देखने को मिलता है। अकाली दल की कमान बादल परिवार के हाथों में है।
हरियाणा में परिवारवाद
देवी लाल, बंसी लाल और भजन लाल का कभी हरियाणा की राजनीति में काफी दबदबा हुआ करता था लेकिन, इनके बाद प्रदेश की राजनीति में उनके परिवारों का असर बना हुआ है। इन तीनों का जिक्र हरियाणा की राजनीति में वंशवाद का उदाहरण है
बीजेपी में गहरी हैं परिवारवाद की जड़ें
कांग्रेस के परिवारवाद पर सवाल उठाने वाली बीजेपी भी वंशवाद की राजनीति से अलग नहीं है... बीजेपी की सियासत में एक फौज परिवारवाद से आई है...
विजयाराजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया दूसरी बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनी हैं
यशोधरा राजे सिंधिया शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट में मंत्री हैं
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे सांसद हैं
बीजेपी के सबसे बड़े नेता कल्याण सिंह के बेटे सांसद हैं, और पोता विधायक और मंत्री हैं
यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा मोदी कैबिनेट में मंत्री हैं
राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह नोएडा से बीजेपी विधायक हैं
हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पीके धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर बीजेपी से सांसद हैं
केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी सुल्तानपुर से बीजेपी सांसद हैं
बीजेपी नेता प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन मुंबई नॉर्थ सेंट्रल से लोकसभा सांसद हैं
पूर्व केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं
लालजी टंडन के बेटे गोपालजी टंडन देवरिया से बीजेपी विधायक हैं
जाहिर है कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाने वाली बीजेपी का दामन खुद सियासत में विरासत से रंगीन है
सपा है देश का सबसे बड़ा सियासी कुनबा
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में तो परिवारवाद पूरी तरह हावी है। देश में सबसे बड़ा सियासी कुनबा मुलायम सिंह यादव का है। मुलायम परिवार के दो दर्जन से ज्यादा लोग राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। बेटे अखिलेश यादव, बहु डिंपल यादव, भाई शिवपाल सब सपा के बड़े चेहरों में शुमार हैं। मुलायम परिवार के सदस्य सांसद से लेकर पंचायत तक में काबिज हैं। सपा के मौजूदा पांचों सांसद मुलायम परिवार से हैं। उनके बेटे अखिलेश यादव यूपी का मुख्यमंत्री रह चुके हैं और फिलहाल पार्टी के अध्यक्ष हैं...
वंशवाद से दूर नहीं मायावती
कांग्रेस और दूसरे दलों पर हमेशा वंशवाद को लेकर तंज कसने वाली मायावती खुद वंशवाद से अछूती नहीं हैं। मायावती ने भी मुलायम की राह अपनाई है। मायावती ने पार्टी में दूसरे नंबर का दर्जा देते हुए अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे अकाश को पार्टी में अहम पद से नवाजा है।
आरएलडी में भी हावी वंशवाद
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की पार्टी लोकदल जो बाद में आरएलडी बनी, पर उनके बेटे अजित सिंह का कब्जा कायम है। उन्होंने अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए बेटे जयंत चौधरी को भी पार्टी में अहम भूमिका दे रखी है।
लालू प्रसाद यादव का सियासी कुनबा
बिहार की सियासत में वंशवाद की बात हो तो भला लालू प्रसाद यादव को कोई कैसे भूल सकता है। बिहार की सियासत में सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा लालू प्रसाद यादव का है। लालू प्रसाद की पत्नी राबड़ी देवी उनके जेल जाने के बाद मुख्यमंत्री रहीं और अब बेटी राज्यसभा सांसद हैं। साथ ही लालू के दोनों बेटे तेज प्रताप यादव और तेजस्वी नीतीश कुमार के साथ गठबंधन सरकार में मंत्री रहे हैं। लालू का लगभग पूरा कुनबा राजनीति में सक्रिय है। एक समय में उनके दोनों साले साधु और सुभाष यादव का बिहार की राजनीति में जलवा था।
पासवान के जूनियर पासवान
बिहार की सियासत में रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी भी वंशवाद से अछूती नहीं है। पासवान के बाद पासवान के बेटे चिराग पासवान भी राजनीति में उतरे। चिराग ने 2014 में चुनाव लड़ा और सांसद बने।
वंशवाद सिर्फ यूपी और बिहार तक ही सीमित नहीं है। पंजाब, कश्मीर, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक, ओडीशा, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश हर जगह ये वंशवाद देखने को मिलता है। तो फिर हर सवाल कांग्रेस से ही क्यों ?

भाजपा के हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस का हिंदुत्व



गांधी के गुजरात में गोधरा के कलंक का धब्बा लगा तो पूरी दुनिया में संदेश गया कि भारत का गुजरात उग्र हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला बन गया है। गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में दहकती आग में साबरमती के संत के संघर्ष भी धधक गए। हिंदुत्व का ऐसा उग्र स्वरूप राम मंदिर आंदोलन के दौर में भी नहीं दिखा था। तब गुजरात सहमा, अब संभलता दिख रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में उग्र हिंदुत्व के सामने जैसे ही नरम हिंदुत्व खड़ा हुआ बीजेपी की पेशानी पर बल पड़ने लगे। ये हिंदुत्व की सियासत को दूसरा रास्ता दिखाने का दांव था। राहुल गांधी के माथे पर तिलक, दाहिनी कलाई पर लाल और भगवा रंग के धागे और बाईं कलाई पर काले रंग का धागा। और फिर सहिष्णु हिंदू की छवि।
और फिर पंथ निरपेक्षता पर गर्व करता हिंदुत्व। और फिर इलाहाबाद के संगम तट पर मुगल शासक अकबर के बनवाए किले को स्वीकार कर आगे बढ़ता हिंदुत्व। तो जाहिर है उग्र हिंदुत्व की सोच की परेशानी बढ़नी थी। उस सोच को उन्मादी हिंदुत्व की ज़रूरत है। उस सोच को विध्वंस का आसरा है, गोधरा के बाद हुए गुजरात पर ही भरोसा है। तो उस सोच को सनातनी परंपरा के उस धागे से परेशानी होने लगी जिसे धारण कर वो गौरवान्वित होता रहा है। उसे राहुल गांधी के जनेऊ ने परेशान कर दिया। उग्र हिंदुत्व को जनेऊ से परेशानी होने लगे तो फिर इसके सियासी मतलब तो बड़े होंगे ही।
मंदिर-मंदिर घूमती सियासत के मायने भी तलाशे जाने चाहिए। हिंदुवादी सियासत की नई बिसात बिछा रही कांग्रेस विवादित मुद्दों से बचती रही और अपनी पारंपरिक राजनीति को कांग्रेस से चुनौती पाती देख बीजेपी जनेऊ से लेकर राम मंदिर के मसले को उठाती रही। हद तो ये कि मंदिर जाने से भी परेशानी होने लगी, इतनी परेशानी कि बात राहुल गांधी के नाना तक पहुंच गई.
तो कांग्रेस की रणनीति में बीजेपी उलझती दिखी। कांग्रेस ने बड़ी साफगोई से बिना कोई विवदाति मुद्दा छुए बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे में सेंध लगा ली। सेंध ही नहीं लगाई बल्कि सॉफ्ट हिंदुत्व की एक नायाब बिसात भी बिछा दी। और फिर कांग्रेस की बिसात पर बीजेपी नेताओं को उतरना पड़ा
ऐसा पहली बार हुआ जब बीजेपी की पारंपरिक राजनीति को कांग्रेस ने नरमी से डील करने की कोशिश की और उसकी बिसात पर ही अपनी डिफेंसिव चाल चल दी। हिंदुत्व की बिसात पर कांग्रेस की चाल का अंदाजा शायद बीजेपी को था नहीं। और शायद यही वजह है कि आनन-फानन में बीजेपी ने राम मंदिर मसले को किनारे लगाया और गुजरात चुनाव में पाकिस्तान का एंगल खोजा। तो गुजरात चुनाव को महज किसी राज्य का चुनाव ही मानिए लेकिन, गुजरात चुनाव में बिछाई गई कांग्रेसी बिसात को गुजरात के दायरे से बाहर भी महसूस कीजिए। सॉफ्ट हिंदुत्व का ये कार्ड उग्र हिंदुत्व से ही अपनी हिस्सेदारी अलग करेगा।

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