Saturday, September 15, 2018

मस्जिद में मोदी: ये जंतर बांध लीजिए

ये तस्वीर भर नहीं है। ये एक जंतर है। इस जंतर को गिरिराज सिंह, साक्षी महाराज जैसे बीजेपी नेताओं को बांध लेना चाहिए। हिंदू राष्ट्र के नारे बुलंद करने वालों को ये जंतर अपनी जेब में डाल लेना चाहिए। जिस हिंदू का खून ना खौला खून नहीं वो पानी है कहने वालों को अपने गले में इसे लटका लेना चाहिए। जो ये कहते फिर रहे हैं कि मोदी के पीएम बनते ही राहुल गांधी मंदिर जाने लगे उन्हें ये भी कहना चाहिए कि राहुल के मंदिर जाने से मोदी मस्जिद जाने लगे। क्योंकि सच ये है कि ये भारत का प्रधानमंत्री होने की मजबूरी है। मुसलमानों के बीच हाथ जोड़ कर खड़े होने वाला ये कोई बीजेपी नेता भर नहीं है। मस्जिद में जाकर खुद को मुसलमानों के बीच का बताने वाला ये कोई वो नेता नहीं है जो राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार था। खुद को मुसलमानों के बीच का बताना वाला ये शख्स भारत का प्रधानमंत्री है। और यही प्रधानमंत्री होने की मजबूरी है।
इसलिए इस जंतर को सत्ता का मंतर समझिए और धारण कर लीजिए। क्योंकि सत्ता के लिए सबके बीच हाथ जोड़ कर खड़े होना राजनेताओं की मजबूरी होती है। और मौजूदा दौर में ये मजबूरी और बड़ी हो गई है। एसएसी एक्ट संशोधन से नाराज सवर्ण, नोटबंदी से नाराज व्यापारी और महंगाई से नाराज मिडिल क्लास के बीच हाथ जोड़ कर खड़े होने की स्थिति बची नहीं है। तो फिर ऐसे में शिया मुसलमानों के बीच अटल राह से गुजरना होगा। अटल बिहारी बाजपेयी ने शिया मुसलमानों से जो रिश्ता जोड़ा था उस रिश्ते की गहराई में उतरना होगा। और हां इसे नारा भर मत मानिए ये भारत की सच्चाई है 'सबका साथ-सबका विकास' । दुर्भाग्य से अब तक आपलोग से इसे जुमला ही समझते रहे। लेकिन मोदी जी भीड़ नहीं हैं मोदी जी भीड़ को खड़ा करने वाले हैं। और भीड़ खड़ा करने वाले नेता को मालूम होता है कि जुमलों से आगे ज़मीन भी तैयार करनी होती है। वो इस जंतर के जरिए वही काम रह रहे हैं। इसलिए आप भी इस जंतर को अपने पास संभाल कर रखिए। और वो जो आपलोगों के पुराने नारे हैं न उन्हें पायताने रख दीजिए। और गला फाड़कर बेलिए सबका साथ-सबका विकास।

Friday, September 14, 2018

'राम' चूक गए अब बीजेपी को रावण का आसरा


तो रावण रिहा हो गया.. भीम आर्मी का संस्थापक..दलित विद्रोह का नायक..सहारनपुर हिंसा का आरोपी और कानून की भाषा में देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका चंद्रशेखर उर्फ रावण रिहा गया.. रिहाई हुई भी तो सरकार की मेहरबानी से.. वही सरकार जो कभी चंद्रशेखर को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताती थी.. अब चंद्रशेखर पर दया दिखाने लगी है.. सहारनपुर में ठाकुर-दलित हिंसा का केंद्र रहे रावण पर हुई सरकारी मेहरबानी का मतलब क्या है.. अचानक उमड़ी दया के मायने क्या हैं.. अचानक हुई रिहाई का रहस्य क्या है.. इस राज़ से भी पर्दा उठेगा..इन सवालों के जवाब भी खोजे जाएंगे..

     तो रिहाई, राज़, रहस्य से पहले जो सबकी आंखों के सामने है वो देखिए.. यूपी के दलित वोटबैंक पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती की सबसे मजबूत दखल है..और यूपी के सवर्ण वोट बैंक पर बीजेपी की जबर्दस्त पकड़ है.. एससी-एसटी ऐक्ट संशोधन विधेयक के बाद भी दलित वोटबैंक की गोलबंदी बीजेपी की तरफ होती नहीं दिख रही..लेकिन गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की मांग कर और एससी-एसटी ऐक्ट में बिना जांच गिरफ्तारी वाले प्रावधानों का विरोध कर मायावती ने सवर्णों पर जाल फेंक दिया है.. 2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ कर मायावती ने यूपी की सत्ता हासिल की थी.. मतलब ये कि मायावती अगर दलित-सवर्ण कार्ड खेलती हैं तो एससी-एसटी एक्ट संशोधन से नाराज सवर्णों का बड़ा हिस्सा अपने पाले कर सकती हैं.. तो फिर बीजेपी का होगा क्या.. जाहिर है बीजेपी भी ऐसी संभावनाओं-आशंकाओं को देख रही है.. तो बिसात की ये चाल समझ सकते हैं.. 2017 के अप्रैल और मई महीने में शब्बीरपुर गांव से भड़की हिंसा ने  सहारनपुर के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में लिया था.. और इस घटना ने यूपी के बड़े हिस्से में ठाकुरों और दलितों को आमने-सामने कर दिया था.. हिंसा की आग भड़काने का आरोप भीम आर्मी पर लगा और मुख्य आरोपी बनाये गए चंद्रशेखर को जेल हुई..हाई कोर्ट से जब जमानत मिली तो सरकार ने चंद्रशेखर पर रासुका लगा दिया...और चंद्रशेखर की रिहाई रुक गई....रासुका लगने के बाद सहारनपुर के कई ठाकुर बहुल गांवों में जश्न मनाया गया।
मतलब ये कि चंद्रशेखर और सवर्ण संघर्ष को सत्ता-सियासत ने खूब खाद-पानी दिया। और मतलब ये भी कि चंद्रशेखर जिसके साथ होंगे सवर्ण उनके साथ जाने से कतराएंगे.. तो फिर सवर्ण वहीं खड़े मिलेंगे जहां वो 2014 या फिर 2017 में खड़े थे..क्योंकि सहारनपुर हिंसा के बाद मायावती को कोस चुके चंद्रशेखर अचानक माया राग अलापने लगे हैं.. और राग से ही बिसात की ये चाल थोड़ी ही सही समझ में आने लगी है
     तो फिर रिहाई को सियासी मानिए या चुनावी.. मानने को इससे अलग भी कुछ मानिए..लेकिन ये भी मानिए कि ये रिहाई चुनाव पर असर डालेगी ज़रूर
  
  

Wednesday, September 12, 2018

सवर्ण भी कोई वौट बैंक है महराज


किसे चाहिए सवर्ण वोट.. किसके पाले में है सवर्ण वोट...हिस्से-हिस्से का किस्सा है या फिर वोटबैंक के बाजार का माल है सवर्ण वोट..क्योंकि एससी एसटी एक्ट संशोधन के बाद नाराज सवर्ण मसले पर पहले पूरी खामोशी और फिर खंड-खंड में टूटती खामोशी लोकतंत्र की बुनियादी खराबी को और खराब करती जा रही है.. क्योंकि जिस बीजेपी पर सवर्णों का गुस्सा भड़का है वो बीजेपी इस मसले पर चुप्पी साधे बैठी है...और जिस कांग्रेस को सवर्णों के गुस्से से आग की उम्मीद है वो कांग्रेस सदन में एससी-एसटी संशोधन के साथ रही और और अब सदन के बाहर सवर्णों के गुस्से के साथ खड़े होने की कोशिश में है.. तो बीजेपी चुप्पी के जरिए सवर्ण सियासत का सौदा चाहती है और कांग्रेस ऊंची आवाज में मोलभाव को तैयार है.. तो फिर सवर्ण होगा किसका.. क्योंकि जिस यूपी से दिल्ली सल्तनत का रास्ता गुजरता है उस यूपी में ब्राह्मण शंख बजाएगा और हाथी चलता जाएगा की तर्ज गढ़ने की कवायद तीसरे तिजारती ने भी शुरू कर दी है..

  लेकिन जिस यूपी की दलित सियासत का सबसे बड़ा चेहरा मायावती हैं उसी यूपी में बीजेपी की सहयोगी दल RPI बीजेपी से दलित सियासत का सौदा चाहती है.. और सौदे का मसौदा सवर्ण नाराजगी के जरिए दलित गोलबंदी पर आधारित है.. क्योंकि पार्टी के अध्यक्ष और केंद्र में मंत्री रामदास अठावले यूपी में सीटों की हिस्सेदारी चाहते हैं..और बीजेपी के बेस वोट बैंक सवर्णों को ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि जो कानून बन गया वो बन गया..ये कभी खत्म नहीं होगा..लिहाजा सवर्ण परिस्थितियों से समझौता कर लें

   तो सच ये है कि अभी सब बस ये आंकने में लगे हैं कि सवर्ण एकता वाला गुब्बारा उड़ेगा कितना...ऊंचाई पर पहुंचा तो टिकेगा कितना.. और सवर्ण नाराजगी के जवाब में जो गोलबंदी होगी उससे किसको कितना फायदा होगा.. तो फिलहाल राजनीति नफा और नुकसान के आंकलन में व्यस्त है..इसीलिए कोई चुप है, कोई थोड़ा कुछ बोल कर रिएक्शन का इंतजार कर रहा है

कांग्रेस: जब राह ही नहीं तो फिर रहबर कौन हो


बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोलने को तैयार कांग्रेस को यूपी जैसे बड़े राज्य में ही ज़मीन मिलती नहीं दिख रही है। जाति और संप्रदाय के मोर्चे पर कमजोर कांग्रेस के पास यूपी में संघर्ष के जरिए हासिल की हुई ताकत भी नहीं है।  2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 42.63 फीसदी वोट मिले जबकि कांग्रेस को महज 7.53 फीसदी। समाजवादी पार्टी ने 22.35 फीसदी वोट हासिल किया और बहुजन समाज पार्टी ने 19.77 फीसदी. ये नतीजे लोगों को अप्रत्याशित लगे। लेकिन बाद में हुए उपचुनावों ने हारे हुए दलों को नया फॉर्मूला दिया। उपचुनवों में बीजेपी को लोकसभा की 3 सीटें गंवानी पड़ी और एक विधानसभा चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा। मतलब चारों उपचुनाव बीजेपी को हार का हरकारा दे गए। उपचुनावों से निकले फॉर्मूलो ने कांग्रेस, सपा और बसपा को नया रास्ता तो ज़रूर दिखाया लेकिन हाल की सियासी घटनाओं ने इस फॉर्मूले से कांग्रेस को बाहर करने के संकेत दिए हैं। क्योंकि तेल की कीमतों में उछाल को जिस तरह मायावती ने बीजेपी के साथ कांग्रेस के माथे थोपा है उससे ये साफ होता है कि फिलहाल बीएसपी को कांग्रेस की ज़रूरत नहीं है
     तो फिर कांग्रेस करेगी क्या..क्योंकि पिछले चुनाव में 7.53 फीसदी वोट पाने वाली पार्टी ने यूपी की सियासत में कोई ऐसा कमला किया भी नहीं है जिससे उसके रिवाइवल की उम्मीदें पैदा हों.. 2009 के नतीजों से तुलना करें तो पार्टी को 2014 में बड़ा नुकसान हुआ था। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में  17.50 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 11.65 फीसदी। सपा ने 23.26 फीसदी वोट पाए थे और बीएसपी ने 27.23 फीसदी। पांच सालों बाद कांग्रेस 12 सीटों से 2 सीटों पर पहुंच गई। मतलब साल दर साल लगातार खिसकते जनाधार वाली कांग्रेस को सहारा चाहिए लेकिन जिनसे सहारे की उम्मीद है उन्हें कांग्रेस की ज़रूरत महसूस होती नहीं दिख रही है.. तभी तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी महंगाई के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों को एक साथ जिम्मेदार ठहराने लगे हैं।
     तो फिर होगा क्या..कांग्रेस अकेले दम पर यूपी में तन कर खड़े होने की स्थिति में है नहीं और सपा-बसपा पास फटकने देने को तैयार हैं नहीं। और पार्टी की मजबूरी ऐसी कि पार्टी के पास कहने को ना तो कोई वोट बैंक है और ना ही पारंपरिक वोट बैंक को एक बार फिर पार्टी से जोड़ने वाला कोई नजरिया

Tuesday, August 28, 2018

शहरी नक्सली नहीं ये हुकूमत ख़तरनाक है


प्राइवेट कंपनियों के मालिकों को धनकुबेर बनाने के लिए सरकारी कंपनियों को बर्बाद कर दिया गया। देश की 157 सरकारी कंपनियां एक लाख करोड़ से भी ज्यादा का नुकसान झेल रहीं हैं। कभी देश को गौरवान्वित करने वाली कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) अब बर्बाद हो चुका है। अकेले 2016-17 में कंपनी को 3187 करोड़ का घाटा हुआ है। इसी साल महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड को 2941 करोड़, हिंदुस्तान फोटोफिल्म्स कंपनी लिमिटेड को 2917, यूनाइडेट इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1914, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1691 और राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड को 1263 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. खास बात रही कि 173 सरकारी नियंत्रण कटेगरी की कंपनियों में से 41 को 2016-17 में ही 4308 करोड़ का नुकसान हो गया.

महज तीन सालों में मोदीयोनॉमिक्स ने देश की तमाम बड़ी सरकारी कंपनियों को दिवालिया कर दिया।
यही हाल बैकों का हुआ। पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में बैंको का कुल नुकसान 2.42 लाख करोड़ रुपये रहा। नतीजतन NPA का 1.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर10.4 लाख करोड़ हो गया था अब यह और भी अधिक बढ़ने वाला है। आलम ये है कि देश का सबसे बड़ा बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया भरभराने लगा है। धनकुबेरों पर सरकारी मेहरबानी ने बैंकों का बेड़ा गर्क कर दिया है।
दुनिया भर में जब पेट्रोलियम प्रोडक्ट सस्ते हो रहे हैं भारत में उनकी कीमत बढ़ती जा रही है। कच्चे तेल की कीमतों में कमी के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ाई गईं। मुंबई में पेट्रोल की कीमत 86 रुपये लीटर हो गई है और डीज़ल 74 रुपये लीटर मिल रहा है। 38 रुपये 26 पैसे के पेट्रोल पर 19रु.48 पैसे तो एक्साइज ड्यूटी लिया जा रहा है। वैट और डीलर कमीशन मिलाकर पेट्रोल को 86 रुपये तक पहुंचा दिया गया। ये सीधी लूट है। सरकार लूट रही है।
सबसे ज्यादा तबाही अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आई है। रुपया इतना डूब गया है कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना नेपाल के अर्थव्यवस्था से होने लगी है। रुपया गिरकर डॉलर के मुकाबले 70.32 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा गया है।
तो फिर इन मुद्दों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है ? ये मसले तो कहीं दिख ही नहीं रहे हैं। न तो चौक-चौराहों पर, ना ही संसद में और ना ही मीडिया में।
तो क्या बाबर को गालियां देकर पेट्रोल-डीज़ल में हम अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई लुटाती रहें ? मोहम्मद गजनी को गालियां देकर बर्बाद हो चुके सरकारी उपक्रमों को बचा लेंगे हम ? तैमूर लंग को कोस कर डूब रहे बैंकों को बचा लेंगे क्या हमलोग ? और रेलवे स्टेशनों का नाम बदल कर डूब रहे रुपये को गर्त से निकाल लेंगे क्या हमलोग ? नहीं न !
तो फिर जो भीड़ मूर्खता के अंधकूप में धेकली जा चुकी है पहले उस भीड़ को बाहर निकालने की कोशिश कीजिए। लौट आइए अपनी नागरिक वाली हैसियत में और अपनी जिंदगी और आने वाली पीढ़ी के लिए असली मुद्दों पर बहस छेड़िए। जब सबकुछ लुट जाएगा तो फिर होश में आकर कपार पीटने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। अभी भी वक्त है लौट आइए।
छोड़िए ये गजनी, बाबर, गोबर और शहरी नक्सली का राग। ये सारे राग हमको-आपको मूर्खता के अंधकूप में धकेलने के लिए अलापे जा रहे हैं। और डरिए भी मत। वैसे भी देश को बिना दीवारों वाली जेल में तब्दील किया जा रहा है तो फिर देश के लिए दीवारों वाली जेल में जाने से डर कैसा।

Friday, August 24, 2018

लंगोट ढीली हुकूमत की और बंदिशें मीडिया पर


पाकिस्तान में सरकारी मीडिया से सेंसरशिप हटाए जाने की खबर के ठीक एक दिन बाद खबर मिली कि भारत के बिहार मे मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई है। बिहार के मुजफ्फरपुर के एक शेल्टर होम में 29 लड़कियों के साथ रेप हुआ था। बार-बार इन लड़कियों को रसूखदारों के पास भेजा गया और बार-बार इनकी अस्मत लूटी गई। इस मामले का खुलासा जिस मीडिया ने किया अब उसी मीडिया को इस मामले में किसी भी तरह की रिपोर्टिंग से रोक दिया गया है।
तो आखिर मीडिया को मुजफ्फपुर कुकांड की रिपोर्टिंग से रोका क्यों गया ?  इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए खुद को पटना हाईकोर्ट के उस आदेश तक मत सीमित रखिए जिस आदेश का हवाला देकर सेंसरशिप लागू की गई है। इस सेंसरशिप को ठीक से समझने के लिए उस तस्वीर को याद कीजिए जो तस्वीर ब्रजेश ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद सामने आई थी। पुलिस हिरासत में ब्रजेश ठाकुर का मुस्कुराता चेहरा तब सबने देखा था। ये वही ब्रजेश ठाकुर है जो सेवा संकल्प एवं विकास समिति नाम से एक एनजीओ चलाता है और उसी एनजीओ के शेल्टर होम में वो लड़कियां रह रहीं थीं जिन्हें रोज किसी न किसी के बिस्तर पर पहुंचाया जाता था। तो वही ब्रजेश ठाकुर गिरफ्तारी के बाद हंसता-मुस्कुराता मीडिया का सामने आया। हंसता-मुस्कुराता कोर्ट रूम में पहुंचा और हंसते-मुस्कुराते ही जेल के बजाय अस्पताल पहुंच गया। तो मतलब साफ है कि ब्रजेश को ना तो कानून का डर था और ना ही रेप को धंधा बनाने का कोई अफसोस। मतलब, ब्रजेश ये जानता था कि जिस मीडिया ने उसके बलात्कारी धंधे का खुलासा किया है उस मीडिया पर नकेल कैसे कसी जाएगी। मतलब, ब्रजेश को पूरा भरोसा था कि सिस्टम उसकी मर्जी से काम करेगा और वो उसी तरह हंसता-मुस्कुराता उन बेटियों के सामने एक दिन फिर खड़ा होगा जिनकी अस्मत का वो सौदा करता रहा है। मतलब, ब्रजेश को पता था कि उसके रसूख के सामने न तो समाज की नैतिकता टिकेगी और ना ही पुलिसिया जांच के चोंचले। और हुआ भी वही। 29 लड़कियों का लगातार रेप करवाने वाले ब्रजेश के रसूख के सामने सीबीआई की एक न चली और मामले की जांच कर रहे जेपी मिश्रा का तबादला करना पड़ा। ये तबादला सीबीआई मुख्यालय से हुआ। और तब हुआ जब जेपी मिश्रा के हाथ सफेदपोशों तक पहुंचने लगे थे। इतना ही नहीं सीबीआई ने पटना हाईकोर्ट में मामले की स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं सौंपी। तो जाहिर है ब्रजेश ठाकुर और ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग 29 लड़कियों का रेप करवा कर हाथ में हथकड़ी पहने सिस्टम की खिल्ली ही उड़ाएंगे। 
   अब बात सेंसरशिप की। जिस कांड का खुलासा ही मीडिया ने किया अब उसी मीडिया को रिपोर्टिंग से रोकने का मतलब है क्या ? दरअसल, सीबीआई जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उन तथ्यों का खुलासा मीडिया के ज़रिए पहले ही हो चुका है। बिहार के कई बड़े अधिकारी और राजनेता मुजफ्फरपुर के उस शेल्टर होम में मौज-मस्ती के लिए जाते रहे हैं और वहां से लड़कियों को पटना बुलवाते रहे हैं। परत दर परत खुलते कुकांड से हाकिम से लेकर हुक्काम तक सहम गए हैं। खुद की कॉलर तो बचानी ही है अपने हाकिम को भी बचाना है।
   गुरुवार को बिहार के समाज कल्याण विभाग ने राज्य के महाधिवक्ता के एक पत्र को आधार बनाकर मामले की मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगा दिया। गुरुवार को ही पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट से कहा था कि मीडिया रिपोर्टिंग की वजह से सूचनाएं लीक हो रहीं हैं और जांच प्रभावित हो रही है। हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि वैसी सूचनाओं के प्रसारण-प्रकाशन से मीडिया को बचना चाहिए जिनसे जांच प्रभावित होती हो। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी में कहीं भी मामले की रिपोर्टिंग पर पूरी तरह से रोक का जिक्र नहीं है। लेकिन डरी ब्यूरोक्रेसी और सहमी सरकार ने हाईकोर्ट से एक कदम आगे जाकर मामले की मीडिया रिपोर्टिंग को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। मीडिया सेंसरशिप की हड़बड़ी में सरकार ये भी भूल गई कि ऐसा कोई भी आदेश सूचना प्रसारण विभाग से ही जारी हो सकता है समाज कल्याण विभाग से नहीं। समाज कल्याण विभाग इसके लिए सूचना प्रसारण विभाग को चिट्ठी भेज सकता है। लेकिन ब्रजेश की मुस्कुराहट पर लहालोट अधिकारियों ने प्रक्रिया में समय गंवाना मुनासिब नहीं समझा और समाज कल्याण विभाग से ही मीडिया सेंसरशिप लागू करवा दिया।
   तो फिर ब्रजेश ठाकुर मुस्कुराए क्यों नहीं ?  जिसकी मुस्कुराहट के लिए सीबीआई के एसएसपी स्तर के अधिकारी का तबादला हो सकता है, जिसकी मुस्कुराहट के लिए हाईकोर्ट की तमाम सख्ती के बावजूद कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट नहीं पेश किया जाए और जिसकी मुस्कुराहट के लिए मीडिया को आपातकाल में धकेल दिया जाए वो भला मुस्कुराए नहीं तो क्या करे।
  सिस्टम की खिल्ली उड़ाता ब्रजेश किसी की भी कलई खोल उसे नंगा करने की ताकत रखता है। ब्रजेश की इस ताकत का अंदाजा उन्हें भी है जिन्हे सीबीआई को संभालना है, उन्हें भी है जिन्हें बिहार की हुकूमत संभालनी है और उन्हें भी है जिन्हे बिहार का प्रशासनिक अमला संभालना है। तो फिर फिक्र ब्रजेश ठाकुर की ही करनी होगी। क्योंकि, कानून, न्याय, बेटियां, अस्मत और समाज की फिक्र में तो इनकी खुद की गरदन ही फंस जाएगी। तो जाहिर है ब्रजेश ठाकुर इस सिस्टम की खिल्ली ही उडाएगा।      

Wednesday, August 22, 2018

वो सबकुछ तबाह कर अयोध्या लौट आएंगे

देश के मोर्चे पर खड़े हर तबके को गलियाना, धमकाना, पीटना ही देशभक्ति की नई पहचान बनती जा रही है। भूख से तड़पते किसानों को नौटंकी मंडली का कलाकार कहा गया। अब नाबार्ड को क्या कहा जाएगा ये देखना-सुनना है।नौकरियों के सारे दरवाजे बंद कर किसानी को भी तबाह किया जा रहा है।

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने हाल ही में जो सर्वे रिपोर्ट पेश की है उसके मुताबिक देश में पिछले तीन सालों में किसानों की हालत बद से बदतर होती गई है। हम सबने देखा है कि एक महिला से प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में अधिकारियों ने कृषि में हुए लाभ के मामले में किस तरह से झूठ बुलवाया था। अब नाबार्ड ने किसानों की आय बढ़ाने वाले प्रोपेगंडा को बेनकाब कर दिया है। 16 अगस्त को नाबार्ड की जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि मौजूदा दौर में देश के आधे से ज्यादा किसान कर्ज के फंदे में फंसे हैं और औसतन हर किसान एक लाख रुपये के कर्ज के बोझ से दबा है। रिपोर्ट बताती है कि 2012-13 में ग्रामीण भारत में 57.8 फीसदी किसान परिवार थे। पिछले तीन सालों में इनमें से 10 फीसदी से ज्यादा मजदूर हो गए। अब 48 फीसदी ही किसान परिवार बचे हैं। जो किसान अपने खेत की उपज से घर-परिवार चला रहे थे वो अब दूसरों के मजदूर होने लगे हैं। जो 48 फीसदी किसान परिवार बचे हैं उनमें भी घर का एक या दो सदस्य ही किसानी से जुड़ा है। ग्रामीण कृषि परिवारों की आय का कुल 23 फीसदी हिस्सा ही किसानी से आ रहा है।2012-13 में ये 60 फीसदी था। मतलब महज तीन सालों में किसानों की आय में 37 फीसदी की साफ गिरावट हुई है। नाबार्ड की ये रिपोर्ट कब नष्ट की जाएगी ये सरकार तय करेगी। लेकिन, मौजूदा ट्रेंड ये बताता है कि जल्दी ही ये रिपोर्ट नष्ट कर दी जाएगी। श्रम मंत्रालय को पहले ही बेरजोगारी के आंकड़े जारी करने से रोक दिया गया है। सांख्यिकी मंत्रालय की वेबसाइट से GDP के आंकड़े हाल ही में हटवाए गए हैं। अब बारी नाबार्ड की है। बारी-बारी से हर संस्था को, हर तबके को पंगु बनाया जा रहा है। पंगु भीड़ नारे लगाएगी, पत्थरें फेंकेगी, आग लगाएगी, गोली खाएगी, जेल जाएगी। उनकी सत्ता के लिए ऐसी भीड़ ज़रूरी है

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...