Sunday, February 18, 2018

मीडिया का भक्ति काल

मीडिया की साख पर जैसा संकट इस वक्त खड़ा है वैसा पहले कभी था क्या ? बहुत सारे लोग आपातकाल के दौरान की मीडिया पर सवाल खड़े करते हैं। लेकिन आपाताकाल का जितना विरोध तब की मीडिया ने किया था वैसा विरोध सरकार के किसी फैसले का शायद ही कभी हुआ हो। राजनीति में मर्यादाओं की चर्चा होगी तो आपातकाल की भी चर्चा होगी। तब इंद्र कुमार गुजराल सूचना-प्रसारण मंत्री हुआ करते थे। कहा जाता है कि संजय गांधी ने तब उनसे कहा था कि दूरदर्शन और आकाशवाणी पर सरकार विरोधी खबरों की संख्या कम करवाएं। इंद्र कुमार गुजराल ने तत्काल अपना इस्तीफा टाइप करवाया और इंदिरा गांधी के पास भेज दिया था। इस्तीफे की चिट्ठी मिलते ही गुजराल तलब किए गए। इस्तीफे की वजह पूछी गई। गुजराल ने तब कहा था कि आपातकाल से तो देश बाहर निकल जाएगा लेकिन मीडिया पर सरकारी नियंत्रण हुआ तो लोकतंत्र का दम घुट जाएगा। इंदिरा मनाती रहीं, उनके सामने ही संजय गांधी को डांटा भी लेकिन गुजराल ने इस्तीफा वापस नहीं लिया। ये थी तब की राजनैतिक मर्यादा। आज इतनी हिम्मत किसी मंत्री में नहीं कि वो प्रधानमंत्री के फैसले के खिलाफ चूं तक बोल पाए, इस्तीफा तो बहुत दूर की बात है।
   हलांकि, तमाम बंदिशों के बावजूद तब के पत्रकार और संपादकों ने नागिन डांस नहीं किया और आपातकाल के खिलाफ खूब लिखा, खूब बोला और फिर जेपी आंदोलन में शामिल होकर इंदिरा सरकार की चूलें भी हिलाईं। आज मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वो सरकारी नीतियों, फैसलों की आलोचना कर सके या फिर उनसे हो रहे नुकसान की चर्चा कर सके। सरकार तो छोड़िए आलम ये है कि आज का मीडिया उस पार्टी का भोंपू बन गया लगता है जिसकी सरकार है। और जैसा कि प्रकृति का नियम है अपने मालिक के लिए दुम हिलाने वाले या भौंकने वाले को टुकड़ा मिलता है वैसे टुकड़े उछाले भी जा रहे हैं।
इसी के साथ बेहद चालाकी से सारी नाकामी का ठीकरा मीडिया पर फोड़ा जा रहा है। आम आदमी के सवालों का तोप मीडिया की तरफ है। पहले महंगाई बढ़ने पर सरकार से सवाल पूछे जाते थे। अब मीडिया से पूछा जा रहा है कि 60 साल क्या सस्ते दिन थे जो अब महंगाई की बात हो रही है ? बेरोजगारी के मसले पर भी सवाल मीडिया से ही पूछे जा रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि पिछले 60 साल में सबको रोजगार मिल गया था क्या जो अब बेरोजगारी पर खबर चला रहे हो ? इसी तरह के सवाल तमाम मसलों पर मीडिया से पूछे जाने लगे हैं। बेहद चालाकी से सरकार ने, सरकार चला रहे सियासी दल ने आम आदमी के तमाम सवालों को मीडिया की तरफ मोड़ दिया है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जैसे महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, अस्पतालों की बदहाली के लिए मीडिया ही जिम्मेदार है । और मीडिया का काम सवाल पूछना है ही नहीं बस सरकार की चाकरी करना है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जिसमें सरकार से सवाल पूछने वाला देशद्रोही है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जिसमें सरकार को कुछ करना न पड़े और उसकी नाकामी का ठीकरा या तो पिछले 60 वर्षों पर फूट जाए या फिर मीडिया पर। बेहद चतुराई से तमाम असहमतियों को मीडिया की तरफ मोड़कर सरकार जवाबदेही मुक्त होती दिख रही है।
मेरा मानना है कि ख़बर किसी के पक्ष या खिलाफ़ में नहीं होती है। खबर बस खबर होती है। मसलन लखनऊ में एक गाड़ी में रात भर किसी लड़की से हुआ बलात्कार खबर ही है ये योगी सरकार की मुखालिफत नहीं है। नोटबंदी के बाद देश में बढ़ी बेरोजगारी खबर भर है किसी सरकार का विरोध नहीं है। लेकिन मौजूदा माहौल में ये सरकार विरोधी ख़बरें बताई जा रहीं हैं और ऐसी ख़बरें लिखने-बोलने वाले देशद्रोही बताए जा रहे हैं। तो मीडिया के लिए जो दौर अभी चल रहा है वैसा दौर पहले कभी रहा तो बताइएगा ज़रूर। मेरी जानकारी में इजाफा होगा और शायद तब मैं कुछ अच्छा लिख पाने के काबिल बन पाऊंगा। फिलहाल लोग मीडिया को भांड, दल्ला और न जाने और क्या-क्या कह रहे हैं।

तानाशाही नहीं चलेगी, बस उन तीनों को याद कीजिए

भारत के तीन सर्वश्रेष्ठ राजनेताओं का चयन करना हो तो किसी के सामने ये बहुत बड़ी चुनौती होगी। फिर भी गुण-दोषों के आधार पर आप किसी नतीजे पर ज़रूर पहुच जाएंगे। भारत में औपचारिक तौर पर लोकतांत्रिक राजनीति की शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी। उससे पहले बाल गंगाधर तिलक लोकतांत्रिक राजनीति की ज़मीन ज़रूर तैयार कर रहे थे लोकिन, उनकी तमाम कोशिशें नेताओं को ही तैयार कर पाई, राजनीति में बड़े पैमाने पर आम आदमी की भागीदारी सुनिश्चित नहीं कर पाई।
      1916 में दक्षिण अफ्रिका के जन आंदोलन को दिशा देकर महात्मा गांधी भारत लौटे। भारत लौटते ही महात्मा गांधी ने पहला जो काम किया वो था जनमानस को लोकतंत्र के लिए तैयार करना। इसके लिए वो बाजाप्ता अखबार निकालते थे, चिट्ठियां और लेख लिखा करते थे। वो जानते थे कि अंग्रेज परस्त अखबार भारत में लोकतंत्र की बात नहीं करेंगे। इसलिए महात्मा गांधी ने सबसे पहला हथियार सूचना और जन संपर्क को बनाया।
महात्मा गांधी ने जो दूसरा बड़ा काम किया वो था बड़े पैमाने पर लोगों को अपने विचारों के साथ जोड़ना। महात्मा गांधी से पहले की कांग्रेस राजनेताओं की बड़ी टोली तो थी लेकिन उसके पास आम लोगों की ताकत नहीं थी। 1917 में बिहार के चंपारण पहुंचे महात्मा गांधी ने पहली बार कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन के साथ आम लोगों को जोड़ा। छोटी-छोटी सभाएं, गांव-टोलों के किसानों-मजदूरों के साथ बैठकें और फिर वकीलों, डॉक्टरों, जमींदारों और पढ़े-लिखे नवजवानों के साथ उनके सीधे संपर्क ने भारत को पहली बार जन आंदोलन का तरीका सिखाया। आज भारत जो कुछ भी है उसमें जन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। हम महात्मा गांधी को सिर्फ आज़ादी की लड़ाई तक सीमित कर के नहीं देख सकते। छुआछूत, स्वच्छता, अहिंसा, कुटीर उद्योंगों के तहत रोज़गार, शिक्षा जैसे क्षेत्र में उनके काम उनके नज़रिए को स्प्षट करते हैं। मतलब आप उनको समग्र राजनेता कह सकते हैं। एक नेता जिसने समग्रता में राष्ट्र और समाज को सम्मान के साथ जीने की कला दी।
       आज़ादी के बाद भारत के पास संघर्षों में तपे, आदर्शों में ढले राजनेताओं की बड़ी फौज थी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीम राव अंबेडकर, जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे बड़े कद के नेता देश में मौजूद थे। लेकिन उस वक्त देश को एक ऐसे नेता की ज़रूरत थी जिसकी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मजबूत दखल हो। एक ऐसे नेता की ज़रूरत थी जिसकी तरफ दुनिया देखती हो और जिसकी बातों को गंभीरता से लेती हो। इस मामले में तब जवाहर लाल नेहरु का कद सबसे बड़ा था। नेहरु कश्मीर के सारस्वत ब्राह्मण थे और समाजवादी विचारों के घोर पोषक थे। हैरो से प्राइमरी की पढ़ाई करने के बाद लंदन के ट्रिनिटी और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने वाले नेहरु ने सात सालों तक लंदन में फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद का अध्ययन किया था। समाजवाद और राष्ट्रवाद के इसी अध्ययन ने उन्हें विचारों का पक्का और समाज-राष्ट्र के प्रति घोर निष्ठावान बनाया था। आज जहां भारत खड़ा है उसमें नेहरु का बड़ा योगदान है। आज़ादी के बाद दुनिया में भारत को एक देश के तौर मान्यता दिलाने में नेहरु बहुत जल्दी सफल हुए थे। इतना ही नहीं बांधों, बिजली, नहरें, अस्पतालों और यूनिवर्सिटीज, वैज्ञानिक शोध संस्थानों का जो ढांचा तब नेहरु ने खड़ा किया वही ढांचा आज भी भारत के विकास का बुनियाद बने हुए हैं।
      भारत के तीसरे सर्वश्रेष्ठ राजनेता के चयन में भी बहुत सारी चुनौतियां हैं। किसको छोड़ें, किसका जिक्र करें ये बड़े सवाल हैं। जय प्रकाश नारायण, डॉ राम मनोहार लोहिया, इंदिरा गांधी जैसी तमाम शख्सियतें हैं। यहां भी गुण-दोषों के आधार पर बेहद बरीकी से किसी एक नाम चयन किया जा सकता है।
   जय प्रकाश नारायण सिर्फ बड़े स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे बल्कि आज़ादी के बाद आम लोगों की स्वतंत्रता के बड़े रक्षक भी साबित हुए। इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि आज़ादी के बाद नेहरु काल से ही शासक वर्ग सुविधाभोगी होने लगा था। इतना ही नहीं शासक वर्ग खुद को ऊंचे दर्जे का भी समझने लगा था। नेहरु और लाल बहादुर शास्त्री खुद कई बार इस बात को स्वीकार कर चिंता जाहिर कर चुके थे।
1971 में पाकिस्तान पर युद्ध विजय और अलग बांग्लादेश के निर्माण के बाद देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के स्वभाव से लोकशाही जाती रही। पाकिस्तान पर शानदार विजय और एक अलग देश का निर्माण करवाने में सफल रहीं इंदिरा के स्वभाव में तानाशाही घर कर गई। तब तक देश का साधारण आदमी यही जनता था कि सरकार का मतलब कांग्रेस और मतदान का मतलब कांग्रेस। लोगों को ये पता ही नहीं था कि लोकतंत्र में विकल्प देना जनता का काम है।
    1974 में जय प्रकाश नारायण ने सप्तक्रांति के जरिए वही प्रयोग दुहराया जो प्रयोग गांधी 1918 में बिहार के चंपारण में कर चुके थे। जय प्रकाश नारायण ने क्रांति के साथ बड़े पैमाने पर आम लोगों को जोड़ा। उन्होंने एक बार फिर आम लोगों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास करवाया। उन्होंने पहली बार देश में गैर कांग्रेसी सरकार की नींव डाल कर लोकशाही में बदलाव की ज़रूरत को स्थापित किया।
  भारत के इन सर्वश्रेष्ठ नेताओं के विचारों, आदर्शों और बलिदानों को आप सिर्फ और सिर्फ लोकशाही में खोज सकते हैं और तानाशाही की किसी भी आशंका के वक्त इनके प्रयोगों को इस्तेमाल कर सकते हैं। आज के भारत की मजबूत लोकतंत्र की नींव इन्हीं नेताओं ने तब रखी थी।

राजनीति जाए भाड़, होली खेलिए कुर्ताफाड़

मंडल जादो का माइंड सुन्न हो गया है। भेजा कामे नहीं कर रहा है। मझौलिया स्टेशन पर उतरते ही गुप्ताइन की दुकान पर चाय ली, सिगरेट सुलगाई और बेतिया में खरीदी हुई वही अखबार जो वो ट्रेन में पढ़ रहे थे फिर पढ़ने लगे। एक-एक अक्षर वही जो वो पहले पढ़ चुके हैं। दुकान पर तीन लोग पहले से मौजूद थे। एक मंगल भाई, पुराने समाजवादी हैं। समाजवादी आंदोलनों में कभी शामिल तो नहीं रहे लेकिन समाजवादी नेताओं के नाम तो ऐसे टपकाते हैं जैसे वैशाख में ताड़ के पेड़ से ताड़ी टपक रही हो। दूसरे हैं रंजीत गिरी। लाल झंडा ढो-ढो कर घर-बार बनवा लिया, बुलेट-बॉलेरो का इंतजाम कर लिया, फिलहाल चीनी मिल के चालान के धंधे से बिन गन्ना-बिन चीनी माल लपेट रहे हैं। भूमिहीनों को ज़मीन का पर्चा दिलवाने के नाम पर पिछले बीस सालों से चंदे काट रहे हैं। अब तो खुद खेतीहर हो गए हैं, 20 साल पहले भले ही भूमिहीन थे। अब तीसरे सज्जन का परिचय। जुबान के तीखे हैं बाकी दिल के साफ। बात-बात में साला फॉरवर्ड सब करते रहते हैं, बाकी बाबू-बबुआनों से अच्छी बनती है। उनसे ही दाल-पानी का रिश्ता है जिलदार राम का।
      मंडल जादो ने किसी से बात नहीं की। जिलदार राम ने भांप लिया बोले, का मंडल जादो कौनो टेंशन धर लिया क ? मंडल जादो कुछ जवाब देते इससे पहले मंगल भाई ने नाक धुसेड़ दी> आरे टेंशन का है, लालटेन वालों ने पूरा माल चभवाया था इस बार भइयावा को, भर मुंहे धी में डुबा लिया था जादो जीअवा। मंडल जादो ने सिगरेट की आखिरी कश ली और मुंह-नाक से ऐसे धुआं निकाला जैसे पाइपलाइन साफ कर रहे हों। साफ-सूफ करके बोला, ए भाई ई ललुआ त बड़ा इल्मी निकला हो, बैकवर्ड-बैकवर्ड करके वोट लिया आ भर परिवारे सेट कर दिया।
   रंजीत गीरी अब तक आंखें बंद कर ध्यान में थे। अचानक दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और ज्ञान चक्षु खोल कर जितना बड़ा खोल सकते थे मुंह खोला, जम्हाई ली और बोलने लगे। का गलती का किया बताइए? बेटा को डिपुटी मुखमंत्री नहीं बनाता त का आपको बनाता? आ बड़का का हेल्थे अइसा है कि उसको तो कम से कम 10 साल चाहिए हेल्थ मिनिस्टरी। मंडल भाई झुट्ठे दिमाग मत लगाइए, चुनाव में माल लपेटे न जी, मस्त रहिए, हम लोगों का चाह का पइसवा भी पेड कर दीजिए। मंडल जी से रहा नहीं गया बोले, पीजिए न महाराज जेतना चाय पीना है, बाकी ई कहां का इंसाफ है कि बैकवर्ड-बैकवर्ड करके वोट लीजिए और मंत्री बनाइए अपने दोनों बेटों को? एक बेटा को बनाते, बाकी एक सीट त कौनो बैकवर्ड नेता को देते। भर बिहार में उनको उनका दोनों बेटवे बैकवर्ड बुझाता है। ए गीरी जी हमरो नाम मंडल और बीपी बाबा के नाम भी था मंडल, बाकी ई त जान लीजिए मंगल भाई के समजवदिया सब, आपका कमनिस्टिया सब, आ हमरा मंडलवदिया सब देश को जेतना मूर्ख बनाया न ओतना त अंगरेजवनों सब नहीं बनाया। नीतीश कुमारे के देखिए, बात करते हैं समाजवाद की आ पार्टी के सब बड़का पद पर अपना जाति के लोगों को फिट किए बइठे हैं। लीजिए सिगरेट फूंकिए, आ छोड़िए राजनीति। राजनीति जाए भाड़ हमलोग होली खेलेंगे कुर्ताफाड़।

नमस्ते सदा वत्सले छोड़िए होली मनाइए

देशभटक पांड़े पगला गए हैं। भीतीहरवा आश्रम के बाहर नाखून से मिट्टी खोद रहे हैं। दांतों से पेड़ के तनों को डंस रहे हैं और भाव-भंगिमाओं से बच्चों का मनोरंजन कर रहे हैं। आही दादा ई का हो गया। देशभटक पांड़े की बूढ़ी मां कपार पीट रही हैं। बेतिया के एमजेके कॉलेज के डॉक्टर आदत के मुताबिक जवाब दे चुके हैं। यहां इलाज संभव नहीं बाहर ले जाइए। अब अपना देह तो इनसे चलता नहीं देशभटक को कहां-कहां लेकर जाती रहें। बाकी सपूत का दुख देखा नहीं जाता। समझे में नहीं आ रहा है कि का देख लिया टीवी में। पहिले तो कभी टीवी देख के एतना नहीं बउराया।
मां कपार पीट रही हैं और बेटा भीतीहरवा आश्रम की दीवार पर सिर पीट रहा है। गांव के लोग भावुक हुए जा रहे हैं। हे गान्ही महात्मा दोहाई सच्चाई के, बालक के माफी दे द, बुढ़िया के एके सपूत है। दोहाई महात्मा के। बाकी देशभटक पांड़े मानने को तैयार नहीं। अब चिल्लाने लगे देशभटक पांड़े, प्रबल प्रवंचना का शिकार हुआ। गांव के लोग भकुआ गए। भगेलू महतो मास्टर जी पूछ रहे हैं, पांड़े जी को परबल पंच कुछ कह दिए का? मास्टर जी गांव के लोगों को समझाने लगे, प्रबल माने बड़का और प्रवंचना माने धोखा। कौनो बड़का धोखा हुआ है पांड़े जी के साथ। धोखा..गांव के लोग अचंभे में। पांड़े बाबा को कौन धोखा हो गया, कौनो लड़की-वड़की ने भभूत खिला दिया का? गांव के लोग देशभटक पांड़े को समझाने लगे। कोई फूल चढ़ा रहा है, कोई अक्षत। ओझा-गुनी बुला लिए गए।
      घुटनी बाबा लोटा से दारू पी रहे हैं और देशभटक पांड़े का भूत उतार रहे हैं। भूत उतर रहा है। घुटनी बाबा के मुंह की दुर्गंध से देशभटक पांड़े को उबकाई आ रही है। लोग चिल्ला रहे हैं, दोहाई सरकार के, दोहाई घुटनी बाबा के, हे भूत-प्रेत दया करो। भूत उतर रहा ह। देशभटक पांड़े जोर से चिल्लाने लगे। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि। अहा देशभटक ठीक हो रहे हैं, सही हो गए, यही बतिया तो वो बोलते रहते हैं, वाह माइंड ठीक हो गया बबुआ के। दोहाई सरकार के, दोहाई गान्ही महात्मा के।
भीड़ देख कर देशभटक पांड़े शुरू हुए। भाइयों-बहनों, माताओं-बहनों। तभी गांव के एक लड़के ने टोका, ए काका हम तो भतीजा हैं। देशभटक पांड़े ने नहीं सुना, बोलते रहे, भारत मां के सपूतों, बड़ा धोखा हुआ। हमको कभी देखा फुल पैंट पहने हुए। कड़ाके की ठंड में भी पाजामा-कुर्ता पहना, घने कुहरे में भी हाफ पैंट पहन कर लाठी भांज। भांजी कि नहीं। बोलिए-बोलिए। गांव के लोगों ने एक सुर में कहा सांच के जड़ पाताल में। देशभटक पांड़े का जोश बढ़ता गया। गांव के लोगों पिछले कई सालों से मैंने आपको बताया कि नहीं कि आज़ादी के बाद से इस देश में कुछ नहीं हुआ। बताया कि नहीं? सड़कें बनीं तो भी मैंने कहा कुछ नहीं हुआ। गांव में रेल पहुंची तब भी मैंने कहा अभी कुछ नहीं हुआ। पाकिस्तान से जंग जीते तब भी मैंने कहा कुछ नहीं हुआ। मैंने हर बार कहा न कि देश में तरक्की का कोई काम नहीं हुआ। आज़ादी के बाद से देश बर्बादी की ओर बढ़ रहा है। कहा कि नहीं? गांव के लोगों ने हामी भरी, कहा बबुआ, सबसे कहा, रोजे कहा, जब भेंटाए तब कहा। देशभटक पांड़े फिर शुरू हुए। यहीं धोखा हुआ, जिनके लिए जाड़े में हाफ पैंट पहन-पहन कर फुलफैंट को भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया, अब वही हमारी संस्कृति का बलात्कार कर रहे हैं। कह रहे हैं शाखाओं में फुल पैंट पहन कर आना है। जिनके लिए सड़क, रेल, पुल, बिजली, नहर सबको बर्बादी की वजह बताया, अब वही लोग देश की संसद में कह रहे हैं कि पिछली सरकारों का, अब तक के तमाम प्रधानमंत्रियों का देश की तरक्की में बड़ा योगदान है। बताइए हमसे धोखा हुआ कि नहीं? बताइए, बताइए, नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे। आ ई धोखा हम नहीं सहेंगे, इस बार शाखा में नहीं गांव में होली मानाएंगे।

आतंकवदियों का गढ़ ही है पाकिस्तान, खतरे में है अवाम

दुनिया भर आतंक फैलाने वाले समूहों में सबसे ज्यादा समूह पाकिस्तान में सक्रिय हैं। इससे ये साफ होता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का सबसे बढ़ा पनाहगाह है। पाकिस्तान पोषित आतंकी समूह वैसे तो दुनिया के तमाम देशों में इंसानियत का कत्ल करने के लिए ही जाने जाते हैं लेकिन, उनके निशाने पर मुख्य रूप से भारत ही होता है। पाकिस्तान की पूरी राजनीति भारत की मुखालिफत पर टिकी है और जब कभी भी पाकिस्तान में चुनाव नजदीक आते हैं भारत-पाक सीमा पर आतंकी हमले, आतंकी घुसपैठ तेज हो जाती है।
  पाकस्तान में गली-मुहल्लों में आतंकी संगठन हैं। इस संगठनों की गिनती बेहद मुश्किल है। इन संगठनों में जो सबसे ज्यादा खतरनाक और पाकिस्तानी राजनीति को प्रभावित करने वाले हैं वो वहां की सेना के सहयोग से ताकत पाते हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम जैश-ए-मुहम्मद है।
 जैश-ए-मुहम्मद का चीफ आंतरराष्ट्रीय आतंकी मसूद अजहर है। इस आतंकी संगठन का गठन पाकिस्तान के बहावलपुर में 31 जनवरी 2000 को किया गया था। संगठन खड़ा करने से पहले ही मौलाना मसूद अजहर कुख्यात आतंकियों को पाकिस्तानी सेना की मदद से ट्रेनिंग दिलवा चुका था। जैश-ए-मुहम्मद के गठन से पहले ही मौलना मसूद अजहर ने अपने आतंकियों के जरिए 1999 में भारत के विमान को हाईजैक कर लिया था। यात्रियों से भरे इस विमान को कंधार ले जाया गया था। यात्रियों की जान की कीमत वसूलते हुए इस आतंकवादी ने अपने तीन आतंकी साथियों को रिहा करवाया था।
   दुनिया के लिए खतरा बन चुका तालिबान भी पाकिस्तान की ज़मीन से ही खाद-पानी पाता है। 90 दशक में उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान खड़ा हुआ। सबसे पहले इस संगठन ने धार्मिक आयोजनों के जरिए लोगों के दिमाग में जहर भरना शुरू किया। संगठन ने सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को संगठन में जगह दी है। 1990 के आसपास जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना वापस जाने लगी तब इस संगठन ने अफगानिस्तान में अपनी जड़ें जमानी शुरू की।1994 में अफगानिस्तान में ये संगठन पूरी तरह से  काबिज हो चुका था। इस आतंकी संगठन ने बामियान में शांति का संदेश देने वाले बुद्ध की मूर्तियों को बमों से उड़ाया। बाद के दिनों मे अमेरिकी फौज ने जब इसे अफगानिस्तान से खदेड़ा तो पाकिस्तान ने इस संगठन को पनाह दी। आज भी इस आतंकी संगठन के पास 60 हजार से ज्यादा ट्रेंन्ड आतंकवादी हैं। पाकिस्तान के पेशावर में इस आतंकी संगठन का मुख्यालय है।
   इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक दुनिया अल्लाह ने बनाई है। और अल्लाह की बनाई इस दुनिया को उजाड़ने की कोशिश करने वालों में हाफिज सईद का नाम भी प्रमुखता से शामिल है। हाफिज सईद लश्कर-ए-तैयबा का चीफ है। 1990 में इस आतंकवादी गिरोह का गठन हुआ था। इस संगठन ने 2001 में भारतीय संसद पर हमला किया था। इस हमले के ठीक बाद 2006 में मुंबई में सीरियल बम धमाके में भी इसी संगठन की भूमिका था। 2008 में मुंबई में हुए हमलों में भी यही संगठन शामिल था। हाफिज सईद ने जमात-उद-दावा नाम का एक दूसरा आतंकी संगठन भी खड़ा कर रखा है। पाकिस्तान को छोड़ कर दुनिया के ज्यादातर देश हाफिज सईद को आतंकवादी घोषित कर चुके हैं।
   दुनिया के बड़े आतंकी समूहों में तहरीक-ए-तालिबान का नाम भी शामिल है। तहरीक-ए-तालिबान की स्थापना आतंकवादी बैतुल्लाह मसूद ने 2007 में की। तब इस संगठन में छोटे-बड़े 15 आतंकवादी गुट शामिल हुए थे। माना जाता है कि अभी इसमें 30 हजार ऐसे ट्रैंड आतंकी हैं जिन्हें पाकिस्तानी फौज की मदद से तैयार किया गया है। मौलाना फैजलुल्लाह फिलहाल इस आतंकी नेटवर्क का नेतृत्व कर रहा है।

 इसके अलावा पाक सेना की मदद से हक्कानी नेटवर्क और अल कायदा जैसे आतंकी संगठन भी पाकिस्तान की सरज़मीं पर खाद-पानी पाकर ऐंठ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि दुनिया इस सच को नहीं जानती। पूरी दुनिया को पता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा खुंखार आतंकी और उनके संगठन पाकिस्तान में पनाह पाकर दुनिया भर में तबाही मचा रहे हैं। बावजूद इसके पाकिस्तान के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। 

Friday, February 16, 2018

हे गंगा मइया, तोहर कौनो नाहीं सुनइया

  तो सूख जाएगी गंगा, ब्रह्मपुत्र में उड़ेगी धूल और पानी के लिए तरसेगा इंसान
नीति आयोग के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने जल संरक्षण पर जो रिपोर्ट तैयार की है वो रिपोर्ट बता रही है कि धरती पर अब जीवन की संभावनाएं सूखती जी रही हैं। जीवन को सबसे बड़ा खतरा भारत में ही है। रिपोर्ट बताती है कि हिमालय से निकलने वाली आधी से ज्यादा जलधाराएं सूखने के कगार पर हैं। हिमालय के अलग-अलग हिस्सों से 55 से 60 लाख के बीच जलधाराएं निकलती हैं। इनमें से 30 से ज्यादा तो सिर्फ भारतीय हिमालयी क्षेत्र से निकलती हैं।    
  राष्ट्रीय नदी गंगा के उदगम स्थल गोमुख का आकार लगातार बदल रहा है। इतना ही नहीं गंगोत्री हिमखंड खिसकता जा रहा है। गंगोत्री हिमखंड के लगातार पीछे खिसकने से गंगा का मुख्य जल स्त्रोत ही संकट में पड़ गया है। गंगोत्री हिमखंड सालाना 22 मीटर पीछे खिसक रहा है। इसी के साथ बाकी तमाम ग्लेशियर सालाना तकरीबन 10 मीटर पीछे खिसक रहे हैं। इनका आकार छोटा और पतला होता जा रहा है। केदरनाथ त्रासदी की वजह से बने गंगोत्री के चैरावाड़ी, दूनागिरी और डुकरानी ग्लेशियर अस्तित्व के संकट से जूझने लगे हैं। जानकार बताते हैं कि हिमनद के पीछे खिसकने से उनकी मोटाई घटती जा रही है और हालात यही रहे तो फिर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मणिपुर और मिजोरम के पांच करोड़ लोग पानी के लिए तरस जाएंगे। छोटी-बड़ी हजारों नदियों में पानी का संकट खड़ा होगा तो फिर उत्तर भारत की धरती सूखने लगेगी। सिर्फ बारिश के भरोसे धरती में पानी अस्तित्व नहीं बच सकता।
   जलवायु परिवर्तन के कारण हिमखंड लागातार घट रहे हैं। पानी की खपत लगातार बढ़ रही है और पेड़ कटने की वजह से पहाड़ी भूमि का चरित्र बदलता जा रहा है। जल विद्युत् परियोजनाओं की वजह से हिमालयी नदियों का दोहन बढ़ता जा रहा है। इंसानी जरूरतों के लिए जल, जंगल और पहाड़ को निचोड़ा जा रहा है। एक बार पिर भागीरथी पर लोहारी-नागपाला परियोजना की हलचल बढ़ा दी गई है। 2010 में जब प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री थे तब उन्होंने इस परियोजना को बंद करवा दिया था। तब पर्यावरणविदों ने बताया था कि इस परियोजना की वजह से पहाड़ों का सीना चीरकर जो सुरंगें बनाई जा रहीं हैं वो तबाही का कारण बन जाएंगी। इन सुरंगों के बनने से तब विष्णु प्रयाग और गणेश प्रयाग पूरी तरह से सूख गए थे। जल विद्युत परियोजना के लिए जो विस्फोट किए गए उनकी वजह से हिमखंड से ढंकी चट्टाने दरक गईं, ग्लेशियर टूट गए और अपने मूल स्थान से खिसक गए। प्रणब मुखर्जी ने उस परियोजना के बंद करवा दिया था। अब एक बार फिर उसे शुरू करने की तैयारी है। अब एक बार फिर पानी के खिलाफ इंसानी साजिश तेज हो गई है।
  आलम ये है कि अब हो चुके नुकसान की भरपाई संभव नहीं है और जो बचा है उसे बचाने की चुनौती हम स्वीकार नहीं कर रहे हैं। तमाम संसाधानों को जुटाने की हमारी ख्वाहिश, भीड़तंत्र में बदल चुके लोकतंत्र वाले विकास की भेड़चाल में हांफती हमारी सरकारें और बस खुद जी लेने भर की हमारी चाहत ने हमें उस मुहाने पर ला खड़ा किया है जहां आगे मौत है और पीछे हमने ही सब कुछ सोख लिया है। अब वो दिन दूर नहीं जब गंगा सिर्फ बरसाती बनकर रह जाएगी और फिर वो दिन भी दूर नहीं जब बरसात भी नहीं होगी।


Wednesday, February 14, 2018

ठेकेदारी से बाहर निकल कर ही खड़ा हो सकता है दलित अस्मिता का संघर्ष

भारत में दलित समाज अगर कल तक दक्खिन टोले में सिसक रहा था तो आज भी वो पूरब में हंसता-खिलखिलाता समाज नहीं गढ़ पाया है। मतलब तब सिसक रहा था अब भी हाशिए पर खड़ा पूरब टोले की ओर टकटकी लगाए देख रहा है। तकरीबन 20 करोड़ की ये आबादी आज भी शादी-व्याह में घोड़े पर सवार होने की जंग में शामिल है। आज भी गांव के मुख्य सड़क से बारात निकालने का संघर्ष देख रहा है। सरकारी नौकरियों और लोकसभा-विधानसभाओं में आरक्षण के लाभ के बावजूद दलित समाज का बड़ा हिस्सा अगर आज भी हाशिए पर खड़ा है तो इसके पीछे दलित समाज के भीतर की वजहों की पड़ताल भी होनी चाहिए। क्योंकि रिजर्व सीट की नौकरी को न तो किसी सवर्ण ने हथियाई और ना ही रिजर्व सीट से बने सांसद-विधायकों को उनके अधिकारों से किसी ने वंचित किया। तो फिर देश का ये मेहनतकश तबका आज भी कतार के सबसे पीछे क्यों खड़ा है ? आइए इस सवाल का जवाब खोजते हैं।
...आरक्षण नीति की खामियां...
दलितों को मिलने वाले आरक्षण में खामियां ही खामियां हैं। चाहे वो सरकारी नौकरियों में मिलने वाला आरक्षण हो या फिर शिक्षण संस्थानों में एडमिशन के लिए मिलने वाला आरक्षण। लोकसभा-विधानसभा चुनावों में मिलने वाले आरक्षण के ढांचे में भी बुनियादी खराबी है। इस ढांचे ने दलित समाज के एक छोटे तबके को सवर्ण खांचे में तो ज़रूर डाल दिया लेकिन बाद में दलितों के बीच पैदा हुआ यही सवर्ण तबका दलितों का शोषक बनता गया। मसलन जिसको एक बार आरक्षण का लाभ मिला वो नौकरी के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत हुआ, सामाजिक हैसियत बढ़ाता गया और फिर संसधानों पर कब्जे के जरिए अपने बाल-बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें भी आरक्षण के जरिए नौकरी में पहुंचाता गया। मतलब जिसने एक बार आरक्षण के जरिए कुछ हासिल कर लिया वो अपनी पीढ़ियों को आरक्षण का अधिकारी बनाता गया और अपने पड़ोसी को उसका फायदा मिलने से रोकता गया। ये सिर्फ नौकरियों में ही नहीं हुआ, ये राजनीति में भी खूब हुआ। बिहार में रामविलास पासवान को 2014 में बीजेपी गठबंधन ने चार सीटें दीं जिनमें एक सीट पर वो खुद, दूसरे पर उनके छोटे भाई रामचंद्र पासवान और तीसरे पर उनके बेटे ने चुनाव लड़ा। चौथी सीट सामान्य थी इसलिए वहां से उन्होंने किसी दलित को टिकट नहीं दिया। जबकि होना ये चाहिए कि उन्हें खुद अब सामान्य सीट से चुनाव लड़कर, आरक्षित सीट पर हाशिए पर खड़े किसी दलित को टिकट देना चाहिए। लेकिन पूरे बिहार में दलित के नाम पर उनको अपने भाई और बेटे के अलावा कोई नहीं दिखा। इस तरह से उन्होंने तीन वैसे दलितों को उनके अधिकारों से वंचित किया जो सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यही हाल सरकारी नौकरियों में हुआ। आरक्षण के जरिए नौकरी पा चुके लोग अगली आरक्षण पर भी अपने बेटों-बेटियों का हक समझने लगे हैं। जबकि वो लोग इतने सक्षम हो चुके हैं कि अपने बच्चों को सामान्य कोटे के संघर्ष में उतार कर आरक्षण वाले कोटे में हाशिए पर खड़े लोगों को मौका दे सकें। जाहिर है आरक्षण नीति की इन खामियों ने दलित समाज में सवर्ण तबका खड़ा कर नए सिरे से शोषण का रास्ता खोल दिया है। 

...दलित ठेकेदारी... 
डॉ राम मनोहर लोहिया ने अपनी कुछ किताबों में पंडित जवाहर लाल नेहरु और डॉ भीम राव अंबेडकर के संबंधों का जिक्र किया है। वो लिखते हैं कि बाबा साहब को देख कर पंडित नेहरु खड़े हो जाते थे और हाथ जोड़ कर उनका अभिवानदन करते थे। लेकिन बाबा साहब कभी भी नेहरु के देख कर कुर्सी से खड़े नहीं होते थे और ना ही पहले हाथ जोड़ते थे। ये वो दौर था जब जातिवाद आज के मुकाबले कहीं ज्यादा था। पंडित नेहरु सारस्वत ब्राह्मण थे और बाबा साहब दलित। मतलब ये कि दलित संघर्षों को, दलित हितों को सिर्फ जाति के खांचे तक रखा गया तो नतीजे कभी अच्छे नहीं होंगे। हमें अंबेडकर के साथ-साथ नेहरु के नजरिए को भी अपनाना होगा। दलित संघर्ष की सबसे बड़ी त्रासदी है दलित समाज की ठेकेदारी। सियासी ठेकेदारी कर रहे कुछ नेताओं ने अपने परिजनों को दलित सियासत की सत्ता दिलाई और बड़े तबके को हाशिए पर खड़ा किए रखा। यही काम ज्यादातर दलित सामाजिक संघर्ष के ठेकेदारों ने भी किया। दलित समाज में खड़ा बौद्धिक वर्ग भी दलित ठेकेदार ही बना रहा। इन तमाम लोगों ने मिलकर उस प्रगतिशील वर्ग के खिलाफ ही माहौल गढ़ा जो लोग गैर दलित वर्ग से होते हुए भी दलित हितों का संघर्ष खड़ा करते रहे। एक कदम बढ़कर जिन लोगों ने दलित हितों का संघर्ष खड़ा किया उन लोगों के संघर्ष को दलित ठेकेदारों ने हमेशा खारिज किया या फिर उस संघर्ष को ही साजिशन संदेह के दायरे में घेरे रखा। हर प्रगतिशील विचार से इस ठेकेदार तबके को खतरा महसूस होता रहा। ये ठेकेदार तबका दलित संघर्ष की पूरी ठेकेदारी अपने कब्जे में रखने की साजिश करता रहा और देश का बड़ा दलित तबका हाशिए पर धकेला जाता रहा। 
दलित अस्मिता का संघर्ष सामाजिक सहयोग के जरिए ही मुकाम पा सकता है। अगर आप चाहते हैं कि दलित और सवर्ण एक साथ, एक टोले में, एक संस्कृति का हिस्सा बन कर रहें तो फिर दलित संघर्षों को दलित ठेकेदारों के चंगुल से आज़ाद कराना होगा।

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