Sunday, February 4, 2018

एक्स मुस्लिम: इस्लाम से नास्तिकता की ओर बढ़ते कदम

तुफैल अहमद भारत के बड़े पत्रकारों में गिने जाते हैं। तुफैल अहमद उन बड़े नामों में भी शामिल हैं जो एक्स मुस्लिम हैं। एक्स मुस्लिम शब्द धीरे-धीरे दुनिया के कई देशों में पसरता जा रहा है। ब्रिटेन की सारा की कहानी जब दुनिया के सामने आई तो एक्स मुस्लिम शब्द पर पहले ज्यादा गौर किया जाने लगा। सारा ने ये कह कर दुनिया को चौंका दिया था कि मुस्लिम रहते आपका जीवन आपका नहीं होता वो मुफ्ती-मौलानाओं का हो जाता है। सारा ने कहा था कि इस्लाम में डर पैदा कर लोगों को मजहब से जोड़े रखा जाता है, इसलिए उन्होंने इस्लाम छोड़ दिया और नास्तिक हो गईं।
      पिछले पांच सालों में एक्स मुस्लिम शब्द पूरी दुनिया में पहुंच चुका है। यूरोप के देशों और अमेरिका में बजाप्ता एक्स मुस्लिम के संगठन बनने लगे हैं और वो एक-दूसरे की मदद करने लगे हैं। एक ब्रिटिश अखबार दी इंडिपेंडेंट ने तो एक्स मुस्लिम कौंसिल के संस्थापक मरयम नमाज़ी का इस मुद्दे पर इंटरव्यू तक छाप दिया था। मरयम नमाज़ी ने कहा था कि इस्लामिक देशों में मजहब से अलग होने पर मौत की सज़ा देने का कानून है, लिहाजा लोग चाह कर भी धर्म नहीं छोड़ पाते। नमाज़ी ने अखबार को दिए अपने बयान में कहा था कि इस्लामिक देश एंटी-अपोस्टसी (मज़हब-त्याग) और एंटी-ब्लासफेमी (ईश-निंदा) कानून हटा दें तो मुस्लिम धर्म छोड़ने की सुनामी आ जाए।
  भारत में भी एक्स मुस्लिम शब्द विस्तार पाने लगा है। ये लोग खुद को नास्तिक या फिर एक्स मुस्लिम बताना पसंद करते हैं। दिल्ली में जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और एनजीओ संचालक खुर्शीद अनवर की मौत के बाद उनके शव को जलाया गया था। उनके परिजनों के मुताबिक वो एक्स मुस्लिम थे और उनकी इच्छा थी कि उनके शव को जलाया जाए, दफनाया नहीं जाए। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के रहने वाले डॉ जफर ने इस्लामी कट्टरवाद विषय पर पीएचडी करने के बाद इस्लाम से दूरी बना ली और अब वो एक्स मुस्लिम हो गए हैं। वो कहते हैं कि ऐसा भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ही संभव है। वो आगे कहते हैं कि किसी इस्लामिक देश में धार्मिक आज़ादी के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता।
   जयपुर में कानून की पढ़ाई कर रहीं आमना बेगम ने कहा कि मदरसों में जाहिल मौलवी भरे पड़े हैं और इस्लाम में खौफ भरा हुआ है। कोलकाता के अली मुंतजर भी एक्स मुस्लिम हैं। उनका मानना है कि जिस मजहब के नाम पर दुनिया भर में कत्ल-ओ-गारत हो रही हो वो मजहब भला किसी को स्वर्ग-नर्क क्या पहुंचाएगा। अली मुतंजर पूछते हैं कि आईएसआईएस जैसे कातिल संगठन किसी और मजहब में हैं क्या ?
   इसी तरह के सवाल सुल्तान शाहीन भी खड़े करते हैं। सुल्तान शाहीन एक सुधारवादी वेबसाइट न्यू एज इस्लाम के संपादक हैं। शाहीन कहते हैं कि भारत में एक्स मुस्लिम को समर्थन देने वाला कोई संगठन नहीं है और ना ही ऐसा कोई आंदोलन यहां चल रहा है जो लोगों को मानसिक तौर पर इस्लाम छोड़ने को तैयार कर रहा हो। लेकिन, शाहीन ये जरूर मानते हैं कि लोग एक्स मुस्लिम शब्द को जान चुके हैं और वैसे लोगों का स्वागत करने लगे हैं।
   जाहिर तौर पर भारत जैसे धर्म परायण देश में एक्स मुस्लिम शब्द कौतूहल पैदा करता है। इससे ज्यादा कौतूहल का विषय है इस्लाम से दूर हो रहे लोगों में बहुत कम लोग ही हिंदू या बौद्ध धर्म अपना रहे हैं। इनमें से ज्यादातर लोग नास्तिक समाज का हिस्सा बनना पसंद कर रहे हैं।

Wednesday, January 31, 2018

कासगंज दंगा: वो, जो चाहते हैं कि आपका बच्चा चंदन बने

कासगंज दंगे के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से अपील की जा रही है कि चंदन गुप्ता की हत्या का बदला लिया जाए। चंदन गुप्ता वही नवजवान था जिसकी हत्या 26 जनवरी को सांप्रदायिक उन्माद के दौरान की गई। इस हत्या के बाद बीजेपी सांसद राजवीर सिंह ने बेहद भड़काऊ बयान दिया। राजवीर सिंह ही नहीं पार्टी से जुड़े कई नेता भड़काऊ बयान देने के लिए मंचों पर पहुंच गए। कई हिंदूवादी, और मुस्लिम संगठन अभी भी बदले की भावना भड़का रहे हैं। इन बयानों और सोशल मीडिया पर चल रहे पोस्ट पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। इन्हें नजरअंदाज करना ख़तरनाक हो सकता है। क्योंकि आप नजरअंदाज करके निकल भी गए तो संभव है आपके परिवार का कोई सदस्य इस भड़काऊ बयान या पोस्ट का शिकार हो जाए। ऐसे ही बयानों, पोस्ट और मीठे ज़हर का शिकार चंदन गुप्ता भी हुआ होगा। इसलिए ज़रूरी है कि आप सावधान रहें। सिर्फ सावधान ही नहीं रहें इनसे सवाल भी पूछें। पूछिए कि क्या राजवीर सिंह अपने बच्चों, भाइयों, रिश्तेदारों के हाथों में पत्थर थमाकर उन्हें उन्मादी बनाएंगे। अगर हां तो फिर अब तक उन्हें सामने लेकर क्यों नहीं आए ? और अगर नहीं तो फिर आपके बच्चों के सीने पर गोली चलवा कर वो सत्ता का सुख क्यों भोगेंगे ? उनके बच्चे, भाई, रिश्तेदार अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं और आपके बच्चों को बदला लेने के लिए उकसाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालने वालों से भी पूछिए कि क्या वो अपने बच्चों को हाथों में पत्थर थमाकर भेज रहे हैं ?
    दरअसल ये सवाल बेहद महत्वपूर्ण हैं। ये सवाल आप खुद से पूछिए। आप क्यों दूसरों का मोहरा बनते जा रहे हैं ? जिस कथित राष्ट्रवाद के नाम पर आपके दिमाग में नफरतें भरी जा रही हैं वो राष्ट्रवाद है भी या नहीं ये भी खुद से पूछिए। जिस हिंदूवाद के नाम पर आपके दिमाग में ज़हर घोला जा रहा है वो हिंदूवाद है या फिर किसी की सत्ता की चाबी ये सवाल भी खुद से पूछिए।

  क्योंकि जिस हिंदूवाद, राष्ट्रवाद के नाम पर चंदन की लाश बिछाई गई उस हिंदूवाद, राष्ट्रवाद के नाम पर आम आदमी के हिस्से हर बार बर्बादी के क़िस्से ही आए हैं। अब तक जितनी भी बस्तियां जलाई गईं वो आम आदमी की ही थीं। इस कथित हिंदूवाद, राष्ट्रवाद के नाम पर अब तक जितनी आबादी बेघर हुई है वो आम आदमी की ही थी। अब तक जितनी लाशें गिराई गईं हैं वो सब आम आदमी की ही थीं। आम आदमी के हिस्से आई ये बर्बादी किसी और के लिए सत्ता का सुख लेकर आई। इसलिए ये ज़रूरी है कि इस दौर में खुद से और उन लोगों से भी, जो भावनाओं को भड़काने में महारत रखते हैं इस किस्म के सवाल पूछे जाएं। और हां, अपने बच्चों, परिवार, रिश्तेदार और समाज को चंदन बनने से बचाने की पूरी कोशिश कीजिए क्योंकि, उनकी पूरी राजनीति किसी चंदन या किसी पहलू खान की हत्या पर ही टिकी है। उनकी सत्ता की भूख मिटाने के लिए अपने कलेजे के टुकड़ों की बलिदानी मत दीजिए। 

Tuesday, January 30, 2018

कासगंज कांड: अपने बच्चों को चंदन गुप्ता बनने से बचाइए

उत्तर प्रदेश के कासगंज में हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। धीरे-धीरे घटना से जुड़ी परतें भी उघड़ रही हैं। सरकारी मशीनरी अपने हिसाब से घटना की जांच कर रही है और सामाजिक ढांचा अपने हिसाब से।
     26 जनवरी को हुई हिंसा में चंदन गुप्ता की हत्या के बाद समाज ने नए सिरे से सोचना शुरू नहीं किया तो फिर समझिए ख़तरा हर घर में जगह बना लेगा। घटना के बाद शुरुआती जांच में जो बातें सामने आ रही हैं वो ये बता रही हैं कि चंदन गुप्ता उसी उन्माद की शिकार हो गया जिस उन्माद के लिए उसे खड़ा किया गया था। सामने आई तस्वीरें ये बता रही हैं कि जिसे तिरंगा यात्रा बाताया जा रहा था वो सिर्फ तिरंगा यात्रा नहीं थी। उस यात्रा में शामिल युवकों के हाथों से तिरंगा कम थे और भगवा झंडे ज्यादा थे। भगवा झंडा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों की ध्वजा है। घटना की शुरुआती जांच बताती है कि जहां हिंसा हुई वहां मुस्लिम पक्ष भी तिरंगा फहराने की तैयारी कर रहा था। मोटरसाइकिल पर सवार कथित तिरंगा यात्रा में शामिल युवकों का पहले तो वहां रास्ते को लेकर विवाद हुआ फिर यही विवाद सांप्रदायिक नारों के बारुद सुलगाने लगा।
   खैर घटना का जिक्र बहुत हो चुका है। ज़रूरत है इस घटना में चंदन गुप्ता और गली-गली गढ़े जा रहे चंदन गुप्ताओं का जिक्र हो। चंदन गुप्ता एक नवजवान था। चंदन गुप्ता एक उत्साही युवा था। चंदन गुप्ता भी मध्यम वर्ग के उस परिवार का हिस्सा था जिस परिवार में जवान होता बेटा बुजुर्ग होते मां-बाप की उम्मीद बनते जाते हैं। ये चंदन कब उस जमात में शामिल हो गया जो जमात लगातार नफरतों के बारूद फैलाती रही ? चंदन गुप्ता कब कैसे उस जमात का हिस्सा बना जो जमात कथित हिंदू राष्ट्र के सपने दिखाकर युवाओं के दिमाग़ में ज़हर बोती रही है और खास राजनीतिक दल के लिए सत्ता की सीढ़ियां गढ़ती रही है ? इन सवालों को आज के वक्त में सुलझाना बेहद ज़रूरी होता जा रहा है।
   क्योंकि, जिस हिंदुत्व की चासनी में इस घटना को डुबोने की बेहूदा कोशिशें हो रहीं हैं वो ख़तरे को और बड़ा कर रही हैं। ये मसला हिंदुत्व का है ही नहीं। अगर चंदन गुप्ता की हत्या का मसला हिंदुत्व से जुड़ा है तो फिर गौरी लंकेश का मसला हिंदुत्व से क्यों नहीं जुड़ा ? जो लोग आज चंदन की हत्या को हिंदू युवा की हत्या से जोड़ रहे हैं ये वही लोग हैं जो गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें कुतिया कह रहे थे। जबकि गौरी लंकेश भी हिंदू थीं। इस मसले को हिंदुत्व से जोड़ने वाले तब क्यों चुप थे जब गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सप्लाई रुक जाने से सैकडों बच्चे मर गए थे ? यहां मरने वाले तमाम बच्चे हिंदू थे। झारखंड में आधार कार्ड नहीं होने की वजह से राशन नहीं मिलने पर भूख से मरी बच्ची भी हिंदू थी। और नोटबंदी के दौरान कतारों में मरे लोग भी हिंदू ही थे। ऊना में हुई घटना का शिकार भी हिंदू ही हुए थे। अगर हिंदुओं की मौत और हत्या पर नाराजगी का मसला होता तो फिर ये भीड़ इन तमाम घटनाओं पर खामोश नहीं रहती।

    मतलब ये मसला हिंदुत्व का है ही नहीं, मसला सिर्फ उन्माद का है और इस उन्माद के आसरे एक दल विशेष को फायदा पहुंचाने की कोशिश भर है। चंदन जैसे युवक उसी उन्माद का हिस्सा बनाए जा रहे हैं। इसके लिए बाजाप्ता अलग-अलग संगठन तैयार किए गए हैं। ये संगठन नफरत की बुनियाद पर धर्म की गलत व्याख्या कर, राष्ट्रवाद का भ्रम फैलाकर युवाओं को अपने गिरोह में शामिल कर रहे हैं। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को नारों और झंडों की ज़रूरत नहीं बेहतर कर्मों की ज़रूरत है। दुर्भाग्य से चंदन का बालमन इनकी साजिशें नहीं समझ पाया। इसलिए ज़रूरी है कि आप सतर्क रहें। अपने बच्चों को चंदन बनने से बचाइए।  

Saturday, January 27, 2018

कासगंज हिंसा: तू इधर-उधर की बात न कर, बस ये बता कि काफिला क्यों लुटा ?

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 26 जनवरी को एक युवक की हत्या हो गई। ये हत्या सांप्रदायिक झड़प में हुई। हत्या के बाद झड़प सांप्रदायिक दंगे में तब्दील हो गई और पूरा शहर कर्फ्यू के सन्नाटे में घिर गया। 27 जनवरी को शहर सुलगने लगा। झड़प और आगजनी की घटनाओं ने कर्फ्यू के सन्नाटे को कहर के कोहराम में तब्दील कर दिया। और यहीं से सवाल खड़ा हुआ कि ये हादसा हुआ ही क्यों ?
इस हादसे के कई पहलुओं की पड़ताल ज़रूरी है। पड़ताल होगी भी। फिलहाल जो बात सामने आ रही है वो ये है कि कासगंज में 26 जनवरी की सुबह कुछ युवकों ने मोटर साइकिलों पर सवार होकर तिरंगा यात्रा निकाली। इस यात्रा की सूचना स्थानीय प्रशासन और पुलिस को नहीं दी गई थी। पहली चूक यहां सामने आती है।

Copyright Holder: ASIT NATH TIWARI
कथित तिंरगा यात्रा जब शहर के बड्डू नगर इलाक़े से गुज़र रही थी तब यात्रा में शामिल युवकों की किसी बात पर मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों से झड़प हो गई. पहले हाथापाई हुई फिर भीषण हिंसा हो गई। ये इलाका सांप्रदायिक नजरिए से बेहद संवेदनशील है। 1993 में इसी इलाके से भड़के दंगे ने राज्य के कई जिलों को अपनी चपेट में ले लिया था। इस इलाके में झड़प इस घटना में दूसरी प्रमुख चूक रही।
झड़प और हिंसा के बाद एक मस्जिद के नजदीक से गोलियां चलने लगीं। इसी गोलीबारी में शहर के नरदई गेट निवासी चंदन गुप्ता की मौत हो गई। फायरिंग के बाद खुद को घिरा देख कथित तिरंगा यात्रा निकालने वाले युवक वहां से जान बचा कर भागे। मामूली झड़प के बाद गोली का चलना इस घटना की तीसरी चूक थी।
इस घटना के बाद पूरे शहर में तनाव बढ़ गया। जब भीड़ ने कोतवाली का घेराव कर लिया तब पुलिस की नींद खुली। 27 जनवरी को पुलिस ये मानकर बैठ गई कि महकमे के बड़े अधिकारी शहर में मौजूद हैं लिहाजा कोई बड़ी घटना नहीं होगी। ये इस घटना की चौथी चूक रही। 27 जनवरी की सुबह से ही शहर में हिंसक घटनाएं होने लगीं। कई दुकानों समेत तीन बसों को भीड़ ने फूंक दिया।
अब इस घटना के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। पहला सवाल ये कि बिना स्थानीय पुलिस को सूचना दिए यात्रा क्यों निकाली गई ? दूसरा सवाल ये कि यात्रा को एक मस्जिद के नजदीक रोक कर वहां धर्म विशेष के खिलाफ नारे क्यों लगाए गए ? तीसरा सवाल ये कि जब यात्रा सड़कों से होते हुए संवेदनशील इलाके की तरफ बढ़ी तो पुलिस ने सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं किए ? चौथा सवाल ये कि जब युवकों में किसी बात पर झड़प हो गई तो फिर गोलियां क्यों चलाई गईं ? पांचवा सवाल ये कि मस्जिद के आसपास उस दिन इतने हथियार क्यों इकट्ठा किए थे ? छठा सवाल ये कि मस्जिद के आसापस से गोलियां चलाने वाले कौन लोग थे ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये कि इन तमाम मसलों पर नजर बनाए रखने के लिए जिस पुलिस तंत्र पर खरबों रुपये खर्च किए जाते हैं वो तंत्र कहां था ?
जब घटना हो गई, एक युवक की जान चली गई, दुकानें, बसें फूंक दी गईं और शहर के आपसी रिश्ते सुलग उठे तब पुलिस कमिश्नर सुभाष चंद्र शर्मा ये कह रहे हैं कि पुलिस ने लापरवाही बरती।
बात बड़ी सीधी है और वो भी सरकार से कि तू इधर-उधर की बात न कर बस ये बता कि काफिला क्यों लुटा ?

क्या सावरकर से भी जुड़े थे गांधी हत्या के तार ?

महात्मा गांधी की मौत बहुत तेजी नजदीक आ रही थी। दिसंबर 1947 की शुरुआत में ही हथियारों के तस्कर मदनलाल पहवा ने होटल संचालक विष्णु करकरे के साथ नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे को कई हथियार दिखा दिए थे। ये तमाम हथियार विष्णु करकरे के होटल के मैनेजर के कमरे में छुपाकर रखे गए थे। लेकिन इस योजना को जनवरी 1948 में तगड़ा झटका लगा। हत्या के एक मामले में पुलिस ने विष्णु करकरे को गिरफ्तार करने के लिए एक होटल में छापा मार दिया। इस दौरान पुलिस को वो तमाम हथियार मिल गए। करकरे और पहवा फरार हो गए।
13 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की तबीयत बेहद खराब हो गई। वो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये की मदद देने की जिद पर अड़ गए। विभाजन के समय हुए वादे को वो बार-बार याद दिलाने लगे। गांधी अनशन करने लगे। डॉक्टरों ने बताया लगातार अनशन की वजह से पहले से ही उनका गुर्दा खराब है और हृदय पर बुरा असर पड़ने लगा है। डॉक्टरों की बात को गांधी जी ने मानने से इनकार दिया। गांधी कमजोर हो चुके थे। वो एक खाट पर निढाल होकर लेटे हुए थे। 14 जनवरी को दिल्ली के तमाम मंदिरों और मस्जिदों के लाउडस्पीकर पर गांधी के सेहतमंद होने की कामना सुनाई देने लगी। इसी किस्म की आवाजें पाकिस्तान में भी सुनी जाने लगीं। जगह-जगह प्रार्थना सभाएं होने लगीं। मंदिर और मस्जिद की तरफ से राहत शिविरों में मदद पहुंचाई जाने लगी। सबसे गांधी की सेहत के लिए दुआ करने की अपील की जाने लगी।
        दिल्ली से सात सौ मील दूर हिंदू राष्ट्र के दफ्तर में जैसे ही गांधी के अनशन की खबर पहुंची नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे एक-दूसरे को देखने लगे। दोनों के चेहरे पर तनाव था। गोडसे ने ऐलानिया तौर पर कहा कि हमें गांधी को मार देना चाहिए। गोडसे के इतना कहते ही उसके सहयोगी मदनलाल पहवा और विष्णु करकरे भी वहां पहुंच गए। गोडसे ने अपनी बात इन दोनों को भी बताई।
हिंदू राष्ट्र के दफ्तर से निकलकर वो चारों मुंबई में उस आदमी के पास पहुंचे जो साधु और फकीर के भेष में हथियार बेचा करता था। दिगंबर बडगे ने फर्श पर हथियार फैला दिए। हथियारों को देखने के बाद तय हुआ कि सभी 14 जनवरी को बंबई के दादर में हिंदू महासभा दफ्तर में मिलेंगे।
इधर दिल्ली के बिड़ला हाउस के लॉन में महात्मा गांधी को धूप में लेटाया गया था। वो खुद चल नहीं पा रहे थे। पोती मनु गांधी उनसे अनशन तोड़ने की भावुक अपील कर रहीं थीं। दादा-पोती एक-दूसरे को गीता और रामायण के उदाहरण दे रहे थे। चारपाई के चारों तरफ हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदाय की बड़ी भीड़ जमा थी। सारे लोग बापू से अनशन तोड़ने की अपील कर रहे थे।
उधर 14 जनवरी 1948 को बंबई के सावरकर सदन में सदी के सबसे बड़े घटना की तैयारी पर मंथन चल रहा था। हथियारों का तस्कर बडके गवैया के रूप में बगल में तबला दबाए सावरकर सदन में बैठा था। दिंगबर बडगे को वहीं बैठने का इशारा कर नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे बडगे वाला तबला लेकर सावरकर के कमरे में पहुंचे। इस तबले में बम और पिस्तौल रखे गए थे।
15 जनवरी को पूरे देश में ये बात फैल गई कि बापू की तबीयत बेहद खराब है। ये गुरुवार का दिन था। देश भर में यज्ञ-हवन और दुआओं का दौर शुरू हो गया। उसी दिन सबेरे तकरीबन साढ़े सात बजे नारायण आप्टे बंबई के एयर इंडिया के दफ्तर पहुंचा और बंबई से दिल्ली जाने वाली फ्लाइट की दो टिकट बुक करवाई। ये टिकट डीएन कर्माकर और एस मराठे के नाम से बुक करवाए गए थे और यात्रा की तारीख थी 17 जनवरी।
इधर दिल्ली में दोपहर बाद पूरी सरकार गांधी की चारपाई के चारों तरफ बैठी थी। जवाहर लाल नेहरु और सरदार वल्लभ भाई पटेल की आंखों में आंसू थे। बापू ने दोनों से पूछा कि अगर भारत अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय समझौता ही तोड़ देगा तो फिर कल दुनिया कैसे उस पर विश्वास करेगी ? दरअसल बापू उस समझौते की याद दिला रहे थे जिसके तहत पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने थे। बापू ने सरदार पटेल से पूछा कि पाकिस्तान में गए और उस भू-भाग पर पहले से बसे लोग क्या वो लोग नहीं हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी ? क्या बिना उन लोगों के सहयोग के ही देश आजाद हो गया ? बापू के इस सवाल के बाद नेहरु और सरदार पटेल फफक पड़े। नाराजगी और गुस्से की बर्फ पिघल पड़ी। बिड़ला हाउस के उसी लॉन से सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने का ऐलान कर दिया।
उसी दिन बंबई में नारायण आप्टे ने बडगे से मुलाकात कर बताया कि सावरकर ने गांधी, नेहरु और सुराहवर्दी को खत्म करने का आदेश दिया है। आप्टे ने बडगे को भी दिल्ली जाने को तैयार कर लिया।
बडगे ने जो हथियार दिए थे उसे मदनलाल ने अपने बिस्तरों वाली पोटली में छुपाकर रख लिया। तय हुआ कि मदनलाल और करकरे फ्रंटियर मेल से दिल्ली के लिए रवाना होंगे। बडके और नाथूराम गोडसे का भाई गोपाल गोडसे अलग-अलग गाड़ियों से दिल्ली जाएंगे। नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे हवाई जहाज से दिल्ली पहुंचेंगे। मतलब बंबई से बापू की मौत दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाली थी।
इधर दिल्ली-बंबई समेत तमाम शहरों से बिड़ला हाउस में तार आने लगे। तमाम तार में लोगों ने बापू के स्वास्थ्य की कामना की थी। 16 जनवरी को दिल्ली-बंबई समेत कई शहरों की तमाम दुकानें बंद रहीं। जगह-जगह बापू के स्वास्थ्य लाभ की खातिर हवन-पूजन होने लगे।
17 जनवरी को तय कार्यक्रम के मुताबिक गोपाल गोडसे ट्रेन में सवार हो गया। गोपाल गोडसे ने भी अपने सामान में एक पिस्तौल छुपा रखा था ताकि जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल में आ सके।
इधर बिड़ला हाउस में गांधी की सेहत में हल्की सुधार के बाद भले ही तमाम चेहरों पर थोड़ी खुशी दिख रही थी लेकिन नेहरु और पटेल अलग-अलग दिशाओं में रोते देखे गए। दोनों गांधी की बिगड़ी तबीयत के लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगे थे। बिड़ला हाउस में भीड़ बढ़ती जा रही थी और इसी भीड़ में मदनलाल पहवा और करकरे भी मौजूद थे।
शाम को कांग्रेस दफ्तर में डॉ राजेंद्र प्रसाद के साथ नेताओं की मीटिंग चल रही थी। तभी फोन पर जानकारी मिली कि गांधी की तबीयत बहुत खराब हो गई है। अगले दिन 18 जनवरी को गांधी घंटे-दो घंटे पर बेहोश होने लगे। 11 बजे तक राजेंद्र प्रसाद, नेहरु, पटेल समेत तमाम बड़े नेता बिड़ला हाउस पहुंच चुके थे। राजेंद्र प्रसाद ने बापू से कहा कि उनकी तमाम शर्तें देश ने मान ली है। दस्तखत करने वालों में हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता भी शामिल हैं। सबने मिलकर आपसे अनशन तोड़ने की अपील की है। गांधी ने कहा सरकरा बैठे लोगों ने सरकार का मतलब दिल्ली समझि लिया है, सरकार का मतलब सारा देश समझिए।
दोपहर 2 बजे तक सारी दिल्ली को खबर लग गई कि गांधी ने अनशन खत्म कर दिया है। बीबीसी ने भी गांधी का अनशन खत्म वाली खबर देश-दुनिया को दे दी। भारत और पाकिस्तान में जश्न का माहौल था। और दिल्ली में गांधी की हत्या के लिए पांच लोग पहुंच चुके थे।

Wednesday, January 24, 2018

गांधी हत्या पर विशेष: गोडसे तो मोहरा भर था

                      पहली कड़ी
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की योजना को अमल लाने की बेचैनी 1947 के नवंबर महीने की पहली तारीख को जिस पूरे गिरोह को तनावग्रस्त कर रही थी उसे मुंबई के सावरकर भवन में रहने वाले अपने वैचारिक गुरु के प्रति अपनी आस्था प्रमाणित करनी थी। ये गिरोह जिसने 15 अगस्त को तिरंगा झंडे का विरोध करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के झंडे को सलामी दी थी 1 फरवरी को मुंबई में अपने नए खुल रहे अखबार के दफ्तर के उदघाटन के लिए जमा हुआ था। हिंदू राष्ट्र अखबार का नया दफ्तर खुलने वाला था और पूणा के दो ब्राह्मण अखबार से आगे की बात सोचने में मशगूल थे। नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे में गहरी मित्रता जरूर थी लेकिन दोनों के स्वभाव में बड़ा फर्क था। दोनों कट्टर हिंदूवाद के समर्थक थे, दोनों विनायक दामोदर राव सावरकर के प्रिय शिष्य थे। लेकिन दोनों में जो फर्क था वो बेहद हैरान करने वाला था। नारायण आप्टे ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीना पसंद करता था। वो रोज शराब पीता था और अपने घर में रहने के बजाय होटल के कमरों में ठहरता था। उसने अपनी पत्नी को अपने हाल पर छोड़ दिया था और अलग-अलग महिलाओं से संबंध बनाता रहता था। वो उन्हीं होटलों में ठहरता था जहां उसके लिए लड़कियों का इंतजाम हो जाए। नाथूराम गोडसे इससे अलग था। गोडसे मांस-मदिरा से बहुत दूर था और ब्रह्मचर्य के नियमों का कठोरता से पालन करता था। लेकिन दोनों की सोच में एक मामले में जबर्दस्त समानता थी। दोनों महात्मा गांधी को जाति के आधार पर अपना नेता नहीं मानते थे। नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे की जाति व्यवस्था पर दृढ़ आस्था थी। दोनों को मानना था कि महात्मा गांधी वैश्य हैं और एक वैश्य का नेतृत्व हिंदुओं के लिए अपमानजनक है। दोनों का मानना था कि विनय दामोदर सावरकर ब्राह्मण हैं और भगवान ने उन्हें हिंदुओं का नेतृत्व करने के लिए ही ब्राह्मण कुल में पैदा किया है। ये दोनों सावरकर समेत खुद को उच्च कुल का चितपावन ब्राह्मण मानते थे।
   1 फरवरी को हिंदू राष्ट्र अखबार की शुरुआत करने वाले ये दोनों युवा परेशान थे। हालांकि अखबार में दोनों की भूमिकाएं बेहद स्पष्ट थीं। आप्टे तेजी से सौदे पटाने की कला का माहिर था और गोडसे जले-भुने लेख लिखने वाला संपादक।
   अखबार की शुरुआत के साथ ही दोनों में निराशा की पहली खबर पानीपत से आई। नवंबर के आखिरी हफ्ते में शहर में रह रहे शरणार्थी हिंदू और स्थानीय हिंदुओं ने मुस्लिम बस्तियों को घेर लिया। पानीपत रेलवे स्टेशन के तब के स्टेशन मास्टर देवीदत ने स्टेशन पर शरण लिए मुसलमानों को एक सुरक्षित कमरे में जगह दे दी तो भीड़ ने उनपर हमला कर दिया।  इस भीड़ में हिंदू और सिख शामिल थे। इस घटना के डेढ़ घंटे बाद ट्रेन के साधारण डब्बे से एक बेहद बूढ़ा शख्स स्टेशन पर उतरा। उस बूढ़े शख्स को देखते ही स्टेशन पर चहलकदमी बढ़ गई। हर आदमी बापू की एक झलक पाने को बेताब हो गया। बापू की एक अपील पर भीड़ ने स्टेशन मास्टर को रिहा कर दिया। कमरे में बंद मुसलमान बाहर आ गए और जो लोग कृपाण लेकर उनपर हमले के लिए बेताब थे वही लोग उन्हें गले लगाने लगे। पानीपत में गांधी ने एक छोटी सी सभा की और शहर का माहौल बदल गया। राहत शिविर में रह रहे सिखो के लिए मुसलमानों की बस्तियों से कपड़े और राशन भिजवाए गए। इस खबर ने अखबार के दफ्तर में बैठे नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को घोर निराशा में धकेल दिया। बापू पानीपत की लड़ाई तो जीत गए लेकिन जिंदगी की लड़ाई हार गए।
   शाम होते ही नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे अपने पुराने मित्र दिगंबर बडके से मिलने उसके घर पहुंच गए। बडके इस दिन साधु के वेश में था। वो रोज अपना वेश बदलता रहता था। बडके की पूना में किताबों की दुकान थी और किताबों की आड़ में वो हथियार बेचा करता था। इसी के साथ वो होटल के कमरों में लड़कियों की सप्लाई भी किया करता था। नारायण आप्टे से उसकी मित्रता होटल में लड़कियां सप्लाई करने के दौरान ही हुई थी। बडके से मिलकर उसने कहा कि वो कुछ करने वाला है और इसके लिए उसे हथियारों की ज़रूरत है। मतलब नवंबर 1947 में ही महात्मा गांधी की हत्या का फैसला हो गया था।

Sunday, January 21, 2018

AAP प्रकरण: क्यों न हो आयोग और मीडिया पर संदेह ?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द करने के चुनाव आयोग के फैसले पर बहसें जारी हैं। मामला हाईकोर्ट में है। लेकिन जिस तरह से आयोग का फैसला सामने आया उससे कई किस्म के संदेह पैदा हो रहे हैं। इस मामले में आदालतों के सामने भी कई चुनौतियां हैं।
  दरअसल संविधान में लाभ के पद की कोई व्याख्या नहीं है। व्याख्या तो दूर की बात इसकी कल्पना तक नहीं है। मतलब लाभ का पद संविधान के जरिए परिभाषित नहीं है। कोर्ट के सामने दूसरी बड़ी चुनौति पुराने मामले हैं। ऐसे कई नजीर हैं जिसपर कोर्ट को नजर डालनी पड़ेगी। राजस्थान का कांता कथुरिया प्रकरण सबको याद है। कांता कथुरिया, कांग्रेस के विधायक थे। तब की सरकार ने उन्हें लाभ के पद पर नियुक्त किया। हाईकोर्ट ने कांता कथुरिया की नियुक्ति को अवैध करार दिया। इसके ठीक बाद सरकार ने कानून बनाकर उस पद को ही लाभ के पद से बाहर कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट गया और सुप्रीम कोर्ट ने कांता कथुरिया की विधानसभा सदस्यता और जिसे लाभ का पद बताया गया था उस पद पर तैनाती को वैध करार दिया।
    आप विधायकों के मामले में चुनाव आयोग के फैसले पर संदेह की बड़ी वजह 2006 का एक मामला भी है। 2006 में दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी। इस सरकार में शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं। तब शीला दीक्षित ने 19 विधायकों को संसदीय सचिव का पद दिया था। बीजेपी ने इसे लाभ का पद बताकर चुनौती दी। सरकार ने तत्काल कानून बनाकर 14 पदों को लाभ के पद की सूची से बाहर कर दिया। ये काम मौजूदा सरकार भी कर चुकी है। मतलब अरविंद केजरीवाल सरकर ने भी कानून के जरिए उन पदों को लाभ के पद की सूची से बाहर कर दिया है जिनपर पार्टी के उन 20 विधायकों को नियुक्त किया गया है जिनपर हाल ही में चुनाव आयोग का फैसला आया है। तो क्या चुनाव आयोग अलग-अलग पार्टियों के लिए अलग-अलग मानक रखता है ?
    चुनाव आयोग के फैसले पर संदेह की और भी कई वजहें हैं। आप के जिन विधायकों पर आयोग ने कार्रवाई की है उन्हें मार्च 2015 में संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया गया। उसी साल छत्तीसगढ़ में भी 11 विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया गया। छत्तीसगढ़ के इन 11 विधायकों की संसदीय सचिव पर नियुक्ति को भी कोर्ट ने अवैध ठहराया है, बावजूद इसके चुनाव आयोग ने उनकी विधानसभा सदस्यता को बहाल रखा है।
   हरियाणा में भी मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पांच विधायकों को लाभ का पद दिया। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को अवैध बताया लेकिन, इनकी विधानसभा सदस्यता को चुनाव आयोग ने बरकरार रखा। राजस्थान के भी 10 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया है। मध्य प्रदेश में तो 118 विधायकों को लाभ का पद दिया गया है। दिल्ली के 20 विधायकों के मामले में झटपट कार्रवाई और मध्य प्रदेश के 118 विधायकों के मामले में चुप्पी। तो फिर चुनाव आयोग पर संदेह क्यों नहीं किया जाए ? राजस्थान, हरियाणा और छत्तीसगढ़ के मामलों में चुनाव आयोग के रवैये पर संदेह क्यों नहीं किया जाए ?
   2016 में अरुणाचल प्रदेश की सरकार में तोड़फोड़ कर बीजेपी की सरकार बनाई गई। पेमा खांडू मुख्यमंत्री बने। इसी पेमा खांड़ू ने सितंबर 2016 में 26 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया और फिर मई 2017 में 5 और विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया। इतने छोटे राज्य में 31 संसदीय सचिव बनाए गए ये किसी को क्यों नहीं दिख रहा है ?
   और फिर संदेह सिर्फ चुनाव आयोग पर ही क्यों ? ये तमाम तथ्य जुटाने वाले वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार अगर बार-बार मौजूदा टीवी मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं तो क्या ग़लत है ? टीवी पर भयंकर होते एंकर आम आदमी पार्टी के मुद्दे पर तो बहुत गरम होते दिख रहे हैं लेकिन, यही एंकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान के मुद्दे पर एक शब्द भी क्यों नहीं बोल पा रहे  हैं ? 

    जाहिर है संस्थाओं को तबाह किया जा रहा है। इस काम में मदद करने वाले संस्थाओं के प्रमुखों को रिटायरमेंट के बड़े लाभ का पद दिया जा रह है।  

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