विधायिका ने अपनी गरिमा खुद गिराई है। यूं बात-बात में विधायिका के दायरे में न्यायपालिका के डंडे का चलना उचित नहीं है। ये बेहद कमजोर विधायिका की निशानी है। लेकिन विधायिका को इसके लिए संविधान के दायरे में आना होगा। अलग-अलग राज्यों में राज्यपालों ने अक्सर विधायिका का सम्मान आहत किया है। 1990 के बाद ज्यादातर राजभवनों ने संविधान और संसदीय मर्यादा को छलनी किया है। आपको जब खुद अपने सम्मान का ख्याल नहीं होगा तो फिर दूसरे तो आपका मजाक उड़ाएंगे ही। आप खुद को जब पंचायत में लेकर चले जाएंगे तो सभा आपके दोषों के ढूंढेगी ही। देश और संविधान से अलग जब आप किसी नेता या गिरोह में आस्था रखने लगेंगे तो आदालत के डंडे आपकी पीठ पर पड़ेंगे ही। सभ्य समाज में दरवाजे पर पुलिस आने को भी अपमानजनक माना जाता है। तो फिर सभ्य राजनीति में राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक करार देना भी अपमानजनक माना जाना चाहिए। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल ऐसे फैसले ना लें जो असंवैधानिक हों और भरी पंचायत में उनके फैसले को बदलना पड़े। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल संविधान में आस्था रखते हुए काम करें न कि व्यक्ति विशेष में। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल का चयन करते वक्त लाज-शर्म का ख्याल रखा जाए। एक वक्त था जब देश के लोग राष्ट्रपति और राज्यपाल को लोकतांत्रिक गरिमा का प्रतीक समझते थे। यकीन मानिए, आज के ज्यादातर लोग इन दोनों पदों पर बैठे लोगों को रबर स्टांप मानने लगे हैं। कुछ लोग तो अब इन दोनों पदों को ही ग़ैरज़रूरी बताने लगे हैं। इसलिए ज़रूरी है कि ...सियासत में इतनी अदा रहे, आंखों में पानी रहे..लहजे में हया रहे।
Friday, May 18, 2018
Wednesday, May 16, 2018
बहुमत का छल
नदी धनौती मछरी
रेवा, खा ल ई बैकुंठ के मेवा। देशभटक पांड़े के मन में ठीक वैसी ही उथल-पुथल मची
है जैसी उथल-पुथल लंगड़ मल्लाह के कठरा में रेवा मछली करती है। धनौती से निकली रेवा
जब लंगड़ के छोटे से कठरा में आती है तो छटपटाने लगती है। अंदर ही अंदर छटपटा रहे
हैं देशभटक पांड़े। जब से कर्नाटक चुनाव का रिजल्ट आया है इनका माइंड सुन्न हो गया
है। कौन करम बाकी रह गया था चुनाव में। हद से ज्यादा नीचे गिरे, झूठ-फरेब सब किया।
बाकी रिजल्ट हो गया ले लोट्टा। बहुमत और जनमत का हिसाब लगाते-लगाते देशभटक पांड़े
का कपार दुखने लगा है। घर से निकल कर बरवा घाट पहुंचे। देशभटक पांड़े को धनौती की
दुर्दशा भी नहीं देखी जा रही। सूखी नदी में धूल उड़ रही है। कहां कभी सालों भर
कल-कल करती नदी बहती रहती थी। और कहां आज इसमें धूल उड़ रही है। अब तो मुश्किल से
तीन महीने ही पानी रहता है नदी में। बरसात के दिनों में पानी भरता है और बरसात
खत्म होने के साथ नदी सूख जाती है। कभी बैकुंठ का मेवा मिलता था इस नदी में और अब
तो पोठिया-टेंगरा भी नसीब नहीं। जो कभी मछली बेचा करते थे वो अब मजदूर हो गए और
कुछ ताड़ी बेचने लगे।
देशभटक पांड़े का मन एक बार फिर कर्नाटक पहुंच
गया। सबेरे जब शाखा में गए थे तब भी मन वहीं रमा था। समझ में ये बात नहीं आ रही है
कि बहुमत का मतलब क्या है। अब कर्नाटक का ही हिसाब लगाइए। भाजपा को मिले हैं 36
फीसदी वोट जबकि कांग्रेस को 38 फीसदी। कायदे से तो बहुमत कांग्रेस के साथ है। तो
जनमत कांग्रेस के साथ और जीत भाजपा की। तो मतलब ये कि जनतंत्र का ये ढांचा अब तक
लोगों को भ्रमित करता रहा है। ये बहुमत नहीं बहुसीट का ढांचा है। जिसके पास सीट
ज्यादा जीत उसी की।
देशभटक पांड़े को इस बात का संतोष है कि जीत भाजपा
की हुई है। लेकिन बहुमत और जनमत वाला गणित उनको परेशान कर रहा है। उनको भुटिया
पंडित जी वाली ललकार भी याद आ रही है। तिवारी टोला में एक बार भुटिया पंडित जी ने
ताल ठोक कर कहा था कि देश में सिर्फ और सिर्फ अल्पमत की सरकारें बनती रहीं हैं और
जनता को धोखा देने के लिए उसे ही बहुमत बताया जाता रहा है। बीसीयों के सामने
भुटिया पंडित जी तब ये बात साबित कर दिखाई थी और तब देशभटक पांड़े को चुप रह जाना
पड़ा था। शाखा की तमाम ट्रेनिंग धरी की धरी रह गई थी। भ्रम, अफवाह और झूठ पर टिके
रहने वाले सारे दांव उस दिन फेल हो गए थे। भुटिया पंडित जी ने जब कहा कि अच्छा
बताओ पांड़े पांच लोगों ने अगर चुनाव लड़ा और सौ लोगों ने वोट किया तो फिर बहुमत
का अंक कितना होगा। देशभटक पांड़े ने तपाक से कहा था कम से कम इक्यावन। एक पल को
लगा कि देशभटक पांड़े ने भुटिया पंडित जी को हरा दिया लेकिन, अगले ही पल पासा पलट
गया। भुटिया पंडित जी ने कहा कि पांड़े बाबा इसे अक्ल से समझो। मान लो पांच लोगों
ने चुनाव लड़ा और चुनाव में सौ लोगों ने वोट डाला। जीतने वाले को मिले 24 वोट,
दूसरे नंबर पर रहे 23 वोट पाने वाले और इसी तरह बाकी तीन को मिले 20, 18 और 15
वोट। अब 23, 20,18 और 15 को जोड़ोगे तो होते हैं 76 वोट। मतलब 76 लोग तो उस आदमी
के खिलाफ थे। अब सोचो जिसके पक्ष में मात्र 24 लोग हों और खिलाफ 76 लोग वो भला
बहुमत वाला कैसे हो सकता है।
देशभटक पांड़े को अपने संघी तर्क पर बड़ा
भरोसा रहता था। लेकिन, उस दिन उन (कु)तर्कशक्ति ने जवाब दे दिया था। आज एक बार फिर
वही स्थिति है।
दूर कहीं सूरज धनौती की गोद में समाता जा रहा
है। धनौती सूख गई है। रेवा के सपने चकनाचूर हो चुके हैं। लंगड़ मल्लाह अब बेहद
कमजोर हो गया है। बरवा घाट पर अब कोई नहीं आता। शाम होते ही यहां मरघट छा जाता है।
देशभटक पांड़े सोच रहे हैं क्या यही भारत का लोकतंत्र है।
Thursday, May 3, 2018
नायक का रोल छोड़ खलनायक बने जिन्ना को महिमामंडित न करें
अलीगढ़ मुस्लिम
यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के दफ्तर मे मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर खड़ा
हुआ विवाद वैसे तो शुद्ध सियासी विवाद है। बावजूद इसके इस विवाद की आड़ में जिन्ना
को महिमामंडित करना उचित नहीं होगा। इस बात में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि
मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी लेकिन, इस बात में भी किसी को
संदेह नहीं होना चाहिए कि थोड़े ही दिनों बाद जिन्ना अंग्रेजों का पिट्ठू बन गया
और आजादी की लड़ाई को बेहद कमजोर कर गया। जिन्ना ने भारत और पाकिस्तान को कभी खत्म
नहीं होने वाले ऐसे झगड़े दिए जिसका खामियाजा आज तक दोनों देश भुगत रहे हैं।
जिस अलीगढ़ मुस्लिम यूनवर्सिटी में जिन्ना की
तस्वीर लगी है उसी यूनिवर्सिटी के संस्थापक ने पहली बार देश को टुकड़े करने का नीच
विचार पेश किया था। 1867 में ही सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों के लिए अलग देश की
मांग उठा दी थी। हालांकि तब अंग्रेजों ने उनकी बात को कई तवज्जो नहीं दी और बात
आई-गई होती रही। लेकिन, 1920 में एक बड़ी घटना हो गई। इसी साल मोहम्मद अली जिन्ना
ने महात्मा गांधी को हिंदुवादी नेता करार देते हुए मुसलमानों को महात्मा गांधी से
सतर्क रहने की सलाह दे दी। जिन्ना की इस अपील से आजादी की लड़ाई में बड़ी गफलत
पैदा हो गई। जिन्ना की इस अपील के पीछे फिरंगी लार्ड रीडिग का दिमाग काम रहा था।
लार्ड रीडिग ने ही आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के मकसद से जिन्ना को इस योजना पर
काम करने के लिए तैयार किया था। ये वही लार्ड रीडिग था जिसके हाथों 1925 में
जिन्ना ने नाइटहुड की उपाधि ली थी। और आजादी का नायक जिन्ना अब पूरी तरह से देश और
इंसानियत के लिए खलनायक बन चुका था।
रीडिग से उपाधि पाने के बाद जिन्ना खुलकर
अंग्रेजों के लिए काम करने लगा था। 1930 में जिन्ना के सहयोगी मोहम्मद इकबाल ने
इलाहाबाद में मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की मांग के समर्थन में जलसा किया। 1933
में जिन्ना के मित्र रहमत अली ने अलग देश की मांग के साथ अलग देश का नाम भी
सुझाया। इसी साल रहमत अली ने पाकिस्तान नाम के देश के मिर्माण के लिए पर्चे
बंटवाए। देश में तनाव बढ़ता जा रहा था। भारतीय समाज आपस में लड़ कर कमजोर होने लगा
था।
इसी बीच 1934 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग का
पुनर्गठन किया और पुनर्गठन के मौके पर महात्मा गांधी, कांग्रेस, अब्बुल कलाम आज़ाद
और जमात-ए-इस्लामी को मुसलमानों का दुश्मन कह कर संबोधित किया।
जिन्ना ने समाज और इंसानियत के खिलाफ सबसे
घटिया कदम 1937 में उठाया। 1937 में जब कांग्रेस ने जिन्ना के पाकिस्तान विचार को
खारिज कर दिया तब जिन्ना आपा खो बैठा और अंग्रेजों के इशारे पर उसने मुसलमानों से गृहयुद्ध
की अपील कर दी। जिन्ना की इस घटिया चाल से देश भर में दंगे भड़क गए। जैसे-तैसे
दंगों पर काबू पाया ही गया कि फिर 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने
प्रस्ताव पारित कर कहा कि लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है और इसके
लिए मुसलमानों को आखिरी लड़ाई लड़नी होगी।
1940 के इस लाहौर अधिवेशन का सबसे अधिक फायदा
अंग्रेजों को हुआ। अंग्रेजों ने बड़ी आसानी से देश भर में हिंदु-मुस्लिम दंगों की
आग लगा दी। लेकिन इसके ठीक बाद 1942 में आजादी के दीवानों ने ऐसी आग लगाई जिसमें
जिन्ना और अंग्रेजों की लगाई आग खुद जल कर राख हो गई। 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन से
जिन्ना और अंग्रेज, दोनों बौखला गए। देश को फिर सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक
दिया गया। 1946 में प्रतिनिधि सभा के चुनाव में मुसलमान बहुल इलाकों में मुस्लिम
लीग ने बड़ी सफलता हासिल की। चुनाव के नतीजों से कांग्रेस कमजोर पड़ गई और मुस्लिम
लीग प्रतिनिधियों ने देश के बंटवारे का प्रस्ताव पारित कर अंग्रेजों की झोली में
डाल दिया।
ऐसे जिन्ना को भारत में आजादी की लड़ाई का
नायक नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे जिन्ना को तो पाकिस्तान में भी आजादी की लड़ाई का
नायक नहीं माना चाहिए। तो फिर जिन्ना की तस्वीर को किसी यूनिवर्सिटी में सजाने का
मतलब ही क्या है ? उस तस्वीर के समर्थन में उतरने का मतलब क्या है ?
Friday, April 13, 2018
अपनी बहन-बेटियों के लिए ही सही अब नागरिक की हैसियत में वापस लौटिए
कठुआ, उन्नाव और
समस्तीपुर में हुई बलात्कार के बाद हत्या और बलात्कार की घटनाओं पर मचा शोर थोड़ा
कम हुआ है। अब ज़रूरी है कि हम खुद से कुछ सवाल पूछें। सोशल मीडिया पर ये सवाल
उठाया गया कि कठुआ में मुस्लिम लड़की की बलात्कार के बाद हत्या की गई तो मीडिया ने
बहुत शोर मचाया और समस्तीपुर में हिंदू लड़की की रेप के बाद हत्या पर मीडिया ने
कोई शोर नहीं मचाया। इस बेहूदा सवाल से भागना ठीक नहीं होगा। जिम्मेदार लोग फकीर
नहीं होते जो सवालों से मुंह छुपाने कि लिए झोला उठाकर भाग जाएं। जिम्मेदार लोगों
को जवाब देना होता है। बेहूदगी से भरे इस सवाल का जवाब नहीं दीजिएगा तो बेहूदगी
बढ़ती जाएगी। कठुआ और समस्तीपुर की घटनाओं में समानता नहीं है इसलिए दोनों को एक
चश्मे से नहीं देखा जा सकता। समस्तीपुर में बच्ची के साथ एक युवक रेप करता है और
उसकी हत्या कर देता है। घटना सामने आते ही समाज और प्रशासन दोनों अपना काम करते
हैं। जबकि, कठुआ में एक मंदिर में एक लड़की के साथ कई दिनों तक गैंगरेप होता है,
पुलिस गैंगरेप करने वालों के बचाती रहती है और फिर अंत में लड़की की हत्या कर शव
छुपाने की योजना भी पुलिस ही बनाती है। कहा तो ये भी जा रहा है कि एक पुलिस
अधिकारी ने ये तक कहा कि अभी मत मारना मुझे भी मज़े ले लेने दो। क्या समस्तीपुर
में भी ऐसा कुछ हुआ था ? नहीं न। तो फिर दोनों घटनाओं को मीडिया
में बराबर स्पेस कैसे मिल जाता ? समस्तीपुर की घटना
के बाद क्या किसी मुस्लिम संगठन ने बलात्कारी के पक्ष में रैली निकाली ? नहीं, लेकिन कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ कई
दिनों तक मंदिर में गैंगरेप होता रहा, उसकी हत्या की गई और हिंदूवादी संगठन ने
बलात्कारियों के पक्ष में रैली की। इस रैली में जय श्री राम के नारे लगे। ऐसा इस
देश में पहली बार हुआ जब बलात्कारियों के पक्ष में उन्मादी धार्मिक गोलबंदी करने
की कोशिश की गई। हाथ में तिरंगा लेकर, जुबान पर जय श्री राम लेकर बलात्कारियों के
पक्ष में भीड़ खड़ी दिखी। इसलिए समस्तीपुर और कठुआ की घटनाओं को आप एक चश्मे से न
देखें। कठुआ में बलात्कारियों के समर्थकों के हाथों में लहराता तिरंगा कितना
गौरवान्वित हुआ होगा ये तिरंगा ही जाने, बलात्कारी-हत्यारों के जुबान से जय श्री
राम के नारे सुन राम कितने फूले समाए होंगे ये राम ही जानें। मेरी समझ में यह
तिरंगे का घोर अपना था और राम की मर्यादाओं के साथ बलात्कार था। वैसे पहले भी ये
तबका राम के जयकारे उनकी भक्ति में नहीं लगाता रहा है। पहले भी राम के जयकारे
सत्ता की भूख में लगते रहे हैं और अब जिस्म की भूख में लगने लगे हैं। इसलिए हर घटना
में हिंदू-मुस्लिम करने वाले इस वक्त अपने घर में अपनी मां-बहन के साथ बैठें और
जरा उनसे स्त्री देह की गरिमा समझने की कोशिश करें।
अब बात उन्नाव वाली घटना की। उन्नाव वाली घटना
इतनी बड़ी नहीं होती अगर सत्ता-प्रतिष्ठान ने ठीक से काम किया होता।
सत्ता-प्रतिष्ठान ने एक आरोपी को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लड़की
को खामोश करने की पूरी किशिशें हुईं, लड़की के पिता की हत्या सत्ता-समाज ने की और
फिर किस्म-किस्म के बेहूदा तर्क सत्ता-समाज ने गढ़े। डीजीपी ने कहा कि आरोपी
विधायक के खिलाफ इतने साक्ष्य नहीं कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सके लेकिन, वहीं
डीजीपी ये नहीं बता पाया कि पीड़ित लड़की के पिता के खिलाफ कौन से साक्ष्य थे कि
उनको गिरफ्तार कर लिया और फिर पीट-पीट कर मार डाला।
आप
कोसिए, सबको कोसिए। सरकार को, पुलिस को, राजनेता को कोसते-कोसते अगर आप खुद को भी
नहीं कोस रहे हैं तो यकीन मानिए आप ईमानदार नहीं हैं। बलात्कार को हिंदू-मुस्लिम
के खांचे में धकेलने वाला समाज बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकता है। बलात्कार
के पक्ष में रैलियां करने वाला समाज बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकता है।
बलात्कारी नेता के पक्ष में कुतर्क गढ़ने वाली भीड़ बलात्कार भोगने के काबिल ही हो
सकती है। बलात्कार के पक्ष में खड़ी राजनैतिक विचारधारा बलात्कारी ही हो सकती है।
इसलिए ज़रूरी है कि अभी भी आप समर्थक और
भक्त की हैसियत से ऊपर उठ कर आम नागरिक की हैसियत में वापस लौटिए, हिंदू-मुस्लिम
के सिकुड़े दायरे से बाहर निकलिए और दूसरों की बहन बेटियों कि फिक्र तो दूर की बात,
अपनी ही बहन-बेटियों को इन उन्मादियों से बचा लीजिए।
Wednesday, February 21, 2018
न तो नीरव कोई पहला किस्सा है और ना ही देश की लूट कोई पहली कहानी
पशुपालन घोटाले में
लालू प्रसाद का नाम आने से वो घोटाला बहुत बड़ा हो गया। वरना उनसे बड़े
घपले-घोटाले कर के आईपीएल वाले ललित मोदी, किंगफिशर वाले विजय माल्या और मुकेश
अंबानी के रिश्तेदार नीरव मोदी ऐश ही तो कर रहे हैं। दरअसल लालू राजनीति की चुनौती
थे, माल्या मोदी राजनीति के मददगार हैं। लालू प्रसाद को घोटाले के बाद मीडिया
ट्रायल का जैसा सामना उन्हें करना पड़ा वैसा मोदी-माल्या को नहीं करना पड़ा। लालू
प्रसाद के मामले में राजनीति ने जितनी ताकत लगाई उतनी मोदी-माल्याओं में कभी भी
नहीं लगाएगी क्योंकि, लालू प्रसाद को कमजोर कर सत्ता हासिल करने की तमाम गुंजाइश
हैं लेकिन, मोदी-माल्याओं को कमजोर कर पार्टियां खुद का कुबेर कमजोर नहीं कर सकतीं।
भारत में सार्वजनिक संपत्ति की लूट का
इतिहास बहुत पुराना है। लेकिन राजनीति बड़ी ही होशियारी से सिर्फ कुछ राजनेताओं से
जुड़े घोटालों को मसला बनाकर बड़ी लूट को छुपाती रही है। ये सिर्फ भारत में ही
नहीं हुआ है वरन पूरी दुनिया में हुआ है।
अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान जैसे
पूंजीपति देशों के चंद पूंजीपतियों ने गरीब और विकासशील देशों के कुछ व्यापारियों
को मिलाकर दुनिया की बड़ी आबादी को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। विश्व बैंक,
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएं इसी मकसद से खड़ी
ही की गईं कि इनके जरिए दुनिया की बड़ी आबादी पर आर्थिक शासन थोपा जा सके।
भारत समेत एशिया के ज्यादातर देशों की बड़ी
आबादी उसी आर्थिक गुलामी का शिकार है। मालिकों के लिए मुनाफा पैदा करने वाली ये
भीड़ पूंजवादी मुनाफे के लिए अपनी हड्डियां गलाती रहे इसके लिए सरकारें
पूंजीपतियों के सामने खड़ी नजर आती हैं।
आपको ये जान कर बेहद हैरानी होगी कि दुनिया की
85 फीसदी संपदा महज 20 फीसदी लोगों के पास है। बाकी की 15 फीसदी संपदा में दुनिया
की 80 फीसदी आबादी जैसे-तैसे जीने के लिए अपनी हड्डियां गला रही है। वर्ल्ड
इंस्टिट्युट ऑफ डेवलपमेंट इकॉनामिक रिसर्च के मुताबिक दुनिया के महज 1 फीसदी
अमीरों ने दुनिया की 40 फीसदी सपंदा हथिया ली है। दुनिया की 85 फीसदी संपदा पर 10
फीसदी अमीरों का कब्जा है।
अब बात भारत की। प्रत्यक्ष विश्व बैंक के एक
सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के 86 फीसदी लोगों की एक दिन की कमाई 80 रुपये से भी कम
है और महज 1 फीसदी संपदा के सहारे कुल आबादी के 30 फीसदी लोगों को जीना पड़ रहा
है।
इसलिए किसी एक माल्या या मोदी के घोटाले कर
लेने भर से देश बर्बाद हुआ है ये सिर्फ और सिर्फ प्रौपेगंडा है। ये प्रौपेगंडा वो
खड़े करते हैं जिनको पूंजीपतियों ने अपने पैसों के बल पर खड़ा किया है और जिनको
इसी किस्म के प्रौपेगंडा के लिए वो पालता रहा है। इसमें मीडिया, राजनीतिक दल और
कॉर्पोरेटर शामिल होते हैं।
हमें मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को समझने की
कोशिशें करनी होंगी। पहले विश्व युद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से
तहस-नहस हो गई थी। तब यूरोप में जनक्रांति की तमाम संभावनाएं थीं लेकिन जनता ने न
कोई क्रांति की और ना ही कोई विरोध हुआ। ऐसा क्यों हुआ ? दरअसल सत्ताधारी वर्ग सिर्फ उत्पादन पर ही
नियंत्रण नहीं रखता वो विचारधारा पर भी पूरी तरह से नियंत्रण रखता है। वो अपने हित
की बात को ही राष्ट्र और धर्म से जोड़ता है और फिर उसी को विचारधारा के तौर पर
जनता पर थोप देता है। ऐसे ही सत्ताधारी वर्ग संस्कृति को अपने नियंत्रण में लेता
है और फिर जन समान्य की श्रद्धा का अपने हिसाब से प्रबंधन करने लगता है।
इसलिए आप सिर्फ किसी मोदी या माल्या में मत उलझ
जाइए। देश की कुल संपदा में आपकी हिस्सेदारी कितनी है और पांच बड़े अमीरों की
हिस्सेदारी कितनी है इसका आकलन कीजिए और फिर व्यवस्था से पूछिए कि आपका बाकी का
हिस्सा है कहां। क्योंकि, जान लीजिए तमाम किस्म के राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक,
आर्थिक प्रौपेगंडा इसीलिए खड़े किए जाते रहें हैं ताकि आप उसमें उलझे रहें और किसी
भी दिन अपना हिस्सा न मांग सकें।
Monday, February 19, 2018
एक खत, हर आतंकवादी के नाम
प्रिय बुरहान वानी,
मुझे तुम्हारे मारे जाने का दुख है। लेकिन जी कर भी तुम क्या करते सिवाय बगुनाहों के कत्ल के । दुख है कि देश का एक नवजवान पहले रास्ता भटका और अब मारा गया। चलो अच्छा ही हुआ। वैसे तुम जिंदा होते तो शायद किसी दिन ये समझ पाते कि जो रास्ता तुमने चुना वो तुम्हारे अल्लाह ताला के खिलाफ बग़ावत का रास्ता है, वो इस्लाम के ख़िलाफ बग़ावत का रास्ता है। तुम ज़िंदा होते तो शायद किसी दिन ये देख पाते कि तुम इंसानियत का दुश्मन हो गए थे, तुम अल्लाह ताला की बसाई दुनिया उजाड़ रहे थे। फिर तुम एक दिन भटके लोगों को रास्ता दिखाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तुम उसी फौज की गोली का शिकार हो गए जिस फौज पर तुम्हें आतंकी बनाने का आरोप है। बताया जा रहा है कि तुम अपने भाई के मारे जाने के बाद बदले की भावना का शिकार हो गए।
Copyright Holder: ASIT NATH TIWARI
बुरहान, तुम्हारे कश्मीर से ही लाखों कश्मीरी पंडितों को उजड़ना पड़ा था। जिस वक्त वो उजड़ रहे थे उस वक्त उनकी दुनिया उजड़ रही थी। उस वक्त न जाने कितनों के भाई, पिता, बेटे मारे गए थे। क्या कोई कश्मीरी पंडित मिलिटेंट बना? वो बदला लेने निकला? नहीं न। तुम भी नहीं निकलते। जानते हो तुम क्यों मिलिटेंट बने ? तुम इसलिए मिलिटेंट बने क्योंकि कोई तु्म्हें, तुम जैसे भारतीय नवजवानों को मिलिटेंट बनाना चाहता था, आज भी चाहता है। वो लगातार हिंदुस्तानियों के खिलाफ हिंदुस्तानियों के हाथ में बंदूक थामाता जा रहा है और लगातार हिंदुस्तानियों के हाथों हिंदुस्तानियों का क़त्ल करवाता जा रहा है। तुम उसके बहकावे में आ गए। तुम्हारे जैसे हमारे हजारों नवजावन उनके बहकावे में आते रहे हैं। घाटी में ऐसे हज़ारों दलाल बेठै हैं जो तुम जैसे नवजवानों को अपने मुल्क के खिलाफ, कौम के खिलाफ और इंसानियत के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं।
बुरहान, कौम के नाम पर जिस शख्स ने तुम्हें हथियार उठाने के लिए उकसाया था क्या उसका बेटा बाग़ी है क्या? क्या उसने खुद हथियार उठाए हैं? क्या तुमने कभी ये जानने की कोशिश की ? क्या तुमने कभी ये सवाल पूछा कि ये लोग देखते-देखते अमीर कैसे हो गए? क्या तुमने कभी ये सोचा कि जिस सरज़मीं पर खुदा ने तुम्हे पैदा किया है तुम उसी सरज़मीं को खुदा के बंदों के खून से रंग रहे हो?
निश्चित तौर तुमने न तो कभी ये सवालात उठाए न सोच पाए। तुम तो गोलियों में भरोसा करने लगे थे। तुम तो खुदा की बनाई दुनिया को उजाड़ने में लगे रहे। तुम तो अपने मुल्क के दुश्मनों के हाथ का खिलौना बने रहे।
बुरहान, तुमने कभी किसी उस मां का सामना किया है जिस मां के बेटे की मौत तुम्हारी गोलियों से हुई हो? कभी उस मासूम से मिले हो जिसे तुमने यतीम किया हो? कभी उस बेवा से मिले हो जिसका शौहर तुम्हारी गोलियों का शिकार हुआ हो?
बुरहान, जिस इस्लाम के नाम पर तुम गोलियां बरसाते रहे उसी इस्लाम की राह पर कभी चल पाए तुम? तुम जब मारे गए उस वक्त तुमने जमकर शराब पी थी। शराब तो हराम है न? तो क्या जवाब दोगे अपने अल्लाह ताला को?
हम तो यही दुआ करेंगे कि अल्लाह तुम्हें माफ करें।
बिसात पर अंबेडकर और हाशिए पर दलित
मन में अंबेडकर, मिजाज में अंबेडकर, दिल में अंबेडकर, दिमाग़ में अंबेडकर, राह में अंबेडकर, आह में अंबेडकर, लेकिन उद्दश्यों में अंबेडकर नहीं हैं। उद्देश्य तो सत्ता प्राप्ति की है, चाह तो सत्ता की है और इस चाह में अंबेडकर समा नहीं सकते। तो फिर अंबेडकर को प्रतीक बनाना पड़ा। भारत की राजनीति प्रतीकों के सहारे चलती रही है। कभी गांधी प्रतीक थे, कभी राम प्रतीक बने और आज अंबेडकर बनाए जा रहे हैं। तभी तो हिंदू धर्म के आडंबरों को खारिज कर बौद्ध बने अंबेडकर उन लोगों को भी भाने लगे हैं जो हिंदू राष्ट्र के सपने देखा करते हैं और जिनके लिए बुद्ध और कबीर हिंदू विरोधी हैं।
Copyright Holder: ASIT NATH TIWARI
तो झंडों और डंडों पर हैं अंबेडकर, मंचों और नारों में हैं अंबेडकर। और अंबेडकर का समाज, वो तो आज भी उसी गंदी बस्ती में है जिससे निकालने के लिए अंबेडकर ने संघर्ष किया और सबके निशाने पर आए। वो आज भी अपनी ही धर्म व्यवस्था का शिकार है और हाशिए पर खड़ा गांव के दक्खिन वाली बस्ती में जीने की विवशता की गवाही दे रहा है। नारों, झंडों में अंबेडकर को ढोने वाले मंचों के रास्ते शाही दरबार तक पहुंच गए, शहंशाह हुए और दलित समाज को वहीं का वहीं खड़ा रखा जहां से निकालने का संघर्ष अंबेडकर ने खड़ा किया था।
तो सच ये है कि अंबेडकरवाद को भी गांधीवाद और लोहियावाद जैसे लबादे में लपेट कर राजनीति की बिसात पर रख दिया गया है। जहां मकसद अंबेडकर को पाना नहीं, अंबेडकर के नाम पर सत्ता पाना है। अहिंसा के इस पुजारी के नाम खड़ा संगठन भीम आर्मी लोगों से हथियार उठाकर हमलावर होने की खतरनाक अपील कर रहा है तो समाज का संघर्ष खड़ा करने वाले अंबडेकर के नाम राजनीति करने वाले नेता पूरे दलित समाज को सिर्फ और सिर्फ वोटबैंक की दलदल बनाए रखने की तमाम कवायदें करते दिख रहे हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)
ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...
-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...
-
देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी कांग्रेस अब बिहार में बैशाखी को अपना सच मान चुकी है। 1985 में बिहार में प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनाने वाली ...
-
पत्रकारिता के एक छात्र ने मजेदार सवाल पूछा है। सवाल है ‘ सर, भारत में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या कम नहीं है बावजूद इसके मोदी सबको उल्लू कै...