Saturday, September 12, 2015

काम न पूछो नेता की पूछ लिजिए जात

बिहार की राजनीति में जाति का वजूद खत्म नहीं हुआ है...लेकिन कई मौकों पर व्यक्तिवादी होती राजनीति पार्टी पर हावी हुई है..कई मौकों पर पार्टी राग आम आदमी के मुद्दों को हाशिए पर धकेलता रहा है.. तो बिहार में कौन चलेगा..किसकी चलेगी..कैसे चलेगी..जाति की राजनीति चलेगी क्या.. लालू प्रसाद के मंडल राग के बाद पिछड़ों की सियासी जमीन पर जातीय राजनीति को परवान देने की कवायद तेज हुई है.. लगातार हुए जातीय सम्मेलनों और चुनाव से ठीक पहले कई जाति-समुदाय को ओबीसी, बीसी, एससी, एसटी के खांचे में डालना भी उसी सियासत का हिस्सा है..जातीय नेताओं के उभार और गठबंधन में जातीय पहचान वाले नेताओं को शामिल करने की राजनीति खूब हुई...मंचों से एक पूर्व मुख्यमंत्री की जाति बता-बताकर इसको हवा भी खूब दी गई... तो क्या एक बार फिर बिहार में जात की राजनीति ही चलेगी...या फिर पार्टी वाली राजनीति चलेगी...भागलपुर के दंगों के बाद बदली बिहार की राजनीति में मंडल आयोग की अनुशंसाओं ने बड़ा असर दिखाया...अचानक सूबे की राजनीति बदली..कांग्रेस हाशिए पर जाती रही और जनता दल शीर्ष पर पहुंचता रहा.. इसी जनता दल से बाद में आरजेडी और जेडीयू का जन्म हुआ..अब दोनों एक साथ हैं..आरजेडी की चलेगी, जेडीयू की चलेगी..या फिर देश में कांग्रेस का विकल्प बन राष्ट्रीय राजनीति को बदल चुकी बीजेपी की चलेगी.... तीसरा सवाल व्यक्ति विशेष में सिमटती राजनीति से जुड़ा है... अजीब संयोग है कि बीजेपी कहती है कि जेडीयू में एक आदमी की चलती है वो हैं नीतीश कुमार, एलजेपी कहती है कि आरजेडी में एक आदमी की चलती है वो हैं लालू प्रसाद, नीतीश कुमार कहते हैं कि बीजेपी में एक आदमी की चलती है वो हैं नरेंद्र मोदी.. तो क्या देश की राजनीति व्यक्तिकेंद्रित होती जा रही है.. और बिहार में यही राजनीति चलेगी.. लोग किसी के नाम पर उससे जुड़े उम्मीदवारों को वोट दे देंगे...सवाल हैं.. जवाब अलग-अलग ही होंगे..लेकिन जो भी होंगे दिलचस्प होंगे

Tuesday, September 8, 2015

एक अदद सीएम उम्मीदवार चाहिए



बिहार में बीजेपी को है मुख्यमंत्री की तलाश

संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं के मुताबिक चुनाव में जीतकर गए सांसद सदन में अपना नेता चुनते हैं...विधायक अपना नेता..लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित कर नई परंपरा की शुरुआत कर दी.. अब यही परंपरा उसके गले की हड्डी बन गई है..बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर बहस तेज हो गई है...जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस नेता लगातार उसपर हमलावर हैं..तीनों पार्टियां लोगों को ये समझाने में लगी हैं कि बीजेपी में सबकुछ ठीक नहीं है इसिलिए पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं कर रही है.. बताया जा रहा है कि नाम के एलान के बाद पार्टी में गुटबाजी तेज हो जाएगी और चुनाव पर इसका सीधा असर पड़ेगा...विपक्ष के इस हमले का जवाब बीजेपी अपने तरीके से जरुर दे रही है..लेकिन बीजेपी के साथ चल रही आरएलएसपी ने मुख्यमंत्री पद के लिए उपेंद्र कुशवाहा का नाम आगे सरकार कर बीजेपी को जरुर सकते में डाल दिया.. एनडीए में भले ही इस मसले पर आम सहमति जैसी स्थिति नहीं हो लेकिन बीजेपी को अब लगने लगा है कि मसले पर आम सहमति जरुरी है..केंद्रीय गृह मंत्री और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इशारा किया है कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम का एलान कर सकती है...उनके इस इशारे के मायने-मतलब निकाले जा रहे हैं....लेकिन इसे पार्टी के अंदरखाने को टटोलने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है.. प्रदेश बीजेपी में भी इस मसले पर आम राय नहीं बन पाई है.. इस बीच चर्चा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के किसी विश्वस्त के नाम पर मंथन चल रहा है.. ये नाम चर्चाओं में नहीं है लिहाजा पूरी गोपनीयता बरती जा रही है.. हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर का नाम भी अचानक उभरा था और शीर्ष नेतृत्व के सामने तमाम विरोध ठंडे पड़ गए थे..बताया जा रहा है कि बिहार में बीजेपी यही प्रयोग दोहराने की फिराक में है

Friday, February 21, 2014

जूतम पैजार

अगड़म बगड़म छू

तूम तड़ाम 
लोकतंत्र धड़ाम
जूतम पैजार
मिर्च बौछार
गाली-गलौच
मंदिर में शौच
नेता परेता
अगड़म बगड़म छू

सांस दर सांस
खंड-खंड विश्वास
थेथर मुंह
उंह...उंह
नेता नहीं कीचड़
शनीचर, शनीचर
सड़ते सांसद
सांसत, सांसत
अगड़म बगड़म छू

धिक्कार धिक्कार
चालबाज़ सरकार
धूर्तों का धंधा
लोकतंत्र का फंदा
प्रतिकार, प्रतिकार
जमता हाहाकार
गुंडे मवाली
नेताओं की भर्ती आली
अगड़म बगड़म छू

बगुला बसंत
हाथ असंख्य
बकलोल नेता
बेटा, बेटा
हाथ में चांदी
देश की बर्बादी
चमचो की फौज
अगड़म बगड़म छू

Wednesday, February 19, 2014

तेलंगाना का सियासी सच

सत्ता-पक्ष और विपक्ष की जो एकता मंगलवार को लोकसभा में दिखी वो शायद ही कभी दिखी हो..राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को फोन किया.. आडवाणी का विरोध किनारे लगाया गया ..फिर व्यंग्य और मुस्कान के जरिए ऐसी सहमति बनी कि महज 1 घंटे 20 मिनट में तेलंगाना बिल पास हो गया..न बीजेपी ने कोई संशोधन प्रस्ताव रखा और ना ही सरकार को कोई परेशानी हुई.. लेकिन आंध्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी बिदक गए.. बुधवार को क्रांतिकारी त्यागी बन बैठे..बगावत तो पहले ही कर चुके थे... इस्तीफा बुधवार को दिया... मुख्यमंत्री पद से, विधानसभा सदस्यता से... और सियासी जख्म देने वाली कांग्रेस से भी...
दरअसल किरण कुमार रेड्डी की पकड़ तेलंगाना में है नहीं सो विरोध के जरिए आंध्र में खुद की जमीन बचाए रखना सियासी लाचारी है..बीजेपी ना तो आंध्र में है ना तेलंगाना में.. सो तेलंगाना का समर्थन कर जमीन तलाश रही है और सीमांध्र की चिंता दिखा कर जो मिल जाए की हालत में है... 2009 में आंध्र की 42 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस की सूबे में हालत बेहद खराब है... जगनमोहन रेड्डी ने कहीं का छोड़ा नहीं.. बची-खुची आस पर चंद्रबाबू नायडू पानी फेर सकते हैं... सो अलग तेलंगाना की 17 सीटों ने उम्मीद जगाई है
दरअसल चंद्रबाबू नायडू और जगनमोहन रेड्डी की तेलंगाना में कोई जमीन नहीं है.. ऐसे में नए राज्य के गठन को बंटवारे की भावना से जोड़कर सीमांध्र के लोगों का समर्थन बचाए रखना होगा.. जाहिर है सबकी राजनीतिक सौदेबाज़ी ने खूब गलबहियां की.. लोकतंत्र के दरवाजे बंद रहे.. दीवारें चोट खाती रहीं



Thursday, February 6, 2014

आतंक बरास्ते विचारधारा

आतंक बरास्ते हिंदूवाद या आतंक बरास्ते RSS ... अंग्रेजी पत्रिका कैरावैन की कवर स्टोरी ने आतंक के रास्तों पर बहस खड़ी कर दी है... 2007 में हरियाणा के पानीपत के पास समझौता ट्रेन में ब्लास्ट हुआ था.... ब्लास्ट में कुल 68 लोगों की मौत हुई थी.... नैशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी ने इस मामले में असीमानंद, लोकेश शर्मा, राजेंद्र पहलवान, कमल चौहान को आरोपी बनाया... असीमानंद पर ब्लास्ट करवाने में मदद देने का आरोप है जबकि राजेंद्र पहलवान, लोकेश शर्मा और कमल चौहान पर रेल में बम लगाने का आरोप ... मैगज़ीन का दावा है कि आरोपी असीमानंद ने अपने इंटव्यू में कहा कि इस ब्लास्ट के लिए उसे संघ प्रमुख मोहन भागवत का आशीर्वाद हासिल था...मैगजीन ने असीमानंद से बातचीत का टेप भी जारी किया है... मैगजीन ने दावा किया है कि जुलाई 2005 में असीमानंद और सुनील जोशी सूरत में संघ नेताओं मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार से मिले थे... तब मोहन भागवत संघ प्रमुख नहीं थे ..... एक टेप को 10 जनवरी 2014 को हरियाणा की अंबाला सेंट्रल जेल में रेकॉर्ड किया गया है जिसे असीमानंद का इंटरव्यू बताया जा रहा है.... इसमें असीमानंद और मैगजीन की पत्रकार लीना गीता रघुनाथन की बातचीत है... जरा इस बातचीत को देखिए

असीमानंदः मोहन भागवत, इंद्रेश और सुनील, वे सभी मुझसे मिलने शाबरी धाम (गुजरात) आए थे।
सुनील ने भागवतजी से कहाः थोड़ा हिंदू का आक्रमण होना है। संघ से जुड़े हुए लोग हैं जो ये विचार रखते हैं। जो भी होगा हम तक ही रहेगा। संघ से इनको जोड़ेंगे भी नहीं। आप से कोई मदद नहीं लेंगे। आप अधिकारी हैं इसलिए आपको बता रहे हैं। इसलिए आपको बता रहे हैं कि हम लोग सोच रहे हैं।

तब मोहनजी और इंद्रेश दोनों ने कहाः यह बहुत अच्छा है। जरूरी है। संघ से नहीं जोड़ना। संघ नहीं करेंगे... हिंदुत्व के लिए भी ऐसा कोई है। संघ का यह विचार नहीं है। 

मोहन भागवत:  स्वामीजी आप ये करेंगे तो हम निश्चिंत होंगे। कोई गलत नहीं होगा। अपराध नहीं होगा। आप करेंगे तो क्राइम करने के लिए कर रहे हैं ऐसा नहीं लगेगा। विचारधारा के साथ जुड़ा लगेगा। बहुत जरूरी है यह हिंदू के लिए। आप लोग करो। आशीर्वाद है। इससे आगे कुछ भी नहीं।

मैगजनी के दावों में अगर थोड़ी भी सच्चाई है तो देखिए कैसे विचारधारा को बम से जोड़ा जा सकता है..और कैसे कट्टरवाद सीधे आतंक से जुड़ जाता है.. तो क्या कत्ल के जरिए सांस्कृतिक विरासत की हिफाजत हो सकती है...ये बहस खड़ी होती है तो असीमानंद से साध्वी प्रज्ञा तक जाती है... और आतंक के रास्ते सत्ता समाज को कनेक्ट करते हुए बीजेपी को ताकत देती नज़र आती है... संघ और संगठन की आतंक से खतरनाक जुगलबंदी को बेपर्द करती है... या फिर आतंक के खिलाफ एक और आतंक के खड़े होने का रास्ता खोलती है... तो फिर सवाल ये कि ये रास्ता देश को बांट-छांट कर किधर लेकर जाएगा?

Monday, February 3, 2014

मुद्दे से भटकती बहस

दिल्ली में पूर्वोत्तर के छात्र नीडो की हत्या के बाद बीच बहस में नस्लभेद आ गया है... ऐसा नहीं है कि दिल्ली में बाहरियों पर ये कोई पहला हमला है..पूर्वोत्तर के लोगों को दिल्ली के लोग चिंकी कहते हैं.. ये भी किसी हमले से कम नहीं..लेकिन नस्लभेद के दायरे में इस बात को सिमटाना साजिश का हिस्सा हो सकता है...दरअसल मुबंई में उत्तर भारतीयों पर हमले के खिलाफ खड़े लोग इस मसले पर खड़े नहीं हो रहे हैं.. सियासी साजिश की बू यहीं से आ रही है.. महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले राजनीति का हिस्सा हैं... और उन हमलों के खिलाफ खड़े होना भी राजनीति का हिस्सा है... लेकिन दिल्ली में ना तो पूर्वोत्तर के लोग मजबूत वोटबैंक हो पाए... और ना ही किसी दलीय खांचे में समा पाए..याद कीजिए करीब 10 साल पहले की दिल्ली... तब बिहारी शब्द किसी इलाका विशेष के मूल निवासियों की पहचान से ज्यादा दिल्ली की एक जमात की जुबान के लिए गाली हुआ करती थी... हालात बदले उत्तर भारतीयों की सियासी ताकत बढ़ी.. और अब उनपर हमलों की तादाद कम हो गई है... तो क्या ये ही हमले अब पूर्वोत्तर के लोगों पर हो रहे हैं.. तो क्या देश में इज्जत के साथ जीने की खातिर सायासी गोलबंदी के खांचे में समाए रहना एक मजबूरी है.. क्षेत्रवाद के जरिए अपनी गली का शेर बनने की महानगरीय आदत सभ्य समाज के दायरे में जंगल खड़ा नहीं कर रही.. बहस इन सवालों पर भी क्यों नहीं हो रही

Friday, February 15, 2013

जग सूना-सूना लागे

                                                       जग सूना-सूना लागे
सर्वोच्च अदालत ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान वीआईपी सुरक्षा के नाम पर चल रहे ताम-झाम पर सवाल खड़े किया है..आम आदमी की फिक्र के साथ.. इस बात पर तेज हो गई है कि वीआईपी सुरक्षा और लाल बत्ती जरूरत हैं य झूठी शान
 सालाना 31 करोड़ रु. का खर्च...ये खर्च वीआईपी सुरक्षा में तैनात जवानों के वेतन मद में होता है.. इसी काम के लिए तकरबीन इतना ही खर्च बाकी मदों में होता है... पंजाब के चंडीगढ़ में पीएम का कारकेड गुजर रहा था..ट्रैफिक रोका गया... एंबुलेंस में पड़े-पड़े एक मरीज की मौत हो गई.. प्रशासन पीएम के स्मूथ मूवमेंट के लिए बेचैन दिखा... एंबुलेंस उसकी फिक्र के दायरे से बाहर था... देश के तमाम राज्यों -शहरों में पीएम-सीएम और वीवीआईपी मूवमेंट के नाम पर यही होता है... अब सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा है कि किस नियम के तहत पुलिस ट्रैफिक रोकती है... अगर सड़कें इतनी खतरनाक हैं तो आम आदमी के लिए भी हैं.. उसकी सुरक्षा के लिए क्या होता है....
-कोर्ट ने वीआईपी सुरक्षा के मानक पर सवाल पूछा है... झूठी शान के लिए लाल बत्ती गाड़ी का इस्तेमाल और सरकारी बॉडीगार्ड की ठसक पर सवाल उठाए हैं.. जिनको जरूरत है उनको सब मिले.. लेकिन वीआईपी की मेम साहिबा, बच्चों और रिश्तेदारों को ये सुविधा क्यों … जनप्रतिनिधि के नाम पर आपराधिक छवि के लोगों को सरकारी हिफाजत क्यों...
कोर्ट ने पूरी जानकारी मांगी है.. किनको सुरक्षा दी गई है.. क्यों दी गई है.. देने का आधार क्या है... और उस पर कितना खर्च आता है... वीआईपी मूवमेंट के दौरान आम आदमी की सुरक्षा में तैनात जवानों को ट्रैफिक रोकने में किस नियम के तहत लगाया जाता है... आम और खास की सुरक्षा में बड़ा फर्क क्यों है... सरकारें आंकड़े जुटा रही हैं.. जवाब खोज रही हैं...हम और आप ये सोच रहे हैं कि आम आदमी से इतना ऊपर क्यों होता है उसका जनप्रतिनिधि


सत्ता-सियासत ने लोकतंत्र की परिभाषा को कब और कैसे बदल दिया पता ही नहीं चला... लोक कब हासिए पर गया.. तंत्र कब सत्ता के इर्द-गिर्द घूमने लगा और सिस्टम कब आम आदमी से दूर हो गया स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं दिखा... और इसी बीच आम आदमी का नुमाइंदा आम से खास हो गया...
सायरन की ऊंची और डरा देने वाली आवाज... धूमती लाल बत्ती... सनसनाती गाड़ियां... डंडे भांजते पुलिस के जवान..चौक-चौराहों पर खड़े अधिकारी से लेकर जवान तक... वायरलेस पर दौड़ते-भागते मैसेज... आगे और पीछे पूरी तरह से खाली सड़क.... और अगल-बगल में पूरी तरह से ठहरा ट्रैफिक... अवाक लोग... परेशान भीड़... ये नजारा आम होता है.. वजह सड़क से गुजर रहा कोई 'खास' होता है
 जिस इलाके से ये काफिला गुजरता है... उधर के ज्यादातर पुलिसकर्मी इसके स्मूथ मूवमेंट के इंतजाम में लग जाते हैं... कुछ पल के लिए आम आदमी इनकी फिक्र के दायरे से बाहर हो जाता है...
लोकतंत्र में लोक कहां है.. तंत्र किसके लिए काम कर रहा है... सर्वोच्च् अदालत ने सवाल पूछा है...जवाब की तैयारी है.. लेकिन इसका हिसाब कौन देगा कि इतने दिनों तक आम आदमी के पैसे का इस्तेमाल इस तरह क्यों हुआ




ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...