Monday, August 6, 2018

देवरिया से मुजफ्फरपुर तक दर्द तो एक ही है


उत्तर प्रदेश के देवरिया में 10 साल की लड़की ने लिजलिजी व्यवस्था को बेपर्द कर दिया है..शहर के मां विंध्यवासिनी शेल्टर होम में लड़कियों के शोषण पर पड़े सिस्टम के पर्दे को 10 साल की लड़की ने एक झटके में खींच दिया है..यहां बड़ी संख्या में लड़कियों का यौन शोषण हो रहा था...और तमाम सूचनाओं के बावजूद सिस्टम सो रहा था
   लक्ष्मी को पूजिए, दुर्गा को पूजिए, सरस्वती को पूजिए, पार्वती को पूजिए..पूजिए क्योंकि ये एक धर्मपारायण देश है...देवियों के पास धन का, शक्ति का, विद्या का आशीर्वाद है..इसलिए पूजिए... देवियों के देश में बेटियों की लूट मची है.. इस लूट पर खामोश मत रहिए..वरना आपकी देवियां आपको आशीर्वाद देने से कतराने लगेंगी

   इस दर्द को महसूस कीजिए, इन आंसुओं के समंदर में समाइए, इस हिम्मत का साथ दीजिए...वरना आपकी बेटियां आपको माफ नहीं करेंगी

    कल बिहार का मुजफ्फरपुर था...आप चुप रहे..क्योंकि आपको लगा कि वो दूसरे शहर का किस्सा है...आज यूपी का देवरिया है...कल कोई और शहर होगा..कुछ और बेटियां होंगी.. आपकी चुप्पी नहीं टूटी तो ये बेटियां कल किसी और का हिस्सा होंगी
    कल ये बेटी किसी और की बेटी हो सकती है..कल ये खबर किसी और परिवार का दर्द भी हो सकता है.. आपकी चुप्पी नहीं टूटी तो खामोशी का अंधेरा कल आपमें से किसी के भी घर को अपने आगोश में ले सकता है..

Tuesday, July 24, 2018

हम बलात्कार का विश्वगुरु बनने निकले हैं


इलाहाबाद में कुंभ के दौरान पहुंचने वाले आखाड़ों के संतों के लिए अब टैंट की जगह इमारतें होंगी...बाबाओं का झुंड आराम से रहेगा.. देश की सबसे बड़ी पंचायत अभी ये तय करने में जुटी है कि 1984 में सिख विरोधी दंगे मॉब लिंचिंग की पैमाइश में मौजूदा मॉब लिंचिंग से बड़े हैं या छोटे…आम समाज सड़क दर सड़क चल रही मार-कुटाई और बिसहड़ा से अलवर तक हो रही हत्याओं का धर्म तलाशने में बीजी है..लिहाजा झांसी से लेकर उन्नाव तक, गाजियाबाद से लेकर गोरखपुर तक यूपी की लुटती आबरू की न तो किसी ने फिक्र की और ना ही बेटियों, उनकी माओं, उनके पिता, उनके भाईयों का दर्द किसी ने साझा किया.. हलाला पर गलाफाड़ू बहसों में उलझा हमारा सत्ता समाज अस्मत गवांती बेटियों की सिसकियों को अपनी नाकामियों वाले गौगोबर में बेहद चालाकी दबाता जा रहा है..
         सरकारों की आबरू ऊंची इमारतों में महफूज होती है, नेताओं की आबरू सफेद कलफदार कपड़ों में इठलाती है, पुलिस की आबरू खाकी में खनकती है....लेकिन आम आदमी की आबरू...न कोई पहरेदार, न कोई मुहाफिज.. लखनऊ से सांसद और देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो के जो आंकड़े पेश किए थे वहीं आंकडे बता रहे हैं कि यूपी में रोजाना 10 रेप की घटनाएं थानों तक पहुंचती हैं, 30 महिलाओं को अगवा किया जाता है और बलात्कार की घटनाओं में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है.. ये आंकड़े सरकारी हैं..जबकि सच ये है कि बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले ज्यादातर लोकल लेवल पर ही खत्म कर दिए जाते हैं...कुछ मामले तो घरवाले ही लोकलाज की दहलीज में कैद कर लेते हैं
   झांसी की चीख और कन्नौज की गैंगरेप पीड़िता की सिसकियां आक्रोश पैदा करती हैं..उस सिस्टम के खिलाफ जिसकी जिम्मेदारी हमें अपराध मुक्त समाज देना है...झांसी में दो एसपी हैं...अंदाजा लगाइए हमारी-आपकी गाढ़ी कमाई का कितना पैसा वहां खर्च हो रहा है.. पुलिस की कमी का रोना रोने वाले ये जानते हैं कि रुस के पास महज 11 लाख पुलिसकर्मी हैं, अमेरिका के पास 10 लाख. जबकि भारत के पास 30 लाख पुलिसकर्मी हैं। रोजाना होती इन घटनाओं से पुलिस को नए मुकदमे मिलते हैं, नए मुल्जिम मिलते हैं, नए गवाह और अज्ञात के नाम पर बहुत कुछ करने के कई मौक़े....फिर जांच, पेशी, तारीखें, जेल, मेल-मिलाई और बिड़ी बंडल..पुलिस के लिए ये प्रक्रिया कमाई का समंदर है....नेताओं को इन घटनाओं में जाति और मजहब का एंगल मिलता है... पुरानी सरकारों का रिकॉर्ड तोड़ने का गौरव भी... लेकिन हमको-आपको मिलता है बइंतहां दर्द, लुटती बेटियों के सामने दिखती अपनी बेबसी, सिस्टम और अपराधियों के बीच पिसने की लाचारी...वैसे खबर है कि लोकसभा में राहुल गांधी के आंख मारने से संसद की अस्मत तार-तार हो गई है..नेताजी अपने हर भाषण में इसका जिक्र कर रहे हैं... हमारी लुटती आबरू उनकी फिक्र के दायरे में नहीं समाती
   


Monday, July 23, 2018

साक्षी महाराज के बिगड़े बोल: शरिया मांगने वाले जाएं पाकिस्तान


भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ...सब्र कर...रोजगार नहीं तो सब्र कर, व्यापार नहीं तो सब्र कर, अस्पताल नहीं तो सब्र कर, स्कूल नहीं तो सब्र कर, घर-बार नहीं तो सब्र कर, सुरक्षा नहीं तो सब्र कर, सब्र कर क्योंकि आज़ाद हिंदुस्तान ने अवाम को सब्र सिखाया है.. गर आवाज उठा दी तो शहरी नक्सली बताया है…भूख से तनी मुट्ठियों को नक्सलबाड़ी बताया है...कभी जाति के नाम पर कभी धर्म के नाम पर हमें आपस में लड़वाया है...
       विधि ने जब अदालतें दीं हैं तो फिर शरई अदालतों की मांग क्यों...ये सवाल है तो इस सवाल का जवाब हुकूमत को देना है.. हुकूमत का जवाब है पाकिस्तान चले जाओ..हिंदुस्तान की हर मुश्किल का हल पाकिस्तान ही है क्या.. सियासत को हिंदुस्तान के कई सवालों का जवाब पाकिस्तान ही क्यों लगता है...सवाल ये भी हैं...सवाल ये भी कि क्या ये हुकूमत का काम नहीं कि वो अपनी जनता के सवालों के जवाब ढूंढे.. वो ये बताए कि आखिर संघीय ढांचे के भीतर बार-बार इस किस्म की मांग क्यों उठती है...या हकूमत की ये जिम्मेदारी नहीं है कि वो इस किस्म की डिमांड के पीछे की वजहों को खत्म करे...कभी गिरिराज कभी, कभी साक्षी, और कभी कोई ये बोल जाता है कि फलां पाकिस्तान चले जाएं...पूछिए इनसे कि हिंद की संतान पाकिस्तान क्यों जाए..
     जम्हूरित में अवाम को पूरा अधिकार है कि वो अपनी सरकार से अपनी सुविधाओं की मांग करे...और सरकार की जिम्मेदारी है कि वो अपनी अवाम की जायज मांगों को पूरी करने की कोशिश करे...जो मांगें जायज नहीं हों उन्हें जनता के बीच लाकर जनता को कंन्विंस करे.. लेकिन ये जवाब कि अलां पाकिस्तान चले जाएं, फलां पाकिस्तान चले जाएं लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला नहीं तो क्या है..तो फिर पूछिए इनसे कि ये होते कौन हैं हमें कहने वाले कि पाकिस्तान चले जाओ

Saturday, July 21, 2018

संसदीय परंपरा सिर्फ राहुल क्यों निभाएं ?

भारतीय आम समाज में आंख मारने की कई वैरायटी मौजूद है...अलग-अलग मौकों पर आंख मारने के अलग-अलग मायने भी हैं.. बावजूद इसके आंख मारने की कोई संसदीय परंपरा नहीं रही.. जो परंपराएं रहीं हैं वो ध्वस्त हो रहीं हैं..लिहाजा नई परंपराओं के लिए जगह तो वैकेंट हो ही रही है..तो क्या आंख मारने को संसदीय परंपरा में शामिल कर लेना चाहिए.....आइए एक मनोरंजक-व्यग्यात्मक लेख पढ़िए..
आंख मार दी.. और ऐसे वक्त पर मारी, ऐसी जगह पर मारी की देश भर की आंखों में चुभ गई.. विरोधियों की आंखों में तो तीर जैसी जा धंसी.. माइक नहीं तोड़ी, मुक्का नहीं मारा, टेबल पर नहीं कूद पड़े...आंख मार दी...और बस लोकतंत्र की बची-खुची गरिमा को भी मिट्टी में मिला दिया.. लोकतंत्र में, लोकसभा में, माइक तोड़ने वाले आंखों के तारे बन जाते हैं, बांहें मड़ोरने वाले आंखों के लाल होते हैं.. मुक्का-मुक्की कर ली तो फिर मंत्री पद पक्का...लेकिन आंख मारी तो आंखों के शूल हो गए.. अब जो हुआ सो हुआ..सबकुछ सीरियस ही हो ऐसा ज़रूरी नहीं...भारतीय लोकतंत्र में जितनी आज़ादी चुनावी घोषणाओं के लिए है उतनी ही आज़ादी मनोरंजन के लिए भी है.. अब ये तो हमारा कसूर है कि मनोरंजन के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का हम पूरा इस्तेमाल ही नहीं करते... आंख मारना अगर सभ्य लोकतंत्र को मंजूर नहीं है, तो न हो.. हमारे मनोरंजन को, रुमानियत को, शरारत को तो मंजूर है न.. तो फिर मनोरंजन कर चुकाए बिना हम मस्ती में डूबें तो इस संसदीय परंपरा को भला क्यों आपत्ती हो.. वो क्या है न हमारे मनोरंजन के संसार में आंखों ही आंखों में कई बातें हो जाया करती हैं... वैसे आंखों ही आंखों में इशारे होते रहे हैं और कई बड़े घोटाले भी होते रहे हैं.. लेकिन इस किस्म के इशारों से संसदीय व्यवस्था की गरिमा पर असर नहीं होता है..अब देखिए ना जिन लोगों ने लोकसभा में आंख मारने वाली घटना देखी वो दुनिया की बाकी घटनाओं को कुछ पल के लिए भूल गए और फिर यहीं से डाउट हुआ कि आंखमारू स्क्रिप्ट में हो न हो कुछ राज़ है..वरना आंख मारने को भला इतना बड़ा मुद्दा बनाया ही क्यों जाता ..खैर, सबकुछ हुआ, बस ये पता नहीं चला कि आंखों से तूने ये क्या कह दिया और थोड़ी देर पहले तक आंखें मिलाने की चुनौती देने वाले अचानक क्यों आंखें चुराने लगे.. कम से ये ही बता दिया होता कि अंखियों के झरोखे से देखा किसको था..खैर हम तो यही दुआ करेंगे कि किसी को आंखों की किरकिरी न बनाएं.. और फिर गुस्ताखियों को किनारे करते हुए आगे बढ़ें और लगे हाथ फुल एंटरटेनमेंट के लिए थोड़ी देर के लिए प्रिया प्रकाश को भी याद करें.. बहुत सारे गानों के बोल मैंने लिख दिए हैं..तुरत मोबाइल उठाइए और गानों में खो जाइए...बस आंख मत मारिएगा

Friday, July 20, 2018

ये झप्पी दूर तलक जाएगी


तो राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जादू की झप्पी दी...और फिर पीएम की पीठ थपथपाई... इसके तुरंत बाद मोदी ने उन्हें दोबारा अपने पास बुलाया..एक बार फिर राहुल को गले लगाया और इस बार पीएम ने राहुल की पीठ थपथपाई..तो ये कोई भरत मिलाप नहीं था...ये सियासी अदा थी.. और अदा ये कि राहुल ने अपने ऐक्शन से ये साबित करने की कोशिश की कि बीजेपी भले ही राहुल से नफरत करती हो..राहुल सबको गले लगाते हैं...मतलब ये कि बीजेपी भले ही राहुल को पप्पू मानती हो..राहुल विरोधियों का भी सम्मान करते हैं...मतलब ये कि कांग्रेस मोहब्बत की राजनीति करती है..और बीजेपी नफरत की राजनीति करती है
      तो राहुल का ये सियासी दांव कांग्रेस को ऑक्सीजन दे गया.. क्योंकि राहुल गांधी को ये खूब पता था कि अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष चाहे जो कर ले, सरकार को खतरे में नहीं ला पाएगा..पूरा विपक्ष इस अंकगणित को जान रहा था...विपक्ष तो बस वो मौका चाह रहा था जिस वक्त सत्ता और विपक्ष की ताकत देश के सामने ला सके.. इस अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष ने ये साबित कर दिया कि शिव सेना और बिजू जनता दल भले ही विपक्ष के साथ नहीं हों लेकिन सदन में ये सत्ता पक्ष के साथ भी नहीं हैं... बहस के दौरान वॉक आउट होते ही बीजेपी इस सियासत को भांप गई थी..वरना जिस राफेल डील के मसले पर सरकार सबकुछ ठीक होने के दावे कर रही है...उस राफेल मसले पर वो जवाब की बारी का इंतजार करती, तिलमिलाती नहीं..  
     तो जादू की झप्पी से लेकर पप्पू तक अविश्वास प्रस्ताव का सच ये है कि कांग्रेस ने इसमें भले ही लीड रोल नहीं किया हो लेकिन स्क्रिप्ट का सबसे महत्पूर्ण हिस्सा अपने लिए सुरक्षित रखा था...टीडीपी को आगे कर कांग्रेस ने सियासी आंख मारी और हार-जीत की जंग से खुद को बाहर रखा

Wednesday, July 18, 2018

मॉब लिंचिंग: राजपथ पर इठलाते हत्यारे


पास्टर निमोलर की एक कविता हमारे मौजूदा वक्त की ज़रूरत बन गई है। निमोलर ने लिखा था कि
पहले वो आए कम्यूनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्यूनिस्ट नहीं था
फिर वो आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
फिर वो आए यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वो मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता
लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट को आखिरकार कहना पड़ा कि देश को भीड़ की मर्जी के हवाले नहीं कर सकते..ये कहना पड़ा कि भीड़ अपने-आप में कोई कानून नहीं है...ये कहना पड़ा कि भीड़ के भेड़ियों के खिलाफ सख्त कानून बनाइए...देश के किसी न किसी हिस्से में हर दूसरे दिन बौखलाई भीड़ किसी को मार रही है, किसी की हत्या कर रही है, किसी को पेड़ पर लटका रही है, किसी को जिंदा फूंक रही है।  टीवी चैनल और अखबार इसे भीड़ का इंसाफ बता रहे हैं..भीड़ की ताकत मीडिया भी जानती है...भीड़ की ताकत पुलिस भी जानती है और भीड़ की ताकत राजनीति भी जानती है...भीड़ जब अपनी अदालत लगाती है ये तीनों कहीं सो रहे होते हैं...बाद में पुलिस अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करती है... फिर किसी से अपना हिसाब चुकाती है, किसी से हिसाब-किताब करती है.. नेता भीड़ वाली अदालत से निकले इंसाफ का इस्तकबाल करते हैं और मीडिया पुलिस और राजनीति की भीड़ में उस भीड़ वाले इंसाफ में ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव खोजता है। पुलिस की नाकामियों से भीड़ का गुस्सा बढ़ता है और फिर भीड़ की अदालत से पुलिस को मुकदमा मिल जाता है...कई मुल्जिम मिल जाते हैं...कई गवाह मिल जाते हैं.. पीड़ित मिल जाते हैं..दलाल मिल जाते हैं... भीड़ भी किसी धंधे का हिस्सा ही तो होती है..इस भीड़ के जरिए पूरे मुल्क में रोज-रोज नई भीड़ खड़ी की जा रही है...भीड़ और राजनीति दोनों एक दूसरे के पूरक होते जा रहे हैं.. दरअसल ये भीड़ जिंदा लाश होती है..ये आदमी और जानवर का फर्क नहीं समझती..ये कानून की परवाह नहीं करती.. उसे समाजिकता की समझ नहीं होती..कोई बताने वाला भी नहीं होता. हां उनके भीतर के जानवर को जगाने वाला कोई होता है...वो कोई नेता होता है..कभी-कभी वो कोई विचार भी होता है...ये विचार इंसान और इंसान के बीच फर्क बताता है...ये हिंदू और मुसलमान बताता है...जब पुलिस भीड़ देख कर भाग रही होती है तब उसी भीड़ के बीच से कोई नेता निकलता है.. ये नेता पहले थानों की मुट्ठी गरम करता है...फिर थाने इसकी मुट्ठी गरम करने लगते हैं...जब ये जेल से बाहर आता है तो जयंत सिन्हा जैसे नेता उसे माला पहनाने लगते हैं... फिर चुनावों में नेता उससे सौदा करने लगते हैं..और तरह भीड़ का इंसाफ राजपथ पर इठालाने लगता है...

मॉब लिंचिंग: भरभराते लोकतंत्र की तस्वीर


भीड़ के जरिए खड़े किए गए भय के माहौल के सामने सिस्टम कैसे भरभरा कर गिर रहा है उसकी गवाही झारखंड के पाकुड़ में मंगलवार को दिखी...तकरीबन 70 साल के बुजुर्ग स्वामी अग्निवेश भरभराकर नीचे गिरे और भीड़ उनपर टूट पड़ी...ये घटना जिस वक्त हुई उससे ठीक कुछ घंटों पहले देश की सबसे बड़ी अदालत ने मॉब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाने की जरूरत बताई थी..लेकिन भीड़ की अदालतों ने कब कानूनी अदालतों को मान्यता दी है जो तब देते...और दें भी क्यों... 2015 में नोएडा के दादरी में भीड़ की अदालत ने अखलाक को सजा-ए-मौत दी थी...अखलाक के हत्यारों में से 15 आरोपियों को तब एनटीपीसी की संविदा नौकरी ऑफर की गई थी..मतलब भीड़ में शामिल होकर हत्या करो और नौकरी पाओ... 1 अप्रैल 2017 को अरवल में पहलू खान को गौगुंडों ने पीट-पीट कर मारा डाला..यहां भी हत्यारों को महिमामंडित करने का अभियान चलाया गया.. इसी साल 22 जून को दिल्ली-बल्लबगढ़ में ट्रेन में मोहम्मद जुनैद को भीड़ ने मार डाला था... हत्यारों का तब स्वागत किया गया था.. जून 2017 में ही झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन की हत्या भीड़ ने कर दी थी...हत्या का आरोपी जब जेल से बाहर निकला तो केंद्र सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा ने माला पहना कर उसका स्वागत किया... तो फिर भीड़ की शक्ल में किसी की हत्या से कोई डरे क्यों...और फिर सुप्रीम कोर्ट के उस सुझाव का मतलब भी क्या समझें... उन्हीं लोगों से सख्त कानून बनाने की उम्मीद की जा रही है जो हत्यारों को गले लगाते हैं..या फिर नौकरी ऑफर करते हैं..
          हाल ही में कर्नाटक में सॉफ्टवेयर इंजीनियर आजम उस्मानसाब की हत्या भीड़ ने की है.. जून 2018 में झारखंड के गोड्डा में सिराजुद्दीन अंसारी और मुर्तजा अंसारी की भीड़ ने लाठी-डंडों से पीट कर हत्या कर दी..इससे पहले सूबे के खरसांवां में भीड़ ने तीन लोगों की हत्या की थी... महाराष्ट्र, हरियाणा, केरल, कर्नाटक देश का कोई भी राज्य इस हिंसक भीड़ को रोकने में सक्षम साबित नहीं हुआ...भीड़ की हिंसा का सबसे ज्यादा कहर उत्तर प्रदेश में बरपा...सर्वाधिक घटनाएं यूपी में ही हुईं..और अब उस लोकसभा को मॉब लिंचिंग के खिलाफ कड़े कानून बनाने हैं जिस लोकसभा बैठे नेताजी हत्यारे को फूल माला पहनाते हैं
        राहत इंदौरी का एक मतला है लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है..तो अब आग फैल रही है...कल तक गले में भगवा डाले जो भीड़ दाढ़ी और टोपी पर हमले किया करती थी अब वही भीड़ ऊपर से नीचे तक भगवा धारण किए स्वामी अग्निवेश को भी अपनी आग में झुलसा रही है.. हिंसक समाज के आसरे राजनीति की रोटी सेंकने वाले भी एक दिन इस आग की चपेट में आएंगे.. और हां हालात नहीं बदले तो फिर भीड़ की इन आदालतों से किसी दिन देश की सर्वोच्च अदालत का भी इंसाफ हो जाएगा

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...