Sunday, January 14, 2018

मंडल आरक्षण: ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम

मंडल आंदोलन महज एक सामाजिक आंदोलन नहीं था। मंडल आंदोलन एक राजनैतिक आंदोलन भी था। बहुत लोग तो आज भी ‘मंडल की आग’ संज्ञा का इस्तेमाल करते हैं। 1989-90 में देश ने जो माहौल देखा उसकी याद आज भी ताजा है। शहर दर शहर जल रहे थे, गांव-गांव में पारंपरिक रिश्ते बिखर रहे थे। खैर इसी बीच वीपी सिंह की सरकार मे मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दीं। केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 फीसदी मंडल आरक्षण 1993 में लागू हुआ।

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आरक्षण के बाकी पहलुओं पर खूब चर्चाएं हुईं लेकिन 27 फीसदी वाले इस खांचे का सच सामने नहीं लाया गया। एक सच जो मंडल आरक्षण के लागू होने के 18 साल बाद सामने आया था उसपर चर्चा से बचने की तमाम कोशिशें की गईं। 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी की हिस्सेदारी महज 11 फीसदी थी। तो फिर 27 फीसदी का मतलब क्या ? 27 फीसदी आरक्षण और महज 11 फीसदी ओबीसी वर्ग के कर्मचारी। मतलब 27 फीसदी की जगह महज 11 फीसदी सीटों पर ही पिछड़े समुदाय के लोगों को नौकरी दी जा सकी। तो फिर 16 फिसदी आरक्षण कहां गया ? इसमें भी गौर वाली बात थी कि क्लास-वन के पदों पर 7 फीसदी पिछड़ा वर्ग के लोगों को नौकरी मिल पाई थी। क्लास दो में ये आंकड़ा 7 फीसदी से थोड़ा ज्यादा था तो क्साल तीन में 15 फीसदी से थोड़ा ज्यादा। ओबीसी को सबसे अधिक मौके फोर्थ ग्रेड में मिले। 2011 से 17 तक इस आंकड़े में बदलाव जरूर हुआ होगा लेकिन चमत्कारिक बदलाव हुआ हो ऐसा नहीं है। ये आलम केंद्र सरकार की नौकरियों में है। हलांकि कुछ लोगों का मानना है कि अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में नौकरियों में भारी कमी आई इसलिए ये आंकड़ा कम भी हो सकता है।
मंडल आरक्षण लागू होने से पहले भी केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी क्लास के लोग नौकरी थे। आरक्षण लागू होने के बाद अगर 27 फीसदी आरक्षण का कोटा भी नहीं भरा जा सका तो ऐतिहासित मंडल आंदोलन का हासिल क्या रहा ? एक बड़े सामाजिक तानाव और बंटवारे से देश को क्या मिला ?
आज एक बार फिर आरक्षण को लेकर कई किस्मों की बहसें खड़ी की जा रहीं हैं। लेकिन जब सरकार खाली पदों को भरेगी ही नहीं तो फिर आरक्षण का मतलब रह ही क्या जाएगा। नौकरियां हैं नहीं और बहसें आरक्षण पर हो रहीं हैं। तो क्या आरक्षण की आग में पिछड़ा वर्ग को झोंककर उसके सामाजिक संबंधों को जलाने की कोशिश हो रही है ? संभव है ऐसा हो रहा हो क्योंकि, समाज को बांट-छांट कर राजनीति आगे बढ़ती रही है और सामाजिक तनाव के जरिए राजनीतिक फायदे उठाए जाते रहे हैं।

तो क्या मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ेगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ?

अब शास्त्रों और बीजेपी के खिलाफ होगी संघ परिवार की जंग !
2014 में अन्ना आंदोलन से पैदा हुए माहौल को घर-घर तक पहुंचाने वाले संघ के जिन स्वयं सेवकों ने मोदी-मोदी के नारे गढ़े संभव है वही 2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारे गढ़ने आपके दरवाज़े पर पहुंचें। ख़बर आपको हैरान करने वाली है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तैयारी इससे आगे की है। संघ ने सिर्फ अपना हाफ पैंट नहीं छोड़ा है, हाफ पैंट के साथ घिसी-पिटी पुरातनपंथी सोच को भी छोड़ने की तैयारी कर ली है। वेद-शास्त्रों के हर्फ-हर्फ को अपना जीवन कहने वाला संघ अब वेद-शास्त्रों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जुटाने लगा है। संघ परिवार ने पानी, मंदिर और श्मशान आंदोलन शुरू करने की योजना बनाई है। संघ परिवार ने साफ कर दिया है कि पानी को लेकर जो जाति विभेद करने वाले शास्त्र हैं उन्हें वो नहीं मानेगा, संघ अब उन शास्त्रों के उस हिस्से को भी नहीं मानेगा जो ऊंच-नीच की बात करते हैं। इससे आगे बढ़ते हुए संघ परिवार ने गांव-गांव श्मशान आंदोलन चलाने की तैयारी की है। गांव-गांव अलग-अलग जाति-वर्ग के लोगों के श्मशान हैं। संघ परिवार अब एक ही श्मशान में सवर्ण, पिछड़ा वर्ग और दलित के दाह संस्कार के लिए मुहिम चलाने की तैयारी में है। इतना ही नहीं मुसलमानों के बीच पकड़ मजबूत करने के लिए संघ परिवार ने बड़ी रणनीति बनाई है। ये रणनीति राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबी है और इसी चाशनी में संघी मुस्लिम तैयार किए जाएंगे। फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खुद को एक ग़ैर राजनैतिक संगठन के केंचुल से बाहर निकालने की मुहिम चलाएगा और संभव है कि राष्ट्रीय स्वयं संघ नाम से ही सियासी दल चुनावी मैदान में हो और फिर अपने सियासी मकसद के लिए उसे बीजेपी की बिसात पर उलझना नहीं पड़ेगा।

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हलांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अभी ऐसी कोई घोषणा नहीं की है लेकिन, संघ से जुड़े सूत्र बता रहे हैं कि संघ अपने लक्ष्यों को हासिल करने में पूरी सतर्कता बरत रहा है और अगर मौजूदा मोदी सरकार संघ के लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रही तो फिर संघ परिवार नए राजनीतिक दल के गठन पर विचार करेगा। दरअसल संघ परिवार की सोच में ये बड़ा बदलाव मौजूदा केंद्र सरकार के रवैये से आया है। संघ परिवार को ये एहसास होने लगा है कि मोदी सरकार संघ के आनुषांगिक संगठनों की उपेक्षा कर रहा है। ऐसे में भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच, सहकार भारती, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत और लघु उद्योग भारती जैसे संगठनों की साख पर संकट पैदा होने का खतरा है।
केंद्र सरकार ने ना तो स्वदेशी जागरण मंच के विरोध को महत्व दिया और ना ही भारतीय किसान संघ के विरोध पर गंभीरता दिखाई। हद तो ये हो गई कि एफडीआई और महंगाई के मुद्दों पर संघ के आनुषांगिक संगठनों के तमाम विरोध के बावजूद केंद्र सरकार के किसी प्रतिनिधि ने संघ या संघ के आनुषांगिक संगठनों के नेताओं से बात तक नहीं की। जाहिर है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सरकार का ये रुख पसंद नहीं आना था और आया भी नहीं। कुछ ही दिनों पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय समन्वय बैठक में ये मुद्दा बेहद गंभीरता से उठा भी था।
सूत्र बता रहे हैं कि इस बैठक में आरएसएस के संयुक्त सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल, आरएसएस के सहयोगी संगठनों-स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, सहकार भारती, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत और लघु उद्योग भारती के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। भाजपा की तरफ से अमित शाह और अरुण जेटली समेत केंद्र के कुछ मंत्रियों को बैठक में बुलाया गया था।
इस बैठक के बाद संघ परिवार के भीतर अब ये चर्चा भी होने लगी है कि बाहर और भीतर से बीजेपी को समर्थन देने से बेहतर होगा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही एक राजनैतिक दल के रूप में ढाल लिया जाए। संघ का मानना है कि उसका संगठन भारत के 90 फीसदी हिस्से में मजबूत पकड़ रखता है और गांव-गांव, शहर-शहर मजबूत संगठन होने की वजह से सीधी राजनीति में उसे कोई शुरुआती दिक्कत नहीं आएगी।
संघ और बीजेपी के बीच दूरी बढ़ी तो भारत की राजनीति एक झटके में बदली नजर आएगी। इस सच से किसी को इनकार नहीं होगा कि बीजेपी का आधार वोट संघ परिवार ही तैयार करता है। ये भी सच है कि अगर संघ ने सहयोग रोक दिया तो बीजेपी के लिए चुनावी राजनीति की चुनौतियां बढ़ जाएंगी। लेकिन बात उससे आगे की है। कल्पना कीजिए कि किसी चुनाव में बीजेपी के खिलाफ आरएसएस मैदान में हो और आरएसएस के नेता बीजेपी नेताओं की कलई खोल रहे हों और दूसरी तरफ बीजेपी के नेता आरएसएस की कलई खोल रहे हों। हलांकि अभी ये सिर्फ कल्पना भर है लेकिन, भारत जैसे बहुदलीय लोकतांत्रिक देश में इसके विकल्प हमेशा खुले हैं और राजनीति का सच ये है कि इसमें कोई किसी का सगा नहीं होता।

आपका दिवाला सरकार की दिवाली, ये है तेल का खेल

भारत में एक बार फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी की तैयारी चल रही है। इसकी वजह है अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल। तो फिर क्या होगा ?
पहले से ही देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान पर हैं। और वो भी तब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बेहद कम थीं। आलम ये था कि तेल उत्पादक देश अपनी कई शर्तों को खत्म कर तेल खरीदारों के सामने झुके नजर आए। तो फिर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान पर क्यों रहीं ? इसका सीधा जवाब है सरकार की कमाई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कम होने के बावजूद भारत सरकार ने इसका फायदा आम लोगों को नहीं दिया। सरकार ने इसका फायदा खुद उठाया और जमकर कमाई की। केंद्र सरकार ने 2014 से 2016 के बीच डीजल के उत्पाद शुल्क में 11 बार में 380 फीसदी की बढ़ोत्तरी की। मतलब इस दौरान एक लीटर डीजल का उत्पाद शुल्क 3 रु.56 पैसे से बढ़कर 17 रु.33 पैसे हो गया। यही हाल पेट्रोल का भी रहा। केंद्र सरकार ने 2014 से 2016 के बीच पेट्रोल के उत्पादद शुल्क में 120 फीसदी का इजाफा कर दिया। 2014 में एक लीटर पेट्रोल पर सरकार 9 रु.48 पैसे उत्पाद शुल्क ले रही थी जो 2016 में 21 रु.48 पैसे हो गया।

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देश को महंगाई की आग में झोंक कर सरकार ने कैसे कमाई की इसको इस तरह भी समझिए। वित्तीय वर्ष 2014-15 में केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम प्रॉडक्ट से 1 लाख 72 हजार 66 करोड़ का राजस्व जुटाया था। 2015-16 में ये 2 लाख 58 हजार 443 करोड़ रुपये हो गया। 2016-17 में तो सरकार ने कच्चे तेल की कम कीमतों का जमकर फायदा उठाया और आम आदमी पर महंगाई का बोझ लाद कर 3 लाख 34 हजार 534 करोड़ रुपये की कमाई की।
बाजार में कच्चे तेलों की कीमतें बेहद कम हुईं लेकिन भारत में इसका फायदा आम लोगों को नहीं हुआ। अकेले दिल्ली के बाजार के हिसाब से देखें तो भी आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आपको कितनी राहत मिल सकती थी और आप कितनी बचत कर सकते थे या फिर उन पैसों से अपनी कितनी ज़रूरतें पूरी सकते थे।
2017 के सितंबर महीने की 15 तारीख को दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 70 रुपये 43 पैसे थी। जबकि इसकी मूल कीमत थी 27 रु.61 पैसे। तो फिर ये 70 रु.43 पैसे में क्यों बेचा गया ? इसका जवाब पढ़िए। 27 रु.61 पैसे के पेट्रोल में 2 रु.80 पैसे मार्केटिंग लागत को जोड़िए फिर इसमें सरकार की कमाई वाला 21 रु.48 पैसे उत्पाद शुल्क जोड़िए। इस बाद सरकार ने फिर वैट और प्रदूषण के नाम पर 14 रु.97 पैसे वसूले। विक्रेता का 3 रु.57 पैसा जोड़कर ये हो गया 70 रु.43 पैसों का। मतलब 27 रु.61 पैसे के पेट्रोल पर सरकार ने उत्पाद शुल्क और वैट,प्रदूषण कर लगाकर 36 रु.45 पैसों की शुद्ध कमाई की। ये अपने आप में हैरान करने वाली कर व्यवस्था है। आम भाषा में 28 रुपये का माल और उस पर 37 रुपये टैक्स।
यही हाल डीजल का भी रहा। 27 रु.51 पैसों के डीजल पर सरकार ने 17 रु.33 पैसे उत्पाद शुल्क और 8 रु.69 पैसे वैट और प्रदूषण शुल्क के नाम वसूले। मतलब 28 रुपये के माल पर 27 रुपये टैक्स।
अब ये महंगाई और बढ़ने वाली है। अपने खर्चे बढ़ा चुकी केंद्र सरकार खुद का खर्च कम करने को तैयार नहीं है। केंद्र सरकार केंद्रीय करों में कटौती के लिए तो तैयार नहीं है लेकिन राज्य सरकारों से कर कटौती की अपील ज़रूर कर रही है। 2017 के जून में बाजार में कच्चे तेल की कीमत 46 डॉलर के पार थी जो दिसंबर 2017 में 62 डॉलर प्रति बैरल के पार हो गई। केंद्र सरकार अपनी कमाई बरकार रखना चाहती है। मतलब अब डीजल-पेट्रोल की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी के लिए आप तैयार हो जाइए और इसी के साथ महंगाई की भारी मार झेलने की क्षमता भी विकसित कर लीजिए।

सुप्रीम कोर्ट नहीं बचा तो लोकतंत्र तो भूल जाइए देश ही नहीं बचेगा

आजाद देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के जज मीडिया से मुखातिब हुए। ऐसा पहली बार हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के कामकाज के तरीकों पर खुद सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सवाल उठा दिए। ऐसा पहली बार हुआ कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की मंशा पर सवाल उठाए गए हों। ऐसा पहली बार हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के भीतरी पहलुओं को सार्वजनिक किया गया। और इस घटना के साथ ही ये बहस तेज हो जानी चाहिए कि क्या सुप्रीम कोर्ट पर किसी का दबाव है ? क्या सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित किया जा रहा है ? चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को सवालों के घेरे में लाने वालों का मकसद क्या है?
    इन तमाम सवालों के जवाब नहीं खोजे गए तो निश्चित तौर पर देश में लोकतंत्र मिट जाएगा और फिर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली हालत पैदा हो जाएगी। इन सवालों के जवाब खोजने तो होंगे लेकिन उससे पहले पूरे मामले को समझते हैं।

साभार: पीटीआई
   दरअसल शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जस्टिस मीडिया से मुखातिब हुए और बेहद दुख के साथ बताया कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है। जजों ने ये भी कहा कि वक्त रहते अगर संस्था को ठीक नहीं किया गया तो फिर लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।
   इन चार जजों में जस्टिस जे चेलामेश्वर भी शामिल थे। जे चेलामेश्वर वरिष्ठता के मामले में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बाद आते हैं। उनके साथ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर, और जस्टिस कुरियन जोसेफ भी थे। चारों जजों ने मीडिया से मुखातिब होने की जो वजह बताई वो बैहद चौंकाने वाली है। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा कि हमने ये प्रेस कॉंफ्रेंस इसलिए बुलाई ताकि कोई ये ना कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है।
    मीडिया से मुखातिब जजों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। जजों ने ये भी कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को कई बार खत लिखकर आग्रह किया गया कि वो स्थितियों को नियंत्रित करें लेकिन कुछ हुआ नहीं। जजों ने कहा कि CJI से सुधारात्मक कदम उठाने की कई बार गुजारिश की गई लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। चारों जजों ने एक बार फिर कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और ये लोकतंत्र के लिए किसी खतरे से कम नहीं है।
    इस दौरान जजों ने उस चिट्ठी के महत्वपूर्ण अंश भी साझा किए जो CJI को लिखी गई थी और दावा किया जा रहा है कि CJI ने इसपर कोई कदम नहीं उठाया।
   सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा चीफ जस्टिस को लिखी गई चिट्ठी के मुख्य अंश...
· चीफ जस्टिस उस परंपरा से बाहर जा रहे हैं, जिसके तहत महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय सामूहिक तौर पर लिए जाते रहे हैं.
· चीफ जस्टिस केसों के बंटवारे में नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं.
· वे महत्वपूर्ण मामले, जो सुप्रीम कोर्ट की अखंडता को प्रभावित करते हैं, चीफ जस्टिस उन्हें बिना किसी वाजिब कारण के उन बेंचों को सौंप देते हैं, जो चीफ जस्टिस की प्रेफेरेंस (पसंद) की हैं.
· इससे संस्थान की छवि बिगड़ी है.
· हम ज़्यादा केसों का हवाला नहीं दे रहे हैं.
· सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने उतराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसफ और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त करने की सिफारिश भेजी है.
· जस्टिस केएम जोसफ ने ही हाईकोर्ट में रहते हुए 21 अप्रैल, 2016 को उतराखंड में हरीश रावत की सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को रद्द किया था, जबकि इंदु मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट में सीधे जज बनने वाली पहली महिला जज होंगी, जबकि सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल जस्टिस आर भानुमति के बाद वह दूसरी महिला जज होंगी.
· सुप्रीम कोर्ट में तय 31 पदों में से फिलहाल 25 जज हैं, यानी जजों के 6 पद खाली हैं.
        निश्चित तौर पर ये बेहद चिंता का विषय होना चाहिए। देश की सर्वोच्च अदालत में अगर सबकुछ ठीक नहीं हो तो फिर इंसाफ की उम्मीदें दम तोड़ने लगेंगी। जिस समाज में आदमी की आखिरी उम्मीदें दम तोड़ने लगती हैं उस समाज में अराजक हालात पैदा हो जाते हैं। हमें कहीं तो भरोसे का एक मजबूत खूंटा बचाए रखना होगा। हमें ये ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रवाद किसी नेता या पार्टी के पक्ष में नारा लगाना नहीं होता है असली राष्ट्रवाद देश के संघीय ढांचे की सुरक्षा है।

Sunday, December 31, 2017

नमस्ते सदा वत्सले गया तेले लेने...गुड मॉर्निंग बोलिए जनाब....

प्रभु, हमें माफ कीजिएगा। हम तो निश्छल भाव से नमस्ते सदा वत्सले बोलते रहे। हमें लाठी-टोपी वाले निक्कर पंडे ने ये बताया था कि नमस्ते सदा वतस्ले बोलने से ही प्रभु प्रसन्न होते हैं। निक्कर पंडे ने ही बताया था कि नमस्ते सदा वत्सले बोलना ही हमारी संस्कृति है। हे प्रभु, हमारी भूल के लिए हमें माफ करना। हम तो आस्थावान लोग ठहरे। निक्कर पंडे-पुजारियों की बात सिर झुका कर मानने वाले लोग ठहरे। आस्था के मामले में हम अपने विवेक का इस्तेमाल भी पाप समझते हैं। हमने कभी भी आस्था पर कोई तर्क-वितर्क नहीं किया प्रभु। हमें तो निक्कर पंडे-पुजारियों ने बताया कि गुड मॉर्निंग बोलना कुसंस्कार है और कुसंस्कार से बच कर रहना है। निक्कर पंडे ने ही बताया कि नमस्ते सदा वत्सले बोलना संस्कार है और संस्कार धारण करना है। लेकिन, जब से ये सुना है कि गुड मॉर्निंग नहीं बोलने से आप रुष्ट हैं मेरा दिल डूबा जा रहा है। अब तक की तमाम निश्छल साधना बेकार जाती दिख रही है। अपनी मूर्खता पर क्षोभ हो रहा है। 

प्रभु, हम भक्तों की मूर्खता से आप भली-भांति परिचित हैं। मूर्ख न होते तो आपके भक्त क्यों होते ? ये हमारी मूर्खता ही तो है कि हम तब भी ये नहीं समझ पाए कि पश्चिमी संस्कृति ही हमारा ध्येय होना चाहिए जब आपने मेक इन इंडिया का नारा दिया। निक्कर पंडों के चक्कर में हम पश्चिम संस्कृति को कोसते रहे और आपने फिर हमें चेताया। आपने स्किल इंडिया बोला। हम मूरख लोग तब भी नहीं समझ पाए प्रभु। जब आपने स्टैंडिंग इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे सांस्कृतिक वरदान दिए तब भी हम मूर्खों को अक्ल नहीं आई। हे प्रभु हम तो निक्कर पंडे पर आंख मूंद कर भरोसा करते रहे और अंग्रेजी को कोसते रहे। आपने स्टार्ट अप इंडिया कहा तब भी हमारी आंखें नहीं खुलीं।
आज जब आपने गुड मॉर्निंग नहीं बोलने पर नाराजिक जाहिर की तो दिल डूबने लगा। अपनी तुच्छता, मूर्खता पर गुस्सा आ रहा है प्रभु।
प्रभु, आज मैं प्रण ले रहा हूं कि नमस्ते सदावत्सले को अब कभी अंगीकार नहीं करूंगा अब तो सिर्फ और सिर्फ गुड मॉर्निंग बोलूंगा। प्रभु, आपको प्रसन्न करने के लिए वैसे तो पहले ही भक्तों ने सारे संस्कार छोड़ दिए हैं। कुछ अंश बचे रह गए हैं उन्हें भी त्याग देने का प्रण लेते हैं प्रभु।

Tuesday, December 26, 2017

लालू-जगन्नाथ के बहाने एक बार फिर आग लगाने की साजिश

जलता समाज टूटते देश की गवाही है। चारा घोटाले के दूसरे मुकदमे में भी राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को सज़ा होने के बाद बिहारी समाज में आग लगाने की ख़तरनारक कोशिशें तेज हो गई हैं। राजनैतिक बयानों और सोशल मीडिया के जरिए एक बार बिहार में अगड़ा-पिछड़ा संघर्ष का माहौल गढ़ा जा रहा है। लालू प्रसाद को दोषी पाए जाने और डॉ जगन्नाथ मिश्र को बरी किए जाने के अदालती आदेश को जातीय खांचे में धकेलने की होड़ सी मच गई है। जबकि सच्चाई ये है कि कोर्ट ने जयनारायण निषाद को भी बरी किया है जो पिछड़ा वर्ग से आते हैं और लालू प्रसाद के साथ कई सवर्णों को दोषी करार दिया है। बावजूद इसके इस मामले को सिर्फ लालू-जगन्नाथ से जोड़ कर आगे किया जा रहा है।
राजनीति की ये कुटिल चाल राजनेता कम चल रहे हैं कुटिल इंटलेक्चुअल तबका ज्यादा चल रहा है। सोशल मीडिया पर ऐक्टिव ये तबका बिहार में जातीय संघर्ष के लिए बेचैन दिख रहा है। ये तबका ये नहीं लिख रहा कि कोर्ट ने जयनरायण निषाद समेत पिछड़े वर्ग के कई आरोपियों बरी किया है। ये तबका सिर्फ ये बताने-जताने में लगा है कि लालू प्रसाद पिछड़ी जाति से हैं इसलिए उनको दोषी करार दिया गया और जगन्नाथ मिश्र सवर्ण हैं इसलिए वो बरी कर दिए गए। जबकि सच ये है कि लालू प्रसाद समेत जिन 16 लोगों को दोषी पाया गया है उनमें आधे से ज्यादा अगड़ी जाति से हैं।
क्यों जात-पात की आग लगाने की बेचैनी है?
70 के दशक में बिहार में जातीवादी राजनीति ने जातीय संघर्ष की बुनियाद रखी। 80 के दशक में ये संघर्ष विस्तार पाने लगा और नब्बे के दशक ने इसका सबसे खतरनाक रूप देखा। इस राजनीति का सबसे बड़ा फायदा उनको मिला जिन्होंने कभी राजनीति की ही नहीं। सीधे जात के नाम पर वोट मांगा और सत्ता हथिया ली। दूसरा लाभ उस तबके को मिला जो समाज में जातिवाद की जड़ें गहरी करने का काम करता रहा और सत्ता से उसकी मोटी कीमत वसूलता रहा। तीसरा फायदा ये हुआ कि जाति की राजनीति करने वालों को समाज-राज्य के प्रति जिम्मेदार होने की जहमत नहीं उठानी पड़ी। ना तो बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, सड़क जैसे मसलों में उलझना पड़ा। वो बस ये बता कर चुनाव जीतते रहे कि वो अमुक जाति के बड़े नेता हैं और जाति के लोगों को तो अपनी जाति के नेता को ही वोट करना चाहिए।
 ख़तरा क्यों है ?
बिहार में नीतीश के शासन काल की तमाम कमियां गिनाई जा सकती हैं लेकिन, इस बात की तारीफ ज़रूर होनी चाहिए कि नीतीश ने बिहार में वर्ग संघर्ष पर काबू पाया। बिहार में जातीय संघर्षों का इतिहास बेहद रक्तरंजित रहा है। फिर वही माहौल गढ़ा गया तो हालात बेकाबू हो जाएंगे।
1977 में बिहार की राजधानी पटना जिले के बेलछी गांव में पिछड़ी जाति के दबंगों ने 14 दलितों को जिंदा जला दिया था।
1996 में भोजपुर के बथानी टोला में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या की गई।
1997: 30 नवंबर की रात को लक्ष्मणपुर बाथे में 58 दलितों की हत्या की गई।
1999: 25 जनवरी की रात को जहानाबाद के शंकर बिगहा में 22 दलितों की हत्या की गई।
1999 में ही 18 मार्च को जहानाबाद के सेनारी में 34 भूमिहारों की हत्या की गई।
इसके बीद फिर 16 जून 2000 की रात मियांपुर नरसंहार सामने आया। 35 लोगों की हत्या की गई।
बिहार को जातीय संघर्ष की आग में झोंकने की कोशिश करने वाले इतिहास के खूनी पन्नों से वाकिफ हैं। लेकिन ये वही लोग हैं जो बेगुनाहों के कत्ल से सत्ता सीढ़ियां चढ़ते रहे हैं। खून का स्वाद चख चुके ये लोग नरभक्षी हो चुके हैं और इनकी सत्ता की भूख एक बार फिर बिहार को नरसंहारों वाले दौर में पहुंचा सकती है। ये बिहारी समाज को तय करना है कि उसे अमन-चैन चाहिए या फिर सेनारी-मियांपुर ?

Monday, December 25, 2017

विकास पगलाया तो आपकी ज़मीन हड़प ली जाएगी !

झारखंड के जंगलों में कोयल कूकती भर नहीं है अपनी कलकल धाराओं के साथ बहती भी है। कोयल जब बहती है तो रांची के पठारों से लेकर हजारीबाग की जमीन को सींचती सोन तक किसानों और आदिवासियों को जीवन देती जाती है। इसी उत्तरी कोयल से जुड़ी है कुटकू परियोजना। इसे उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना कहते हैं। 1970 में कुटकू मंडल परियोजना की परिकल्पना सामने आई थी। 1990 में इसके लिए ज़मीन अधिग्रहण की शुरुआत कर दी गई। लेकिन इससे प्रभावित किसानों-आदिवासियों के  पुनर्वास की समस्या विकराल होती दिखी तो तब सरकार ने परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसके बाद सीधे अगस्त 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने इस परियोजना को पूरी करने के लिए 1622.27 करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी।
    सरकार ने मंजूरी से पहले इस योजना के इतिहास को कितना जाना-समझा ये सरकार जाने। लेकिन इस परियोजना की शुरुआत जान-माल के बड़े नुकसान से हुई थी। परियोजना की वजह से 1997 में पलामू टाइगर रिज़र्व क्षेत्र में भीषण बाढ़ आई थी। इस बाढ़ में पलामू और डालटेनगंज के जंगलों में रहने वाले जानवरों की बड़ी तादाद में मौत हुई ही इसी के साथ 19 आदमी भी बह गए जिनके शव तक नहीं मिले। नतीजा ये हुआ कि घटना से गुस्साए ग्रामीणों ने बांध के इंजीनियर बैजनाथ मिश्रा पर हमला कर दिया। इस हमले में बैजनाथ मिश्र की मौत हो गई।

    इस घटना के बाद परियोजना से प्रभावित होने वाले गांव के लोग परियोजना के खिलाफ हो गए। 1980 के बाद तो ग्रामीणों का गुस्सा इस कदर भड़का कि कुटकू परियोजना से जुड़े अधिकारी दफ्तर छोड़ कर भाग गए। 1994 आते-आते वहां परियोजना का कोई नामलेवा नहीं बचा।
   अब, जबकि परियोजना को नए सिरे से जिंदा करने करने की कोशिशें हो रहीं हैं एक बार फिर 15 गांवों के लोगों की नींद उचट गई है। ये वो गांव हैं जो परियोजना की वजह से डूब क्षेत्र में आ गए हैं। पुनर्वास की नीति से झारखंड परिचित है। लोगों को कई जगहों पर बसाया जाता है। नई जगह पर वहां के पुराने समाज से समायोजन में मुश्किलें आती हैं। इलाके के पुराने लोग इन्हें अपना नहीं मानते। लिहाजा दूसरी जगह पर बसे लोग कमजोर होते जाते हैं और पीढ़ियों से उस जगह पर बसे लोगों के शोषण का शिकार होते हैं।

बांध के खिलाफ क्यों भड़क सकता है गुस्सा ?
दरअसल झारखंड के इस इलाके में ग़ैरमजरुआ जमीन पर खेती होती है। आदि काल से आदिवासी जंगलों में रहते आए हैं । पहले आदिवासियों को ये मालूम तक नहीं था कि ज़मीन की रजिस्ट्री की कोई व्यवस्था है। ऐसे में जंगल में रहने वाले यो लोग जंगल को ही अपनी दुनिया समझते रहे और जंगल में ही खेती-बाड़ी करते रहे। वैसी ज़मीन जो किसी नाम रजिस्ट्री नहीं है उसे ही गैरमजरुआ ज़मीन कहते हैं। जब यहां को लोगों को यहां से विस्थापित किया जाएगा तो फिर उन्हें दूसरी जगह गैरमजरुआ ज़मीन नहीं मिलेगी। जाहिर है खेती करने वाली ये आबादी मजदूर बना दी जाएगी। परियोजना के विरोध की दूसरी वजह परियोजना से होने वाला फायदा भी है। इस परियोजना से पलामू को विस्थापन और बाढ़ के अलावा कुछ नहीं मिलना है। परियोजना का पानी बिहार के औरंगाबाद को मिलेगा और परियोजना से तबाही झारखंड के पलामू में मचेगी। जाहिर है ये सच अब सबके सामने आ चुका है और परियोजना के खिलाफ पलामू में गोलबंदी होने लगी है। इस परियोजना से पलामू टाइगर रिजर्व बुरी तरहसे प्रभावित हो सकता है। बरसात  दिनों में जंगलों में पानी भरेगा तो जंगली जानवर जान बचाने के सिए आसापास की इंसानी बस्तियों का रुख करेंगे। ऐसे में जानवरों और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ेगा और बड़ी तादाद में जानवार मारे जाएंगे।
  
परियोजना के विरोध की वजहों में एक बड़ी वजह ये है कि आम धारणा बन गई है कि सरकार तमाम सरकारी ज़मीन बड़े उद्योगपतियों को देने का काम रही है। हाल ही छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में संशोधन का विरोध देखा जा चुका है। आलम ये हुआ कि आदिवासियों का गुस्सा देख कर राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने रघुवर दास सरकार के उस संशोधन विधेयक को वापस कर दिया।

   झारखंड में ज़मीन अधिग्रहण त्रासदी की अतंहीन कहानी है। हाल ही में एनटीपीसी के खिलाफ वहां बड़ा आंदोलन हो चुका है। किसानों का आरोप है कि सरकार किसानों से बातचीत किए बगैर जबरिया ज़मीन अधिग्रहित कर रही है और निजी हाथों को सौंप रही है।
   सालों पहले जिनको विस्थापित किया गया अभी तक उन लोगों को पुनर्वासित नहीं किया जा सका है। हेवी इंजीनयरिंग कॉर्पोरेशन की वजह से विस्थापित आज भी पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहे हैं। झारखंड का शायद ही कोई ऐसा जिला हो जहां बड़े पैमाने पर विस्थापन नहीं हुआ हो। हर बार किसानों को ही विकास की कीमत चुकानी पड़ी है। अपना सबकुछ गंवा चुकी 2 करोड़ 93 लाख लोगों की ये भीड़ अब मजदूर बन चुकी है और आज भी पुनर्वास की लड़ाई लड़ रही है। अब एक बार फिर कुटकू परियोजना के लिए किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने की योजना बन चुकी है।

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...