Thursday, November 22, 2018

सबका साथ सबका विकास: पेशाब पवित्तर हो गया

काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात...क्योंकि भारतीय राजनीति में जाति वो मारक मंत्र है जिसे फूंक देने भर से तमाम ज़रूरी मुद्दे मारे जाते हैं....अगर मंत्र की मारक क्षमता से कुछ बच भी गए तो फिर उन्हें धर्म वाले सिद्ध मंत्र से मार दिया जाता है..और ऐसे में स्कूल, अस्पताल, नौकरी, रोजगार, भूख जैसे तामाम मसलों पर जवाब की जरूरत ही नहीं पड़ती ..क्योंकि परलोक के सुख के सपनों में भटकाई जा रही जनता इस लोक के सारे कष्ट अपनी जाति के लिए भोग लेना चाहती है...सो सत्ता के सुखकाल में पूंजिवादियों के लिए दिन-रात एक कर देने वाली राजनीति चुनावी काल में जातिवाद के लिए रात-दिन जुट जाती है..
छितराई जनता उसे अच्छी नहीं लगती इसलिए वो उसे गोलबंद करने निकल पड़ती है.. दिलतों को गोलबंद करती है, पिछड़ों को गोलबंद करती है, अति पिछडों को गोलबंद करती है, सवर्णों को गोलबंद करती है...गोलबंद करते-करते जब समीकरण उलझने लगने लगता है तो फिर बांटती भी है..दिलतों को दलित-महादलित में बांटती है, सवर्णों को ठाकुर-ब्राह्मण में बांटती है, इसी तरह से पिछड़े-अति पिछड़े को भी बांटती है...बांट-छांट कर उस बंटवारे को गोलबंद करने के लिए राजनीति फिर सम्मेलन करती है... महादलित सम्मेलन, दलित सम्मेलन.. फिर इसी तर्ज पर पिछड़ा, अति पिछड़ा होते हुए क्षत्रीय और ब्राह्मण सम्मेलन भी यही राजनीति करती है...और सबसे वादे एक ही होते हैं..ठीक वैसे ही जैसे साहेब जिस राज्य में जाते हैं उसे देश का नंबर वन राज्य बनाने का वादा करते हैं...
तो बीजेपी सबका साथ सबका विकास तब ही कर पाएगी जब वो तमाम जातियों के सम्मेलन कर लेगी..पिछले साढ़े चार साल के शासन काल में बीजेपी ने जो सीखा वो ये कि जातियों के सम्मलेन के जरिए विकास वाला मंत्र सिद्धी पाएगा.. और फिर जाति वाली राजनाति ही सत्ता को सिद्ध कर पाएगी.. जैसे बीएसपी, सपा, राजद, जदयू, रालोद के जातीय समीकरण हैं ठीक वैसा ही समीकरण गढ़े बिना बीजेपी भी सबका साथ-सबका विकास कर नहीं पा रही है.. तो ठीक चुनाव से पहले जाति वाला टोटका याद आ गया..सो अब तैयारी शुरू है.. तो फिर काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात
जाति-जाति के इस खेल में समाज के भीतर तो खुल कर जाति-जाति चल जाती है..लेकिन सफेद कॉलर समाज में कहीं जातिवाद की घटिया सोच पर सवाल ने उठ जाएं सो पेशाबघर की जगह वाशरूम शब्द का इस्तेमाल करने वलों ने इसे सोशल जस्टिस और सोशल इंजीनयरिंग कहना शुरू कर दिया..वो क्या है न अंग्रेजी में बोल देने से पेशाब पवित्तर हो जाता है... और जातिवाद इंजीनियरिंग और जस्टिस का ऊंचाई पा जाता है.. तो फिर बोलिए काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात

Monday, November 19, 2018

चाय वालों की हालत तो पता है अलाव वालों का क्या होगा ?

मुद्दों की मारामारी के बीच नोएडा के सेक्टर 63 में चाय बेचने वाले  विनोद, छाया और पूजा ने अपनी परेशानियों को बयां किया तो लगा कि आप तक इनकी बातें पहुंचाई
जानी चाहिए... चायवालों को अयोध्या के साथ जोड़ दिया जाए तो अभी चैनल के दफ्तर के
बार पार्टी प्रवक्ताओं की भीड़ लग जाएगी और हर प्रवक्ता इस मसले पर ज्यादा से
ज्यादा बोलने लगेगा...लेकिन चाय वालों की पीड़ा पर अब कौन बोले.. चाय पर चर्चा तो
बीते सियासी वक्त की बात हो गई है

    यही हाल किसानों का
है..मीडिया के हिंदू-मुस्लिम चरित्र के बावजूद किसानों को अभी लगता है कि न्यूज चैनल
पर उनकी बात आ जाए तो उनकी समस्याएं खत्म हो जाएंगी.. यो भरोसा अगर है तो इसका
स्वागत है..गावों में जाकर देखिए अनाज और आदमी दोनों छितराए हुए हैं... न तो दाम
मिल रहा है और ना ही काम..  2014 से लेकर
2015 के बीच तक चाय वालों पर किस्म-किस्म के कार्यक्रम न्यूज चैनलों पर दिखाए
गए..क्या चाय वालों की हालत बदली...नहीं न...तो अब अलाव पर चर्चा की तैयारी
है..उत्तर प्रदेश में जहां चीनी मिल मालिकों पर गन्ना किसानों का सबसे ज्यादा बकाया
है और जिस पश्चिमी यूपी के किसान कुछ दिनों पहले ही दिल्ली की सल्तन से दंगल कर
चुके हैं अब उन लोगों के साथ बीजेपी अलाव पर चुनावी चर्चा करेगी...इस अलाव पर
सियासी रोटियां तो सेंकी जा सकेंगी लेकिन क्या किसानों की स्थिति भी बदलेगी...चाय
वालों की कहानी हमारे सामने है..
सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए ये मुद्दे एक दूसरे की निंदा करने
भर के लिए हैं मगर कोई भी ठोस प्रस्ताव जनता के बीच नहीं रखता है कि वाकई क्या
करने वाला है
, जो कर रहा है वो क्यों चूक जा रहा है. कई बार लगता है कि हमारे
राजनेता
, हमारे अर्थशास्त्री, सिस्टम में बैठे लोगों ने ज़िद कर ली है कि इन
बुनियादी सवालों पर बात नहीं करना है
, मीडिया को हर रात कोई न कोई थीम मिल जाता है, सब कुछ इसी थीम की
तलाश के लिए हो रहा है. इसके बाद भी भारत के भीतर से तस्वीरें उथला कर सतह पर आ जा
रही हैं.
..जवान जहां खड़े थे वहां से पीछे धकले जा
रहे हैं और किसान जहां पड़े थे वहीं पड़े दिख रहे हैं.. बस सियासत की अलाव पर सब 
भुने जा रहे हैं 

1611 BIG BULL WITH ASIT NATH

https://www.youtube.com/watch?v=UzpkYKotYxM

Saturday, November 10, 2018

दलित-पिछड़ों को बौद्ध बताने की बेचैनी मुसलमानों और दलित चिंतकों में क्यों ?

2008 के अखिर में मैं जब रांची पहुंचा तो मेरे पत्रकार मित्र हरेकृष्ण पाठक ने मेरे लिए पहले से ही रांची के कोकर इलाके में किराए के मकान का इंतजाम कर लिया था। मकान मालिक और उनका परिवार बेहद मिलनसार था लिहाजा दो-चार दिनों में ही मुझसे उनका जुड़ाव होने लगा। मकान का बड़ा हिस्सा किराए पर था और मुझ जैसे कई किराएदार उस मकान में थे। तमाम किराएदार और मकान मालिक का परिवार एक बड़े परिवार की तरह लगते थे। कुछ दिनों बाद बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि मकान मालिक इसाई हैं और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी हैं। इतना ही नहीं उस मकान में किराए पर रहने वाले कई लोगों का उन्होंने धर्मांतरण करवाया था और उन्हें इसाई बनाया था। धर्मांतरण की वजह से इसाई समुदाय में उनकी बड़ी दखल थी और रांची और उसके आसपास के चर्च और मिशनरी में उनको खास महत्व मिलता था। ऐसे ही फिर कुछ दिनों बाद पता चला कि उनके पिताजी रिटायर्ड वनकर्मी हैं और कई बीमारियों से जूझते हुए बूढ़ी पत्नी के साथ बेटे से अलग गांव में रहते हैं। बूढ़ा-बूढ़ी हिंदू धर्म के थे और बेटे-बहू के धर्मांतरण से नाराज होकर इनसे रिश्ते तोड़ चुके थे। 
रांची का वो छोटा प्रवास कई मायनों में बेहद खास रहा। मेरे मकान मालिक और उनकी पत्नी ने मुझे इसाई धर्म के संबंध में बहुत कुछ बताया और कई धार्मिक आयोजनों में मुझे शामिल भी किया। बाद के दिनों में मुझे पता चला कि उस मकान में रहने वाले एक हिंदू यादव नवयुवक ने जब धर्म परिवर्तन किया तो किसी चर्च के जरिए उसकी एक नौकरीपेशा ANM से शादी करवाई गई और किसी मिशनरी ने उसे कुछ रकम और मोटरसाइकिल गिफ्ट की। ऐसी ही बहुत सारी हैरान करने वाली जानकारियां मिलती रहीं और मैं उनकी पुष्टि करता रहा। 

इसी बीच रविवार की एक सुबह मेरे मकान मालिक अचानक मेरे कमरे में चाय के साथ दाखिल हुए। दिसंबर के शुरुआती हफ्ते में सबेरे-सबेरे गरम चाय देखकर ही ताजगी आ गई थी। चाय के साथ थोड़ी गपशप में ये पता चला कि शाम को उनके घर कोई धार्मिक कार्यक्रम है जिसमें फादर समेत कई लोग आने वाले हैं और कार्यक्रम में फादर सिर्फ इसलिए आ रहे हैं क्योंकि मेरे मकान मालिक उनसे मुझे मिलवाना चाहते हैं। उस दिन मैं पूरा दिन घर पर ही रहा और खिड़की से कार्यक्रम की तैयारियों को देखता रहा। रात के करीब 8 बजे जब फादर पहुंचे तो मेरे मकान मालिक और उनकी पत्नी मुझे बुलाने आए। मैं बेहद सहजता से उनके साथ गया और फादर से पूरी गर्मजोशी से मुलाकात की। थोड़ी देर की बातचीत में ये साफ हो गया कि परमेश्वर ने उन्हें मेरे पास भेजा है और परमेश्वर मेरी तमाम समस्याओं को खत्म कर देगा अगर मैं इसाई बन गया तो। इस बीच कई किस्म की खाने की चीजों को मैं अपने उदर में पहुंचा चुका था। घंटे भर की मुलाकात के बाद फादर चले गए तो थोड़ी देर के लिए मैं और मेरे मकान मालिक कमरे से बाहर निकले, टहलने-घूमने के बाद अपनी-अपनी राह पकड़ी। बाद के दिनों में उसी मकान में रहने वाले मुकेश नाम का एक मेरी उम्र का शख्स मुझसे मिलने-जुलने लगा। कई प्रयासों के बाद मुझे ये बताया गया कि पटना के एक बड़े अस्पताल में करने वाली एक लड़की से वो फादर मेरी शादी करवाना चाहते हैं। शादी के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करने के बाद मुझे एक बार उस लड़की से मिलने को कहा गया। फिर एक दिन अचानक जैसे ही मैं दफ्तर से घर पहुंचा मकान मालकिन मुझे दरवाजे पर ही मिल गईं और मुझसे एक कप चाय पीने का अनुरोध किया। चूंकी मेरा उस घर में हर जगह आना-जाना था लिहाजा चाय के लिए मैं आराम से हॉल में पहुंच गया। वहां मकान मालिक के बच्चों के साथ एक अनजान लड़की भी मौजूद थी। मकान मालकिन ने बताया कि ये वही लड़की है जिससे फादर मेरी शादी करवाना चाहते हैं। शादी चर्च में होगी और फिर मुझे रांची के कोकर में दो कट्ठा जमीन और एक लाख रुपये दिए जाएंगे। ज़मीन की रजिस्ट्री के कागजों में मेरा धर्म इसाई लिखा जाएगा। ये सब होने पर परमेश्वर मेरा साथ देने लगेगा। 
धर्मांतरण का ये गंदा खेल मैं समझ चुका था। तमाम धतकर्म, कुकर्म और कपटों पर आधारित धर्म का ये खेल मुझे सबसे बड़ा अधर्म लगा। और यही अधर्म आज के दौर में तमाम धर्मों की बुनियाद है। अधर्म की बुनियाद पर खड़े धर्म-मजहब आपको धार्मिक बनाने की नैतिक ताकत तो नहीं ही रखते होंगे। झारखंड और बिहार में धर्मांतरण का ये खेल भ्रष्ट आचरण के सहयोग से होता है। इसमें शराब, लड़की, पैसा, जमीन सबकुछ शामिल है। 
अब देख रहा हूं यूपी में इसी किस्म का दूसरा खेल हो रहा है। यूपी में दलित और पिछड़ों को बौद्ध बताया जा रहा है। बताने वाले ज्यादातर वो लोग हैं जो खुद मुसलमान हैं। ये खुद न तो बौद्ध धर्म अपनाने वाले हैं और ना ही बौद्ध धर्म को पसंद करने वाले। कुछ वैसे लोग भी हैं जो सोशल मीडिया पर दलित चिंतक के तौर पर जमे हुए हैं और देखते ही देखते ही मालदार लोगों में शामिल हो चुके हैं। ये लोग लगातार ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि दलित और पिछड़ा वर्ग मूलत: बौद्ध धर्म का हिस्सा है और हिंदू धर्म सिर्फ और सिर्फ मनुवादियों का धर्म है। हैरानी की बात ये है कि इनमें से ज्यादातार लोगों ने मनुस्मृति पढ़ी तक नहीं है लेकिन, इनके लिखे हर लेख में 25-50 जगहों पर मनुवाद शब्द का इस्तेमाल होता है। दलित समाज में फैली अशिक्षा का फायदा उठाकर उनका धर्मांतरण करवाने में विफल इस्लाम के कथित ठेकेदार बेहद चतुराई से दलित समाज को बौद्ध बताने में जुटे हैं। इस काम में इनका सहयोग वो दलित चिंतक भी कर रहे हैं जो देखते ही देखते मालदार लोगों की टोली में शामिल हुए हैं।
जो धर्म कभी लोक जागरण की राह पकड़ता था अब वही धर्म लोकभ्रम पैदा कर रहा है। जो धर्म कभी सत्यनिष्ठ हुआ करता था अब वही धर्म झूठ और फरेब की राह पर चलता दिख रहा है। झूठ और फरेब के जरिए धर्म विस्तार का ये गंदा खेल सिर्फ इसाई, मुस्लिम या बौद्ध धर्म में ही होता होगा ऐसा मैं नहीं मानता। बाकी धर्मों के पाखंडी रक्षक भी ये काम करते ही होंगे। जाहिर है कुकर्मों पर आधारित ये धर्म ही अब अधर्म हो गए हैं और ऐसे धर्मों का अनुसरण करने से बेहतर है कि आप खुद को धर्म और जाति के पाखंड से बाहर निकाल लीजिए। ये धर्म और इन धर्मों के रक्षक धतकर्मों को ही धर्म के तौर स्थापित करने में लगे हुए हैं। बेहतर होगा धतकर्मों को धर्म मानने से इनकार किया जाए।

Thursday, October 18, 2018

मुश्किल ये कि संघ के सामने दूसरा रास्ता नहीं है

नवरात्र के नौवें दिन जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपना स्थापना दिवस मना रहा है.. और जब 1925 से लेकर 2018 तक के अपने अनुभवों को साझा कर रहा है तब उसे लग रहा है कि देश की राजनीतिक दिशा भटक सी गई है.. तब उसे लग रहा है कि हाशिए पर खड़े तबके को वक्त पर मदद आज भी नहीं मिल रही.. और जब देश का प्रधानमंत्री खुद संध का स्वयं सेवक है तब संघ परिवार की ये शिकायत है कि सरकार चल कैसे रही है ये पता ही नहीं चलता...चला कौन रहा है ये भी पता नहीं चलता.. मोहन भागवत ने दर्द बयां किया या फिर कोई संकेत दिए  ये तो वो जानें लेकिन, उनके इस बयान के मायने दूर का सफर तय करेंगे।
 तो केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर, मोहन भागवत तक संघ की शिकायतें वहीं टिकीं हैं जहां वो 1925 में टिकी थीं.. क्योंकि सत्ता के बाजपेयी युग में भी संघ के मुताबिक राजनीतिक सत्ता चली नहीं.. और 6 साल तक संघ के स्वयं सेवक वाली सरकार संघ और संगठन में तालमेल बनाए रखने की जुगत में ही लगी दिखी.. 2014 में बनी संघ स्वयं सेवक वाली सरकार इसी मोहन भागवत के सामने बाजाप्ता सरकार का प्रजेंटेशन करती दिखी थी..लेकिन आम चुनाव से तकरीबन एक साल पहले संघ प्रमुख की शियाकतें वैसे ही मुंह बाए खड़ी हैं जैसे आम आदमी की समस्याएं.. तो फिर सत्ता चाहे विचार शून्य के पास हो या संघ के स्वयं सेवक के पास, फर्क पड़ता क्या है.. और ये बात अगर संघ समझ गया है तो फिर बीजेपी के साथ ही वो हर परिस्थिति में खड़ा हो तो क्यों हो..
         तो फिर संघ करे क्या.. मुश्किल ये है कि संघ के साथ बीजेपी-शिवसेना को छोड़ कोई दूसरा दल खड़ा होना नहीं चाहता.. और संघ जिस किस्म के देश के सपने देखता है.. वो सपना खुद स्वयं सेवकों की सरकार साकार कर नहीं पाई.. तो संघ का रास्ता होगा क्या...क्योंकि संघ के सपने महज सामाजिक सोच के बदलाव से पूरे होंगे नहीं.. और सत्ता की राजनीति कुर्सी के समीकरण को ज्यादा समझती है संघ के सपने को नहीं..

Thursday, October 11, 2018

अनुभवहीन राजनीति की देन है यूपी में सिपाही विद्रोह

उत्तर प्रदेश के थानों में अराजक माहौल है। सिपाही अपने दारोगा और इंस्पेक्टर को सैल्यूट नहीं कर रहे। थानेदार, इंस्पेक्टर, और डीएसपी के सामने वर्दी पर काली पट्टी लगाकर खड़े हो रहे हैं। शासन का साफ निर्देश है कि ऐसे कृत्य को अनुशासनहीनता माना जाएगा। बावजूद इसके सूबे के तकरीबन तमाम थानों में काली पट्टी वाले कांस्टेबल रोजाना दिख रहे हैं। ये कांस्टेबल अपनी तस्वीरें सोशल साइट्स पर डाल रहे हैं। 

दरअसल लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या के बाद आरोपी सिपाही की गिरफ्तारी से सूबे के सिपाही नाराज हैं। सिपाहियों का ये रवैया बताता है कि पुलिस में ये धारणा स्थापित हो चुकी है कि वो आम आदमी के साथ चाहे जैसा सलूक करे समाज और सत्ता को वो सलूक मंजूर होना चाहिए। पुलिस ये मान कर चलती है कि अपराधियों को बचाना, घटनाओं के बाद रिश्वत लेना और आम आदमी के साथ बर्बरता करना उसका अधिकार है और सत्ता को उसके इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनते ही इस पुलिसिया धारणा को शक्ति मिलने लगी। खुद मुख्यमंत्री सार्वजनिक कार्यक्रमों में कहने लगे कि पुलिस अपनी ताकत का इस्तेमाल करे, यमराज तक पहुंचाए, ठोके वगैरह-वगैरह। ताकत का इस्तेमाल तो स्वागत योग्य है लेकिन सरकार का मुखिया ही पुलिस को सरकारी शूटर बनाने लगे तो फिर हथियारबंद दस्ते के अनुशासन को बरकार रखना संभव नहीं होता। 

लोकतांत्रिक ढांचे में ठोको,यमराज के पास पहुंचाओ जैसी भाषा सरकार या फिर व्यवस्था की नहीं हो सकती। ये भाषा पूरी तरह से वैधानिक और नैसर्गिक न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। और यही चूक यूपी की योगी सरकार से हुई है जिसके नतीजे सामने हैं। पुलिस को न्यायिक प्रक्रिया के प्रति जिम्मेदार बनाए रखना सत्ता की जवाबदेही है। पुलिस को कानून का रखवाला बनाए रखना भी सत्ता की जिम्मेदारी है। पुलिस, व्यवस्था को बनाए रखने वाली संस्था है। सरकार पुलिस को सत्ता का शूटर न बनाए। पुलिस वालों से गलतियां होती हैं तो उसे संरक्षण ना दे। लोकराज में लोकलाज को पूरी तवज्जो दी जानी चाहिए। पुलिस का अनुशासन टूटना राजनीति की अनुभवहीनता का प्रमाणिक दस्तावेज है। अभी भी वक्त है यूपी की सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़े।

Tuesday, October 9, 2018

भारत ! तेरे अपने ही तेरे टुकड़े करेंगे

पूरब के उगते सूरज को निहारना और पूरब के मेहनतकशों की बदौलत चमकते महानगरों को निहारना एक सा लगता है. महाराष्ट्र से गुजरात तक गम खाते, गाली खाते लुटते-पिटते पूरबिओं का दर्द अपना दर्द लगता है. कई सालों से भारत के टुकड़े किए जा रहे हैं। भारत तेरे टुकड़े होंगे अगर तू भारत बनना ही नहीं चाहता है तो। भारत और भारतीयता से इतर गुजराती, मराठी की सोच पलेगी तो भारत के टुकड़े होंगे। भारतीयता की सोच में अगर यूपी-बिहार शामिल नहीं होंगे तो फिर कोई भारत भी नहीं होगा। आसाम से लेकर, कश्मीर तक और मुंबई से लेकर गुजरात तक यूपी-बिहार के मेहनतकशों के खिलाफ जो माहौल गढ़ा गया है वो मुकम्मल भारत के किसी भी सपने के खिलाफ है। यूपी-बिहार की निकम्मी हुकूमतों का दंश झेलती ये पूरबिया आबादी यूपी-बिहार के विकास की सबसे बड़ी कहानी है। परदेस गए पूत की कमाई से यूपी-बिहार के गांवों में रौनक आती है। और बिहार-यूपी से परदेस गए इन पूरबियों की जब हड्डियां गलती हैं तो गुजरात के हीरे चमकते हैं और मुंबई की माया बढ़ती है। दर्द का सागर है, हुकूमतों की नाकामी की कहानी है, नफरतों की आग लगाने वालों के इरादों का खुलासा है.. लेकिन सियासत ने कभी भी नाकामी मानी नहीं.. और शाही टुकड़ों के जायके ने इन नाकामियों पर सवाल उठने नहीं दिए
कभी किसी ने ये पूछा तक नहीं कि मुंबई में मनसे के जिन गुंडों ने 2009 में 4 बिहारियों की पीट-पीट कर हत्या की उन गुंडों को क्या सजा मिली... असम में 300 से ज्यादा हिंदी भाषियों की हत्या के अलग-अलग मामलों में कितनों को सजा हुई ? वोटों की बुनियाद पर टिके लोकतंत्र की एक बुनियादी खराबी है वोटबैंक की रक्षा.. और फिर यहीं से राष्ट्र, कानून और संविधान की रक्षा की बातें बेमानी हो जाती हैं.. और फिर यहीं से भाषा और क्षेत्र के नाम पर खड़े गुंडा गिरोहों को ताकत मिलती है..वरना जानते तो सब हैं कि भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है जो सड़क पर कुछ और है, संसद में कुछ और है.. और जिस मराठी भाषा के नाम पर मुंबई में उत्तर भारतीयों की हत्याएं हुईं और जिस गुजराती के नाम पर हिंदी भाषी आज गुजरात में मारे जा रहे हैं.. उसका एक सच ये भी है ये उत्तर भारतीय ही हैं जो अपनी भोजपुरी, मगही, मैथिली, अवधी को छोड़ कर हिंदी के लिए देश भर में भाषावादियों का शिकार होते हैं.. हिंदी की खातिर मॉब लिंचिंग का शिकार होते हैं.. और इसी के साथ सवाल ये भी है कि क्या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिसे एक पहिया ढोता..क्योंकि यूपी-बिहार वालों को देश के दूसरे राज्यों में रहने की आजादी भीड़ देती नहीं है.. और उस भीड़ को वोटबैंक की राजनीति का समर्थन मिलता रहता है
यूपी-बिहार के पावों से तले आशा-निराशा की अनगिन कहानियां दबी पड़ी हैं.. रोजगार की तलाश में जब यहां के लोग देवरिया-गोरखपुर की जिंदगी वासीनाका और सूरत में जीने जाते हैं तो रेलवे स्टेशनों पर ही इनसे लूट शुरू हो जाती है..टिकट काउंटर से शुरू होती ये लूट कूलियों से होते हुए टीटी, रेल पुलिस समेत कई गिरोहों का सफर तय करती है.. ट्रेनों में जानवरों से भी ज्यादा बुरे हालातों में सफर करने वाली इस भीड़ ने कभी भी इन हालातों के लिए अपने राज्य की सरकारों पर सवाल खड़े नहीं किए.. लेकिन नियति देखिए.. अपने ही मुल्क में दोयम दर्जे की हैसियत भी इन्हें नसीब नहीं.. क्योंकि लोकतंत्र को वोट से चलना है.. नागरिक सम्मान से नहीं

महागठबंधन नहीं कांग्रेस को कायाकल्प की ज़रूरत है


2014 वाले एनडीए और 2018 में एनडीए में फर्क आ गया है.. 2014 में सहयोगी दलों के साथ मिलकर एनडीए ने कुल 336 सीटों के साथ सरकार बनाई. यानी कि 543 सीटों वाली लोकसभा में एनडीए के पास कुल संख्या 336 थी. लेकिन लोकसभा में मजबूत एनडीए अब कमजोर हो रही है..टीडीपी ने लोकसभा में एनडीए का साथ छोड़ा तो टीडीपी के 16 सांसदों की ताकत भी एनडीए ने खो दिया..
2014 से 2018 के बीच अकेले बीजेपी कई उपचुनाव हार गई.. और अकेले बीजेपी 282 सांसदों वाली पार्टी से 272 सांसदों वाली पार्टी हो गई..राजस्थान, अजमेर अरवल और गुरदासपुर के उपचुनावों में बीजेपी की हार के बाद जब यूपी के गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में उपचुनाव हुए तो हार के हारकारे से बीजेपी में हाहाकार मच गया..2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 20 लोकसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हो चुके हैं जिनमें बीजेपी को मात्र तीन सीटों पर जीत मिली है.. 20 में 17 पर हार बीजेपी के लिए विपक्ष की बड़ी ललकार है...उपचुनावों के इन नतीजों ने बीजेपी के खिलाफ खड़े सियासी दलों को कई मंत्र दिए...यूपी में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में बीजेपी की हार के बाद जो समीकरण सामने आए वो सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की पुख्ता ज़रूरत बताने लगे.. और यहीं से बात आगे बढ़ी भी.. लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों से पहले ही ये समीकरण कण-कण मे बिखर गया.. पहले मायावती ने अलग राह ली.. बाद में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के पंजे को अंगूठा दिखा दिया

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सपा-बसपा एक-दूसरे का साथ देंगे.. और राजनीति के जानकार ये जानते हैं कि इस साथ से हाथ कमजोर होगा...कमल का रास्ता साफ होगा...मतलब ये कि चुनावी मैदान में उतरकर ये दोनों दल बेहद आसानी से दोनों राज्यों में बीजेपी को फायदा पहुंचा देंगे और कांग्रेस को नुकसान...तो फिर उन दलों से कांग्रेस क्या लोकसभा चुनाव में गठबंधन करना चाहेगी जो दल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस की ज़मीन कमजोर करने के लिए अखाड़े में ताल ठोक रहे हों.. और जो दल कांग्रेस का पंजा झटक कर चुनावी मैदान में दूसरे समीकरण गढ़ गए हों.. दरअसल मुश्किल ये है कि इन सवालों के जवाब कांग्रेसी खेमे से आ नहीं रहे हैं.. क्योंकि कांग्रेस की मुश्किल ये कि एनडीए जैसे बड़े गठबंधन का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को भी गठबंधन की ज़रूरत है..और मुश्किल ये भी यूपी में सांप्रदायिक और जातीय राजनीति के जरिए हुए वोट के बंटवारे में उसकी हिस्सेदारी बेहद कम है...आलम ये है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर का ही अपना कोई जनाधार नहीं है और ना ही मास में कोई ऐसी अपील जो सूबे में वोट को प्रभावित कर सके.. तो फिर पार्टी करे क्या.. जाहिर है खुद कांग्रेस अभी इन्ही सवालों के जवाब खोज रही है.. और कांग्रेस की खामोशी में उसके यही हालात छुपे हुए हैं

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...