Thursday, October 18, 2018

मुश्किल ये कि संघ के सामने दूसरा रास्ता नहीं है

नवरात्र के नौवें दिन जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपना स्थापना दिवस मना रहा है.. और जब 1925 से लेकर 2018 तक के अपने अनुभवों को साझा कर रहा है तब उसे लग रहा है कि देश की राजनीतिक दिशा भटक सी गई है.. तब उसे लग रहा है कि हाशिए पर खड़े तबके को वक्त पर मदद आज भी नहीं मिल रही.. और जब देश का प्रधानमंत्री खुद संध का स्वयं सेवक है तब संघ परिवार की ये शिकायत है कि सरकार चल कैसे रही है ये पता ही नहीं चलता...चला कौन रहा है ये भी पता नहीं चलता.. मोहन भागवत ने दर्द बयां किया या फिर कोई संकेत दिए  ये तो वो जानें लेकिन, उनके इस बयान के मायने दूर का सफर तय करेंगे।
 तो केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर, मोहन भागवत तक संघ की शिकायतें वहीं टिकीं हैं जहां वो 1925 में टिकी थीं.. क्योंकि सत्ता के बाजपेयी युग में भी संघ के मुताबिक राजनीतिक सत्ता चली नहीं.. और 6 साल तक संघ के स्वयं सेवक वाली सरकार संघ और संगठन में तालमेल बनाए रखने की जुगत में ही लगी दिखी.. 2014 में बनी संघ स्वयं सेवक वाली सरकार इसी मोहन भागवत के सामने बाजाप्ता सरकार का प्रजेंटेशन करती दिखी थी..लेकिन आम चुनाव से तकरीबन एक साल पहले संघ प्रमुख की शियाकतें वैसे ही मुंह बाए खड़ी हैं जैसे आम आदमी की समस्याएं.. तो फिर सत्ता चाहे विचार शून्य के पास हो या संघ के स्वयं सेवक के पास, फर्क पड़ता क्या है.. और ये बात अगर संघ समझ गया है तो फिर बीजेपी के साथ ही वो हर परिस्थिति में खड़ा हो तो क्यों हो..
         तो फिर संघ करे क्या.. मुश्किल ये है कि संघ के साथ बीजेपी-शिवसेना को छोड़ कोई दूसरा दल खड़ा होना नहीं चाहता.. और संघ जिस किस्म के देश के सपने देखता है.. वो सपना खुद स्वयं सेवकों की सरकार साकार कर नहीं पाई.. तो संघ का रास्ता होगा क्या...क्योंकि संघ के सपने महज सामाजिक सोच के बदलाव से पूरे होंगे नहीं.. और सत्ता की राजनीति कुर्सी के समीकरण को ज्यादा समझती है संघ के सपने को नहीं..

Thursday, October 11, 2018

अनुभवहीन राजनीति की देन है यूपी में सिपाही विद्रोह

उत्तर प्रदेश के थानों में अराजक माहौल है। सिपाही अपने दारोगा और इंस्पेक्टर को सैल्यूट नहीं कर रहे। थानेदार, इंस्पेक्टर, और डीएसपी के सामने वर्दी पर काली पट्टी लगाकर खड़े हो रहे हैं। शासन का साफ निर्देश है कि ऐसे कृत्य को अनुशासनहीनता माना जाएगा। बावजूद इसके सूबे के तकरीबन तमाम थानों में काली पट्टी वाले कांस्टेबल रोजाना दिख रहे हैं। ये कांस्टेबल अपनी तस्वीरें सोशल साइट्स पर डाल रहे हैं। 

दरअसल लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या के बाद आरोपी सिपाही की गिरफ्तारी से सूबे के सिपाही नाराज हैं। सिपाहियों का ये रवैया बताता है कि पुलिस में ये धारणा स्थापित हो चुकी है कि वो आम आदमी के साथ चाहे जैसा सलूक करे समाज और सत्ता को वो सलूक मंजूर होना चाहिए। पुलिस ये मान कर चलती है कि अपराधियों को बचाना, घटनाओं के बाद रिश्वत लेना और आम आदमी के साथ बर्बरता करना उसका अधिकार है और सत्ता को उसके इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनते ही इस पुलिसिया धारणा को शक्ति मिलने लगी। खुद मुख्यमंत्री सार्वजनिक कार्यक्रमों में कहने लगे कि पुलिस अपनी ताकत का इस्तेमाल करे, यमराज तक पहुंचाए, ठोके वगैरह-वगैरह। ताकत का इस्तेमाल तो स्वागत योग्य है लेकिन सरकार का मुखिया ही पुलिस को सरकारी शूटर बनाने लगे तो फिर हथियारबंद दस्ते के अनुशासन को बरकार रखना संभव नहीं होता। 

लोकतांत्रिक ढांचे में ठोको,यमराज के पास पहुंचाओ जैसी भाषा सरकार या फिर व्यवस्था की नहीं हो सकती। ये भाषा पूरी तरह से वैधानिक और नैसर्गिक न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। और यही चूक यूपी की योगी सरकार से हुई है जिसके नतीजे सामने हैं। पुलिस को न्यायिक प्रक्रिया के प्रति जिम्मेदार बनाए रखना सत्ता की जवाबदेही है। पुलिस को कानून का रखवाला बनाए रखना भी सत्ता की जिम्मेदारी है। पुलिस, व्यवस्था को बनाए रखने वाली संस्था है। सरकार पुलिस को सत्ता का शूटर न बनाए। पुलिस वालों से गलतियां होती हैं तो उसे संरक्षण ना दे। लोकराज में लोकलाज को पूरी तवज्जो दी जानी चाहिए। पुलिस का अनुशासन टूटना राजनीति की अनुभवहीनता का प्रमाणिक दस्तावेज है। अभी भी वक्त है यूपी की सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़े।

Tuesday, October 9, 2018

भारत ! तेरे अपने ही तेरे टुकड़े करेंगे

पूरब के उगते सूरज को निहारना और पूरब के मेहनतकशों की बदौलत चमकते महानगरों को निहारना एक सा लगता है. महाराष्ट्र से गुजरात तक गम खाते, गाली खाते लुटते-पिटते पूरबिओं का दर्द अपना दर्द लगता है. कई सालों से भारत के टुकड़े किए जा रहे हैं। भारत तेरे टुकड़े होंगे अगर तू भारत बनना ही नहीं चाहता है तो। भारत और भारतीयता से इतर गुजराती, मराठी की सोच पलेगी तो भारत के टुकड़े होंगे। भारतीयता की सोच में अगर यूपी-बिहार शामिल नहीं होंगे तो फिर कोई भारत भी नहीं होगा। आसाम से लेकर, कश्मीर तक और मुंबई से लेकर गुजरात तक यूपी-बिहार के मेहनतकशों के खिलाफ जो माहौल गढ़ा गया है वो मुकम्मल भारत के किसी भी सपने के खिलाफ है। यूपी-बिहार की निकम्मी हुकूमतों का दंश झेलती ये पूरबिया आबादी यूपी-बिहार के विकास की सबसे बड़ी कहानी है। परदेस गए पूत की कमाई से यूपी-बिहार के गांवों में रौनक आती है। और बिहार-यूपी से परदेस गए इन पूरबियों की जब हड्डियां गलती हैं तो गुजरात के हीरे चमकते हैं और मुंबई की माया बढ़ती है। दर्द का सागर है, हुकूमतों की नाकामी की कहानी है, नफरतों की आग लगाने वालों के इरादों का खुलासा है.. लेकिन सियासत ने कभी भी नाकामी मानी नहीं.. और शाही टुकड़ों के जायके ने इन नाकामियों पर सवाल उठने नहीं दिए
कभी किसी ने ये पूछा तक नहीं कि मुंबई में मनसे के जिन गुंडों ने 2009 में 4 बिहारियों की पीट-पीट कर हत्या की उन गुंडों को क्या सजा मिली... असम में 300 से ज्यादा हिंदी भाषियों की हत्या के अलग-अलग मामलों में कितनों को सजा हुई ? वोटों की बुनियाद पर टिके लोकतंत्र की एक बुनियादी खराबी है वोटबैंक की रक्षा.. और फिर यहीं से राष्ट्र, कानून और संविधान की रक्षा की बातें बेमानी हो जाती हैं.. और फिर यहीं से भाषा और क्षेत्र के नाम पर खड़े गुंडा गिरोहों को ताकत मिलती है..वरना जानते तो सब हैं कि भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है जो सड़क पर कुछ और है, संसद में कुछ और है.. और जिस मराठी भाषा के नाम पर मुंबई में उत्तर भारतीयों की हत्याएं हुईं और जिस गुजराती के नाम पर हिंदी भाषी आज गुजरात में मारे जा रहे हैं.. उसका एक सच ये भी है ये उत्तर भारतीय ही हैं जो अपनी भोजपुरी, मगही, मैथिली, अवधी को छोड़ कर हिंदी के लिए देश भर में भाषावादियों का शिकार होते हैं.. हिंदी की खातिर मॉब लिंचिंग का शिकार होते हैं.. और इसी के साथ सवाल ये भी है कि क्या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिसे एक पहिया ढोता..क्योंकि यूपी-बिहार वालों को देश के दूसरे राज्यों में रहने की आजादी भीड़ देती नहीं है.. और उस भीड़ को वोटबैंक की राजनीति का समर्थन मिलता रहता है
यूपी-बिहार के पावों से तले आशा-निराशा की अनगिन कहानियां दबी पड़ी हैं.. रोजगार की तलाश में जब यहां के लोग देवरिया-गोरखपुर की जिंदगी वासीनाका और सूरत में जीने जाते हैं तो रेलवे स्टेशनों पर ही इनसे लूट शुरू हो जाती है..टिकट काउंटर से शुरू होती ये लूट कूलियों से होते हुए टीटी, रेल पुलिस समेत कई गिरोहों का सफर तय करती है.. ट्रेनों में जानवरों से भी ज्यादा बुरे हालातों में सफर करने वाली इस भीड़ ने कभी भी इन हालातों के लिए अपने राज्य की सरकारों पर सवाल खड़े नहीं किए.. लेकिन नियति देखिए.. अपने ही मुल्क में दोयम दर्जे की हैसियत भी इन्हें नसीब नहीं.. क्योंकि लोकतंत्र को वोट से चलना है.. नागरिक सम्मान से नहीं

महागठबंधन नहीं कांग्रेस को कायाकल्प की ज़रूरत है


2014 वाले एनडीए और 2018 में एनडीए में फर्क आ गया है.. 2014 में सहयोगी दलों के साथ मिलकर एनडीए ने कुल 336 सीटों के साथ सरकार बनाई. यानी कि 543 सीटों वाली लोकसभा में एनडीए के पास कुल संख्या 336 थी. लेकिन लोकसभा में मजबूत एनडीए अब कमजोर हो रही है..टीडीपी ने लोकसभा में एनडीए का साथ छोड़ा तो टीडीपी के 16 सांसदों की ताकत भी एनडीए ने खो दिया..
2014 से 2018 के बीच अकेले बीजेपी कई उपचुनाव हार गई.. और अकेले बीजेपी 282 सांसदों वाली पार्टी से 272 सांसदों वाली पार्टी हो गई..राजस्थान, अजमेर अरवल और गुरदासपुर के उपचुनावों में बीजेपी की हार के बाद जब यूपी के गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में उपचुनाव हुए तो हार के हारकारे से बीजेपी में हाहाकार मच गया..2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 20 लोकसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हो चुके हैं जिनमें बीजेपी को मात्र तीन सीटों पर जीत मिली है.. 20 में 17 पर हार बीजेपी के लिए विपक्ष की बड़ी ललकार है...उपचुनावों के इन नतीजों ने बीजेपी के खिलाफ खड़े सियासी दलों को कई मंत्र दिए...यूपी में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में बीजेपी की हार के बाद जो समीकरण सामने आए वो सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की पुख्ता ज़रूरत बताने लगे.. और यहीं से बात आगे बढ़ी भी.. लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों से पहले ही ये समीकरण कण-कण मे बिखर गया.. पहले मायावती ने अलग राह ली.. बाद में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के पंजे को अंगूठा दिखा दिया

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सपा-बसपा एक-दूसरे का साथ देंगे.. और राजनीति के जानकार ये जानते हैं कि इस साथ से हाथ कमजोर होगा...कमल का रास्ता साफ होगा...मतलब ये कि चुनावी मैदान में उतरकर ये दोनों दल बेहद आसानी से दोनों राज्यों में बीजेपी को फायदा पहुंचा देंगे और कांग्रेस को नुकसान...तो फिर उन दलों से कांग्रेस क्या लोकसभा चुनाव में गठबंधन करना चाहेगी जो दल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस की ज़मीन कमजोर करने के लिए अखाड़े में ताल ठोक रहे हों.. और जो दल कांग्रेस का पंजा झटक कर चुनावी मैदान में दूसरे समीकरण गढ़ गए हों.. दरअसल मुश्किल ये है कि इन सवालों के जवाब कांग्रेसी खेमे से आ नहीं रहे हैं.. क्योंकि कांग्रेस की मुश्किल ये कि एनडीए जैसे बड़े गठबंधन का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को भी गठबंधन की ज़रूरत है..और मुश्किल ये भी यूपी में सांप्रदायिक और जातीय राजनीति के जरिए हुए वोट के बंटवारे में उसकी हिस्सेदारी बेहद कम है...आलम ये है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर का ही अपना कोई जनाधार नहीं है और ना ही मास में कोई ऐसी अपील जो सूबे में वोट को प्रभावित कर सके.. तो फिर पार्टी करे क्या.. जाहिर है खुद कांग्रेस अभी इन्ही सवालों के जवाब खोज रही है.. और कांग्रेस की खामोशी में उसके यही हालात छुपे हुए हैं

Friday, October 5, 2018

इनकी अयोध्या वापसी से सावधान रहिए


जिस राम मंदिर आंदोलन ने बीजेपी को लोकसभा में 2 सीटों वाली पर्टी से 282 सीटों वाली पार्टी तक पहुंचा दिया...वही राम मंदिर मुद्दा अब बीजेपी के लिए गले की फांस बनता जा रहा है.. अयोध्या से जुड़ा भूमि विवाद फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है और मामले की आखिरी सुनवाई शुरू होने वाली है..बावजूद इसके विश्व हिंदू परिषद की कोशिशों से इस मुद्दे पर एकजुट हुआ भारतीय संत समाज धैर्य खोता दिख रहा है.. और बीजेपी के लिए मुश्किलें ये कि यही संत समाज बीजेपी से भी भरोसा खोता दिख रहा है
      दरअसल एससी-एसटी एस्ट्रोसिटी एक्ट में संशोधन के जरिए प्रावधानों में बदलाव करने वाली बीजेपी सरकार पर ये सवाल उठाए जा रहे हैं कि जिस मंदिर मुद्दा को बीजेपी ने कोर चुनावी एंजेंडा बनाए रखा उसी मंदिर के लिए वो कानून क्यों नहीं बनाना चाहती..और बीजेपी की मुश्किलें ये कि वो इस मामले में अदालती प्रक्रिया के सम्मान का हवाला भी नहीं दे सकती..क्योंकि एस-एसटी एस्ट्रोसिटी एक्ट में वो अदालती आदेश को पलटने के लिए संशोधन के जरिए कानून बना चुकी है..तो मतलब साफ है कि मंदिर के मुद्दे पर बीजेपी नारे चाहे जितने गढ़ ले.. ठोस कदम उठाने से बचती रही है और संत समाज इस राजनीति को समझ चुका है

    तो फिर सवाल ये भी कि जब अदालती प्रक्रिया चल ही रही है और फैसले की तारीख बेहद नजदीक दिख रही है...विश्व हिंदू परिषद और संत समाज इतना बेसब्र क्यों हो रहे हैं...और इसी सवाल के साथ ये बात भी उलझ रही है कि कहीं ये कोई चुनावी दांव तो नहीं.. क्योंकि कई राज्यों में चुनाव होने हैं.. और फिर लोकसभा चुनाव भी.. तमाम ज़रूरी मुद्दों को हाशिए पर धकेलने की कवायदें पहले से ही चल रहीं है.. ऐसे में राम मंदिर मुद्दे को ठीक से हवा दी गई तो फिर हवा के झोंके से आग भी भड़ाकाई जा सकेगी.. और भड़की आग के गुस्से में हिंदूवादी राजनीति की रोटी आसानी से सेंकी जा सकेगी..

Tuesday, October 2, 2018

अमीरों पर मेहरबान, किसान हलकान


सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंक, जिनपर देश को भरोसा है अब खुद से भरोसा खोते जा रहे हैं.. पिछले चार सालों में बैंक घाटों की वजह, एनपीए ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.2014-15 में जो एनपीए 4.62 फीसदी था वही एनपीए 2017 में बढ़ कर 10.41 फीसदी हो गया.. मतलब बैंकों के 7 लाख 70 हजार करोड़ रुपये डूब गए.. और तुर्रा ये कि डूब रहे इन बैंकों को पूरी तरह से डुबाने के लिए बड़े कर्जदारों के 3 लाख 16 हजार करोड़ रुपये इन्ही बीते चार सालों में माफ कर दिए गए.. जिनके लोन माफ हुए वे लोग दुनिया भर में अपनी अमीरी के लिए जाने जाते हैं..तो फिर पिछले चार देश के कुल 10 लाख 86 हजार करोड़ रुपये किस मकसद से हवा-हवाई कर दिए गए ये न तो कोई बताना वाला है और ना ही कोई पूछने वालातो फिर उन किसानों की कौन पूछे जो एक और दो साल पहले चीनी मिलों को अपना गन्ना दे चुके हैं लेकिन अब तक उनके गन्ने का भुगतान नहीं हुआ है

        बकाया पैसा मांगते-मांगते थके किसान सड़कों पर उतर गए..हरिद्वार से दिल्ली के दरवाजे पर पहुंचे किसानों को यूपी गेट पर रोक दिया गया.. तर्क था कि किसानों के दिल्ली पहुंचने से राजधानी में अराजकता फैल जाएगी.. और जिस देश में जय जवान जय किसान के नारे उछाले जाते हैं उसी देश में किसानों के सामने जवान संगीन ताने खड़े हो गए.. पानी की मार, फिर लाठी की मार सहते किसानों पर आंसू गैस छोड़े गए.. जख्मी किसानों को अस्पताल ले जाने का इंतजाम भी काफी देरी से किया गया.. यूपी गेट पर लाठियां बरसती रहीं.. और लुटियन के एक बंगले में देश के गृह मंत्री किसानों के प्रतिनिधियों से बात करते रहे.. शाम होते-होते बताया गया कि किसानों की मांगें मान ली गईं हैं..लेकिन ये दावा भी जुमला निकला..क्योंकि जब कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र शेखावत किसानों के बीच पहुंचे तो उनके पास सरकार और किसानों के बीच हुई किसी तरह की सहमति का कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं था
       दरअसल किसान गन्ना के बकाए भुगतान की मांग कर रहे हैं..इसी के साथ कृषि कर्ज की माफी और 10 साल से ज्यादा पुराने ट्रैक्टर पर लगी रोक को हटाने की मांग भी कर रहे हैं.. लेकिन किसान न तो उन गरीबों में शामिल हैं जिनके नाम अमीरी के लिए पूरी दुनिया जानती है.. और ना ही किसान उन खास लोगों में शामिल हैं जिनके 3 लाख 16 हजार करोड़ रुपये का कर्ज चुपके से माफ कर दिया गया

Friday, September 28, 2018

बिहार: बर्बादी को ही विकास बताने की साजिशें


विकास का मतलब क्या क्या सड़कें बनना विकास है क्या फ्लाईओवर बनना विकास है आपका जवाब भी वही होगा जो मेरा जवाब है। हां, सड़कें, फ्लाईओवर बनना विकास है। कॉमन जवाब है ये। और इसी जवाब से मेरा ये संदेह और गहरा होता जाता है कि सत्ता-समाज ने हमारी पूरी सोच को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बिहार में जिस विकास की गाथा सुनाई जा रही है वो विकास सूबे के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर सरपट दौड़ता दिख रहा है। पटना और नालंदा में यही विकास फ्लाइओवर पर सीना ताने खड़ा मिल जाता है।

  लेकिन इस विकास की कीमत चुकाई किसने ? कौन इस चमकते-दमकते विकास की चकाचौंध में तबाह हुआ ? इन सवालों का सीधा जवाब है बिहार। बिहार की जनता इस चकाचौंध में बुरी तरह से बर्बाद हुई है।
   पटना को देखकर अब अच्छा लगता है। गड्ढामुक्त सड़कें, चौंड़ी सड़कें, सड़कों के किनारे फुटपाथ, फ्लाईओवर पर सरपट दौड़ती गाडियां। नालंदा की तस्वीर भी ऐसी ही है सो अच्छी लगती है। लेकिन पटना से निकलते ही हाजीपुर हो या आरा कुछ बदला नहीं दिखता। शहरों को जोड़ने वाली सड़कें ज़रूर बेहतर हुईं हैं लेकिन शहर जस के तस हैं। बेतिया से लेकर दरभंगा तक, सुपौल से लेकर औरंगाबाद तक शहरों में कुछ बदला नहीं दिखता। तो फिर कौन सी चकाचौंध और किसकी तबाही का जिक्र मैं कर रहा हूं ?
   मैं जिक्र कर रहा हूं आपकी बर्बाद होती नस्लों का। आपको बाजार के हवाले करती व्यवस्था का। मंचों से बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री या सूबे के शिक्षा मंत्री ने आपको कभी ये नहीं बताया होगा कि बिहार के स्कूलों की हालत क्या है। क्या आपको किसी ने ये बताया है कि बिहार के 68 फीसदी प्लस टू स्कूलों में गणित के शिक्षक नहीं हैं ? क्या विकास के इन स्वघोषित नायकों ने आपको कभी ये बताया कि सूबे के 70 फीसदी प्लस टू स्कूलों में फिजिक्स के टीचर नहीं हैं ? यही हाल केमेस्ट्री के शिक्षकों का भी है। तकरीबन 70 फीसदी प्लस टू स्कूलों में केमेस्ट्री के टीचर नहीं हैं। इंग्लिश के शिक्षकों के मामले में भी यही हाल है। और ये हाल सिर्फ प्लस टू स्कूलों का नहीं है। दसवीं तक चलने वाले स्कूलों का हाल भी यही है। ये हाल क्यों है और सड़कों-पुलों को नीली रौशनी में नहलाने की बेचैनी क्यों है ? इन सवालों के जवाब से पहले स्वास्थ्य महकमे का हाल भी जान लीजिए।
  बिहार के तमाम सरकारी अस्पताल नियोजित डॉक्टरों के भरोसे चल रहे हैं। एक तो अस्पताल ही बेहद कम हैं ऊपर से 60 फीसदी डॉक्टरों के पद रिक्त हैं। कई जिला अस्पतालों में तो हार्ट अटैक के मरीजों को देखने वाला कोई है ही नहीं। सरकारी अस्पतालों में आंख, कान और गला के डॉक्टर खोजे नहीं मिलते और दांत वाला विभाग कब बंद हो गया किसी को याद तक नहीं। नर्स और कंपाउंडर के भी ज्यादातर पद खाली हैं।
  अब आइए इस मजेदार खेल को समझते हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का माहौल होगा या अच्छी व्यवस्था होगी तो आप क्यों किसी प्राइवेट स्कूल को अपनी गाढ़ी कमाई देंगे ? जब तेल से लेकर साबुन तक और यहां तक कि दवाई में भी आप सरकार को टैक्स दे रहे हैं तो फिर अपने ही दिए पैसों से सरकारी स्कूलों में ही अपने बच्चे को क्यों नहीं पढ़ाना चाहेंगे आप ? आप भले ही ये सवाल खुद से नहीं पूछते हों लेकिन सरकारों को ये सवाल टोकते रहते हैं। और सरकार को ये मालूम होता है कि जिस जनता के टैक्स के पैसों से सरकार राजा होता है उसी जनता को अगर किसी दिन अपने पैसों का सच पता चल गया तो फिर वो सरकार से सवाल पूछने लगेगी। आपको ये जान कर बेहद हैरानी होगी कि गांवों और शहरों में बसने वाली बहुत बड़ी उस आबादी को, जो इनकम टैक्स के दायरे से बाहर है, ये पता ही नहीं कि वो भी सरकार को टैक्स देती है। सरकारों ने और सरकारी मशीनरी ने कभी भी उस आबादी को ये नहीं बताया कि वो जो साबुन,तेल, दवाई, नमक खरीदती है उसकी कीमत का बड़ा हिस्सा सरकार का थोपा गया टैक्स होता है। और सरकार का सारा तामझाम चलता है इसी टैक्स के पैसों से। लेकिन राजनीति इससे नहीं चलती। राजनीति के लिए और राजनीतिक दलों को चलाने लिए बहुत पैसों की जरूरत होती है। ये पैसा आता कहां से है ? नेता कहते हैं चंदे से। चंदा देता कौन है ? नेता कहते हैं कि वो ये नहीं बताएंगे।
  तो फिर चलिए बिहार में चलने वाले प्राइवेट स्कूलों की तरफ देखते हैं। विशाल कैंपस, महलों सी इमारतें, 20 से लेकर 150 तक बड़ी बसें और न जाने क्या-क्या। जाहिर है इन स्कूलों के मालिक बहुत पैसे वाले होते होंगे। और जाहिर है कि जब सरकारी स्कूलों में टीचर होंगे, बिजली-पंखे होंगे और अच्छी पढ़ाई होगी तो इन प्राइवेट स्कूलों में कोई क्यों आएगा। और जब इन प्राइवेट स्कूलों में बच्चे नहीं आएंगे तो इन स्कूलों के अमीर मालिक लोग किसी पार्टी या किसी नेता को चंदा क्यों देंगे?
  सरकारी अस्पतालों में अगर डॉक्टर रहने लगें, जांच और इलाज होने लगे तो फिर फ्राइवेट अस्पतालों का धंधा चलेगा कैसे ? और जब धंधा ही नहीं चलेगा तो पार्टी फंड में गुप्त चंदा कैसे पहुंचेगा ?  

  सड़कों और पुलों के निर्माण में जो कंपनियां लगी होती हैं वो अरबों-खरबों की कंपनियां होती हैं। अरबों-खरबों का टेंडर होता है। और इसी अनुपात में गुप्त चंदा भी। मतलब दोनों के फायदे। प्राइवेट कंपनियां जनता के पैसों से सड़कें बनाकर मालामाल। राजनीतिक दल प्राइवेट कंपनियों के चंदों से मालामाल और सरकार के विकास के दावे के लिए सड़क, पुल और फ्लाईओवर।
   नीतीश कुमार के शासनकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य महकमे का जैसा बुरा हाल हुआ वैसा बिहार के इतिहास में कभी नहीं हुआ। नीतीश कुमार के पास विकास गाथा के लिए सड़कें, पुल और फ्लाईओवर हैं। लेकिन ये गाथा किसी साजिश का हिस्सा लगती है। सड़कों के साथ-साथ शिक्षकों की भी जरूरत है। पुलों के साथ डॉक्टरों की भी ज़रूरत है। लेकिन डॉक्टर चुनावी चंदा नहीं दे सकता और शिक्षक के पास देने के लिए कोई गुप्त धन नहीं होता। कंस्ट्रक्शन कंपनी के पास देने के लिए बहुत कुछ होता है।  


ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...