Friday, July 20, 2018

ये झप्पी दूर तलक जाएगी


तो राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जादू की झप्पी दी...और फिर पीएम की पीठ थपथपाई... इसके तुरंत बाद मोदी ने उन्हें दोबारा अपने पास बुलाया..एक बार फिर राहुल को गले लगाया और इस बार पीएम ने राहुल की पीठ थपथपाई..तो ये कोई भरत मिलाप नहीं था...ये सियासी अदा थी.. और अदा ये कि राहुल ने अपने ऐक्शन से ये साबित करने की कोशिश की कि बीजेपी भले ही राहुल से नफरत करती हो..राहुल सबको गले लगाते हैं...मतलब ये कि बीजेपी भले ही राहुल को पप्पू मानती हो..राहुल विरोधियों का भी सम्मान करते हैं...मतलब ये कि कांग्रेस मोहब्बत की राजनीति करती है..और बीजेपी नफरत की राजनीति करती है
      तो राहुल का ये सियासी दांव कांग्रेस को ऑक्सीजन दे गया.. क्योंकि राहुल गांधी को ये खूब पता था कि अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष चाहे जो कर ले, सरकार को खतरे में नहीं ला पाएगा..पूरा विपक्ष इस अंकगणित को जान रहा था...विपक्ष तो बस वो मौका चाह रहा था जिस वक्त सत्ता और विपक्ष की ताकत देश के सामने ला सके.. इस अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष ने ये साबित कर दिया कि शिव सेना और बिजू जनता दल भले ही विपक्ष के साथ नहीं हों लेकिन सदन में ये सत्ता पक्ष के साथ भी नहीं हैं... बहस के दौरान वॉक आउट होते ही बीजेपी इस सियासत को भांप गई थी..वरना जिस राफेल डील के मसले पर सरकार सबकुछ ठीक होने के दावे कर रही है...उस राफेल मसले पर वो जवाब की बारी का इंतजार करती, तिलमिलाती नहीं..  
     तो जादू की झप्पी से लेकर पप्पू तक अविश्वास प्रस्ताव का सच ये है कि कांग्रेस ने इसमें भले ही लीड रोल नहीं किया हो लेकिन स्क्रिप्ट का सबसे महत्पूर्ण हिस्सा अपने लिए सुरक्षित रखा था...टीडीपी को आगे कर कांग्रेस ने सियासी आंख मारी और हार-जीत की जंग से खुद को बाहर रखा

Wednesday, July 18, 2018

मॉब लिंचिंग: राजपथ पर इठलाते हत्यारे


पास्टर निमोलर की एक कविता हमारे मौजूदा वक्त की ज़रूरत बन गई है। निमोलर ने लिखा था कि
पहले वो आए कम्यूनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्यूनिस्ट नहीं था
फिर वो आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
फिर वो आए यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वो मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता
लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट को आखिरकार कहना पड़ा कि देश को भीड़ की मर्जी के हवाले नहीं कर सकते..ये कहना पड़ा कि भीड़ अपने-आप में कोई कानून नहीं है...ये कहना पड़ा कि भीड़ के भेड़ियों के खिलाफ सख्त कानून बनाइए...देश के किसी न किसी हिस्से में हर दूसरे दिन बौखलाई भीड़ किसी को मार रही है, किसी की हत्या कर रही है, किसी को पेड़ पर लटका रही है, किसी को जिंदा फूंक रही है।  टीवी चैनल और अखबार इसे भीड़ का इंसाफ बता रहे हैं..भीड़ की ताकत मीडिया भी जानती है...भीड़ की ताकत पुलिस भी जानती है और भीड़ की ताकत राजनीति भी जानती है...भीड़ जब अपनी अदालत लगाती है ये तीनों कहीं सो रहे होते हैं...बाद में पुलिस अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करती है... फिर किसी से अपना हिसाब चुकाती है, किसी से हिसाब-किताब करती है.. नेता भीड़ वाली अदालत से निकले इंसाफ का इस्तकबाल करते हैं और मीडिया पुलिस और राजनीति की भीड़ में उस भीड़ वाले इंसाफ में ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव खोजता है। पुलिस की नाकामियों से भीड़ का गुस्सा बढ़ता है और फिर भीड़ की अदालत से पुलिस को मुकदमा मिल जाता है...कई मुल्जिम मिल जाते हैं...कई गवाह मिल जाते हैं.. पीड़ित मिल जाते हैं..दलाल मिल जाते हैं... भीड़ भी किसी धंधे का हिस्सा ही तो होती है..इस भीड़ के जरिए पूरे मुल्क में रोज-रोज नई भीड़ खड़ी की जा रही है...भीड़ और राजनीति दोनों एक दूसरे के पूरक होते जा रहे हैं.. दरअसल ये भीड़ जिंदा लाश होती है..ये आदमी और जानवर का फर्क नहीं समझती..ये कानून की परवाह नहीं करती.. उसे समाजिकता की समझ नहीं होती..कोई बताने वाला भी नहीं होता. हां उनके भीतर के जानवर को जगाने वाला कोई होता है...वो कोई नेता होता है..कभी-कभी वो कोई विचार भी होता है...ये विचार इंसान और इंसान के बीच फर्क बताता है...ये हिंदू और मुसलमान बताता है...जब पुलिस भीड़ देख कर भाग रही होती है तब उसी भीड़ के बीच से कोई नेता निकलता है.. ये नेता पहले थानों की मुट्ठी गरम करता है...फिर थाने इसकी मुट्ठी गरम करने लगते हैं...जब ये जेल से बाहर आता है तो जयंत सिन्हा जैसे नेता उसे माला पहनाने लगते हैं... फिर चुनावों में नेता उससे सौदा करने लगते हैं..और तरह भीड़ का इंसाफ राजपथ पर इठालाने लगता है...

मॉब लिंचिंग: भरभराते लोकतंत्र की तस्वीर


भीड़ के जरिए खड़े किए गए भय के माहौल के सामने सिस्टम कैसे भरभरा कर गिर रहा है उसकी गवाही झारखंड के पाकुड़ में मंगलवार को दिखी...तकरीबन 70 साल के बुजुर्ग स्वामी अग्निवेश भरभराकर नीचे गिरे और भीड़ उनपर टूट पड़ी...ये घटना जिस वक्त हुई उससे ठीक कुछ घंटों पहले देश की सबसे बड़ी अदालत ने मॉब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाने की जरूरत बताई थी..लेकिन भीड़ की अदालतों ने कब कानूनी अदालतों को मान्यता दी है जो तब देते...और दें भी क्यों... 2015 में नोएडा के दादरी में भीड़ की अदालत ने अखलाक को सजा-ए-मौत दी थी...अखलाक के हत्यारों में से 15 आरोपियों को तब एनटीपीसी की संविदा नौकरी ऑफर की गई थी..मतलब भीड़ में शामिल होकर हत्या करो और नौकरी पाओ... 1 अप्रैल 2017 को अरवल में पहलू खान को गौगुंडों ने पीट-पीट कर मारा डाला..यहां भी हत्यारों को महिमामंडित करने का अभियान चलाया गया.. इसी साल 22 जून को दिल्ली-बल्लबगढ़ में ट्रेन में मोहम्मद जुनैद को भीड़ ने मार डाला था... हत्यारों का तब स्वागत किया गया था.. जून 2017 में ही झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन की हत्या भीड़ ने कर दी थी...हत्या का आरोपी जब जेल से बाहर निकला तो केंद्र सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा ने माला पहना कर उसका स्वागत किया... तो फिर भीड़ की शक्ल में किसी की हत्या से कोई डरे क्यों...और फिर सुप्रीम कोर्ट के उस सुझाव का मतलब भी क्या समझें... उन्हीं लोगों से सख्त कानून बनाने की उम्मीद की जा रही है जो हत्यारों को गले लगाते हैं..या फिर नौकरी ऑफर करते हैं..
          हाल ही में कर्नाटक में सॉफ्टवेयर इंजीनियर आजम उस्मानसाब की हत्या भीड़ ने की है.. जून 2018 में झारखंड के गोड्डा में सिराजुद्दीन अंसारी और मुर्तजा अंसारी की भीड़ ने लाठी-डंडों से पीट कर हत्या कर दी..इससे पहले सूबे के खरसांवां में भीड़ ने तीन लोगों की हत्या की थी... महाराष्ट्र, हरियाणा, केरल, कर्नाटक देश का कोई भी राज्य इस हिंसक भीड़ को रोकने में सक्षम साबित नहीं हुआ...भीड़ की हिंसा का सबसे ज्यादा कहर उत्तर प्रदेश में बरपा...सर्वाधिक घटनाएं यूपी में ही हुईं..और अब उस लोकसभा को मॉब लिंचिंग के खिलाफ कड़े कानून बनाने हैं जिस लोकसभा बैठे नेताजी हत्यारे को फूल माला पहनाते हैं
        राहत इंदौरी का एक मतला है लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है..तो अब आग फैल रही है...कल तक गले में भगवा डाले जो भीड़ दाढ़ी और टोपी पर हमले किया करती थी अब वही भीड़ ऊपर से नीचे तक भगवा धारण किए स्वामी अग्निवेश को भी अपनी आग में झुलसा रही है.. हिंसक समाज के आसरे राजनीति की रोटी सेंकने वाले भी एक दिन इस आग की चपेट में आएंगे.. और हां हालात नहीं बदले तो फिर भीड़ की इन आदालतों से किसी दिन देश की सर्वोच्च अदालत का भी इंसाफ हो जाएगा

Wednesday, July 11, 2018

अयोध्या आस्था है तो राजनीति का आसरा भी


अयोध्या।धर्मनगरी अयोध्या। भारत की राजनीति का टर्निंग टर्मिनल अयोध्या। भारतीय समाज को जोड़ता-बांटता अयोध्या। राम की नगरी अयोध्या। बाबरी विवाद की ज़मीन अयोध्या। आस्था का सैलाब अयोध्या। सियासत की सरयू अयोध्या। पौराणिक कथाओं का अयोध्या। मौजूदा तनावों का अयोध्या। अयोध्या महज किसी जगह का नाम नहीं है। भक्तों के लिए अयोध्या आस्था है। राजनीति के लिए अयोध्या आसरा है। और इसी अयोध्या में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का जुटान हो रहा है। राम की नगरी में कुरान की आयतें पढ़ी जाएंगी। सरयू के घाट पर अजां होगी। दावा है कि सदभावना की खातिर संघ परिवार से जुड़ा राष्ट्रीय मुस्लिम मंच कुरान की तिलावत करेगा। तो कुरान की तिलावत उसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा मुस्लिम मंच करेगा जिस संघ से जुड़े विश्व हिंदू परिषद ने 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन खड़ा किया। अक्टूबर 1984 में वीएचपी ने अयोध्या में रामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। 1989 में वीएचपी ने विवादित जगह के नजदीक ही राम मंदिर की नींव रख दी। जून 1989 में बीजेपी ने पालमपुर में बाजाप्ता प्रस्ताव पारित कर खुद को राम मंदिर आंदोलन का अगुआ घोषित कर लिया। अब वीएचपी पीछे थी बीजेपी आगे। 1984 में जो बीजेपी लोकसभा में महज 2 सांसदों वाली पार्टी थी 1991 में वही पार्टी 120 सीट जीतकर देश में कांग्रेस का विकल्प बन गई।1992 में विवादित ढांचा गिरा दिया गया।
   तो इतिहास के पन्नों को पलटते हुए वर्तमान पर निगाह डालिए। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच गुरुवार को अयोध्या में तिलावत की शुरुआत कर रहा है और इससे ठीक दो दिन पहले दुनिया के कई देशों से आए अप्रवासी भारतीयो की एक टोली विश्व हिंदू परिषद की बैठक में शामिल होकर अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग कर चुकी है।
    तो अब अल्लमाए इक़बाल को याद कीजिए। है राम के वजूद पर हिंदोस्तां को नाज़...अहल-ए-वतन समझते हैं इसको इमाम-ए-हिंद। तो नाज है राम के वजूद पर फिर विवाद क्यों है राम की जन्मभूमि पर.। तो क्या स्वागत करें राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की इन कोशिशों का ? ठहरिए! पहले ये तो देखिए की मंच की ये कोशिशें ईमानदार हैं या फिर सियासी चालें हैं। अगर ये राजनीति की बिसात है तो सावधान हो जाइए। सावधान! क्योंकि, वो फिर अयोध्या लौट आए हैं। और अगर ये सदभावना की ईमानदार कोशिश है तो फिर गले लगाइए। कदम से कदम मिलाइए। आप भी अदावत को तौबा कीजिए। आप भी तिलावत कीजिए। बाबर की बात छोड़िए।1992 को भी अब भूल जाइए। अदम गोण्डवी को याद कीजिए हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.. ग़र ग़लतियाँ बाबर की थींजुम्मन का घर फिर क्यों जले ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए’ 

Monday, June 25, 2018

आपातकाल के लिए 'संपूर्ण भ्रांति' वाले जेपी जिम्मेदार नहीं थे क्या ?

25 जून को जब पूरे देश में आपाताकाल की बरसी मनाई जा रही थी और आपातकाल को याद करते हुए तरह-तरह के लेख पोस्ट हो रहे थे तो मैं गौर से बहुत कुछ देख-पढ़ रहा था। ज्यादातर लेख मुझे परंपरावादी लगे। कार्यक्रमों में व्यक्त किए जा रहे उद्गार भी परंपरावादी ही लगे। मेरे पिताजी ने जयप्रकाश नारायण और डॉ लोहिया के साथ थोड़े-बहुत दिनों तक कुछ काम किए थे और जेपी के आह्वान पर संपूर्ण क्रांति में हिस्सा भी लिया था। बचपन से जेपी की महानता के क़िस्से सुनता आया हूं। जब नौंवी क्लास में था तो पहली बार जेपी की किताब मेरी विचार यात्रा पढ़ी थी। बाद में वो किताब फिर पढ़ी। जेपी के क़िस्से सुनते-पढ़ते कई वैसे लोगों से मुलाकातें हुईं जो लोग संपूर्ण क्रांति के क्रांतिकारी रहे और जेलें भोगीं। लेकिन तमाम लोगों के विचारों-लेखों के बावजूद मेरा एक सवाल अनुत्तरित रह गया। वो सवाल है कि संपूर्ण क्रांति से देश को मिला क्या ? 
जेपी ने अपनी क्रांति को सात रंगों से रंगा था। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति। राजनैतिक क्रांति ऐसी हुई कि एक चुनी हुई बहुमत वाली सरकार के खिलाफ देश में अराजकता पैदा की गई। 1977 के चुनाव में कांग्रेस चुनाव हारी, खुद इंदिरा गांधी चुनाव हारीं। क्रांति से पैदा हुए जेपी के चेलों की क्रांतिकारी सरकार बनी। ये ऐसी क्रांतिकारी सरकार थी जिसमें स्वार्थों का जबरदस्त टकराव हुआ और ढाई साल में ही ये क्रांतिकारी सरकार भरभरा कर गिर गई। आलम ये हुआ कि इस आंदोलन से निकले किसी नेता की दूसरे नेता से नहीं बनी और सबने अपने-अपने इलाके में अपनी-अपनी पार्टी बनाई और बाद में उसी कांग्रेसवाद के साथ खड़े हुए जिस कांग्रेसवाद के खिलाफ संपूर्ण क्रांति की थी। 
इस क्रांति ने सिवाय सत्ता परिवर्तन के कुछ नहीं किया। मतलब जो काम आम आदमी बिना किसी शोर-शराबे के महज वोट के जरिए कर देता है वही काम ढाई सालों के घोर अराजक माहौल के जरिए किया गया। खुद जॉर्ज फर्नांडिस ने स्वीकार किया कि उन्हें खुद नहीं मालूम के आंदोलन के दौरान उन्होंने कितनी रेलगाड़ियां बेपटरी करवाईं। 
ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता जिसके आधार पर आप ये कह सकें कि जेपी आंदोलन के जरिए राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति हुई हो। हुआ ये कि बाद में जेपी आंदोलन से ही निकले कई लोगों ने इसे संपूर्ण क्रांति की जगह संपूर्ण भ्रांति कहना शुरू कर दिया। 
भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन से लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता निकले। एक घोटाले के दोषी हैं और फिलहाल सज़ायाफ्ता हैं। दूसरे पर आय से अधिक संपत्ति का मामला लंबित है। जेपी के चेलों ने जातिवादी राजनीति का जो जंगल खड़ा किया उससे निकलने का रास्ता अब किसी को नहीं दिख रहा है। जेपी के आंदोलन से निकले अंटल बिहारी बाजपेयी ने अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से पहले कहा था कि ज़मीन को समतल करना होगा। इसी संपूर्ण क्रांति के एक और क्रांतिक्रारी लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर रथ यात्रा निकाली। देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंकने वाले भी जेपी आंदोलन से ही निकले। 
खैर ये विषय बहुत बड़ा है और इसपर बहुत कुछ कहने-लिखने को है। फिलहाल आपातकाल की चर्चा तक ही इसे सीमित रखें तो, पहली नज़र में आपातकाल के लिए भी जयप्रकाश नारायण जिम्मेदार नज़र आते हैं। जेपी की मंशा भले ही बेहद साफ रही हो लेकिन, बेहद ईमानदार और भोले जेपी से ऐसी भूल हो गई जिसने लोकतंत्र के इतिहास को कलंकित कर दिया। 
25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने लाखों की भीड़ से आह्वान कर दिया कि वो प्रधानमंत्री आवास को घेर ले। जेपी यहीं नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने बड़ी चूक कर दी। जेपी ने भारतीय सेना से बग़ावत की अपील कर दी। ये आत्मघाती क़दम था। जेपी ने सेना से कहा कि वो सरकारी आदेशों को न माने। जेपी ने सेना से सरकार गिराने में मदद का आह्वान कर दिया। प्रधानमंत्री को खुफिया इनपुट मिला और देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। 
कल्पना कीजिए अगर सेना ने बगावत कर दी होती, प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति गिरफ्तार कर लिए जाते, सुप्रीम कोर्ट पर ताले लटका दिए जाते और लाखों आम लोगों के समर्थन से कोई सैन्य अधिकारी, सैन्य तानाशाही की स्थापना कर देता तो इस देश का क्या हुआ होता। सेना सिर्फ सरकार का आदेश मानना छोड़ दे तो फिर उस देश की रक्षा संभव नहीं है। 1971 में पाकिस्तान की सेना का समर्पण करवा कर पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटने वाली इंदिरा के सामने बदले की भावना से बौखलाया पाकिस्तान तन कर खड़ा था। और हार के ठीक चार साल बाद जब पाकिस्तान ये देखता कि भारतीय सेना ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बग़ावत कर दी है तो क्या वो ऐसा मौका जाने देता ? 
हैरानी है कि जेपी और आपातकाल पर लिखने वाले इस महत्वपूर्ण मसले को छूते तक नहीं हैं। इस घटना का जिक्र तक नहीं करते। जबकि ये ऐसी घटना थी जिसके बाद आपातकाल के अलावा तब की सरकार के पास शायद ही कोई दूसरा रास्ता बचा हो। या तो देश को सैन्य तानाशाही के हवाले करना, या फिर चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के रहते चुनाव में जाना। इंदिरा गांधी के पास यही दो रास्ते बचे थे। इंदिरा ने आपातकाल थोपा नहीं था। इंदिरा गांधी को आपातकाल के लिए मजबूर किया गया था। हमें जेपी की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए लेकिन जेपी की ये भूल हमें स्वीकारनी होगी।

Thursday, June 7, 2018

मुसलमान मुक्त भारत चाहने वालों के लिए

मुसलमान मुक्त भारत की बात करने वालों, आप इस मुल्क के लिए ख़तरनाक हैं. आप आशफाकुल्ला खान की शहादत का अपमान कर रहे हैं. अशफाकउल्लाह ही क्यों आप तो भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की कुर्बानी को भी अपमानित कर रहे हैं. अब्दुल हमीद, मेजर सलमान की शहादत को आप धूल में मिला रहे हैं. खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना मजहरूल हक़, सैयद अहमद खान के संघर्षों को तिलांजली दे रहे हैं आपलोग. ख़तरनाक हैं आपलोग इस मुल्क के लिए. आपलोग मोहम्मद अली जिन्ना का समर्थक हैं. आप ही जैसे लोगों ने ऐसे हालात बनाए कि देश को बंटना पड़ा. आपलोग विभाजनकारी हैं. किसे हिंदुस्तान से हटाना चाहते हैं आपलोग? एपीजे अब्दुल कलाम की मिट्टी को यहां से हटा कर देशभक्त हो जाएंगे क्या आपलोग? आपलोग दे पाएंगे अशफाक उल्लाह खान जैसी शहादत? अब्दुल हमीद जैसी कुर्बानी देने की हिम्मत है क्या आपमें? बस भड़काऊ बायन दे सकते हैं आपलोग. बयान भी देश की कौमी एकता के खिलाफ. किससे भारत को मुक्त करना चाहते हैं आपलोग? जब हमारा एआर रहमान मां तुझे सलाम पर तान लेता है तो कलेजा दहलने लगता है आपलोगों का. जब हमारा ए आर रहमान वंदे मातरम को ऊंचाइयां देता है तो मिट्टी खिसकने लगती है आप लोगों की. जब हमारा ए आर रहमान कहता है कि भारत हमको जान से प्यारा है तो पाकिस्तानियों की तरह आप जैसों को वो बहुत ही बुरा लगता है. सुनिए, जब हमारे जावेद अख्तर साहब ओ पालन हारे निर्गुण और न्यारे गाते हैं तो पूरे हिंदुस्तान पर सूफी संतों के आशीर्वादों की बारिश होती है. कितने नाम गिनाएं आपको.
तो क्या आपको ए आर रहमान मुक्त भारत चाहिए? आपको चाहिए जावेद अख्तर मुक्त भारत? आपको चाहिए अशफाक उल्ला खान मुक्त भारत? आपको चाहिए अब्दुल हमीद मुक्त भारत? आपको चाहिए मौलाना मजहरुल हक मुक्त भारत?  आपको चाहिए एपीजे अब्दुल कलाम मुक्त भारत? कभी सोचा है आपने कैसा होगा वो भारत जिसमें सिर्फ आप जैसे लोग होंगे? अगर किसी दिन ऐसा कोई मुल्क बन भी गया तो यकीन मानिए वो किसी मुल्क का ईमान नहीं होगा. यकीन मानिए वो हिंदुस्तान नहीं होगा. आपलोग खतरा हैं इस देश के लिए. आपलोगों को तो कैच लपकता हमारा अजहरुद्दीन भी मंजूर नहीं था. आपलोग न तो हिंदुस्तानी कैफ को अपना मानते हैं, न ज़हीर खान को. सच बताऊं, आप जैसों को ये हिंदुस्तान अपना नहीं मानता . ये हिंदुस्तान है. कलाम के लिए जार-जार रोने वाला हिंदुस्तान. रहमान के गानों पर झूमने वाला हिंदुस्तान. अशफाक की शहादत को चूमने वाला हिंदुस्तान.

Thursday, May 31, 2018

मीडिया: गोदी से उतरें तो जाएं कहां ?


2012 के नवंबर महीने में ज़ी न्यूज़ के एंकर सुधीर चौधरी चैनल के दफ्तर से गिरफ्तार कर लिए गए थे। नवीन जिंदल को ब्लैकमेल करने के आरोप में चौधरी साहब तिहाड़ जेल भेजे गए। इससे पहले जब वो लाइव इंडिया में संपादक हुआ करते थे तो टीआरपी के दबाव में ग़लत ख़बर चलवा कर उन्होंने एक महिला टीचर को भीड़ से पिटवाया और उनके लगभग सारे कपड़े फड़वा डाले थे। महिला टीचर वाले मामले में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर वो खुद को बचा गए लेकिन, जिंदल ब्लैकमेलिंग केस में उन्हें जेल जाना पड़ा था। बाद के दिनों में वो पत्रकार के बजाए सत्ताधारी दल का प्रवक्ता नज़र आने लगे। इसी बीच एनडीटीवी वाले रवीश कुमार ने एक शब्द उछाला गोदी मीडिया। पत्रकारिता के पेशे में दूर कहीं एक छोटी सी जगह पर बेहैसियत सा मैं या मेरे जैसे कई लोग गोदी मीडिया, बिकाऊ मिडिया, सत्ता की चाकरी करती मीडिया, सत्ता से डरी-सहमी मीडिया को जीते-भोगते रहे हैं।
          कोबरा पोस्ट के हालिया स्टिंग ऑपरेशन ने एक बात साफ कर दी कि आप चाहे जो भी अखबार पढ़ते हैं, चाहे जिस किसी न्यूज चैनल को देखते हैं इनमें से ज्यादातर बिकाऊ हैं। टाइम्स ग्रुप से लेकर छोटे-मोटे चैनल तक एजेंडा जर्नलिज्म का सौदा बेनकाब हो चुका है। कोबरा पोस्ट ने न सिर्फ एजेंडा जर्नलिज्म का खुलासा किया है बल्कि इसी के साथ बिकाऊ मीडिया का सच सामने लाकर पत्रकारों को बड़ी राहत दी है। आम तौर पर ये धारणा बनती जा रही थी कि पत्रकार बिकाऊ हो गए हैं। कोबरा पोस्ट ने साफ कर दिया कि पत्रकार तो सिर्फ और सिर्फ नौकरी बजा रहा है। बिके तो मालिकान हैं, बिका तो प्रबंधन है।
    तो फिर मुझे सुधीर चौधरी कम कसूरवार नज़र आते हैं। एक पत्रकार कैसे-कैसे ब्लेकमेलर बन जाता है, एक पत्रकार कितने दबाव में नौकरी कर रहा होता है और पत्रकार एक अदद नौकरी के लिए कितने समझौते करता है ये मीडिया में बैठे हर आदमी को पता है।
   कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन को देखकर अगर टाइम्स नाऊ, टाइम्स ऑफ इंडिया और बीसीयों रीज़नल चैनल के पत्रकारों की अंतरात्मा जाग गई और वो बिके हुए मीडिया हाउस को लात मारकर रोड पर आ गए तो क्या खुद को ईमानदार कहने वाले मीडिया हाउस उनको नौकरी देंगे ?
   जिस देश में चपरासी की नौकरी के लिए इंजीनियर, वकील, पीएचडी और एमबीए डिग्रीधारी लाखों की भीड़ लाइन लगाती हो वहां पत्रकार अपनी नौकरी बचाने की जद्दोजहद ना करे तो क्या हरिश्चंद्र बना फिरे ?
    जिस समाज के लिए एक पत्रकार खतरनाक माफिया और सरकारी महकमे के गठजोड़ से लड़ता है वो समाज कभी किसी पत्रकार के लिए खड़ा हुआ है क्या ?
      मैंने अपराधियों के मारे जाने पर तोड़फोड़ और आगजनी देखी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों पत्रकार नक्सली बताकर जेल भेजे गए, सैकड़ों पत्रकार अपराधी-पुलिस गठजोड़ वाली बंदूकों से मार दिए गए। कभी किसी पत्रकार के लिए समाज को सड़क पर उतरते देखा है क्या ?
    आपके दिमाग़ में इतना ज़हर भरा जा चुका है कि आप एक दंगाई की मामूली बातों में बहक कर अपना ही शहर आग के हवाले करने लगे हैं लेकिन, एक अच्छी अपील आपको अपील नहीं करती।
    तो फिर हर बात के लिए मीडिया को मत कोसिए। कोबरा पोस्ट के स्टिंग ने बड़ी राहत दी है। स्टिंग ने साफ कर दिया है कि मीडिया मालिकों को बस पैसे चाहिए। इसके लिए वो दंगे करवाने को तैयार हैं। सैकड़ों लोगों की हत्या करवा कर, हज़ारों घरों को राख मिलवा कर उन्हें खुशी होगी अगर इसके लिए उन्हें कोई पैसे देता है। वो आपके बच्चों को दंगाई बनाकर उस जंगल में धकेलने को तैयार हैं जहां कहां से छूटी किसकी गोली किसके सीने में धंस जाए ये किसी को पता नहीं होता।
   स्टिंग ऑपरेशन में जिन मीडिया घरानों को आपने बेनकाब होता देखा है क्या आप उनका चैनल देखना, उनका अख़बार पढ़ना बंद करेंगे ? अगर हां, तब तो आपको ये नैतिक अधिकार है कि आप एक पत्रकार से पत्रकारिता की उम्मीद करें। और, अगर नहीं तो फिर आपको ये अधिकार नहीं कि आप किसी को बिकाऊ मीडिया कहें।
    और आख़िरी बात अपने पत्रकार साथियों से। आप सब मुझसे वरिष्ठ हैं। किसी नैतिक दबाव में मत आइए। कोबरा के डंक से बस कुछ अखबार और चैनल बचे हैं। ज़रूरी नहीं कि ये सारे बिकाऊ नहीं हों। और इनमें से जो बिकाऊ नहीं होंगे वो आपकी ईमानदारी से खुश होकर आपको नौकरी नहीं दे देंगे। और जिस राष्ट्र-समाज की वजह से आप नैतिक दबाव महसूस कर रहे हैं न वो आपको एक दिन के लिए भी पूछने नहीं आएगा। ध्यान रहे आप बिकाऊ नहीं हैं। बस इस बात का ध्यान रखिए कि आप खुद किसी को ब्लैकमेल न कीजिए और ना ही झूठी ख़बर चला कर किसी का मान हनन कीजिए। लेकिन नौकरी छोड़कर आप कोई क्रांति नहीं कर पाएंगे। फिलहाल प्रेमचंद की कहानी नमक का दारोगा पढ़िए। कहानी के पात्र ईमानदार दारोगा की जब नौकरी गई तो उसे नमक तस्कर अलोपीदीन की ही नौकरी करनी पड़ी थी। हम पत्रकारों को मालूम होना चाहिए कि हम अलोपीदीन की औलादों की नौकरी कर रहे हैं।

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...