Wednesday, July 26, 2017

इस दौर में

इस दौर का सवाल है
बिजली, पानी, रोजगार कहां हैं ?
जवाबदेहों का जवाब है
औरंगजेब अत्याचारी था
हम पूछ रहे हैं
स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाने वालों की कमी क्यों ?
वो बता रहे हैं
बाबर आक्रांता था
वो गूंजते सवालों को टाल रहे हैं
हम टलते सवालों को उठा रहे हैं
उनके टालने का अंदाज
हमारे सवालों को धारदार बना रहा है

Saturday, July 15, 2017

सत्ता लोलुपता और मौक़ापरस्ती के लिए याद किए जाएंगे नीतीश कुमार

बिहार के मौजूदा सियासी घटनाक्रम में नीतीश कुमार को महान बनाने की कोशिशें बीजेपी और जेडीयू दोनों तरफ हो रहीं हैं। तेजस्वी यादव पर लगे आरोपों के ज़रिए नीतीश कुमार को महिमा मंडित करने का अभियान सा चल पड़ा है। ये जेडीयू की सियासी मजबूरी हो सकती है लेकिन बीजेपी की नहीं। बिहार बीजेपी के नेता जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार का क़द बड़ा कर किसका क़द छोटा करना चाहते हैं वो जानें। संभव है 2019 के लिए पीएम कैंडिडेट तैयार करने की सियासी चाल हो। संभव है बीजेपी नेता ही नरेंद्र मोदी का विकल्प पेश करने की तैयारी में हों। ये तमाम संभावनाएं हैं। संभावनाओं से इतर जिस बात पर मेरा दृढ़ विश्वास होता जा रहा है वो है नीतीश की सत्ता लोलुपता और उनकी मौक़ापरस्ती। करप्शन के जिन आरोपों के आधार पर वो तेजस्वी से जवाब मांग रहे हैं उन आरोपों से काफी बड़े आरोप तो लालू प्रसाद पर हैं। चारा घोटाले के आरोपी लालू प्रसाद से गठबंधन तो नीतीश कुमार ने ही किया। 2015 में जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से गठबंधन किया तब उनकी करप्शन के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस वाली नीति कहां चली गई थी ? तब तो नीतीश कुमार ने सिर्फ सत्ता का समीकरण देखा था। फिलहाल जिन आरोपों को ज़रिए तेजस्वी को घेरा जा रहा है अगर वो आरोप सही निकले तो भी तेजस्वी दोषी नहीं होंगे। वो तमाम कारनामे तो चारा घोटाले वाले लालू प्रसाद ने ही किए होंगे। बेटे-बेटी, दामाद और न जाने कितने लोगों के नाम पर लालू ने अकूत धन जुटाया है। 2015 के चुनाव में जब चारा घोटाले के इस बदनाम खलनायक को नीतीश कुमार ग़रीबों और पिछड़ों का मसीहा बता रहे थे तब उनकी ईमनादार वाली छवि चारा खाने गई थी क्या ? बस इतने भर से मैं नीतीश कुमार को मौक़ापरस्त और सत्ता लोलुप नहीं मानने लगा हूं। और भी कई वजहें हैं। 2014 के आम चुनाव से पहले जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तो नीतीश कुमार ने खुद को एनडीए से अलग कर लिया। कहा कि सांप्रदायिक पार्टी है बीजेपी और सांप्रदायिक शक्तियों को रोकने के लिए कोई भी बलिदान देने को तैयार हैं। अपनी सत्ता लिप्सा को ये नेता कैसे बलिदान का चोला ओढ़ा देते हैं ये देखिए। क्या बाबरी विध्वंस सांप्रदायिक उन्माद की घटना नहीं थी ? बाजपेयी जी ने कहा ज़मीन को समतल करना होगा। आडवाणी ने रथयात्रा की और भीड़ जुटाई। देश भर में दंगे हुए हज़ारों लोगों का कत्ल हुआ। 1992 की ही घटना है ये। 2004 में नीतीश कुमार उसी अटल-आडवाणी के साथ खड़े हो गए। तब कहां थी नीतीश जी की धर्मनिर्पेक्षता ? केंद्र में मंत्री का पद भोगा। उसी बीजेपी के साथ 2005 से लेकर 2015 तक बिहार की सत्ता भोगी। 2015 में जब 10 साल पुरानी सरकार से जनता की बेरुखी की ख़बर मिली तो तुरंत लालू प्रसाद के एमवाई समीकरण से चिपक गए और बीजेपी को सांप्रदायिक बताने लगे। यही है उनकी मौक़ापरस्ती और सत्ता लोलुपता। जीतन राम मांझी को इस्तीफा देने पर मजबूर करने वाले नीतीश कुमार कोई एक ठोस वजह बताएं कि क्यों मांझी की सरकार गिराई गई? दरअसल सत्ता का आदि हो चुके नीतीश कुमार एक पल भी बिना सत्ता के नहीं रह पा रहे हैं। और तमाम सियासी चालें उनकी मौक़ापरस्ती और सत्ता लोलुपता की मिसाल ही हैं। वरना तेजस्वी के ज़रिए आपना दामन साफ दिखाने वाले नीतीश चारा घोटाले के कुख्यात आरोपी लालू प्रसाद से गठबंधन नहीं करते। अगर जेजस्वी करप्ट हैं तो लालू करप्ट के बाप हैं।

Wednesday, July 12, 2017

हत्यारे के आंसू

हम जिस समय में जी रहे हैं
उस समय में हत्यारा हत्याओं पर आंसू बहा रहा है
हत्यारों का समूह तालियां पीट रहा है
मुट्ठियां लहरा रहा है, बांहें फड़फड़ा रहा है
हम पर थोप रहा है वो सारे इल्ज़ाम
हमारे बीच के ही किसी शख्स की हत्या करके
वो हमें ही ठहराना चाहता है हत्या का जिम्मेदार
हम खून से लथपथ हैं और वो नारे लगा रहा है
हम डर नहीं रहे हैं तो फिर वो किसी और का कत्ल कर रहा है
ये मरना हमें मंजूर है लेकिन उससे डरना मंजूर नहीं है
डरने और जीने के बीच बिना डरे मौत अच्छी है
दाभोलकर, पनसारे से पहले भगत सिंह, आज़ाद और गांधी
उनसे पहले सुकरात और ईशा मरे, वो भी बिना डरे
तब भी खूब हुईं थीं डराने की कोशिशें
तब भी हत्यारा हत्याओं पर आंसू बहा रहा था
अब भी हत्यारा हत्याओं पर आंसू बहा रहा है
हत्यारों का समूह तलियां बजा रहा है
......असित नाथ तिवारी...

Tuesday, June 20, 2017

प्रेम बीज भर है

 बीते इन सालों में
तुमने मुझे थोड़ा-थोड़ा भुलाया होगा
फिर भी कहीं किसी कोने में
मैं थोड़ा सा बचा रहा होऊंगा
मन के सिमटते अलापों में
उस थोड़े से मुझ को तुमने गुनगुनाया होगा
मेरे आदि को, मेरे अंत को
मेरी यादों के अनंत को कहीं बचाया होगा, कहीं छुपाया होगा
ये जो प्रेम है न वो बीज है
थोड़ी नमी पाकर ही अंकुरित होता है
बीते उन सालों में जो मुझे भुलाने में गुजरे होंगे
तुमने हर मोड़ पर मुझे पाया होगा
बस ये मत पूछना कि बीते उन्हीं सालों को
मैने कैसे बिताया होगा



....19-06-17....कानपुर

Wednesday, May 17, 2017

ये मीडिया का संक्रमण काल है



मीडिया की साख पर जैसा संकट इस वक्त खड़ा है वैसा पहले कभी था क्या ? बहुत सारे लोग आपातकाल के दौरान की मीडिया पर सवाल खड़े करते हैं। लेकिन आपाताकाल का जितना विरोध तब की मीडिया ने किया था वैसा विरोध सरकार के किसी फैसले का शायद ही कभी हुआ हो। राजनीति  में मर्यादाओं की चर्चा होगी तो आपातकाल की भी चर्चा होगी। तब इंद्र कुमार गुजराल सूचना-प्रसारण मंत्री हुआ करते थे। कहा जाता है कि संजय गांधी ने तब उनसे कहा था कि दूरदर्शन और आकाशवाणी पर सरकार विरोधी खबरों की संख्या कम करवाएं। इंद्र कुमार गुजराल ने तत्काल अपना इस्तीफा टाइप करवाया और इंदिरा गांधी के पास भेज दिया था। इस्तीफे की चिट्ठी मिलते ही गुजराल तलब किए गए। इस्तीफे की वजह पूछी गई। गुजराल ने तब कहा था कि आपातकाल से तो देश बाहर निकल जाएगा लेकिन मीडिया पर सरकारी नियंत्रण हुआ तो लोकतंत्र का दम घुट जाएगा। इंदिरा मनाती रहीं, उनके सामने ही संजय गांधी को डांटा भी लेकिन गुजराल ने इस्तीफा वापस नहीं लिया। ये थी तब की राजनैतिक मर्यादा। आज इतनी हिम्मत किसी मंत्री में नहीं कि वो प्रधानमंत्री के फैसले के खिलाफ चूं तक बोल पाए, इस्तीफा तो बहुत दूर की बात है। हलांकि तमाम बिदिशों के बावजूद तब के पत्रकार और संपादकों ने नागिन डांस नहीं किया और आपातकाल के खिलाफ खूब लिखा, खूब बोला और फिर जेपी आंदोलन में शामिल होकर इंदिरा सरकार की चूलें भी हिलाईं। आज मीडिया में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वो सरकारी नीतियों, फैसलों की आलोचना कर सके या फिर उनसे हो रहे नुकसान की चर्चा कर सके। सरकार तो छोड़िए आलम ये है कि आज का मीडिया उस पार्टी का भोंपू बन गया लगता है जिसकी सरकार है। और जैसा कि प्रकृति का नियम है अपने मालिक के लिए दुम हिलाने वाले या भौंकने वाले को टुकड़ा मिलता है वैसे टुकड़े उछाले भी जा रहे हैं। इसी के साथ बेहद चालाकी से सारी नाकामी का ठीकरा मीडिया पर फोड़ा जा रहा है। आम आदमी के सवालों का तोप मीडिया की तरफ है। पहले महंगाई बढ़ने पर सरकार से सवाल पूछे जाते थे। अब मीडिया से पूछा जा रहा है कि 60 साल क्या सस्ते दिन थे जो अब महंगाई की बात हो रही है ? बेरोजगारी के मसले पर भी सवाल मीडिया से ही पूछे जा रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि पिछले 60 साल में सबको रोजगार मिल गया था क्या जो अब बेरोजगारी पर खबर चला रहे हो ? इसी तरह के सवाल तमाम मसलों पर मीडिया से पूछे जाने लगे हैं। बेहद चालाकी से सरकार ने, सरकार चला रहे सियासी दल ने आम आदमी के तमाम सवालों को मीडिया की तरफ मोड़ दिया है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जैसे महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, अस्पतालों की बदहाली के लिए मीडिया ही जिम्मेदार है । और मीडिया का काम सवाल पूछना है ही नहीं बस सरकार की चाकरी करना है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जिसमें सरकार से सवाल पूछने वाला देशद्रोही है। ऐसा माहौल गढ़ा जा रहा है जिसमें सरकार को कुछ करना न पड़े और उसकी नाकामी का ठीकरा या तो पिछले 60 वर्षों पर फूट जाए या फिर मीडिया पर।  बेहद चतुराई से तमाम असहमतियों को मीडिया की तरफ मोड़कर सरकार जवाबदेही मुक्त होती दिख रही है। मेरा मानना है कि ख़बर किसी के पक्ष या खिलाफ़ में नहीं होती है। खबर बस खबर होती है। मसलन लखनऊ में एक गाड़ी में रात भर किसी लड़की से हुआ बलात्कार खबर ही है। ये योगी सरकार की मुखालिफत नहीं है। नोटबंदी के बाद देश में बढ़ी बेरोजगारी खबर भर है किसी सरकार का विरोध नहीं है। लेकिन मौजूदा माहौल में ये सरकार विरोधी ख़बरें बताई जा रहीं हैं और ऐसी ख़बरे लिखने-बोलने वाले देशद्रोही बताए जा रहे हैं। तो मीडिया के लिए जो दौर अभी चल रहा है वैसा दौर पहले कभी रहा तो बताइएगा ज़रूर। मेरी जानकारी में इजाफा होगा और शायद तब मैं कुछ अच्छा लिख पाने के काबिल बन पाऊंगा। फिलहाल लोग मीडिया को भांड, दल्ला और न जाने और क्या-क्या कह रहे हैं।

Sunday, April 23, 2017

वो भी बाबर तुम भी बाबर

बाबर ने तुड़वा दिया मंदिर
तुड़वा दी सीता रसोई भी
तुड़वा दी करोड़ों लोगों की अस्था
तुड़वा दिया राजा के न्याय का भ्रम भी
जब टूटा होगा मंदिर तब फैली होगी दहशत
करोड़ों लोगों की आंखों में फैली होगी वहशत
तब हुआ होगा एहसास रियाया होने का
तब राजा की ताक़त के सामने
जनता की लाचारी, बेबसी साबित हुई होगी
और फिर राजा होने के दंभ से
जब चुनी गई होगी मस्जिद की दीवार
तब और बड़ी हुई होगी दहशत
तब और पसर गई होगी वहशत
ठीक वैसे ही जैसे पसरी 6 दिसंबर 1992 को
ठीक वैसे ही जब भीड़ की ताक़त ने
गिरा दी थी मस्जिद बहुसंख्यक होने के एहसास के साथ
और बताई गई अल्पसंख्यक को उसकी औकात
उसकी डरी आंखों में देखे गए अपनी जीत के आंसू
आबादी में उसके कम होने को समझा गया उसकी कमज़ोरी
ठीक वैसे जैसे बाबर ने ढहाया होगा मंदिर
वैसे ही तो गिराई थी मस्जिद भी
तो फिर बाबर को ग़लत बताने वाले
उतने ही ग़लत हैं जितना बाबर रहा होगा
तो फिर बताइए आप बाबर से अलग कहां हैं
बाबर लुटेरा था तो लुटेरा हैं आप भी
बाबर आक्रांता था तो आक्रांता हैं आप भी
बाबर आतातायी था तो आतातायी हैं आप भी
बाबर नें मंदिर गिराया था तो मस्जिद गिरा गए आप भी

Wednesday, April 12, 2017

अब भरम रह गए

तुम न तुम रह गए,  हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए
साथ चलकर भी मंजिल वो पा न सके
जिनके पीछे सफर में कदम रह गए
न खुशी रह गई, न गम रह गए
तुम न दुश्मन बने, न सनम रह गए....
तुम न तुम रह गए, हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए
अब तो एहसासों के बस कफन रह गए
मोहब्बत में कैसे कहें क्या मिला
चंद यादों के दिल में जख्म रह गए
तुम न तुम रह गए, हम न हम रह गए

अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए.

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...