Tuesday, October 29, 2019

कुपुत्र से गंगा मइया को बचइया


तो डुगडुगी बजा दी गई। शाखा में आने वालों को सूचना दे दी गई कि छठ पूजा से पहले गंगा घाटों को साफ-सुथरा कर देना है। इसके लिए बाजाप्ता मीटिंग बुलाई गई है। प्रमोद काका पुराने शाखाई हैं। हाफ पैंट के ज़माने से शाखा जाते रहे हैं। अब, जब शाखा फुलपैंटिया हो गई तो वो भी फुलपैंट पहनने लगे हैं। अंग्रेजी पैंट, अंग्रेजी शर्ट, अंग्रेजी बेल्ट, अंग्रेजी जूते पहनकर स्वदेशी पर लेक्चर देना उनका सबसे प्रिय काम है। शाखा के हर आदेश का पालन अपना परम धरम समझते हैं प्रमोद काका।
    सो शाम को होने वाली मीटिंग के लिए घुटनी बाबा की मठिया वाली झोंपड़ी की सफाई शुरू हो गई है। सबसे पहले प्रमोद काका ने सुरा भरे बर्तनों को खाट के नीचे रखा और चादर से एक पर्दा बनाकर उनको छुपाया। फिर मठिया के अगल-बगल पड़े मुर्गे-बकरों की हड्डियों को इकट्ठा कर दूर ले गए और कुत्तों को आमंत्रित किया। फिर झाड़ू लगाकर निश्चिंत हुए।
  तो मीटिंग स्थल तैयार। प्रमोद काका सोचने लगे। सोचना उनका प्रिय काम है। अक्सर सोचने लगते हैं। और जब सोचते हैं तो फिर कोई दूसरा काम नहीं करते हैं। तो प्रमोद काका सोच रहे हैं कि गंगा की सफाई, गंगा घाटों की सफाई कैसे ? वहां तो बदबू आती है। वहां को कचरा पड़ा रहता है। वहां तो सड़ांध है। प्रमोद काका सोच ही रहे थे कि तभी उनके नथुनों में गांजा का धुआं भर गया। तंद्रा टूटी तो देखा कि घुटनी बाबा चीलम सुलगाए सामने ही बैठे हैं। प्रमोद काका तुरत झोपड़ी से बाहर निकल आए। लेकिन सोच ने साथ नहीं छोड़ा। सोचते-सोचते सोचा कि गंगा की सफाई क्यों। गंगा तो स्वच्छ और निर्मल हो ही गई होगी। 2014 में काशी पहुंचे गंगा पुत्र ने तो प्रण लिया था कि मां गंगा को निर्मल बनाएगा। देश ने उस गंगा पुत्र को अपना राजा बनाया। राजा ने गंगा की सफाई के लिए अलग मंत्रालय बनाया। राजा ने उस मंत्रालय को गंगा सफाई के लिए ढेर सारा धन दिया। राजकोष की अशर्फियां दी गईं। खज़ाना खोल दिया था गंगा पुत्र ने गंगा की सफाई के लिए। तो फिर गंगा तो स्वच्छ और निर्मल होगी ही। भला राजा की मां मैले-कुचले कपड़ों में किसी मलिन बस्ती में रहती है।
   प्रमोद काका के चेहरे पर मुस्कान आ गई। अहा! कैसा दृश्य होगा गंगा घाट का। आहा! कितना निर्मल होगा गंगा का पानी। सुपुत्र पाकर फूली समा रही होंगी गंगा मइया।
   प्रमोद काका के पांव खुद चल पड़े। तेज कदम, और तेज कदम और अब तो दौड़ने लगे प्रमोद काका। सीधे गंगा की तरफ दौड़े जा रहे हैं प्रमोद काका। अहा! कैसा सुंदर दृश्य होगा।
  लेकिन ये क्या ? दूर से ही दुर्गंध! कूड़ा-कचरा, सड़ांध। पानी भी बदबूदार। हे गंगा मइया! जिसका बेटा राजा उसकी ऐसी हालत! लानत...लानत...लानत...ऐसे पुत्र को लानत। कहां गईं खज़ाने की अशर्फियां ? कहां गए वो दावे ? मां तो जार-जार रो रही है। हे मां, कुपुत्र-सुपुत्र, कैसा तेरा पुत्र?
  प्रमोद काका फिर सोचने लगे। द्वापर में भी तो था गंगा पुत्र। तीर के बल अंबा, अंबे, अंबालिका को अगवा किया था गंगा पुत्र ने। गंगा पुत्र ही तो था वो जो चुप्पी साधे अपनी पौत्र वधु का चीरहरण देख रहा था। गंगा पुत्र ही तो था वो जो अन्यायियों-बेईमानों की विशाल कौरवी सेना का नेतृत्व कर रहा था। गंगा पुत्र ही तो था वो जो सत्य को पराजित करने के लिए असत्य की विशाल सेना लेकर कुरुक्षेत्र में डटा खड़ा था। हां, गंगा पुत्र ही था वो। गंगा पुत्र...गंगा पुत्र...गंगा पुत्र...। जब द्वापर युगीन गंगा पुत्र ऐसा था तो फिर कलियुगी गंगा पुत्र कैसा होगा! हे छठी मइया कुपुत्र से गंगा मइया को बचइया। प्रमोद काका रो रहे हैं, गंगा मइया रो रही हैं। गंगा पुत्र राज सिंहासन पर बैठा ठहाके लगा रहा है।  

Friday, September 20, 2019

मोदी भक्तों को जवाबदेह बनाना होगा


 भीड़ विकल्पहीन होती है, लोकतंत्र नहीं। जो आज ये कह रहे हैं कि अलां-फलां का विकल्प कौन है उनसे पूछिए कि 2004 में अटल बिहारी बाजपेयी का विकल्प कौन था ? अटल के नेतृत्व में एनडीए की हार हुई और देश ने विकल्प भी पेश कर दिया। मुश्किल काम विकल्प तलाशना नहीं है। मुश्किल काम है भारतीय लोकतंत्र को भीड़तंत्र या भेंड़तंत्र बनने से रोकना। और ऐसा नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र में पहली बार भीड़तंत्र दिखा हो। आज जिनके लिए भक्त शब्द का इस्तेमाल हो रहा है वो पहले भी मौजूद थे। 1974 में जब जय प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया तब भी उनके साथ भीड़ खड़ी थी। मसला था भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का। जेपी ने कहा कि इंदिरा गांधी की सरकार भ्रष्ट है और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के लिए इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाना होगा। भीड़ ने जेपी की इस बात पर भरोसा कर लिया। बिना ये सोचे कि क्या भ्रष्टाचार का संबंध सिर्फ इंदिरा गांधी से है। जो नया आएगा वो हरिश्चंद्र होगा और भारत सतयुग में पहुंच जाएगा। भीड़ ने शायद इस पर विचार ही नहीं किया और ना ही कोई तर्क सामने रखा। जेपी के पास भी कोई फॉर्मूला नहीं था। उनकी संपूर्ण क्रांति बाद के दिनों में सत्ता परिवर्तन के लिए किया गया एक सियासी हथकंडा साबित हुआ और फिर उन्हीं के लोगों ने संपूर्ण क्रांति को संपूर्ण भ्रांति कहना शुरू कर दिया। लेकिन उनके साथ भीड़ खड़ी थी और लोकतंत्र में भीड़ की ताकत का एहसास उन्हें खूब था। और ताली बजाने वाली इस भीड़ ने तो 25 जून 1975 को तब भी ताली ही बजाई थी जब जेपी ने रामलीला मैदान मे जुटी भारी भीड़ से ये अपील कर दी कि वो प्रधानमंत्री का आवास घेर ले और उन्हें घर से निकलने ही न दे। भीड़ ने इसी दौरान लोकतंत्र को कलंकित करने वाली उस अपील पर भी ताली बजाई थी जिसकी वजह से आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी। जेपी ने तब भारतीय सेना से अपील कर दी कि वो सरकार का आदेश मानने से इनकार कर दे और इंदिरा को सत्ता से हटाने में जनता की मदद करे। आप कल्पना कीजिए कि क्या स्थिति होती अगर सेना ने बग़ावत कर दी होती। जाने-अनजाने में देश को सैन्य तानाशाही की तरफ झोंकने वाली वो अपील भी भीड़ को अच्छी ही लगी थी। तो ये थे जेपी भक्त।
     उसी जेपी आंदोलन से निकले तमाम बड़े नेता भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में जेल गए, कुछ आज भी जेल में बंद हैं। तो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े उस आंदोलन ने भ्रष्ट राजनेताओं की बड़ी भीड़ इस देश को दी। और फिर न तो इन सबके लिए भीड़ को जिम्मेदार ठहराया गया और ना ही भीड़ ने इसकी जिम्मेदारी ली क्योंकि, भीड़ की कोई जवाबदेही नहीं होती।
   5 अप्रैल 2011 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू हुआ। ये आंदोलन भी भ्रष्टाचार के आरोपों में धिरी तत्कालीन मनमोहन सरकार के खिलाफ था। आंदोलन के मंच पर मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित अरविंद केजरीवाल, देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी, योग व्यवसायी बाबा रामदेव समेत कई बड़े लोग मौजूद थे। लोगों को समझाया गया कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार ही देश की तमाम समस्याओं की वजह है। भीड़ ने ये बात मान ली। यहां भी भीड़ ने तर्क को जगह नहीं दी। यहां भी भीड़ ने सोचने के लिए खुद के विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। भीड़ ने मान लिया कि सोचना-समझना तो अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और बाबा रामदेव का काम है। भीड़ का काम सिर्फ नारे लगाना और ताली बजाना है। भीड़ का काम सिर्फ उनको कोसना है जिनको मंच पर मौजूद नेता कोसना चाहते हैं। तब की ये भीड़ अन्ना भक्त थी। उस आंदोलन से देश को क्या मिला ये सवाल अब अन्ना हजारे से पूछा जाना चाहिए।
   अब जो भीड़ है वो मोदी भक्त है। किसी को ये नहीं पता था कि नोटबंदी से देश को क्या फायदा होना है लेकिन, भीड़ ने ताली बजाई। किसी को नहीं पता था कि जीएसटी से कैसे आर्थिक सुधार को गति मिलेगी लेकिन, भीड़ ने ताली बजाई। किसी को ये नहीं पता था कि अडानी और अंबानी के कर्जे माफ कर देने से देश में कैसे औद्योगिक क्रांति आएगी लेकिन, भीड़ ने ताली बजाई। और आज जब अर्थव्यवस्था डूब चुकी है, सरकार के पास वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, सैनिकों को वेतन देने के पैसे नहीं हैं और सरकार सबके वेतन और भत्तों में कटौती करती जा रही है तब भी भीड़ ताली ही बजा रही है। एक-एक कर कई छोटे उद्योग और रोज़गार बंद हो गए लाखों लोगों से उनका रोज़गार छिन गया। उत्पादन क्षेत्र में चीन ने भारतीय बाजार पर कब्जा कर लिया और भक्त ताली ही बजा रहे हैं। सरकार ने एलआईसी की कमाई लूट ली, रिज़र्व बैंक की सत्तर साल कमाई पर डाका डाल दिया और भक्त ताली बजाते रहे।
   तो मुश्किल काम विकल्प खड़ा करना नहीं है मुश्किल काम है भारतीय लोकतंत्र को भीड़तंत्र बनने से बचाना। और ये काम राजनेता और राजनीतिक दल नहीं करेंगे। ये काम देश की मीडिया को, छात्रों को, सामाजिक कार्यकर्ताओं को, वकीलों, शिक्षकों को करना होगा। ये काम देश की आम जनता को करना होगा। देश किसी मदारी का तमाशा नहीं होता कि बस कोई आया डुगडुगी बजाई और फिर कौए को कबूतर बनाने वाली हाथ की सफाई दिखा गया और देश ताली पीटने लगा। जेपी से लेकर मोदी तक के भक्तों को जवाबदेह बनाना सबकी जवाबदेही है। वरना ताली पीटते-पीटते कपार पीटने की नौबत आ जाएगी।     

Wednesday, August 28, 2019

चल झूठे

झोला उठा कर चला जाएगा भोगी
चल झूठे
राज सिंहासन पर बैठा योगी
चल झूठे
चिडिय़ा, पत्ती, फूल और कलियाँ
सब उदास हैं
मुझसे बिछड़ कर वो खुश होगी
चल झूठे

Monday, August 12, 2019

सावरकर को वीर कहना भगत सिंह का अपमान है

महान क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि उनके साथ राजनीतिक बंदी जैसा ही व्यवहार किया जाए और फांसी देने की जगह गोलियों से भून दिया जाए. जबकि हिंदू राष्ट्रवादी सावरकर ने अपील की कि उन्हें छोड़ दिया जाए तो आजीवन क्रांति से किनारा कर लेंगे.
1911 में जब सावरकर को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए अंडमान के कुख्यात सेल्युलर जेल में भेजा गया था, तब सावरकर ने अपनी 50 वर्षों की सज़ा शुरू होने के कुछ महीनों के भीतर ही अंग्रेज़ों के सामने उन्हें जल्दी रिहा करने की याचिका लगायी थी. एक बार फिर 1913 में और 1921 में मुख्यभूमि में स्थानांतरित किये जाने और 1924 में अंततः क़ैदमुक्त किये जाने तक उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने ऐसी अर्जी लगायी. उनकी याचिकाओं की मुख्य पंक्ति थी: मुझे छोड़ दें तो मैं भारत की आज़ादी की लड़ाई को छोड़ दूंगा और उपनिवेशवादी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा.
23 मार्च, 1931 को शहीद भगत सिंह और उनके दो बेहद क़रीबी साथी शहीद राजगुरु और शहीद सुखदेव को ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकार ने फांसी पर लटका दिया था. अपनी शहादत के वक़्त भगत सिंह महज 23 वर्ष के थे. इस तथ्य के बावजूद कि भगत सिंह के सामने उनकी पूरी ज़िंदगी पड़ी हुई थी, उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने क्षमा-याचना करने से इनकार कर दिया, जैसा कि उनके कुछ शुभ-चिंतक और उनके परिवार के सदस्य चाहते थे. अपनी आख़िरी याचिका और वसीयतनामे में उन्होंने यह मांग की थी कि अंग्रेज़ उन पर लगाए गये इस आरोप से न मुकरें कि उन्होंने उपनिवेशवादी शासन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा. उनकी एक और मांग थी कि उन्हें फायरिंग स्क्वाड द्वारा सज़ा-ए-मौत दी जाए, फांसी के द्वारा नहीं. यह दस्तावेज़ भारत के बारे में उनके सपने को भी उजागर करता है, जिसमें मेहनतकश जनता अंग्रेज़ों के ही नहीं, भारतीय ‘परजीवियों’ के अत्याचारों से भी आज़ाद हो.

Friday, August 9, 2019

लोकतंत्र के मुर्दाघर में केवल जय-जयगान चलेगा

.ना टीवी ना अखबार चलेगा लोकतंत्र के मुर्दाघर में केवल जय-जयगान चलेगा....
कश्मीर में पिछले चार दिनों से अखबार नहीं छपे हैं। बाहर से अखबार ले जाने पर रोक लगा दी गई है। टीवी चैनलों का प्रसारण बंद है। मोबाइल और लैंड लाइन फोन तो बंद हैं ही। आप अखबार पर रोक के क्या मायने समझते हैं ? सूचना और संचार पर ऐसी पाबंदी के क्या मायने समझते हैं ? जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के सुरक्षा सलाहकार के विजय कुमार बता रहे हैं कि जुमे की वजह से कर्फ्यू में थोड़ी देरे के लिए सशर्त ढील होगी, फिर कर्फ्यू। सरकार बता रही है घाटी में शांति है। शांति है तो फिर कर्फ्यू क्यों है ? शांति है तो फिर अखबार और न्यूज चैनलों पर रोक क्यों है ? क्या हम दहशत के साये को शांति समझने की भूल कर रहे हैं ? क्या हम बंदूक के साए को लोकतंत्र समझने लगे हैं ? तो फिर ये गोली-बंदूक-सिपाही कितने दिन ? सच कहने की कहो मनाही कितने दिन ? घाटी में अपने ही घरों में कैद ये लोग किस गुनाह की सज़ा भोग रहे हैं ? समस्या सीमा पार पाकिस्तान है। कश्मीर हमारी समस्या नहीं है। समस्या पाकिस्तान से लगातार हो रही घुसपैठ है। कश्मीरी हमारी समस्या नहीं हैं। कश्मीरियों को रिहा कीजिए। सरकारी दहशतगर्दी की हद हो गई। बंद कीजिए ये तमाशा। धारा 370 के दो प्रावधानों को खत्म करने के आपके फैसले के साथ ये देश खड़ा है लेकिन, देश के इस समर्थन को भेड़चाल समझने की भूल मत कीजिए। नागरिक अधिकारों का ऐसा दमन मत कीजिए कि हालात 1975 जैसे हो जाएं और नतीजे 1977 जैसे। अपने ही नागरिकों की आंखों में दहशत देख कर प्रसन्न होना लोकतांत्रिक सरकार की नहीं क्रूर शासक की निशानी होती है। धरती के स्वर्ग ने मुस्कुराना छोड़ दिया है और आप अपने चेहरे पर विजित भाव लेकर घूम रहे हैं। किसको हराया है आपने ? किस पर विजय पाई है आपने ? कश्मीर में शांति और विश्वास बहाल करना सबका काम है। और सरकार की जिम्मेदारी है घाटी में शांति और विश्वास बहाल करना। दहशत के बादलों से अपनी नाकामी मत छुपाइए आप लोग। आपलोग कश्मीर जा क्यों नहीं रहे हैं ? जाइए लोगों को गले लगाइए। हमें आपका दंभ या अहंकार नहीं चाहिए। हमें हमारे कश्मीरियों के चेहरों पर वापस लौटी मुस्कान चाहिए।

Thursday, August 1, 2019

उनके हिस्से का हिंदुत्व ख़तरे में है


गर्मियों में जिस धनौती नदी में अब धूल उड़ने लगी है बरसात में अब वही धनौती फूंफकारती है। अमवा मझार के हाई स्कूल के फील्ड में रोजाना लगने वाली शाखा से लौटते वक्त प्रमोद काका थोड़ी देर के लिए धनौती किनारे खड़े होते हैं। तिवारी टोले वाले चौर का पानी बारी पर धनौती से मिलता है। जाल में गरई, पोठिया और टेंगरा मछलियां खूब फंसती हैं। वैसे तो प्रमोद काका कभी मछली खरीदते नहीं हैं लेकिन रोजाना वहां जाने का फायदा ये होता है कि बाबूलाल दुसाध कभी-कभार उन्हें एक-आध पाव मछली दे दता है। प्रमोद काका के लिए वही दिन सबसे अच्छा होता है जिस दिन बाबूलाल दुसाध उनके हाथ में मछली थमाते हुए कहता है कि लीं तिवारी जी मछरी खाईं। प्रमोद काका की ये खुशी संकट में है। वो शाखा समाप्ती के बाद घर के रास्ते में हैं। बगल में धनौती उफना रही है। सामने कुछ दूरी पर बारी है। वही बारी जहां से न जाने कितनों सालों से वो मुफ्त की मछली बड़े चाव से खा रहे हैं। बड़ा असमंजस है। शाखा में अजय जायसवाल ने बताया कि पटना वाले एक शुक्ला जी असली हिंदु निकले। एकदम हिंदुत्व के शिवाजी। शेर, सवा शेर। दुकान वाले ने मुसलमान के हाथों खाना भेजा तो लेने से इनकार कर दिया। सनातन धर्म की रक्षा के लिए भूखे सो गए। इतना ही नहीं सोए हिंदुओं को जगाने के लिए सोशल मीडिया पर इस बात का प्रचार भी खूब किया।
    प्रमोद काका असमंजस में हैं। मुसलमान के हाथों भेजा गया खाना खा लेने भर से हिंदुत्व खतरे में आ जाता है ! काका का माइंड सुन्न हुआ जा रहा है। वो तो कई बार रोज देवान के घर की बनी रोटी खा चुके हैं। छोटे थे तो रोज देवान उन्हें गोदी में खेलाया करते थे। कई बार अपने हाथों अपने घर की बनी रोटी भी खिलाई है रोज देवान ने। रोज देवान तो मुसलमान थे। प्रमोद काका का धर्म संकट बढ़ता जा रहा है। सिर्फ मुसलमान के हाथों खाना भेजने भर से हिंदु धर्म जब खतरे में आ जाता है तो फिर ये तो कई बार मुसलमान के घर की रोटी मुसलमान के ही हाथों खा चुके हैं। मतलब इनके हिस्से का हिंदुत्व तो बचा ही नहीं है। वो तो कब का मिट गया है। मतलब अब ये हिंदु नहीं रहे। काका का कनफ्यूजन बढ़ता जा रहा है। पैर लड़खड़ाने लगे। धम्म से बैठ गए महुआनी में।
    काका कोई बुद्ध तो हैं नहीं कि तपस्या करने लगते। बरसात में महुआ के पेड़ के नीचे बैठे तो चींटियों ने जहां-तहां शरीर पर रेंगना शुरू कर दिया। बदन झाड़कर उठे तो सामने वही बारी जहां से वो वर्षों से हर बरसात में मछली लाते, पकाते और खाते रहे हैं। हर साल बारी का ठेका  बाबूलाल दुसाध और हातिम अंसारी ही लेते रहते हैं। साझे का ठेका सालों से चला आ रहा है। जाल में फंसी मछलियां हातिम अंसारी निकाल-निकाल कर टोकरी में रखते जाते हैं और बाबूलाल दुसाध सब बेचने के बाद जो थोड़ा बचता है उसी में से थोड़ा प्रमोद काका को दे देते हैं। हाय! मुसलमान के हाथों पकड़ी गई मछली खाते रहे हैं प्रमोद काका। मुसलमान के घर की रोटी भी खाई है प्रमोद काका ने। एक कदम भी नहीं चल पाए कि धम्म से महुआनी में ही गिर पड़े प्रमोद काका। होश आया तो देखा कि बारी पर पुल के किनारे लेटे पड़े हैं। कई लोग उनको घेरे खड़े हैं। बाबूलाल दुसाध सिर की मालिश कर रहे हैं और हातिम अंसारी तलवों की मालिश कर रहे हैं। कोई सीने की मालिश कर रहा है कोई पानी के छींटे मार रहा है। हड़बड़ा कर उठ बैठे प्रमोद काका। थोड़ी देर में सबकुछ ठीक हो गया। बाबूलाल दुसाध ने एक किलो से भी ज्यादा मछली एक उनके गमछे में बांध दी, हातिम अंसारी ने अपनी साइकिल से प्रमोद काका को उनके घर तक पहुंचा दिया। सारा कनफ्यूजन दूर हो गया। न तो हिंदुत्व खतरे में है और ना ही हिंदु खरते में है। खतरे में है तो बस हिंदु-हिंदु जपने वाले नेताओं की कुर्सी।

Sunday, July 28, 2019

डूबता बिहार, कौन जिम्मेदार ?


समूचा उत्तर बिहार हर साल भीषण बाढ़ की चपेट में होता है। सैकड़ों लोग मरते हैं, हजारों कच्चे-पक्के मकान बह जाते हैं या फिर कटाव की वजह से गिर जाते हैं। फसलों की तबाही से लाखों किसान हर साल बर्बाद होते हैं। डूबते-उतराते उत्तर बिहार के लोगों ने इन्हीं हालातों में रचने-बसने की कला सीख ली है। डूबते-उतराते उत्तर बिहार के लोगों को ये समझा दिया गया है कि सालाना तबाही एक प्राकृतिक आपदा है। प्राकृतिक आपदा की समझ विकसित होने के बाद तबाही के गुनहगार राहत-बचाव के सालाना लूट वाले उर्स में शामिल हो जाते हैं। बिहार की इस बर्बादी की मीडिया रिपोर्टिंग भी अज्ञानता के अंधकूप में भटकती दिखती है। न तो तथ्यों की पड़ताल, ना कोई अध्ययन और ना कोई रिसर्च। मीडिया रिपोर्टिंग में बस लफ्जों की बाजीगरी और नाटकीयता का मंचन होता रहता है।

   भागलपुर में मची तबाही के लिए नेपाल और बरसात को कोस रही मीडिया रिपोर्टिंग ये बताने कि लिए काफी है कि टीवी रिपोर्टिंग मर चुकी है। राहत और बचाव की खामियों से आगे न तो रिपोर्टर सोच पा रहा है और ना ही डेस्क पर बैठे लिखाड़ी। ग़म और आंसुओं को कैसे माल बना कर बेचा जाए सारा फोकस इसी पर है। पिछले साल भी सारा फोकस इसी पर था, अगले साल भी सारा फोकस इसी पर रहेगा। बरसात भी हर साल होगी, नेपाल भी वहीं रहेगा जहां वो आज है। इसमें से कुछ भी बदलने वाला नहीं है। सरकार और मीडिया के लिए ये सबसे अच्छी स्थिति है कि बरसात हर साल आती है और पड़ोस में पहाड़ों पर बसा नेपाल है।
   भागलपुर में तबाही भी हर साल आती है। 1950 में ही वैज्ञानिक कपिल भट्टाचार्य ने ये बता दिया था कि बाढ़ से भागलपुर बर्बाद हो जाएगा। तब कपिल भट्टाचार्य को विकास विरोधी वैज्ञानिक बताया गया। तब कपिल भट्टाचार्य की रिपोर्ट पर विचार कर रही सरकार को विकास विरोधी बताया गया। ये वो दौर था जब पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर फरक्का बैराज बनाने का विचार सामने आया था। वैज्ञानिक कपिल शर्मा ने तब इसका विरोध करते हुए कहा था कि फरक्का के कारण बंगाल के मालदा, मुर्शीदाबाद के साथ बिहार के पटना, बरौनी, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया हर साल पानी में डूबेंगे। 1971 में बिहार में अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ आई। ये वही साल है जिस साल फरक्का बैराज बन कर तैयार हुआ। फरक्का बैराज बनने का बाद गंगा नदी का बहाव अवरुद्ध हुआ और नदी में गाद बढती गई।
    गंगा बिहार के ठीक मध्य से होकर गुजरती है। यह पश्चिम में बक्सर जिले से राज्य में प्रवेश करती है और भागलपुर तक 445 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई झारखंड और फिर बंगाल में प्रवेश कर जाती है। बिहार की ज्यादातर नदियां गंगा में ही मिलती हैं और गंगा ही उनका पानी बंगाल की खाड़ी तक पहुंचाती है। फरक्का बैराज बनने से पहले गैर बरसाती मौसमों में बिहार में गंगा की औसत गहराई 12-14 मीटर हुआ करती थी जो अब मात्र 6-7 मीटर रह गई है। मतलब गाद भरने से गंगा उथली हो गई है और अब वो सोन, गंडक, बूढ़ी गंडक समेत दर्जनों नदियों का पानी ढो पाने में सक्षम नहीं है।
  2016 में जब बिहार की राजधानी पटना में गंगा की पानी घुसा और पटना और भागलपुर में तकरीबन तीन सौ लोग बाढ़ से मरे तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर फरक्का बैराज हटाने की मांग की। लेकिन तबाही को विकास समझने-समझाने वाली 1950 वाली सोच 2016 में भी मौजूद रही और फरक्का के मसले पर केंद्र सरकार ने विचार तक नहीं किया।
  अब उथली होने के साथ गंगा का स्वभाव भी बदला है। ऐसा लगता है कि बरसात के मौसम में गंगा फरक्का में जाकर ठहर जाती है अंजाम ये होता है कि ये अपनी सहायक नदियों का पानी नहीं खीच पाती है और इसक सहायक नदियां उफना जाती हैं। गंगा की सहायक धाराओं के उफनाने से पूरा उत्तर बिहार डूब जाता है।
  हैरानी है कि तबाही की इस वजह पर कोई चर्चा नहीं हो रही। न तो राज्य की विधानसभा में तबाही की मूल वजह पर कोई चर्चा होती है और ना ही लोकसभा में बिहार के सांसद मूल वजह पर कोई चर्चा कर पाते हैं। मीडिया से तो ऐसी उम्मीद ही अब नहीं की जा सकती। उम्मीद बिहार की उसी जनता से की जा सकती है जो हर साल तबाह और बर्बाद हो रही है। यही जनता एक दिन फरक्का बैराज का अंत लिखेगी।    

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...