तो बेहद चालाकी से ट्रेड यूनियन और कर्मचारी-मजदूर आंदोलनों को खत्म कर सत्ता-समाज ने ठेका-मजदूरी की विवशता खड़ी कर ही दी। इसमें सरकार ठेकेदार होगी और विभागों का कामकाज करने वाले ठेका मजदूर। बिहार में अब स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति होगी ही नहीं। सरकार की दलील है कि स्थायी नियुक्ति होने पर सेवा-शर्त और तबादलों की समस्या बनी रहती है जिससे शिक्षण कार्य बाधित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को सही माना और स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को ही रोक दिया। स्कूल अब ठेके वाले शिक्षक चलाएंगे। सरकार की साजिश और कोर्ट के बे-सिर-पैर वाले फैसले से अधिकारी भी खुश हैं। लेकिन, वो ये नहीं सोच रहे कि कल ऐसी दलीलें उनके लिए भी कोर्ट में रखी जाएंगी क्योंकि, तबादले तो शिक्षा अधिकारी के भी होते हैं और डीएम के भी। डीएम के तबादले से भी कामकाज प्रभावित होता है। और सरकार की दलील मान लें तो फिर स्थायी कलेक्टर की ज़रूरत ही क्या है ? किसी एजेंसी को ठेका दे दीजिए वो टैक्स कलेक्ट कर लेगी। ऐसी दलीलें बाकी सरकारी पदों पर बैठे लोगों के लिए भी दी जा सकती हैं। ये दलील सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए भी दी जानी चाहिए। जरूरत ही क्या है स्थायी जजों की ? निविदा वाले जज भी तो फैसला सुना ही सकते हैं। तो फिर बेहतर यही होगा कि देश की सारी व्यवस्था ठेके पर दे दी जाए। ठेका एजेंसी ठीक से काम ना करे तो फिर दूसरी एजेंसी को काम दे दिया जाए। ऐसी व्यवस्था हो कि राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता करे और राष्ट्रपति देश चलाने की जिम्मेदारी किसी एजेंसी को दे दें। एजेंसी ठीक से काम करे तो फिर उसी को मौका दिया करें और अगर ठीक से काम ना करे तो निविदा के जरिए दूसरी एजेंसी को देश सौंप दिया जाए। जब सबकुछ ठेके पर चल सकता है तो फिर देश भी ठेके पर चल सकता है। इसकी शुरुआत स्कूलों से हो ही गई है अब सुप्रीम कोर्ट के जजों की स्थायी नियुक्ति रद्द कर उन्हीं जजों को निविदा पर तैनात कर इस मुहिम को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।
Monday, May 13, 2019
Friday, May 10, 2019
ये इंसाफ नहीं अदालत का थोपा हुआ फैसला है मी लॉर्ड
सरकार ठेकेदार और कर्मचारी ठेका मजदूर। बिहार के नियोजित शिक्षकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यही कहता है। ये फैसला नैसर्गिक न्याय के विपरीत है। ये फैसला जन कल्याणकारी राज की अवधारणा के भी विपरीत है। ये फैसला सरकार की शोषणकारी नीति का समर्थन है। इस फैसले को चुनौती दी जानी चाहिए क्योंकि, कोई भी अपनी मर्जी से कम वेतन पर काम नहीं करता। वो अपने सम्मान और गरिमा की कीमत पर अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए इसे स्वीकार करता है। वो अपनी और अपनी प्रतिष्ठा की कीमत पर ऐसा करता है क्योंकि उसे पता होता है कि अगर वो कम वेतन पर काम नहीं करेगा तो उस पर आश्रित इससे बहुत पीड़ित होंगे। कम वेतन देने या ऐसी कोई और स्थिति बंधुआ मजदूरी के समान है। इसका उपयोग अपनी प्रभावशाली स्थिति का फायदा उठाते हुए किया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि ये कृत्य शोषणकारी, दमनकारी और परपीड़क है और इससे अस्वैच्छिक दासता थोपी जाती है। सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ आम आदमी के पास दो लोकतांत्रिक रास्ते होते हैं। पहले वो विरोध-आंदोलनों के ज़रिए सरकार से टकराता है और सरकार जब नहीं सुनती है तो अदालत की राह पकड़ता है। हैरानी की बात ये है कि बिहार के नियोजित शिक्षकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दमनकारी, शोषणकारी नीतियों की रक्षा की है और लाखों लोगों की अघोषित दासता को कानूनी शक्ल दे दी है। समान काम के लिए समान वेतन एक सिद्धांत है, इसे खारिज नहीं किया जा सकता। निजी स्कूलों का व्यवसाय बढ़ाने के लिए सरकारी शिक्षा को चौपट करने की साजिश को अदालती समर्थन मिलने लगेगा तो फिर देश अराजकता का शिकार हो जाएगा। सरकार जब सबकुछ निजी हाथों को सौंप देगी तो फिर एक दिन अदालतें भी किसी कॉर्पोरेट की दुकानें हो जाएंगी। कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे अगर सरकारों के पास नहीं होंगे तो फिर एक दिन सारे विभाग बड़ी कंपनियों के मैनेजर चलाने लगेंगे। सरकार कंपनियों के अधीन होगी और देश में कंपनी राज होगा। हैरानी है कि देश की आला अदालत ने सरकार की दलील मान ली। कल को सरकार कहेगी कि उसके पास अस्पताल चलाने के पैसे नहीं हैं, सड़क बनाने के लिए पैसे नहीं हैं, और जजों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं तब क्या आला अदालत सरकार के फैसले के साथ खड़ी होगी ? कोर्ट का ये फैसला वाकई हैरान करने वाला है। यही हाल रहा तो फिर सरकारों की ज़रूर ही क्या है। कंपनियों के मैनेजर ही देश चला लें। शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय का भ्रम बेहद मुनाफे के धंधे हैं। और हां, इन्साफ जालिमों की हिमायत में जायेगा,
ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा।
ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा।
Thursday, April 18, 2019
जिसका जवान बेटा मरा वो भी राष्ट्रवादी है
जेट एयरवेज के कैप्टेन अमित राय से मिलिए और उनके गहरे सदमे को समझने की कोशिश कीजिए। जेट एयरवेज के बंद होने से 20 हजार से ज्यादा लोग अचानक सड़कों पर आ गए हैं। अमित राय भी उनमें शामिल हैं। आसमान से धाराशायी हुए इन लोगों के पास कई यादें हैं। अमित राय के पास जो याद है वो कलेजा दहलाने वाली है। कुछ दिनों पहले अमित राय जब दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे तभी उनके ह्वाट्स ऐप पर एक मैसेज आया। मैसेज जेट एयरवेज के एक एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर का था। इंजीनियर ने एप्लास्टिक एनीमिया से जूझ रहे अपने बेटे के इलाज के लिए अपने तमाम सहयोगियों से मदद मांगी थी। जेट एयरवेज के ज्यादातर कर्मचारियों की आर्थिक हालत बेहद खराब थी और कोई भी मदद की स्थिति में नहीं था। वक्त पर पैसों का इंतजाम नहीं हो सका और एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर के बेटे की मौत हो गई। मौत तो अब जेट एयरवेज की भी हो गई। 20 हजार से ज्यादा कर्मचारियों का घर-परिवार अब कैसी मुश्किलों में होगा ये मुझे नहीं पता लेकिन, जिस पिता ने पैसों के अभाव में अपने बेटे को तिल-तिल मरता देखा है उस पिता के दर्द को तो हम और आप महसूस कर ही सकते हैं।
विपत्तियों का जो पहाड़ अचानक इन परिवारों पर टूटा है उसके पीछे हमारी-आपकी चुप्पी भी जिम्मेदार है। 8 नवंबर 2016 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया। दावा किया गया कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। अमीरों का कालाधन निकलेगा और गरीबों के पास पहुंचेगा। और भी कई दावे थे। बाद के दिनों में ये साफ दिखा कि आतंकवाद और बेलगाम हुआ, अमीर और अमीर हुए, गरीब और गरीब हुए। दावे तो खोखले थे लेकिन उन दावों में हमे-आपको भी बहुत खोखला किया। सेंटर ऑफ सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट (CSE) द्वारा मंगलवार को जारी ‘State of Working India 2019' रिपोर्ट में यह कहा गया है कि साल 2016 से 2018 के बीच करीब 50 लाख पुरुषों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। नोटबंदी के दौरान बेरोजगार हुए ये लोग किसी एयरक्राफ्ट में इंजीनियर नहीं थे। जब एयरक्राफ्ट के मेंटेनेंस इंजीनियर के पास बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं जुट पाए तो फिर छोटी-मोटी तनख्वाह या दिहाड़ी वाले इन 50 लाख लोगों के परिवार अब किन हालात में होंगे जब इनकी आय का वो जरिया भी एक सनकी फैसले ने छीन लिया। उम्मीद है आप फर्जी नारों को किनारे लगा कर असली मर्म समझने की कोशिश करेंगे। आज से पांच साल पहले तक BSNL और भारतीय डाक विभाग की नौकरी को बेहद अच्छी नौकरी माना जाता है। पिछले पांच सालों में ये हालत हो गई कि BSNL के पास अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं हैं और भारतीय डाक विभाग बर्बाद हो चुका है। अब इन दोनों विभागों से कई हजार या फिर कई लाख लोग जबरन निकाल दिए जाएंगे। नौकरी से निकाले जाने के बाद इनमें कौन क्या करेगा हम नहीं जानते लेकिन इनलोगों के खुशहाल परिवारों पर मुश्किलों का पहाड़ टूटना तय है। राष्ट्र के लोगों को बदहाल-बेहाल-कंगाल करने वाले लोग जिस राष्ट्रवाद की बात कर रहे हैं दरअसल वो सोच ही फर्जी है। इन नकली राष्ट्रवादी नारों के जरिए सिसकियों का शोर दबाया जा रहा है। राष्ट्रवाद का मतलब राष्ट्र को खुशहाल बनाना होता है बदहाल बनाना नहीं। कैप्टेन अमित राय का मोबाइल फोन, कैप्टेन अमित राय के आंसू और कैप्टेन अमित राय के दर्द अपने साथ काम करने वाले एक सहयोगी के लिए उमड़-उभर रहे हैं। नोटबंदी के दौरान बेरोजगार हुए 50 लाख लोग, जेट एयरवेज के बंद होने से बेरोजगार हुए 20 हजार लोग, BSNL को संकट में डालकर और भारतीय डाक विभाग को बर्बाद कर जिन लोगों को बेरोजगार करने की तैयारी है उनमें भले ही हम और आप शामिल नहीं हैं लेकिन हम इस बात की गांरटी नहीं दे सकते कि जिस रोजगार से हम जुड़े हैं कल उस रोजगार के सामने संकट नहीं होगा। हमारे सामने उस एयक्राफ्ट इंजीनियर की कहानी तो है जिसके बेटे की मौत पैसों के अभाव में हो गई लेकिन, उन 50 लाख लोगों की कहानी हमारे पास नहीं है जो नोटबंदी की वजह से बेरोजगार हुए। संभव है इनमें से कई लोगों के पास कैप्टेन अमित राय से ज्यादा गहरे सदमे हों। अब ये आपको तय करना है कि आप फर्जी राष्ट्रवाद गढ़ने वाली उस भीड़ की जीत का जश्न मना रहे हैं जिस भीड़ ने लाखों जिंदगियों को गहरे सदमे दिए हैं या फिर उन लोगों के साथ खड़े हैं जो इस वक्त मुश्किल हालातों से जूझ रहे हैं।
Sunday, March 17, 2019
इस्लाम: बिना गीता-बाईबिल के क़ुरान नहीं
इस्लाम को मानने और
समझने के दावे करने वाले ज्यादातर लोग आपको ये बताते हुए मिल जाएंगे कि इस्लाम में
क़ुरान के अलावा किसी दूसरी मज़हबी किताब को जगह नहीं दी गई है। कम पढ़े-लिखे
मुसलमान जब ये बात कहते हैं तो ऐसा लगता है कि इस्लाम के जानकारों ने ज्यादातर मुसलमानों
को मज़हबी मामलों में अंधेरों में ही रखा है। इस्लाम की जो मूल अवधारणा है, भारत
में ठीक उसके विपरीत इस्लाम की व्याख्या दिखती है। कुछ मुस्लिम विद्वानों को छोड़
दें तो ज्यादातर मज़हबी जानकारों ने इस्लाम की ग़लत व्याख्या ही की है। क़ुरान को
लेकर ही बहुत सारी ग़लतफ़हमियां पैदा की गई हैं। बहुत लोगों का ये मानना कि क़ुरान
ही एक मात्र मज़हबी किताब है और सिर्फ क़ुरान ही ईश्वर प्रेरित है। ये अवधारणा
पूरी तरह से क़ुरान के विपरीत है।
क़ुरान में ये बात बार-बार दुहराई गई है कि मुहम्मद साहब से पहले भी हर मुल्क और हर क़ौम में रसूल होते रहे हैं। क़ुरान में साफ कहा गया है कि ‘इसमें कोई शक नहीं कि तुमसे पहले अल्लाह ने सब क़ौमों में रसूल भेजे हैं।’ कुरान कहता है कि ‘जो कुछ मैंने तुमसे कहा है वो सब पहले के लोगों के पवित्र ग्रंथों में मौजूद है। सब कौमों में ईश्वर ने पैग़ंबर(अवतार) भेजे हैं। उन पैग़ंबरों में हम एक-दूसरे के साथ किसी तरह का फर्क नहीं करते। सबको एक बराबर मानते हैं और सबकी एक ही तालीम है।’ कुरान के मुताबिक किसी रसूल को मानना और किसी को न मानना या रसूलों में फर्क करना, किसी को बड़ा या किसी को छोटा मानना कुफ्र या नाशुक्रापन है। कुरान में एक जगह काफ़ेरूने हक्क़ा शब्द का इस्तेमाल है। काफ़ेरूने हक्क़ा का मतलब बताया गया है सबसे बड़ा काफिर। क़ुरान में काफ़ेरूने हक्क़ा उन्हें बताया गया है जो क़ुरान के अलावा दूसरी मज़हबी क़िताबों को, इस्लाम के अलावा दूसरे धर्मों को और मुहम्मद साहब के अलावा दूसरे धर्मों के अवतारों और उनके उपदेशों को ख़ारिज करते हैं। क़ुरान अपने से पहले के सब धर्म ग्रंथों को, सब मज़हबी किताबों को भी अपनी तरह ठीक मानता है।
क़ुरान में ये बात बार-बार दुहराई गई है कि मुहम्मद साहब से पहले भी हर मुल्क और हर क़ौम में रसूल होते रहे हैं। क़ुरान में साफ कहा गया है कि ‘इसमें कोई शक नहीं कि तुमसे पहले अल्लाह ने सब क़ौमों में रसूल भेजे हैं।’ कुरान कहता है कि ‘जो कुछ मैंने तुमसे कहा है वो सब पहले के लोगों के पवित्र ग्रंथों में मौजूद है। सब कौमों में ईश्वर ने पैग़ंबर(अवतार) भेजे हैं। उन पैग़ंबरों में हम एक-दूसरे के साथ किसी तरह का फर्क नहीं करते। सबको एक बराबर मानते हैं और सबकी एक ही तालीम है।’ कुरान के मुताबिक किसी रसूल को मानना और किसी को न मानना या रसूलों में फर्क करना, किसी को बड़ा या किसी को छोटा मानना कुफ्र या नाशुक्रापन है। कुरान में एक जगह काफ़ेरूने हक्क़ा शब्द का इस्तेमाल है। काफ़ेरूने हक्क़ा का मतलब बताया गया है सबसे बड़ा काफिर। क़ुरान में काफ़ेरूने हक्क़ा उन्हें बताया गया है जो क़ुरान के अलावा दूसरी मज़हबी क़िताबों को, इस्लाम के अलावा दूसरे धर्मों को और मुहम्मद साहब के अलावा दूसरे धर्मों के अवतारों और उनके उपदेशों को ख़ारिज करते हैं। क़ुरान अपने से पहले के सब धर्म ग्रंथों को, सब मज़हबी किताबों को भी अपनी तरह ठीक मानता है।
इस्लाम को लेकर भारत में जो दूसरी धारणा
विकसित गई वो है ज़बरदस्ती और धोखे से धर्म परिवर्तन। जबकि क़ुरान में साफ कहा गया
है कि मज़हब के मामले में किसी से कोई ज़बरदस्ती नहीं होनी चाहिए। ये भी कहा गया
है कि धर्म या नेकी इस बात में नहीं है कि
किसी से झूठ बोलकर या जब़रदस्ती मज़हबी बात मनवाई जाए। इस्लाम कहता है कि असली दीन
दूसरों के साथ नेकी है कोई रीति-रिवाज नहीं। क़ुरान में कहीं ये नहीं गया है कि
नमाज़ करते वक्त चेहरा पूरब की तरह हो या पश्चिम की तरह।
मतलब, गीता, गुरु ग्रंथ साहिब, बाईबिल या फिर
इस किस्म के तमाम धर्म ग्रंथों को नकारने वाले दरअसल क़ुरान के उपदेशों को नकारते
हैं। इस्लाम के अलावा दूसरे धर्म-मज़हबों को ख़ारिज करने वाले क़ुरान के उपदेशों
को नकारते हैं। भारत के मुसलमानों को भारत के इस्लामिक जानकारों ने ही मज़हबी
मामलों में अंधेरे में रखा है। इसलिए ये ज़रूरी है कि क़ुरान की रौशनी में इस्लाम
को समझा जाए। भारत के वो लोग जो बिना इस्लाम को जाने-समझे मुसलमानों से नफरत करते
हैं वो भी काफ़ेरूने हक्का हैं। इस्लाम किसी भी धर्म का विरोध नहीं करता, किसी भी
धर्म ग्रंथ के खिलाफ नहीं होता और किसी भी अवतार, संत, फकीर को खारिज नहीं करता।
इस्लाम में सर्व धर्म समभाव की अवधारणा है।
Tuesday, March 12, 2019
इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी-03
मुहम्मद साहब से
पहले अरब किसी देश की शक्ल में नहीं था। कभी-कभार अलग-अलग हिस्सों में छोटी-छोटी
बादशाहतें ज़रूर कायम हुईं। छठी शताब्दी तक अरब में इसी किस्म की छोटी बादशाहतें
कायम होती रहीं हैं। मक्का और मदीना भी मुहम्मद साहब के वक्त में अलग-अलग कबीलों
में बंटे शहर थे। इन कबीलों की कई शाखें होतीं थीं और सैकड़ों घरानों के हजारों
परिवार एक कबीले में रहा करते थे। कबीले का हर सदस्य दूसरे सदस्य के लिए हर किस्म
की कुर्बानी देता था। कबीले के किसी एक सदस्य के साथ दूसरे कबीले के लोग बदसलूकी
करते थे तो उसे पूरे कबीले की बेइज्ज़ती मानी जाती थी और फिर बदले के लिए
खून-ख़राबा होता रहता था। कई कबीले तो पीढ़ियों तक एक-दूसरे से जंग लड़ते थे। हर
कबीले का एक सरदार होता था जिसे शेख कहते थे। ये शेख उस कबीले का हाकिम, जरनैल और
पंडा-पुरोहित हुआ करता था। हर कबीले को लगता था कि उसका कबीला सर्वश्रेष्ठ नस्ल का
है और उसके कबीले की मान्यता ही पवित्र है। एक मान्यता पूरे अरब में थी कि अगर
किसी का कत्ल हो गया तो उसकी आत्मा चिड़िया बनकर उसके कब्र पर तब तक मंडराती रहती
थी जब तक कि उसके कत्ल का बदला कत्ल से ही नहीं ले लिया जाए।
कबीलों की आपसी लड़ाइयों में जो स्त्री-पुरुष
कैद कर लिए जाते थे वो ग़ुलाम बना लिए जाते थे। महिलाओं से अरबों का बर्ताव बेहद
अमानवीय था। कई कबीलों में बेटियों को ज़िंदा दफनाने के बाद उत्सव मनाने का रिवाज
था। आलम ये था कि किसी की मौत के बाद उसकी बीवी किसी और की मिल्कीयत हो जाती थी।
एक पुरुष कई स्त्रियों से और एक स्त्री कई पुरुषों से विवाह कर सकते थे। दो-चार
शहरों को छोड़कर सारा अरब खाना-बदोश था। पानी की जरूरत के मुताबिक कबीले जगह बदलते
रहते थे। लेकिन अरब के कबीलों में साल के चार महीने शांति के होते थे। इस दौरान
आपसी लड़ाइयां बंद हो जाती थीं और कबीलों के पुराने झगड़ों को खत्म करने की
कोशिशें भी होती थीं। इसी दौरान अरब के लोग काबा आकर मक्का की यात्रा करते थे।
मुहम्मद साहब से पहले ही काबा अरबों का तीर्थ स्थान था।
इन्हीं परिस्थितियों में इस्लाम का अवतरण
हुआ। मान्यता है कि मुहम्मद साहब जब चालीस साल के थे तब रात को उन्हें आवाज़ आई ‘ऐलान कर’।
मुहम्मद साहब इस आवाज़ के मायने नहीं समझ पाए। एक-एक कर ये आवाज़ तीन बार आई।
तीसरी बार आवाज़ सुनकर मुहम्मद साहब घबरा गए और पूछा ‘क्या
ऐलान करूं ?’ जवाब मिला—“ऐलान कर अपने
उसी रब के नाम पर जिसने कायनात बनाई है। जिसने प्रेम से प्रेम का पुतला आदमी बनाया
है। ऐलान कर तेरा रब बड़ा ही दयावान है, उसने आदमी को सोचने-समझने की ताक़त दी,
आदमी को वो सब बातें सिखाई जो वो नहीं जानता है।“ फिर एक रात
आवाज आई कि “जा उठ! और रब्ब का संदेश
दुनिया तक पहुंचा।“
मुहम्मद साहब परेशान रहने लगे। धीरे-धीरे वक्त
गुजरता गया। मुहम्मद साहब की बेचैनी बढ़ती गई। उनकी हालत देख उनकी पत्नी ख़दीजा से
रहा नहीं गया। ख़दीजा के एक रिश्तेदार थे बरका। बरका यहूदी और ईसाई धर्म के बड़े
विद्वान थे। एक दिन मुहम्मद साहब को लेकर खदीजा अपने रिश्तेदार बरका के पास गईं।
मुहम्मद साहब ने बरका को सारा हाल सुनाया। बरका ने मुहम्मद साहब को बताया कि वो
खुदा के भेजे पैग़ंबर हैं और अब उन्हें वही करना चाहिए जो उनका खुदा उनसे कह रहा
है।
तीन साल तक संदेह और संशय में जीने के बाद
मुहम्मद साहब अचानक एक दिन पैग़ंबरी की राह पर निकल पड़े। कहा जाता है कि जिस दिन
वो पैग़ंबरी की राह पर निकले उस दिन के पहले वाली रात को उन्हें आवाज़ आई थी कि ‘ऐ चादर में लिपटे हुए, उठ और
लोगों को आगाह कर और अपने रब्ब की बड़ाई कर और अपने कपड़ों को साफ कर और अपने
मैलेपन से बच और दूसरों की सेवा करने के लिए किसी पर अहसान मत जता और अपने रब्ब के
लिए सब्र से काम ले।’
मुहम्मद साहब का इलहाम का ये दावा धर्मों के
इतिहास में कोई नई बात नहीं थी। दुनिया के
तमाम धर्मों को स्थापित करने वालों पीरों-पैग़बंरों, वलियों, ऋषियों-महात्माओं ने
अपने-अपने तरीक़े से इसका दावा किया है। वेद, तौरेत, इंजील को मानने वाले
अरबों-अरब लोग अपने-अपने धर्म ग्रंथों को ईश्वर की रचना ही मानते हैं।
Sunday, March 10, 2019
इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी-02
यहूदियों के बीच
ऊंच-नीच का बहुत भेद तो था ही वैज्ञानिक सोच का घोर अभाव था। ईसाइयों के बीच
ऊंच-नीच का भेद तो नहीं था लेकिन ईसाइयों के बीच घोर अवैज्ञानिकता थी। तब ईसाइयों
के बीच धर्मांधता का दौर था। आलम ये था कि बीमारी की हालत में इलाज करवाना धर्म
विरुद्ध माना जाता था। दवाओं से इलाज करवाना पाप माना जाता था। कहा जाता था कि
बीमार लोगों को गिरजे के बुतों और पादरियों के पास जाकर दुआएं मांगनी चाहिए।
ईसाइयों के बीच झाड़-फूंक और गंडे-तावीज का चलन था। धर्मांधता का जोर इतना था कि
दवाओं से इलाज करने वालों को ईसाई सम्राट मौत की सज़ा देते थे। कुस्तुनतुनिया के
सम्राट का जोर जहां तक था वहां ईसाई धर्म ग्रंथ के अलावा किसी दूसरी किताब के
पढ़ने पर कड़ी सज़ा का प्रावधान था। इसके अलावा ईसाई धर्म में मरियम को लेकर भी
विवाद था। कुछ लोग मरियम को ईश्वर की मां मानते थे तो कुछ लोग ईसा की मां। इस
विवाद की वजह से ईसाई धर्म के बीच भीषण रक्तपात हुआ। शहर के शहर लाशों से पटने
लगे। रोम, कुस्तुनतुनिया और सिकंदरिया के पादरियों के बीच वर्चस्व का ऐसा संघर्ष
छिड़ा कि खुद पादरी ही नरसंहार करवाने लगे। ईसाई संतो-महंतों की फौजें तब के
सम्राटों की फौजों से मिलकर वर्चस्व की लड़ाई में आम लोगों का खून बहाने लगीं और
इसे ही धर्म रक्षा के लिए युद्ध बताने लगीं। यहूदियों और ईसाइयों की धर्मांधता और
हिंसा से लोग तंग आ चुके थे। इन परिस्थितियों में मुहम्मद साहब का उदय एक ऐतिहासिक
घटना थी।
मुहम्मद साहब के जन्म से पहले यमन के हरे-भरे
इलाकों पर इथियोपिया के बादशाह ने कब्जा कर लिया था। अरब के उत्तर और पश्चिम में
रोमी सल्तनत और पूरब में ईरान की बादशाहत थी। हेजाज़ के इलाके को वहां के पुराने
वाशिंदों ने अपनी बहादुरी के दम पर बाहरी बादशाहों की हुकूमत से बचा रखा था। इसी
इलाके में मक्का शहर है जहां इस्लाम जन्मा और मदीना ही जहां वो पनपा। रेगिस्तान के
इलाके तब बेकार हुआ करते थे। हेजाज़, नज़द, हज़रमौत और ओमान ही वो इलाके थे जो खुद
को आज़ाद कह सकते थे। मुहम्मद साहब का जन्म जिस ख़ानदान में हुआ उस खानदान को बनी
हाशिम कहा जाता था। अपने ज़माने में हाशिम मक्का का हाकिम था और हाशिम की शोहरत
बहुत दूर-दूर तक फैली थी। हाशिम के बाद हाशिम के भाई मुत्तलिब और मुत्तलिब के बाद
हाशिम के बेटे अब्दुल मुत्तलिब गद्दी पर बैठे। अब्दुल मुत्तलिब के सबसे छोटे बेटे
अब्दुल्ला की मौत 25 साल की उम्र में ही हो गई। अब्दुल्ला की मौत के कुछ ही दिनों
बाद उनकी बेवा आमिना ने मुहम्मद साहब को जन्म दिया। अब्दुल मुत्तलिब के बड़े बेटे
अबु तालिब ने मुहम्मद साहब का पालन-पोषण किया। 10-12 साल की उम्र में ही मुहम्मद
साहब को अपने खानदान के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा और तिज़ारती काफिले के साथ सीरिया
के फलस्तीन और यरुसलम की कई यात्राएं करनी पड़ी। इन यात्राओं के दौरान मुहम्मद
साहब का साबका ईसाई और यहूदियों से हुआ। तब सीरिया एशिया की सबसे सुखी और
वैज्ञानिक सोच में सबसे अव्वल देशों में गिना जाता था। सिकंदर के बाद दशकों तक ये
देश यूनानियों के कब्जे में रहा था। यूनानियों ने धर्म ग्रंथों के अलावा विज्ञान
और दर्शन की पढ़ाई पर जोर दिया। इसी दौरान यहां बौद्ध धर्म ने खूब विस्तार पाया। लेकिन,
मुहम्मद साहब के समय कुस्तुनतुनिया पर ईसाई सम्राट का कब्जा हो चुका था और सम्राट
थियोडोसियस ने सीरिया में ज्ञान-विज्ञान को अपराध घोषित कर दिया था। थियोडोसियस, बौद्ध
धर्म और विज्ञान को पाप मानता था। उसने आदेश दिया था कि जो लोग सिकंदरिया और रोम
के ईसाई पोप के बताए मार्ग पर नहीं चलेंगे उनको देश निकाला दे दिया जाएगा। यहूदी
रिवाज से ईस्टर का त्यौहार मनाने वाले लोगों को मौत की सज़ा दे दी जाती थी। इसी
दौरान ईसाई संत आगस्टाइन ने ये आदेश दिया कि जिन किताबों में धरती को गोल बताया
गया है उन्हें जला दिया जाए और उन किताबों को पढ़ने वालों को सज़ा दी जाए। आगस्टाइन
ने कहा कि इंजील में धरती को चिपटा लिखा गया है इसलिए धरती को चिपटा मानना ही धर्म
है। संत आगस्टाइन और पोप ग्रिगरी के कहने पर रोम के मशहूर पैलेटाइन लाइब्रेरी को
आग लगा दी गई और गणित, भूगोल, खगोलशास्त्र और वैद्यकी पढ़ने वालों को देश से निकाल
दिया गया। डॉक्टर और दार्शनिकों की खोज-खोज कर हत्या की जाने लगी। हुक्म दिया गया
कि ‘बैपतिस्मे के वक्त तीन बार पानी
में डुबकी लगा लेना, शहद और दूध मिलाकर पी लेना, कपड़े या जूते पहनते वक्त माथे पर
क्रूश का निशान कर लेना और मरियम और इसाई संतों की मूर्तियों के सामने प्रार्थना
करना ही सारी बीमारियों का इलाज है। इसके अलावा किसी और विधि से इलाज करवाने वाले
और इलाज करने वाले को मौत की सज़ा दी जाए।‘
ये बात साफ होती है कि वो सीरिया जो यूनानों
के वक्त ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की रौशनी देख चुका था ईसाइयों के वक्त धर्मांधता
की मूर्खता देख रहा था। यही सारी बातें मुहम्मद साहब का प्रभावित करने लगीं।
जारी है....
इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी-01 पढ़ने के लिए नीचे वाले लिंक पर जाएं
इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी-01 पढ़ने के लिए नीचे वाले लिंक पर जाएं
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Thursday, March 7, 2019
इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी- 01
मैं नास्तिक हूं और मेरे लिए धार्मिक पुस्तकें आस्था का विषय नहीं हैं बावजूद
इसके मैं अलग-अलग धर्मग्रंथों को पढ़ता हूं। मैंने धर्म पर आस्था रखने वाले कई
लोगों को धर्मग्रंथ पढ़ते देखा है और धर्म का धंधा करने वालों को पाया है कि उनके
पास किसी धर्म की बुनियादी जानकारी नहीं होती। हिंदु धर्मग्रंथ तो पहले से ही घर
में मौजूद थे। बाद के दिनों में मैंने इसाई, इस्लाम और सिख धर्मग्रंथ भी ले लिए।
पटना वाले गुरमीत सिंह जी ने सूरज प्रकाश दिया और रांची वाले वेसाल आज़म ने कुरान
का हिंदी तर्जुमा दिया। IAS अधिकारी रहे तहसीम अहमद जी ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति
से प्रकाशित ‘पैग़म्बर मुहम्मद
क़ुरान और हदीस इस्लामी दर्शन’ किताब दी। इस तरह से मेरे पास कुछ और किताबें हो गईं।
रामचरित मानस की चौपाइयां तब से पढ़ रहा हूं जब उनके मतलब समझ भी नहीं पाता था।
रामायण तब पढ़ी जब मैं 9वीं और 10वीं क्लास में था। बीए फर्स्ट ईयर में था तब पहली
बार गीता पढ़ी। फिर एक बार कह दूं मैं नास्तिक हूं। मैं इन किताबों को सिर्फ किताब
मानता हूं। लेकिन हाल के दिनों में धर्म मानने वालों के बीच जो धर्मोन्माद दिखा
उसने ये साबित किया कि धर्मों का मौजूदा स्वरूप धर्मांधता है। गली-गली घूम रहे
टीकाधारियों और दाढ़ीधारियों से आप उनके धर्म की गूढ़ता नहीं जान सकते। इनमें
ज्यादातर उस कौए के पीछे भागने वाले लोग हैं जिसके बारे में किसी ने कहा है कि वो
कान लेकर भाग रहा है।
भारत की बहुसंख्यक आबादी इस्लाम को
जिस नज़रिए से देखती है वो नज़रिया विकसित किया है भारत के ही कठमुल्लों ने। ये
कठमुल्ले वो लोग हैं जो मजहब का म तो नहीं जानते लेकिन खुद को मजहबी ठेकेदार बनाए
रखना चाहते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि वो लोग जो न धर्मांध हैं और ना ही धर्म की
किसी बंदिश को मानते हैं वो धार्मिक आडंबरों को खारिज करते हुए धर्म-मजहब मानने
वालों को ये बताएं कि उनके धर्मग्रंथ क्या कहते हैं।
भारत में इस्लाम बाहर से आया। अरब
के देशों में सबसे पहले यहूदी ही धर्म की तरह खड़ा हुआ। उससे पहले वहां अलग-अलग
कबीलों में अलग-अलग मान्यताएं थीं लेकिन, वो कबीले किसी एक धर्म का प्रवर्तन नहीं
कर पाए। यहूदियों के बाद ईसाई धर्म ने वहां पांव जमाए। यहूदियों, अलग-अलग कबीलों
और ईसाइयों के बीच भीषण रक्तपात होते रहते थे। ईसा की पहली सदी में रोम के सम्राट
टाइटस ने यहूदियों को फलस्तीन से निकाल दिया। बाद के दिनों में ईसाइयों के आपसी
झगड़ों में इतनी हिंसा हुई कि सीरिया (शाम) और दूसरी कई जगहों से उनको निकाला गया।
इसी दौरान बड़ी तादाद में ईसाई और यहूदी अरब देशों मे जाकर बसे। अरब की एक बड़ी
आबादी इब्राहिम को अपना पूर्वज मानती थी। बाद के दिनों में ये मान्यता यहूदी और
ईसाई धर्म में भी स्थापित हो गई कि इब्राहिम ही यहूदियों और ईसाइयों के पूर्वज थे।
वो इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल की मूर्तियों की उपासना का वक्त था। बाद में
इब्राहिम और इस्माइल के साथ ईसा की मां मरियम की मूर्तियां भी रखी जाने लगीं। इस
तरह से एक मिश्रित संस्कृति का विकास शुरू हुआ लेकिन, यही मिश्रण बाद के दिनों में
बड़े रक्तपात की वजह बना।
यहूदी एक ईश्वर और बहुत सारे
अवतारों के अलावा एज़रा को भगवान का बेटा मानते थे। यहूदियों में छुआछूत बहुत
ज्यादा थी और दूसरी मान्याताओं को वो नीच समझते थे। वो दूसरे धर्मों को नीच और
नापाक मानते थे।
ईसाई धर्म यहूदी के बाद आया था।
ईसाई धर्मावलंबियों का मानना था कि यहूदियों के बीच लकीर की फ़कीरी है और घटिया
रस्मों का चलन है। तब ये माना गया कि ईसाई धर्म यहूदी की ही एक शाखा है और
यहूदियों के बीच धर्म सुधार आंदोलन चला रहा है। यहूदियों की बीसियों मूर्तियों की
जगह ईसाइयों ने त्रिमूर्ति पूजा को तरजीह दी। इन तीन मूर्तियों में ईश्वर, ईसा और
उस मानी हुई आत्मा की मूर्ति हुआ करती थी जिसके बारे में मान्यता है कि उसी आत्मा
के जरिए ईसा की कुंआरी मां मरियम को गर्भ ठहरा था। कुछ जगहों पर ईश्वर, ईसा और
मरियम की त्रिमूर्ति हुआ करती थी। कुछ जगहों पर इन तीन मूर्तियों के अलावा कई
संतों और फ़रिश्तों की मूर्तियां भी हुआ करती थीं।
क्रमश:
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