Thursday, March 7, 2019

इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी- 01

मैं नास्तिक हूं और मेरे लिए धार्मिक पुस्तकें आस्था का विषय नहीं हैं बावजूद इसके मैं अलग-अलग धर्मग्रंथों को पढ़ता हूं। मैंने धर्म पर आस्था रखने वाले कई लोगों को धर्मग्रंथ पढ़ते देखा है और धर्म का धंधा करने वालों को पाया है कि उनके पास किसी धर्म की बुनियादी जानकारी नहीं होती। हिंदु धर्मग्रंथ तो पहले से ही घर में मौजूद थे। बाद के दिनों में मैंने इसाई, इस्लाम और सिख धर्मग्रंथ भी ले लिए। पटना वाले गुरमीत सिंह जी ने सूरज प्रकाश दिया और रांची वाले वेसाल आज़म ने कुरान का हिंदी तर्जुमा दिया। IAS अधिकारी रहे तहसीम अहमद जी ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति से प्रकाशित पैग़म्बर मुहम्मद क़ुरान और हदीस इस्लामी दर्शनकिताब दी। इस तरह से मेरे पास कुछ और किताबें हो गईं। रामचरित मानस की चौपाइयां तब से पढ़ रहा हूं जब उनके मतलब समझ भी नहीं पाता था। रामायण तब पढ़ी जब मैं 9वीं और 10वीं क्लास में था। बीए फर्स्ट ईयर में था तब पहली बार गीता पढ़ी। फिर एक बार कह दूं मैं नास्तिक हूं। मैं इन किताबों को सिर्फ किताब मानता हूं। लेकिन हाल के दिनों में धर्म मानने वालों के बीच जो धर्मोन्माद दिखा उसने ये साबित किया कि धर्मों का मौजूदा स्वरूप धर्मांधता है। गली-गली घूम रहे टीकाधारियों और दाढ़ीधारियों से आप उनके धर्म की गूढ़ता नहीं जान सकते। इनमें ज्यादातर उस कौए के पीछे भागने वाले लोग हैं जिसके बारे में किसी ने कहा है कि वो कान लेकर भाग रहा है।

   भारत की बहुसंख्यक आबादी इस्लाम को जिस नज़रिए से देखती है वो नज़रिया विकसित किया है भारत के ही कठमुल्लों ने। ये कठमुल्ले वो लोग हैं जो मजहब का म तो नहीं जानते लेकिन खुद को मजहबी ठेकेदार बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि वो लोग जो न धर्मांध हैं और ना ही धर्म की किसी बंदिश को मानते हैं वो धार्मिक आडंबरों को खारिज करते हुए धर्म-मजहब मानने वालों को ये बताएं कि उनके धर्मग्रंथ क्या कहते हैं।
   भारत में इस्लाम बाहर से आया। अरब के देशों में सबसे पहले यहूदी ही धर्म की तरह खड़ा हुआ। उससे पहले वहां अलग-अलग कबीलों में अलग-अलग मान्यताएं थीं लेकिन, वो कबीले किसी एक धर्म का प्रवर्तन नहीं कर पाए। यहूदियों के बाद ईसाई धर्म ने वहां पांव जमाए। यहूदियों, अलग-अलग कबीलों और ईसाइयों के बीच भीषण रक्तपात होते रहते थे। ईसा की पहली सदी में रोम के सम्राट टाइटस ने यहूदियों को फलस्तीन से निकाल दिया। बाद के दिनों में ईसाइयों के आपसी झगड़ों में इतनी हिंसा हुई कि सीरिया (शाम) और दूसरी कई जगहों से उनको निकाला गया। इसी दौरान बड़ी तादाद में ईसाई और यहूदी अरब देशों मे जाकर बसे। अरब की एक बड़ी आबादी इब्राहिम को अपना पूर्वज मानती थी। बाद के दिनों में ये मान्यता यहूदी और ईसाई धर्म में भी स्थापित हो गई कि इब्राहिम ही यहूदियों और ईसाइयों के पूर्वज थे। वो इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल की मूर्तियों की उपासना का वक्त था। बाद में इब्राहिम और इस्माइल के साथ ईसा की मां मरियम की मूर्तियां भी रखी जाने लगीं। इस तरह से एक मिश्रित संस्कृति का विकास शुरू हुआ लेकिन, यही मिश्रण बाद के दिनों में बड़े रक्तपात की वजह बना।  
          यहूदी एक ईश्वर और बहुत सारे अवतारों के अलावा एज़रा को भगवान का बेटा मानते थे। यहूदियों में छुआछूत बहुत ज्यादा थी और दूसरी मान्याताओं को वो नीच समझते थे। वो दूसरे धर्मों को नीच और नापाक मानते थे।
   ईसाई धर्म यहूदी के बाद आया था। ईसाई धर्मावलंबियों का मानना था कि यहूदियों के बीच लकीर की फ़कीरी है और घटिया रस्मों का चलन है। तब ये माना गया कि ईसाई धर्म यहूदी की ही एक शाखा है और यहूदियों के बीच धर्म सुधार आंदोलन चला रहा है। यहूदियों की बीसियों मूर्तियों की जगह ईसाइयों ने त्रिमूर्ति पूजा को तरजीह दी। इन तीन मूर्तियों में ईश्वर, ईसा और उस मानी हुई आत्मा की मूर्ति हुआ करती थी जिसके बारे में मान्यता है कि उसी आत्मा के जरिए ईसा की कुंआरी मां मरियम को गर्भ ठहरा था। कुछ जगहों पर ईश्वर, ईसा और मरियम की त्रिमूर्ति हुआ करती थी। कुछ जगहों पर इन तीन मूर्तियों के अलावा कई संतों और फ़रिश्तों की मूर्तियां भी हुआ करती थीं।
क्रमश:

Sunday, February 10, 2019

मेरे पास बाबूजी की सीख है

मेरा ये दृढ़ विश्वास है कि मेरे बाबूजी स्व.श्यामाकांत तिवारी समाजवादी विचारधारा के बेहद करीब थे। 1989-90 में जब देश मंडल और कमंडल आंदोलनों के जरिए जातीय और सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में था मैं देखता था कि मेरे घर तमाम जाति-धर्म के लोग आते थे और मेरे बाबूजी उनके साथ अलग-अलग गांवों में जाकर एकता-अखंडता की कवायद में जुटे रहते थे। हलांकि तब मेरी उम्र 8-9 साल की थी और मेरे लिए तब समाजवाद या फिर दक्षिणपंथ को समझना बेहद मुश्किल था। लेकिन 1992 में जब बाबरी कांड हुआ या फिर 90 के दशक में बिहार में जब नरसंहारों का सिलसिला शुरू हुआ तब बाबूजी की बढ़ी गतिविधियों के बीच उनसे और उनके सहयोगी-मित्रों से वामपंथ, दक्षिणपंथ और समाजवाद पर थोड़ी समझ विकसित होने लगी। बाबूजी अक्सर डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव के विचारों की चर्चा करते रहते थे। वो चंद्रशेखर और जॉर्ज फर्नांडिस के करीबी थे, उनके ज्यादातर कार्यक्रमों में शामिल होते थे। उन्हीं की वजह से बेहद कम उम्र में मैं चंद्रशेखर और जॉर्ज फर्नांडिस से मिल सका था। 


जब में नौवीं में था तब मैने जयप्रकाश नारायण की लिखी मेरी विचार यात्रा पढ़ी। ये किताब दो भागों में है। तब शायद मैं उसे ठीक से समझ नहीं पाया था इसलिए बारहवीं की परीक्षा खत्म होने के बाद मैंने वो दोनों किताबें दोबारा पढ़ीं। जेपी की लिखी ये किताबें समाजवादी विचारधारा की एक पूरी यात्रा हैं। हलांकि बाद के दिनों में जब आपातकाल की परिस्थितियों को समझने के लिए पढ़ना शुरू किया तो जेपी के प्रति आस्था का भाव खत्म सा होता गया। बावजूद इसके मैं मानता हूं कि समाजवादी सोच के जरिए ही भारतीय समाज को बनाए-बचाए रखा जा सकता है।
समाजवाद को परिभाषित करना मेरे लिए मुश्किल काम है। फिर भी मैं इतना तो मानता ही हूं कि ये सिद्धांत और आंदोलन, दोनों ही है और यह विभिन्न ऐतिहासिक और स्थानीय परिस्थितियों में विभिन्न रूप धारण करता है। मूलत: यह वह आंदोलन है जो उत्पादन के मुख्य साधनों के सामाजीकरण पर आधारित वर्गविहीन समाज स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है और जो मजदूर वर्ग को इसका मुख्य आधार बनाता है, क्योंकि वह इस वर्ग को शोषित वर्ग मानता है जिसका ऐतिहासिक कार्य वर्गव्यवस्था का अंत करना है।
अब भारत के परिपेक्ष्य में इस विचारधारा की एक मूल बात पर आइए। सामाजीकरण पर आधारित वर्गविहीन समाज स्थापित करना प्राचीन भारतीय दर्शन है। दुर्भाग्य से अपने देश में समाजवादी आंदोलनों से खड़े हुए नेताओं ने ही वर्ग और वर्ण व्यवस्था को मजबूती देने का काम किया और जातीय विद्वेश को खाद-पानी उपलब्ध करवाया।
समाजवादी विचारक तो व्यक्तिवाद और प्रतिस्पर्द्धा की जगह आपसी सहयोग पर आधारित समाज की कल्पना करते थे। उन्हें विश्वास था कि मानवीय स्वभाव और समाज का विज्ञान गढ़ कर सामाजिक ताने-बाने को बेहतर रूप दिया जा सकता है। परंतु भारत में समाजवाद सत्ता हासिल करने का जरिया बना और इसके लिए जाति आधारित राजनीतिक व्यवस्था खड़ी की गई। इस राजनीतिक व्यवस्था की काट के तौर पर जो राजनीति सामने आई वो सांप्रदायिक है। दक्षिणपंथी विचारधारा ने जातिवादी संकट से जूझने के लिए ज्यादा खतरनाक तरीके अपनाए और सांप्रदायिक सोच को हिंसक तरीके से समाज के बीच स्थापित किया। दुष्परिणाम ये हुआ कि आज जब हमें मानवीय विकास के अलग-अलग आयामों पर विमर्श करना चाहिए तब हम हिंदू-मुस्लिम और दलित-ठाकुर वाले उस विमर्श में उलझे हैं जो विमर्श हजारों साल पहले दकियानूस समाज को गढ़ रहे थे। मनवीय जीवन के सुधार की तमाम बहसें खत्म कर दी गई हैं, तमाम संभावनाओं को धकेल कर समाज को हजारों साल पीछे धकेला जा रहा है और दुर्भाग्य ये कि दक्षिमपंथियों के साथ-साथ इस काम में कथित समाजवादी भी लगे हुए हैं। इस दौर में मुझे अपने बाबूजी अच्छे लगते हैं। वो इस दुनिया में भले नहीं हैं लेकिन जाने से पहले उन्होंने मुझे ये तो बता ही दिया कि जाति-धर्म की सोच से ज्यादा बड़ी है समानता की सोच, ज्यादा अच्छा है एक-दूसरे को गले लगाना।

Saturday, February 2, 2019

मोहन भागवत को ये दिन देखने ही थे

तो ऐसा पहली बार हुआ जब विश्व हिंदू परिषद के किसी कार्यक्रम में संघ प्रमुख को विरोध का सामना करना पड़ा। ये विरोध पहले ही हो जाना चाहिए था। देर से ही सही लोगों को ये बात समझ आ गई कि संघ परिवार के लिए राम मंदिर का मुद्दा, आस्था का मुद्दा नहीं है। ये बात समझने में देर ज़रूर हुई लेकिन जब लोगों ने समझी तो ठीक से समझी कि संघ परिवार की आस्था बीजेपी की सरकार में है राम में नहीं। कुंभ में आयोजित धर्म संसद में धर्म कहां खड़ा था किसी को पता ही नहीं चला। ऐसा लगा जैसे बीजेपी की दो दिवसीय कार्यशाला हो। लेकिन मज़ेदार ये कि जिन लोगों को राम की आस्था के नाम पर जुटाया गया था वो ये समझ गए कि संघ परिवार का मकसद राम मंदिर के आसरे बीजेपी के लिए माहौल बनाना है। ये संत भी समझ गए थे और यही वजह है कि देश के चारों प्रमुख अखाड़ों ने इस बार वीएचपी के इस धर्म संसद का बहिष्कार किया था। बावजूद इसके वीएचपी ने राम मंदिर के नाम पर धर्म संसद में बड़ी संख्या में लोगों को जुटा लिया। लेकिन इस बार दावं उल्टा पड़ गया। कार्यक्रम के दूसरे दिन जितना समय मोदी सरकार को दोबारा मौका देने वाले प्रवचन को दिया गया उसका चौथाई भर हिस्सा भी राम मंदिर मुद्दे को नहीं दिया गया। फिर क्या था लोग असली खेल समझ गए और धर्म संसद के नाम से चल रही राजनीतिक कार्यशाला के खिलाफ उठ खड़े हुए। 
    संध परिवार और उससे जुड़ी वीएचपी के लिए ये घटना गंभीर चुनौती है। ऐसा पहली बार हुआ है जब संत समाज संघ परिवार के खिलाफ खड़ा हुआ है और ऐसा पहली बार हुआ है जब धर्म संसद के नाम पर चल रही बीजेपी कार्यशाला का अपने ही लोगों ने विरोध किया है। ये भी पहली बार हुआ है कि अब अपने ही लोग राम मंदिर के नाम पर बीजेपी का एजेंडा चलाने का आरोप संघ परिवार पर लगाने लगे हैं। संघ के अपने ही लोगों को ये पता चल गया है कि ये सारी कवायद सिर्फ और सिर्फ बीजेपी की सत्ता के लिए होती रही है और बीजेपी को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए संघ परिवार राम को आगे करता रहा है।
   तो इस बार अपनों ने ही पोल खोल दी। उठ गए राम के पक्ष में और जब राम के पक्ष में खड़े हुए तो स्वभाविक तौर पर संघ के विरोध में दिखे। राम के पक्ष में खड़े हुए तो बीजेपी का विरोध दिखा। राम मंदिर के पक्ष में बोल रहा हर आदमी बीजेपी और संघ परिवार के खिलाफ बोलता दिखा।
   ये तो होना ही था क्योंकि, राम नाम की चादर तान कर कब तक सच पर पर्दा डाले रखा जा सकता था। किसी न किसी दिन तो सच को बाहर आना ही था। सच बाहर आया तो हंगामा हो गया। पर्दा हटते ही पता चल गया कि जिसे धर्म संसद बता रहे थे वो तो असल में बीजेपी की कार्यशाला थी। जहां राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की बात कह कर लोगों को जुटाया गया था वहां तो बीजेपी सरकार के लिए रास्तों के तलाश हो रही थी। बस क्या था मुट्ठियां तन गईं। आस्था के नाम पर वोटबैंक खड़ा करने वाले इस खेल की पोल खुल गई। लेकिन इतने कुछ नहीं होता। अभी बहुत कुछ जानना बाकी है इस खेल के बारे में। अभी भी बहुत कुछ पर्दे के पीछे ही छिपा कर रखा गया है। इसलिए ज़रूरी है कि आप सावधान रहें क्योंकि, पर्द के पीछे खड़े सत्ता भोगियों ने न तो अपने परिवार से कभी पहलू खान दिया है और ना ही चंदन गुप्ता। दंगों में मारा जाना आम आदमी के नसीब का क़िस्सा होता है और सत्ता भोगना नेताओं नसीब का हिस्सा होता है। इसलिए अभी भी बहुत सारे पर्दे हटाने हैं आपलोगों को। सही वक्त है एक-एक कर वो सारे पर्दे नोच डालिए जिनके आसरे राजनीति अपने धतकर्म छुपाती रही है और अपनी साजिशें साकार करती रही है।

Sunday, December 23, 2018

ये कहने में भी डर लगता है कि डर लगता है

सिर पर पांव है कि पांव सिर पर कुछ पता ही नहीं चल रहा है। बस ये दिख रहा है कि प्रमोद काका गिरते-पड़ते दौड़े जा रहे हैं। चेहरे पर खौफ ऐसा जैसे कि मॉब लिंचर पीछे पड़े हों। बस भाग रहे हैं और उनके पीछे है घुटनी बाबा का सांड। घुटनी बाबा ने एक सांड पाल रखा है। पाल क्या रखा है छुट्टा छोड़ रखा है। पाला होता तो तिवारी टोले वाले मठ पर खूंटे से बांध कर रखते। चारा-पानी का इंतजाम करते। लेकिन ये सांड तो छुट्टा घूमता है। रबी की हरी फसलों का भोग लगाकर पहलवान बना फूंफकारता ये सांड प्रमोद काका के पीछे पड़ा है। प्रमोद काका भाग रहे हैं सांड फूंफकार रहा है।
अमवा मझार के इस सांड की चर्चा रामनगर बनकट, अहवर मझरिया, अहवर शेख और जौकटिया समेत आसपास के कई पंचायतों में है। सोमवार, गुरुवार और शुक्रवार को अमवा मझार में बड़ा बाजार लगता है। आसपास के गई पंचायतों के लोग इस बाजार में आते हैं। बाजार आने वाले रास्ते के दोनों तरफ खेत में रबी की फसल है और यही फसल घुटनी बाबा के इस सांड का प्रसाद है। फसली भोग लगाने वाले सांड को कभी-कभार इंसानों से परेशानी होने लगती है। और जब वो परेशान है तो उस इंसान की एक-दो हड्डियों को दो-चार हड्डियों में बदल देता है। लिहाजा बाजार आने-जाने वाले लोग अब झोले के साथ लाठी लेकर भी चलने लगे हैं। लाठी भी तब ही काम आ रही है जब लोग झुंड में हों और लाठी दिखाकर भागने की पूरी क्षमता रखते हों क्योंकि, इस सांड को न तो लाठी मारी जा सकती है और ना ही धेला। नवका टोला वाले जहीर मास्टर ने खेत चरते इस सांड पर धेला चला दिया था तो बड़ा बवाल हो गया था। घुटनी चाचा वाली चीलम मंडली ने इसे हिंदुत्व पर खतरा बता दिया। फिर क्या था घेर लिए गए जहीर मास्टर अपने घर में ही। मार इतनी पड़ी कि इलाके के महान गणितज्ञ राजवंशी पटेल भी उसका हिसाब नहीं कर पाए। दोनों हाथों की हड्डियां टूटी सो अलग। तो फिर इस सांड को मारे कौन।
घुटनी बाबा का ये मरखाहा सांड हिंदू है। हिंदुत्व का प्रतीक है। हिंदू स्वाभिमान का जीता-जागता प्रमाण है। हिंदू अस्मिता की निशानी है। इसपर धेला फेंकते ही इलाके का हिंदुत्व खतरे में आ जाता है। जैसे कि सांड होना ही हिंदू होना हो और हिंदू होने का मतलब मरखाहा सांड होना।
तो घटना ये कि प्रमोद काका भागे जा रहे हैं और सांड उनको भगाए जा रहा है। पीछे से भीड़ चिल्ला रही है। कोई कह रहा है कि सीधे भागो, कोई कह रहा है कि खेत की तरफ भागो। प्रमोद काका पीछे मुड़कर देख रहे हैं और भाग रहे हैं। सांड और काकाजी के बीच की दूरी उतनी ही कम रह गई है कि जितनी भक्त से भगवान की होती है।
लेकिन, प्रमोद काका डर नहीं रहे हैं सिर्फ भाग रहे हैं। डर शब्द तो मुंह से निकाल नहीं सकते वो। रामलोचन बाबा का हश्र वो देख चुके हैं। तीन दिनों पहले ही रामलोचन बाबा ने सांड से डरने वाली बात कही थी। बस क्या था भरी पंचायत ने उन्हें गांव छोड़कर चले जाने को कह दिया। मुखियाजी ने तो साफ कहा था कि डरने की बात कहकर रामलोचन कमकर ने पंचायत को बदनाम कर दिया। पंचायत ने रामलोचन बाबा को आजादी गैंग का सदस्य बताया और कहा कि डर लग रहा है तो दूसरे गांव में जाकर बस जाओ। प्रमोद काका भले ही दो-चार हड्डियां तुड़वा लेंगे लेकिन ये तो कत्तई नहीं कहेंगे कि उन्हें डर लग रहा है।

Wednesday, December 5, 2018

बुलंदशहर हिंसा: योगेश जैसे लोग तो मोहरा भर होते हैं

ये दो तस्वीरें इस दौर की व्याख्या की सबसे सटीक तस्वीरें हो सकतीं हैं। भीड़ के हाथों मारे गए सुबोध सिंह की विधवा का पति के शव पर विलाप और हत्यारी भीड़ का स्वागत करता एक केंद्रीय मंत्री। दोनों तस्वीरें भले ही अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी हैं लेकिन जुड़ी एक ही विचारधारा से हैं। झारखंड के रामगढ़ में झूठी अफवाह फैलाकर भीड़ ने एक मुस्लिम युवक की हत्या की। हत्या का वीडियो वायरल हुआ और पहचान के आधार पर गिरफ्तार लोगों में से 8 लोगों को निचली अदालत ने हत्या का दोषी पाया। ऊपरी अदालत में सरकार की कमजोर पैरवी की वजह से सबको ज़मानत मिल गई। ज़मानत मिलते ही इस हत्यारी भीड़ को केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के आवास पर बुलाया गया और वहां खुद जयंत सिन्हा ने सबके गले में माला डाली। सरकार के मंत्री ने सबके सामने सरकार की मंशा जाहिर कर दी। मतलब ये कि हिंदुवाद के नाम पर हत्या करने वाली हर भीड़ के स्वागत में सरकार बिछी हुई है। इस घटना ने देश के सबसे बड़े सियासी दल बीजेपी की मंशा को भी स्पष्ट कर दिया। पार्टी हर उस शख्स के साथ है जो हिंदुवाद के नाम पर लाशें बिछा रहा है। 


तो अब दूसरी तस्वीर पर गौर कीजिए। ये सुबोध सिंह की पत्नी हैं। इंस्पेक्टर सुबोध सिंह भी हिंदू थे और उनकी पत्नी भी हिंदू हैं। कथित हिंदू धर्म रक्षकों ने बुलंदशहर में हिंदू सुबोध सिंह को मारा और हिंदू महिला को विधवा कर हिंदू बच्चों को अनाथ किया। धार्मिक आतंतवाद का ये बम पिछले चार सालों से बारूद पाते-पाते अब इतना बेलगाम हो गया है कि किसी के भी सिर फट जा रहा है।

बुलंदशहर हिंसा मामले का मुख्य आरोपी योगेश राज भले ही इस घटना का मुख्य आरोपी है लेकिन सच ये है कि योगेश राज तो मोहरा भर है। योगेश जैसे लाखों नवजवानों के दिमाग में इतना जहर भर दिया गया है वो नवजवान बस अब किसी को डंस लेना चाहते हैं। ये जहर भरने वाले कौन हैं ये सबको मालूम है लेकिन, वो कभी मुख्य आरोपी नहीं बनाए जाते।
जिस सुमित की मौत हिंसा के दौरान हुई गोलीबारी में हुई उस सुमित के हाथ में पत्थर जिसने थमाया वो कौन है ये हम सब जानते हैं। वो कौन है जो ड़क्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, टीचर, डीएम, क्लर्क, पत्रकार बन सकने वाले नवजवानों को दंगाई बनाना चाहता है ? वो कौन है जो आम समाज के बच्चों की मौत पर सत्ता की सीढियां चढ़ना चाहता है ? वो कौन है जो पहले आपको बच्चों का मरवाता है और फिर मुआवजे का ढोंग कर आपका शुभचिंतक भी बन जाता है ? वो कौन है जो अपने बच्चों को तो अच्छे स्कूलों में पढ़ाता है लेकिन आपके बच्चों को दंगाई बनाता है ? वौ कौन है...वौ कौन है..वो कौन? जानते तो सब हैं लेकिन बताए कौन ?
इस किस्म के तमाम मामलों की तरह योगेश अब कुछ दिनों के लिए भागा फिरेगा, फिर जेल जाएगा। ट्रायल चलेगा। मुकदमा कमजोर करने के लिए उसके परिजन वैसे ही किसी नेता के पैरों पर गिरेंगे जैसे नेताओं ने उसके दिमाग में जहर भर उसे दंगाई बनाया। फिर वही नेता केस कमजोर करवाने के नाम पर योगेश के परिजनों से रुपये ऐंठेगा। योगेश के बाबूजी खेत गिरवी रखेंगे, माताजी गहने गिरवी रखेंगी और नेताजी कुछ दिनों के लिए कमाई का एक जरिया बना लेंगे। जेल से निकलते-निकलते योगेश इतना तबाह हो चुका होगा फिर वैसे ही किसी नेता के पैरों पर गिरे रहना उसकी मजबूरी हो जाएगी।
क्योंकि योगेश और योगेश जैसे लोग तो मोहरा भर होते हैं।

Thursday, November 22, 2018

सबका साथ सबका विकास: पेशाब पवित्तर हो गया

काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात...क्योंकि भारतीय राजनीति में जाति वो मारक मंत्र है जिसे फूंक देने भर से तमाम ज़रूरी मुद्दे मारे जाते हैं....अगर मंत्र की मारक क्षमता से कुछ बच भी गए तो फिर उन्हें धर्म वाले सिद्ध मंत्र से मार दिया जाता है..और ऐसे में स्कूल, अस्पताल, नौकरी, रोजगार, भूख जैसे तामाम मसलों पर जवाब की जरूरत ही नहीं पड़ती ..क्योंकि परलोक के सुख के सपनों में भटकाई जा रही जनता इस लोक के सारे कष्ट अपनी जाति के लिए भोग लेना चाहती है...सो सत्ता के सुखकाल में पूंजिवादियों के लिए दिन-रात एक कर देने वाली राजनीति चुनावी काल में जातिवाद के लिए रात-दिन जुट जाती है..
छितराई जनता उसे अच्छी नहीं लगती इसलिए वो उसे गोलबंद करने निकल पड़ती है.. दिलतों को गोलबंद करती है, पिछड़ों को गोलबंद करती है, अति पिछडों को गोलबंद करती है, सवर्णों को गोलबंद करती है...गोलबंद करते-करते जब समीकरण उलझने लगने लगता है तो फिर बांटती भी है..दिलतों को दलित-महादलित में बांटती है, सवर्णों को ठाकुर-ब्राह्मण में बांटती है, इसी तरह से पिछड़े-अति पिछड़े को भी बांटती है...बांट-छांट कर उस बंटवारे को गोलबंद करने के लिए राजनीति फिर सम्मेलन करती है... महादलित सम्मेलन, दलित सम्मेलन.. फिर इसी तर्ज पर पिछड़ा, अति पिछड़ा होते हुए क्षत्रीय और ब्राह्मण सम्मेलन भी यही राजनीति करती है...और सबसे वादे एक ही होते हैं..ठीक वैसे ही जैसे साहेब जिस राज्य में जाते हैं उसे देश का नंबर वन राज्य बनाने का वादा करते हैं...
तो बीजेपी सबका साथ सबका विकास तब ही कर पाएगी जब वो तमाम जातियों के सम्मेलन कर लेगी..पिछले साढ़े चार साल के शासन काल में बीजेपी ने जो सीखा वो ये कि जातियों के सम्मलेन के जरिए विकास वाला मंत्र सिद्धी पाएगा.. और फिर जाति वाली राजनाति ही सत्ता को सिद्ध कर पाएगी.. जैसे बीएसपी, सपा, राजद, जदयू, रालोद के जातीय समीकरण हैं ठीक वैसा ही समीकरण गढ़े बिना बीजेपी भी सबका साथ-सबका विकास कर नहीं पा रही है.. तो ठीक चुनाव से पहले जाति वाला टोटका याद आ गया..सो अब तैयारी शुरू है.. तो फिर काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात
जाति-जाति के इस खेल में समाज के भीतर तो खुल कर जाति-जाति चल जाती है..लेकिन सफेद कॉलर समाज में कहीं जातिवाद की घटिया सोच पर सवाल ने उठ जाएं सो पेशाबघर की जगह वाशरूम शब्द का इस्तेमाल करने वलों ने इसे सोशल जस्टिस और सोशल इंजीनयरिंग कहना शुरू कर दिया..वो क्या है न अंग्रेजी में बोल देने से पेशाब पवित्तर हो जाता है... और जातिवाद इंजीनियरिंग और जस्टिस का ऊंचाई पा जाता है.. तो फिर बोलिए काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात

Monday, November 19, 2018

चाय वालों की हालत तो पता है अलाव वालों का क्या होगा ?

मुद्दों की मारामारी के बीच नोएडा के सेक्टर 63 में चाय बेचने वाले  विनोद, छाया और पूजा ने अपनी परेशानियों को बयां किया तो लगा कि आप तक इनकी बातें पहुंचाई
जानी चाहिए... चायवालों को अयोध्या के साथ जोड़ दिया जाए तो अभी चैनल के दफ्तर के
बार पार्टी प्रवक्ताओं की भीड़ लग जाएगी और हर प्रवक्ता इस मसले पर ज्यादा से
ज्यादा बोलने लगेगा...लेकिन चाय वालों की पीड़ा पर अब कौन बोले.. चाय पर चर्चा तो
बीते सियासी वक्त की बात हो गई है

    यही हाल किसानों का
है..मीडिया के हिंदू-मुस्लिम चरित्र के बावजूद किसानों को अभी लगता है कि न्यूज चैनल
पर उनकी बात आ जाए तो उनकी समस्याएं खत्म हो जाएंगी.. यो भरोसा अगर है तो इसका
स्वागत है..गावों में जाकर देखिए अनाज और आदमी दोनों छितराए हुए हैं... न तो दाम
मिल रहा है और ना ही काम..  2014 से लेकर
2015 के बीच तक चाय वालों पर किस्म-किस्म के कार्यक्रम न्यूज चैनलों पर दिखाए
गए..क्या चाय वालों की हालत बदली...नहीं न...तो अब अलाव पर चर्चा की तैयारी
है..उत्तर प्रदेश में जहां चीनी मिल मालिकों पर गन्ना किसानों का सबसे ज्यादा बकाया
है और जिस पश्चिमी यूपी के किसान कुछ दिनों पहले ही दिल्ली की सल्तन से दंगल कर
चुके हैं अब उन लोगों के साथ बीजेपी अलाव पर चुनावी चर्चा करेगी...इस अलाव पर
सियासी रोटियां तो सेंकी जा सकेंगी लेकिन क्या किसानों की स्थिति भी बदलेगी...चाय
वालों की कहानी हमारे सामने है..
सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए ये मुद्दे एक दूसरे की निंदा करने
भर के लिए हैं मगर कोई भी ठोस प्रस्ताव जनता के बीच नहीं रखता है कि वाकई क्या
करने वाला है
जो कर रहा है वो क्यों चूक जा रहा है. कई बार लगता है कि हमारे
राजनेता
हमारे अर्थशास्त्रीसिस्टम में बैठे लोगों ने ज़िद कर ली है कि इन
बुनियादी सवालों पर बात नहीं करना है
मीडिया को हर रात कोई न कोई थीम मिल जाता हैसब कुछ इसी थीम की
तलाश के लिए हो रहा है. इसके बाद भी भारत के भीतर से तस्वीरें उथला कर सतह पर आ जा
रही हैं.
..जवान जहां खड़े थे वहां से पीछे धकले जा
रहे हैं और किसान जहां पड़े थे वहीं पड़े दिख रहे हैं.. बस सियासत की अलाव पर सब 
भुने जा रहे हैं 

1611 BIG BULL WITH ASIT NATH

https://www.youtube.com/watch?v=UzpkYKotYxM

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...