Saturday, February 2, 2019

मोहन भागवत को ये दिन देखने ही थे

तो ऐसा पहली बार हुआ जब विश्व हिंदू परिषद के किसी कार्यक्रम में संघ प्रमुख को विरोध का सामना करना पड़ा। ये विरोध पहले ही हो जाना चाहिए था। देर से ही सही लोगों को ये बात समझ आ गई कि संघ परिवार के लिए राम मंदिर का मुद्दा, आस्था का मुद्दा नहीं है। ये बात समझने में देर ज़रूर हुई लेकिन जब लोगों ने समझी तो ठीक से समझी कि संघ परिवार की आस्था बीजेपी की सरकार में है राम में नहीं। कुंभ में आयोजित धर्म संसद में धर्म कहां खड़ा था किसी को पता ही नहीं चला। ऐसा लगा जैसे बीजेपी की दो दिवसीय कार्यशाला हो। लेकिन मज़ेदार ये कि जिन लोगों को राम की आस्था के नाम पर जुटाया गया था वो ये समझ गए कि संघ परिवार का मकसद राम मंदिर के आसरे बीजेपी के लिए माहौल बनाना है। ये संत भी समझ गए थे और यही वजह है कि देश के चारों प्रमुख अखाड़ों ने इस बार वीएचपी के इस धर्म संसद का बहिष्कार किया था। बावजूद इसके वीएचपी ने राम मंदिर के नाम पर धर्म संसद में बड़ी संख्या में लोगों को जुटा लिया। लेकिन इस बार दावं उल्टा पड़ गया। कार्यक्रम के दूसरे दिन जितना समय मोदी सरकार को दोबारा मौका देने वाले प्रवचन को दिया गया उसका चौथाई भर हिस्सा भी राम मंदिर मुद्दे को नहीं दिया गया। फिर क्या था लोग असली खेल समझ गए और धर्म संसद के नाम से चल रही राजनीतिक कार्यशाला के खिलाफ उठ खड़े हुए। 
    संध परिवार और उससे जुड़ी वीएचपी के लिए ये घटना गंभीर चुनौती है। ऐसा पहली बार हुआ है जब संत समाज संघ परिवार के खिलाफ खड़ा हुआ है और ऐसा पहली बार हुआ है जब धर्म संसद के नाम पर चल रही बीजेपी कार्यशाला का अपने ही लोगों ने विरोध किया है। ये भी पहली बार हुआ है कि अब अपने ही लोग राम मंदिर के नाम पर बीजेपी का एजेंडा चलाने का आरोप संघ परिवार पर लगाने लगे हैं। संघ के अपने ही लोगों को ये पता चल गया है कि ये सारी कवायद सिर्फ और सिर्फ बीजेपी की सत्ता के लिए होती रही है और बीजेपी को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए संघ परिवार राम को आगे करता रहा है।
   तो इस बार अपनों ने ही पोल खोल दी। उठ गए राम के पक्ष में और जब राम के पक्ष में खड़े हुए तो स्वभाविक तौर पर संघ के विरोध में दिखे। राम के पक्ष में खड़े हुए तो बीजेपी का विरोध दिखा। राम मंदिर के पक्ष में बोल रहा हर आदमी बीजेपी और संघ परिवार के खिलाफ बोलता दिखा।
   ये तो होना ही था क्योंकि, राम नाम की चादर तान कर कब तक सच पर पर्दा डाले रखा जा सकता था। किसी न किसी दिन तो सच को बाहर आना ही था। सच बाहर आया तो हंगामा हो गया। पर्दा हटते ही पता चल गया कि जिसे धर्म संसद बता रहे थे वो तो असल में बीजेपी की कार्यशाला थी। जहां राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की बात कह कर लोगों को जुटाया गया था वहां तो बीजेपी सरकार के लिए रास्तों के तलाश हो रही थी। बस क्या था मुट्ठियां तन गईं। आस्था के नाम पर वोटबैंक खड़ा करने वाले इस खेल की पोल खुल गई। लेकिन इतने कुछ नहीं होता। अभी बहुत कुछ जानना बाकी है इस खेल के बारे में। अभी भी बहुत कुछ पर्दे के पीछे ही छिपा कर रखा गया है। इसलिए ज़रूरी है कि आप सावधान रहें क्योंकि, पर्द के पीछे खड़े सत्ता भोगियों ने न तो अपने परिवार से कभी पहलू खान दिया है और ना ही चंदन गुप्ता। दंगों में मारा जाना आम आदमी के नसीब का क़िस्सा होता है और सत्ता भोगना नेताओं नसीब का हिस्सा होता है। इसलिए अभी भी बहुत सारे पर्दे हटाने हैं आपलोगों को। सही वक्त है एक-एक कर वो सारे पर्दे नोच डालिए जिनके आसरे राजनीति अपने धतकर्म छुपाती रही है और अपनी साजिशें साकार करती रही है।

Sunday, December 23, 2018

ये कहने में भी डर लगता है कि डर लगता है

सिर पर पांव है कि पांव सिर पर कुछ पता ही नहीं चल रहा है। बस ये दिख रहा है कि प्रमोद काका गिरते-पड़ते दौड़े जा रहे हैं। चेहरे पर खौफ ऐसा जैसे कि मॉब लिंचर पीछे पड़े हों। बस भाग रहे हैं और उनके पीछे है घुटनी बाबा का सांड। घुटनी बाबा ने एक सांड पाल रखा है। पाल क्या रखा है छुट्टा छोड़ रखा है। पाला होता तो तिवारी टोले वाले मठ पर खूंटे से बांध कर रखते। चारा-पानी का इंतजाम करते। लेकिन ये सांड तो छुट्टा घूमता है। रबी की हरी फसलों का भोग लगाकर पहलवान बना फूंफकारता ये सांड प्रमोद काका के पीछे पड़ा है। प्रमोद काका भाग रहे हैं सांड फूंफकार रहा है।
अमवा मझार के इस सांड की चर्चा रामनगर बनकट, अहवर मझरिया, अहवर शेख और जौकटिया समेत आसपास के कई पंचायतों में है। सोमवार, गुरुवार और शुक्रवार को अमवा मझार में बड़ा बाजार लगता है। आसपास के गई पंचायतों के लोग इस बाजार में आते हैं। बाजार आने वाले रास्ते के दोनों तरफ खेत में रबी की फसल है और यही फसल घुटनी बाबा के इस सांड का प्रसाद है। फसली भोग लगाने वाले सांड को कभी-कभार इंसानों से परेशानी होने लगती है। और जब वो परेशान है तो उस इंसान की एक-दो हड्डियों को दो-चार हड्डियों में बदल देता है। लिहाजा बाजार आने-जाने वाले लोग अब झोले के साथ लाठी लेकर भी चलने लगे हैं। लाठी भी तब ही काम आ रही है जब लोग झुंड में हों और लाठी दिखाकर भागने की पूरी क्षमता रखते हों क्योंकि, इस सांड को न तो लाठी मारी जा सकती है और ना ही धेला। नवका टोला वाले जहीर मास्टर ने खेत चरते इस सांड पर धेला चला दिया था तो बड़ा बवाल हो गया था। घुटनी चाचा वाली चीलम मंडली ने इसे हिंदुत्व पर खतरा बता दिया। फिर क्या था घेर लिए गए जहीर मास्टर अपने घर में ही। मार इतनी पड़ी कि इलाके के महान गणितज्ञ राजवंशी पटेल भी उसका हिसाब नहीं कर पाए। दोनों हाथों की हड्डियां टूटी सो अलग। तो फिर इस सांड को मारे कौन।
घुटनी बाबा का ये मरखाहा सांड हिंदू है। हिंदुत्व का प्रतीक है। हिंदू स्वाभिमान का जीता-जागता प्रमाण है। हिंदू अस्मिता की निशानी है। इसपर धेला फेंकते ही इलाके का हिंदुत्व खतरे में आ जाता है। जैसे कि सांड होना ही हिंदू होना हो और हिंदू होने का मतलब मरखाहा सांड होना।
तो घटना ये कि प्रमोद काका भागे जा रहे हैं और सांड उनको भगाए जा रहा है। पीछे से भीड़ चिल्ला रही है। कोई कह रहा है कि सीधे भागो, कोई कह रहा है कि खेत की तरफ भागो। प्रमोद काका पीछे मुड़कर देख रहे हैं और भाग रहे हैं। सांड और काकाजी के बीच की दूरी उतनी ही कम रह गई है कि जितनी भक्त से भगवान की होती है।
लेकिन, प्रमोद काका डर नहीं रहे हैं सिर्फ भाग रहे हैं। डर शब्द तो मुंह से निकाल नहीं सकते वो। रामलोचन बाबा का हश्र वो देख चुके हैं। तीन दिनों पहले ही रामलोचन बाबा ने सांड से डरने वाली बात कही थी। बस क्या था भरी पंचायत ने उन्हें गांव छोड़कर चले जाने को कह दिया। मुखियाजी ने तो साफ कहा था कि डरने की बात कहकर रामलोचन कमकर ने पंचायत को बदनाम कर दिया। पंचायत ने रामलोचन बाबा को आजादी गैंग का सदस्य बताया और कहा कि डर लग रहा है तो दूसरे गांव में जाकर बस जाओ। प्रमोद काका भले ही दो-चार हड्डियां तुड़वा लेंगे लेकिन ये तो कत्तई नहीं कहेंगे कि उन्हें डर लग रहा है।

Wednesday, December 5, 2018

बुलंदशहर हिंसा: योगेश जैसे लोग तो मोहरा भर होते हैं

ये दो तस्वीरें इस दौर की व्याख्या की सबसे सटीक तस्वीरें हो सकतीं हैं। भीड़ के हाथों मारे गए सुबोध सिंह की विधवा का पति के शव पर विलाप और हत्यारी भीड़ का स्वागत करता एक केंद्रीय मंत्री। दोनों तस्वीरें भले ही अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी हैं लेकिन जुड़ी एक ही विचारधारा से हैं। झारखंड के रामगढ़ में झूठी अफवाह फैलाकर भीड़ ने एक मुस्लिम युवक की हत्या की। हत्या का वीडियो वायरल हुआ और पहचान के आधार पर गिरफ्तार लोगों में से 8 लोगों को निचली अदालत ने हत्या का दोषी पाया। ऊपरी अदालत में सरकार की कमजोर पैरवी की वजह से सबको ज़मानत मिल गई। ज़मानत मिलते ही इस हत्यारी भीड़ को केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के आवास पर बुलाया गया और वहां खुद जयंत सिन्हा ने सबके गले में माला डाली। सरकार के मंत्री ने सबके सामने सरकार की मंशा जाहिर कर दी। मतलब ये कि हिंदुवाद के नाम पर हत्या करने वाली हर भीड़ के स्वागत में सरकार बिछी हुई है। इस घटना ने देश के सबसे बड़े सियासी दल बीजेपी की मंशा को भी स्पष्ट कर दिया। पार्टी हर उस शख्स के साथ है जो हिंदुवाद के नाम पर लाशें बिछा रहा है। 


तो अब दूसरी तस्वीर पर गौर कीजिए। ये सुबोध सिंह की पत्नी हैं। इंस्पेक्टर सुबोध सिंह भी हिंदू थे और उनकी पत्नी भी हिंदू हैं। कथित हिंदू धर्म रक्षकों ने बुलंदशहर में हिंदू सुबोध सिंह को मारा और हिंदू महिला को विधवा कर हिंदू बच्चों को अनाथ किया। धार्मिक आतंतवाद का ये बम पिछले चार सालों से बारूद पाते-पाते अब इतना बेलगाम हो गया है कि किसी के भी सिर फट जा रहा है।

बुलंदशहर हिंसा मामले का मुख्य आरोपी योगेश राज भले ही इस घटना का मुख्य आरोपी है लेकिन सच ये है कि योगेश राज तो मोहरा भर है। योगेश जैसे लाखों नवजवानों के दिमाग में इतना जहर भर दिया गया है वो नवजवान बस अब किसी को डंस लेना चाहते हैं। ये जहर भरने वाले कौन हैं ये सबको मालूम है लेकिन, वो कभी मुख्य आरोपी नहीं बनाए जाते।
जिस सुमित की मौत हिंसा के दौरान हुई गोलीबारी में हुई उस सुमित के हाथ में पत्थर जिसने थमाया वो कौन है ये हम सब जानते हैं। वो कौन है जो ड़क्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, टीचर, डीएम, क्लर्क, पत्रकार बन सकने वाले नवजवानों को दंगाई बनाना चाहता है ? वो कौन है जो आम समाज के बच्चों की मौत पर सत्ता की सीढियां चढ़ना चाहता है ? वो कौन है जो पहले आपको बच्चों का मरवाता है और फिर मुआवजे का ढोंग कर आपका शुभचिंतक भी बन जाता है ? वो कौन है जो अपने बच्चों को तो अच्छे स्कूलों में पढ़ाता है लेकिन आपके बच्चों को दंगाई बनाता है ? वौ कौन है...वौ कौन है..वो कौन? जानते तो सब हैं लेकिन बताए कौन ?
इस किस्म के तमाम मामलों की तरह योगेश अब कुछ दिनों के लिए भागा फिरेगा, फिर जेल जाएगा। ट्रायल चलेगा। मुकदमा कमजोर करने के लिए उसके परिजन वैसे ही किसी नेता के पैरों पर गिरेंगे जैसे नेताओं ने उसके दिमाग में जहर भर उसे दंगाई बनाया। फिर वही नेता केस कमजोर करवाने के नाम पर योगेश के परिजनों से रुपये ऐंठेगा। योगेश के बाबूजी खेत गिरवी रखेंगे, माताजी गहने गिरवी रखेंगी और नेताजी कुछ दिनों के लिए कमाई का एक जरिया बना लेंगे। जेल से निकलते-निकलते योगेश इतना तबाह हो चुका होगा फिर वैसे ही किसी नेता के पैरों पर गिरे रहना उसकी मजबूरी हो जाएगी।
क्योंकि योगेश और योगेश जैसे लोग तो मोहरा भर होते हैं।

Thursday, November 22, 2018

सबका साथ सबका विकास: पेशाब पवित्तर हो गया

काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात...क्योंकि भारतीय राजनीति में जाति वो मारक मंत्र है जिसे फूंक देने भर से तमाम ज़रूरी मुद्दे मारे जाते हैं....अगर मंत्र की मारक क्षमता से कुछ बच भी गए तो फिर उन्हें धर्म वाले सिद्ध मंत्र से मार दिया जाता है..और ऐसे में स्कूल, अस्पताल, नौकरी, रोजगार, भूख जैसे तामाम मसलों पर जवाब की जरूरत ही नहीं पड़ती ..क्योंकि परलोक के सुख के सपनों में भटकाई जा रही जनता इस लोक के सारे कष्ट अपनी जाति के लिए भोग लेना चाहती है...सो सत्ता के सुखकाल में पूंजिवादियों के लिए दिन-रात एक कर देने वाली राजनीति चुनावी काल में जातिवाद के लिए रात-दिन जुट जाती है..
छितराई जनता उसे अच्छी नहीं लगती इसलिए वो उसे गोलबंद करने निकल पड़ती है.. दिलतों को गोलबंद करती है, पिछड़ों को गोलबंद करती है, अति पिछडों को गोलबंद करती है, सवर्णों को गोलबंद करती है...गोलबंद करते-करते जब समीकरण उलझने लगने लगता है तो फिर बांटती भी है..दिलतों को दलित-महादलित में बांटती है, सवर्णों को ठाकुर-ब्राह्मण में बांटती है, इसी तरह से पिछड़े-अति पिछड़े को भी बांटती है...बांट-छांट कर उस बंटवारे को गोलबंद करने के लिए राजनीति फिर सम्मेलन करती है... महादलित सम्मेलन, दलित सम्मेलन.. फिर इसी तर्ज पर पिछड़ा, अति पिछड़ा होते हुए क्षत्रीय और ब्राह्मण सम्मेलन भी यही राजनीति करती है...और सबसे वादे एक ही होते हैं..ठीक वैसे ही जैसे साहेब जिस राज्य में जाते हैं उसे देश का नंबर वन राज्य बनाने का वादा करते हैं...
तो बीजेपी सबका साथ सबका विकास तब ही कर पाएगी जब वो तमाम जातियों के सम्मेलन कर लेगी..पिछले साढ़े चार साल के शासन काल में बीजेपी ने जो सीखा वो ये कि जातियों के सम्मलेन के जरिए विकास वाला मंत्र सिद्धी पाएगा.. और फिर जाति वाली राजनाति ही सत्ता को सिद्ध कर पाएगी.. जैसे बीएसपी, सपा, राजद, जदयू, रालोद के जातीय समीकरण हैं ठीक वैसा ही समीकरण गढ़े बिना बीजेपी भी सबका साथ-सबका विकास कर नहीं पा रही है.. तो ठीक चुनाव से पहले जाति वाला टोटका याद आ गया..सो अब तैयारी शुरू है.. तो फिर काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात
जाति-जाति के इस खेल में समाज के भीतर तो खुल कर जाति-जाति चल जाती है..लेकिन सफेद कॉलर समाज में कहीं जातिवाद की घटिया सोच पर सवाल ने उठ जाएं सो पेशाबघर की जगह वाशरूम शब्द का इस्तेमाल करने वलों ने इसे सोशल जस्टिस और सोशल इंजीनयरिंग कहना शुरू कर दिया..वो क्या है न अंग्रेजी में बोल देने से पेशाब पवित्तर हो जाता है... और जातिवाद इंजीनियरिंग और जस्टिस का ऊंचाई पा जाता है.. तो फिर बोलिए काम न पूछो नेता की पूछ लीजिए जात

Monday, November 19, 2018

चाय वालों की हालत तो पता है अलाव वालों का क्या होगा ?

मुद्दों की मारामारी के बीच नोएडा के सेक्टर 63 में चाय बेचने वाले  विनोद, छाया और पूजा ने अपनी परेशानियों को बयां किया तो लगा कि आप तक इनकी बातें पहुंचाई
जानी चाहिए... चायवालों को अयोध्या के साथ जोड़ दिया जाए तो अभी चैनल के दफ्तर के
बार पार्टी प्रवक्ताओं की भीड़ लग जाएगी और हर प्रवक्ता इस मसले पर ज्यादा से
ज्यादा बोलने लगेगा...लेकिन चाय वालों की पीड़ा पर अब कौन बोले.. चाय पर चर्चा तो
बीते सियासी वक्त की बात हो गई है

    यही हाल किसानों का
है..मीडिया के हिंदू-मुस्लिम चरित्र के बावजूद किसानों को अभी लगता है कि न्यूज चैनल
पर उनकी बात आ जाए तो उनकी समस्याएं खत्म हो जाएंगी.. यो भरोसा अगर है तो इसका
स्वागत है..गावों में जाकर देखिए अनाज और आदमी दोनों छितराए हुए हैं... न तो दाम
मिल रहा है और ना ही काम..  2014 से लेकर
2015 के बीच तक चाय वालों पर किस्म-किस्म के कार्यक्रम न्यूज चैनलों पर दिखाए
गए..क्या चाय वालों की हालत बदली...नहीं न...तो अब अलाव पर चर्चा की तैयारी
है..उत्तर प्रदेश में जहां चीनी मिल मालिकों पर गन्ना किसानों का सबसे ज्यादा बकाया
है और जिस पश्चिमी यूपी के किसान कुछ दिनों पहले ही दिल्ली की सल्तन से दंगल कर
चुके हैं अब उन लोगों के साथ बीजेपी अलाव पर चुनावी चर्चा करेगी...इस अलाव पर
सियासी रोटियां तो सेंकी जा सकेंगी लेकिन क्या किसानों की स्थिति भी बदलेगी...चाय
वालों की कहानी हमारे सामने है..
सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए ये मुद्दे एक दूसरे की निंदा करने
भर के लिए हैं मगर कोई भी ठोस प्रस्ताव जनता के बीच नहीं रखता है कि वाकई क्या
करने वाला है
जो कर रहा है वो क्यों चूक जा रहा है. कई बार लगता है कि हमारे
राजनेता
हमारे अर्थशास्त्रीसिस्टम में बैठे लोगों ने ज़िद कर ली है कि इन
बुनियादी सवालों पर बात नहीं करना है
मीडिया को हर रात कोई न कोई थीम मिल जाता हैसब कुछ इसी थीम की
तलाश के लिए हो रहा है. इसके बाद भी भारत के भीतर से तस्वीरें उथला कर सतह पर आ जा
रही हैं.
..जवान जहां खड़े थे वहां से पीछे धकले जा
रहे हैं और किसान जहां पड़े थे वहीं पड़े दिख रहे हैं.. बस सियासत की अलाव पर सब 
भुने जा रहे हैं 

1611 BIG BULL WITH ASIT NATH

https://www.youtube.com/watch?v=UzpkYKotYxM

Saturday, November 10, 2018

दलित-पिछड़ों को बौद्ध बताने की बेचैनी मुसलमानों और दलित चिंतकों में क्यों ?

2008 के अखिर में मैं जब रांची पहुंचा तो मेरे पत्रकार मित्र हरेकृष्ण पाठक ने मेरे लिए पहले से ही रांची के कोकर इलाके में किराए के मकान का इंतजाम कर लिया था। मकान मालिक और उनका परिवार बेहद मिलनसार था लिहाजा दो-चार दिनों में ही मुझसे उनका जुड़ाव होने लगा। मकान का बड़ा हिस्सा किराए पर था और मुझ जैसे कई किराएदार उस मकान में थे। तमाम किराएदार और मकान मालिक का परिवार एक बड़े परिवार की तरह लगते थे। कुछ दिनों बाद बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि मकान मालिक इसाई हैं और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारी हैं। इतना ही नहीं उस मकान में किराए पर रहने वाले कई लोगों का उन्होंने धर्मांतरण करवाया था और उन्हें इसाई बनाया था। धर्मांतरण की वजह से इसाई समुदाय में उनकी बड़ी दखल थी और रांची और उसके आसपास के चर्च और मिशनरी में उनको खास महत्व मिलता था। ऐसे ही फिर कुछ दिनों बाद पता चला कि उनके पिताजी रिटायर्ड वनकर्मी हैं और कई बीमारियों से जूझते हुए बूढ़ी पत्नी के साथ बेटे से अलग गांव में रहते हैं। बूढ़ा-बूढ़ी हिंदू धर्म के थे और बेटे-बहू के धर्मांतरण से नाराज होकर इनसे रिश्ते तोड़ चुके थे। 
रांची का वो छोटा प्रवास कई मायनों में बेहद खास रहा। मेरे मकान मालिक और उनकी पत्नी ने मुझे इसाई धर्म के संबंध में बहुत कुछ बताया और कई धार्मिक आयोजनों में मुझे शामिल भी किया। बाद के दिनों में मुझे पता चला कि उस मकान में रहने वाले एक हिंदू यादव नवयुवक ने जब धर्म परिवर्तन किया तो किसी चर्च के जरिए उसकी एक नौकरीपेशा ANM से शादी करवाई गई और किसी मिशनरी ने उसे कुछ रकम और मोटरसाइकिल गिफ्ट की। ऐसी ही बहुत सारी हैरान करने वाली जानकारियां मिलती रहीं और मैं उनकी पुष्टि करता रहा। 

इसी बीच रविवार की एक सुबह मेरे मकान मालिक अचानक मेरे कमरे में चाय के साथ दाखिल हुए। दिसंबर के शुरुआती हफ्ते में सबेरे-सबेरे गरम चाय देखकर ही ताजगी आ गई थी। चाय के साथ थोड़ी गपशप में ये पता चला कि शाम को उनके घर कोई धार्मिक कार्यक्रम है जिसमें फादर समेत कई लोग आने वाले हैं और कार्यक्रम में फादर सिर्फ इसलिए आ रहे हैं क्योंकि मेरे मकान मालिक उनसे मुझे मिलवाना चाहते हैं। उस दिन मैं पूरा दिन घर पर ही रहा और खिड़की से कार्यक्रम की तैयारियों को देखता रहा। रात के करीब 8 बजे जब फादर पहुंचे तो मेरे मकान मालिक और उनकी पत्नी मुझे बुलाने आए। मैं बेहद सहजता से उनके साथ गया और फादर से पूरी गर्मजोशी से मुलाकात की। थोड़ी देर की बातचीत में ये साफ हो गया कि परमेश्वर ने उन्हें मेरे पास भेजा है और परमेश्वर मेरी तमाम समस्याओं को खत्म कर देगा अगर मैं इसाई बन गया तो। इस बीच कई किस्म की खाने की चीजों को मैं अपने उदर में पहुंचा चुका था। घंटे भर की मुलाकात के बाद फादर चले गए तो थोड़ी देर के लिए मैं और मेरे मकान मालिक कमरे से बाहर निकले, टहलने-घूमने के बाद अपनी-अपनी राह पकड़ी। बाद के दिनों में उसी मकान में रहने वाले मुकेश नाम का एक मेरी उम्र का शख्स मुझसे मिलने-जुलने लगा। कई प्रयासों के बाद मुझे ये बताया गया कि पटना के एक बड़े अस्पताल में करने वाली एक लड़की से वो फादर मेरी शादी करवाना चाहते हैं। शादी के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करने के बाद मुझे एक बार उस लड़की से मिलने को कहा गया। फिर एक दिन अचानक जैसे ही मैं दफ्तर से घर पहुंचा मकान मालकिन मुझे दरवाजे पर ही मिल गईं और मुझसे एक कप चाय पीने का अनुरोध किया। चूंकी मेरा उस घर में हर जगह आना-जाना था लिहाजा चाय के लिए मैं आराम से हॉल में पहुंच गया। वहां मकान मालिक के बच्चों के साथ एक अनजान लड़की भी मौजूद थी। मकान मालकिन ने बताया कि ये वही लड़की है जिससे फादर मेरी शादी करवाना चाहते हैं। शादी चर्च में होगी और फिर मुझे रांची के कोकर में दो कट्ठा जमीन और एक लाख रुपये दिए जाएंगे। ज़मीन की रजिस्ट्री के कागजों में मेरा धर्म इसाई लिखा जाएगा। ये सब होने पर परमेश्वर मेरा साथ देने लगेगा। 
धर्मांतरण का ये गंदा खेल मैं समझ चुका था। तमाम धतकर्म, कुकर्म और कपटों पर आधारित धर्म का ये खेल मुझे सबसे बड़ा अधर्म लगा। और यही अधर्म आज के दौर में तमाम धर्मों की बुनियाद है। अधर्म की बुनियाद पर खड़े धर्म-मजहब आपको धार्मिक बनाने की नैतिक ताकत तो नहीं ही रखते होंगे। झारखंड और बिहार में धर्मांतरण का ये खेल भ्रष्ट आचरण के सहयोग से होता है। इसमें शराब, लड़की, पैसा, जमीन सबकुछ शामिल है। 
अब देख रहा हूं यूपी में इसी किस्म का दूसरा खेल हो रहा है। यूपी में दलित और पिछड़ों को बौद्ध बताया जा रहा है। बताने वाले ज्यादातर वो लोग हैं जो खुद मुसलमान हैं। ये खुद न तो बौद्ध धर्म अपनाने वाले हैं और ना ही बौद्ध धर्म को पसंद करने वाले। कुछ वैसे लोग भी हैं जो सोशल मीडिया पर दलित चिंतक के तौर पर जमे हुए हैं और देखते ही देखते ही मालदार लोगों में शामिल हो चुके हैं। ये लोग लगातार ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि दलित और पिछड़ा वर्ग मूलत: बौद्ध धर्म का हिस्सा है और हिंदू धर्म सिर्फ और सिर्फ मनुवादियों का धर्म है। हैरानी की बात ये है कि इनमें से ज्यादातार लोगों ने मनुस्मृति पढ़ी तक नहीं है लेकिन, इनके लिखे हर लेख में 25-50 जगहों पर मनुवाद शब्द का इस्तेमाल होता है। दलित समाज में फैली अशिक्षा का फायदा उठाकर उनका धर्मांतरण करवाने में विफल इस्लाम के कथित ठेकेदार बेहद चतुराई से दलित समाज को बौद्ध बताने में जुटे हैं। इस काम में इनका सहयोग वो दलित चिंतक भी कर रहे हैं जो देखते ही देखते मालदार लोगों की टोली में शामिल हुए हैं।
जो धर्म कभी लोक जागरण की राह पकड़ता था अब वही धर्म लोकभ्रम पैदा कर रहा है। जो धर्म कभी सत्यनिष्ठ हुआ करता था अब वही धर्म झूठ और फरेब की राह पर चलता दिख रहा है। झूठ और फरेब के जरिए धर्म विस्तार का ये गंदा खेल सिर्फ इसाई, मुस्लिम या बौद्ध धर्म में ही होता होगा ऐसा मैं नहीं मानता। बाकी धर्मों के पाखंडी रक्षक भी ये काम करते ही होंगे। जाहिर है कुकर्मों पर आधारित ये धर्म ही अब अधर्म हो गए हैं और ऐसे धर्मों का अनुसरण करने से बेहतर है कि आप खुद को धर्म और जाति के पाखंड से बाहर निकाल लीजिए। ये धर्म और इन धर्मों के रक्षक धतकर्मों को ही धर्म के तौर स्थापित करने में लगे हुए हैं। बेहतर होगा धतकर्मों को धर्म मानने से इनकार किया जाए।

Thursday, October 18, 2018

मुश्किल ये कि संघ के सामने दूसरा रास्ता नहीं है

नवरात्र के नौवें दिन जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपना स्थापना दिवस मना रहा है.. और जब 1925 से लेकर 2018 तक के अपने अनुभवों को साझा कर रहा है तब उसे लग रहा है कि देश की राजनीतिक दिशा भटक सी गई है.. तब उसे लग रहा है कि हाशिए पर खड़े तबके को वक्त पर मदद आज भी नहीं मिल रही.. और जब देश का प्रधानमंत्री खुद संध का स्वयं सेवक है तब संघ परिवार की ये शिकायत है कि सरकार चल कैसे रही है ये पता ही नहीं चलता...चला कौन रहा है ये भी पता नहीं चलता.. मोहन भागवत ने दर्द बयां किया या फिर कोई संकेत दिए  ये तो वो जानें लेकिन, उनके इस बयान के मायने दूर का सफर तय करेंगे।
 तो केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर, मोहन भागवत तक संघ की शिकायतें वहीं टिकीं हैं जहां वो 1925 में टिकी थीं.. क्योंकि सत्ता के बाजपेयी युग में भी संघ के मुताबिक राजनीतिक सत्ता चली नहीं.. और 6 साल तक संघ के स्वयं सेवक वाली सरकार संघ और संगठन में तालमेल बनाए रखने की जुगत में ही लगी दिखी.. 2014 में बनी संघ स्वयं सेवक वाली सरकार इसी मोहन भागवत के सामने बाजाप्ता सरकार का प्रजेंटेशन करती दिखी थी..लेकिन आम चुनाव से तकरीबन एक साल पहले संघ प्रमुख की शियाकतें वैसे ही मुंह बाए खड़ी हैं जैसे आम आदमी की समस्याएं.. तो फिर सत्ता चाहे विचार शून्य के पास हो या संघ के स्वयं सेवक के पास, फर्क पड़ता क्या है.. और ये बात अगर संघ समझ गया है तो फिर बीजेपी के साथ ही वो हर परिस्थिति में खड़ा हो तो क्यों हो..
         तो फिर संघ करे क्या.. मुश्किल ये है कि संघ के साथ बीजेपी-शिवसेना को छोड़ कोई दूसरा दल खड़ा होना नहीं चाहता.. और संघ जिस किस्म के देश के सपने देखता है.. वो सपना खुद स्वयं सेवकों की सरकार साकार कर नहीं पाई.. तो संघ का रास्ता होगा क्या...क्योंकि संघ के सपने महज सामाजिक सोच के बदलाव से पूरे होंगे नहीं.. और सत्ता की राजनीति कुर्सी के समीकरण को ज्यादा समझती है संघ के सपने को नहीं..

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...