Wednesday, July 11, 2018

अयोध्या आस्था है तो राजनीति का आसरा भी


अयोध्या।धर्मनगरी अयोध्या। भारत की राजनीति का टर्निंग टर्मिनल अयोध्या। भारतीय समाज को जोड़ता-बांटता अयोध्या। राम की नगरी अयोध्या। बाबरी विवाद की ज़मीन अयोध्या। आस्था का सैलाब अयोध्या। सियासत की सरयू अयोध्या। पौराणिक कथाओं का अयोध्या। मौजूदा तनावों का अयोध्या। अयोध्या महज किसी जगह का नाम नहीं है। भक्तों के लिए अयोध्या आस्था है। राजनीति के लिए अयोध्या आसरा है। और इसी अयोध्या में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का जुटान हो रहा है। राम की नगरी में कुरान की आयतें पढ़ी जाएंगी। सरयू के घाट पर अजां होगी। दावा है कि सदभावना की खातिर संघ परिवार से जुड़ा राष्ट्रीय मुस्लिम मंच कुरान की तिलावत करेगा। तो कुरान की तिलावत उसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा मुस्लिम मंच करेगा जिस संघ से जुड़े विश्व हिंदू परिषद ने 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन खड़ा किया। अक्टूबर 1984 में वीएचपी ने अयोध्या में रामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। 1989 में वीएचपी ने विवादित जगह के नजदीक ही राम मंदिर की नींव रख दी। जून 1989 में बीजेपी ने पालमपुर में बाजाप्ता प्रस्ताव पारित कर खुद को राम मंदिर आंदोलन का अगुआ घोषित कर लिया। अब वीएचपी पीछे थी बीजेपी आगे। 1984 में जो बीजेपी लोकसभा में महज 2 सांसदों वाली पार्टी थी 1991 में वही पार्टी 120 सीट जीतकर देश में कांग्रेस का विकल्प बन गई।1992 में विवादित ढांचा गिरा दिया गया।
   तो इतिहास के पन्नों को पलटते हुए वर्तमान पर निगाह डालिए। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच गुरुवार को अयोध्या में तिलावत की शुरुआत कर रहा है और इससे ठीक दो दिन पहले दुनिया के कई देशों से आए अप्रवासी भारतीयो की एक टोली विश्व हिंदू परिषद की बैठक में शामिल होकर अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग कर चुकी है।
    तो अब अल्लमाए इक़बाल को याद कीजिए। है राम के वजूद पर हिंदोस्तां को नाज़...अहल-ए-वतन समझते हैं इसको इमाम-ए-हिंद। तो नाज है राम के वजूद पर फिर विवाद क्यों है राम की जन्मभूमि पर.। तो क्या स्वागत करें राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की इन कोशिशों का ? ठहरिए! पहले ये तो देखिए की मंच की ये कोशिशें ईमानदार हैं या फिर सियासी चालें हैं। अगर ये राजनीति की बिसात है तो सावधान हो जाइए। सावधान! क्योंकि, वो फिर अयोध्या लौट आए हैं। और अगर ये सदभावना की ईमानदार कोशिश है तो फिर गले लगाइए। कदम से कदम मिलाइए। आप भी अदावत को तौबा कीजिए। आप भी तिलावत कीजिए। बाबर की बात छोड़िए।1992 को भी अब भूल जाइए। अदम गोण्डवी को याद कीजिए हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.. ग़र ग़लतियाँ बाबर की थींजुम्मन का घर फिर क्यों जले ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए’ 

Monday, June 25, 2018

आपातकाल के लिए 'संपूर्ण भ्रांति' वाले जेपी जिम्मेदार नहीं थे क्या ?

25 जून को जब पूरे देश में आपाताकाल की बरसी मनाई जा रही थी और आपातकाल को याद करते हुए तरह-तरह के लेख पोस्ट हो रहे थे तो मैं गौर से बहुत कुछ देख-पढ़ रहा था। ज्यादातर लेख मुझे परंपरावादी लगे। कार्यक्रमों में व्यक्त किए जा रहे उद्गार भी परंपरावादी ही लगे। मेरे पिताजी ने जयप्रकाश नारायण और डॉ लोहिया के साथ थोड़े-बहुत दिनों तक कुछ काम किए थे और जेपी के आह्वान पर संपूर्ण क्रांति में हिस्सा भी लिया था। बचपन से जेपी की महानता के क़िस्से सुनता आया हूं। जब नौंवी क्लास में था तो पहली बार जेपी की किताब मेरी विचार यात्रा पढ़ी थी। बाद में वो किताब फिर पढ़ी। जेपी के क़िस्से सुनते-पढ़ते कई वैसे लोगों से मुलाकातें हुईं जो लोग संपूर्ण क्रांति के क्रांतिकारी रहे और जेलें भोगीं। लेकिन तमाम लोगों के विचारों-लेखों के बावजूद मेरा एक सवाल अनुत्तरित रह गया। वो सवाल है कि संपूर्ण क्रांति से देश को मिला क्या ? 
जेपी ने अपनी क्रांति को सात रंगों से रंगा था। राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति। राजनैतिक क्रांति ऐसी हुई कि एक चुनी हुई बहुमत वाली सरकार के खिलाफ देश में अराजकता पैदा की गई। 1977 के चुनाव में कांग्रेस चुनाव हारी, खुद इंदिरा गांधी चुनाव हारीं। क्रांति से पैदा हुए जेपी के चेलों की क्रांतिकारी सरकार बनी। ये ऐसी क्रांतिकारी सरकार थी जिसमें स्वार्थों का जबरदस्त टकराव हुआ और ढाई साल में ही ये क्रांतिकारी सरकार भरभरा कर गिर गई। आलम ये हुआ कि इस आंदोलन से निकले किसी नेता की दूसरे नेता से नहीं बनी और सबने अपने-अपने इलाके में अपनी-अपनी पार्टी बनाई और बाद में उसी कांग्रेसवाद के साथ खड़े हुए जिस कांग्रेसवाद के खिलाफ संपूर्ण क्रांति की थी। 
इस क्रांति ने सिवाय सत्ता परिवर्तन के कुछ नहीं किया। मतलब जो काम आम आदमी बिना किसी शोर-शराबे के महज वोट के जरिए कर देता है वही काम ढाई सालों के घोर अराजक माहौल के जरिए किया गया। खुद जॉर्ज फर्नांडिस ने स्वीकार किया कि उन्हें खुद नहीं मालूम के आंदोलन के दौरान उन्होंने कितनी रेलगाड़ियां बेपटरी करवाईं। 
ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता जिसके आधार पर आप ये कह सकें कि जेपी आंदोलन के जरिए राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति हुई हो। हुआ ये कि बाद में जेपी आंदोलन से ही निकले कई लोगों ने इसे संपूर्ण क्रांति की जगह संपूर्ण भ्रांति कहना शुरू कर दिया। 
भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन से लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता निकले। एक घोटाले के दोषी हैं और फिलहाल सज़ायाफ्ता हैं। दूसरे पर आय से अधिक संपत्ति का मामला लंबित है। जेपी के चेलों ने जातिवादी राजनीति का जो जंगल खड़ा किया उससे निकलने का रास्ता अब किसी को नहीं दिख रहा है। जेपी के आंदोलन से निकले अंटल बिहारी बाजपेयी ने अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से पहले कहा था कि ज़मीन को समतल करना होगा। इसी संपूर्ण क्रांति के एक और क्रांतिक्रारी लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर रथ यात्रा निकाली। देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंकने वाले भी जेपी आंदोलन से ही निकले। 
खैर ये विषय बहुत बड़ा है और इसपर बहुत कुछ कहने-लिखने को है। फिलहाल आपातकाल की चर्चा तक ही इसे सीमित रखें तो, पहली नज़र में आपातकाल के लिए भी जयप्रकाश नारायण जिम्मेदार नज़र आते हैं। जेपी की मंशा भले ही बेहद साफ रही हो लेकिन, बेहद ईमानदार और भोले जेपी से ऐसी भूल हो गई जिसने लोकतंत्र के इतिहास को कलंकित कर दिया। 
25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने लाखों की भीड़ से आह्वान कर दिया कि वो प्रधानमंत्री आवास को घेर ले। जेपी यहीं नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने बड़ी चूक कर दी। जेपी ने भारतीय सेना से बग़ावत की अपील कर दी। ये आत्मघाती क़दम था। जेपी ने सेना से कहा कि वो सरकारी आदेशों को न माने। जेपी ने सेना से सरकार गिराने में मदद का आह्वान कर दिया। प्रधानमंत्री को खुफिया इनपुट मिला और देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। 
कल्पना कीजिए अगर सेना ने बगावत कर दी होती, प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति गिरफ्तार कर लिए जाते, सुप्रीम कोर्ट पर ताले लटका दिए जाते और लाखों आम लोगों के समर्थन से कोई सैन्य अधिकारी, सैन्य तानाशाही की स्थापना कर देता तो इस देश का क्या हुआ होता। सेना सिर्फ सरकार का आदेश मानना छोड़ दे तो फिर उस देश की रक्षा संभव नहीं है। 1971 में पाकिस्तान की सेना का समर्पण करवा कर पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटने वाली इंदिरा के सामने बदले की भावना से बौखलाया पाकिस्तान तन कर खड़ा था। और हार के ठीक चार साल बाद जब पाकिस्तान ये देखता कि भारतीय सेना ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बग़ावत कर दी है तो क्या वो ऐसा मौका जाने देता ? 
हैरानी है कि जेपी और आपातकाल पर लिखने वाले इस महत्वपूर्ण मसले को छूते तक नहीं हैं। इस घटना का जिक्र तक नहीं करते। जबकि ये ऐसी घटना थी जिसके बाद आपातकाल के अलावा तब की सरकार के पास शायद ही कोई दूसरा रास्ता बचा हो। या तो देश को सैन्य तानाशाही के हवाले करना, या फिर चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के रहते चुनाव में जाना। इंदिरा गांधी के पास यही दो रास्ते बचे थे। इंदिरा ने आपातकाल थोपा नहीं था। इंदिरा गांधी को आपातकाल के लिए मजबूर किया गया था। हमें जेपी की नीयत पर शक नहीं करना चाहिए लेकिन जेपी की ये भूल हमें स्वीकारनी होगी।

Thursday, June 7, 2018

मुसलमान मुक्त भारत चाहने वालों के लिए

मुसलमान मुक्त भारत की बात करने वालों, आप इस मुल्क के लिए ख़तरनाक हैं. आप आशफाकुल्ला खान की शहादत का अपमान कर रहे हैं. अशफाकउल्लाह ही क्यों आप तो भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की कुर्बानी को भी अपमानित कर रहे हैं. अब्दुल हमीद, मेजर सलमान की शहादत को आप धूल में मिला रहे हैं. खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना मजहरूल हक़, सैयद अहमद खान के संघर्षों को तिलांजली दे रहे हैं आपलोग. ख़तरनाक हैं आपलोग इस मुल्क के लिए. आपलोग मोहम्मद अली जिन्ना का समर्थक हैं. आप ही जैसे लोगों ने ऐसे हालात बनाए कि देश को बंटना पड़ा. आपलोग विभाजनकारी हैं. किसे हिंदुस्तान से हटाना चाहते हैं आपलोग? एपीजे अब्दुल कलाम की मिट्टी को यहां से हटा कर देशभक्त हो जाएंगे क्या आपलोग? आपलोग दे पाएंगे अशफाक उल्लाह खान जैसी शहादत? अब्दुल हमीद जैसी कुर्बानी देने की हिम्मत है क्या आपमें? बस भड़काऊ बायन दे सकते हैं आपलोग. बयान भी देश की कौमी एकता के खिलाफ. किससे भारत को मुक्त करना चाहते हैं आपलोग? जब हमारा एआर रहमान मां तुझे सलाम पर तान लेता है तो कलेजा दहलने लगता है आपलोगों का. जब हमारा ए आर रहमान वंदे मातरम को ऊंचाइयां देता है तो मिट्टी खिसकने लगती है आप लोगों की. जब हमारा ए आर रहमान कहता है कि भारत हमको जान से प्यारा है तो पाकिस्तानियों की तरह आप जैसों को वो बहुत ही बुरा लगता है. सुनिए, जब हमारे जावेद अख्तर साहब ओ पालन हारे निर्गुण और न्यारे गाते हैं तो पूरे हिंदुस्तान पर सूफी संतों के आशीर्वादों की बारिश होती है. कितने नाम गिनाएं आपको.
तो क्या आपको ए आर रहमान मुक्त भारत चाहिए? आपको चाहिए जावेद अख्तर मुक्त भारत? आपको चाहिए अशफाक उल्ला खान मुक्त भारत? आपको चाहिए अब्दुल हमीद मुक्त भारत? आपको चाहिए मौलाना मजहरुल हक मुक्त भारत?  आपको चाहिए एपीजे अब्दुल कलाम मुक्त भारत? कभी सोचा है आपने कैसा होगा वो भारत जिसमें सिर्फ आप जैसे लोग होंगे? अगर किसी दिन ऐसा कोई मुल्क बन भी गया तो यकीन मानिए वो किसी मुल्क का ईमान नहीं होगा. यकीन मानिए वो हिंदुस्तान नहीं होगा. आपलोग खतरा हैं इस देश के लिए. आपलोगों को तो कैच लपकता हमारा अजहरुद्दीन भी मंजूर नहीं था. आपलोग न तो हिंदुस्तानी कैफ को अपना मानते हैं, न ज़हीर खान को. सच बताऊं, आप जैसों को ये हिंदुस्तान अपना नहीं मानता . ये हिंदुस्तान है. कलाम के लिए जार-जार रोने वाला हिंदुस्तान. रहमान के गानों पर झूमने वाला हिंदुस्तान. अशफाक की शहादत को चूमने वाला हिंदुस्तान.

Thursday, May 31, 2018

मीडिया: गोदी से उतरें तो जाएं कहां ?


2012 के नवंबर महीने में ज़ी न्यूज़ के एंकर सुधीर चौधरी चैनल के दफ्तर से गिरफ्तार कर लिए गए थे। नवीन जिंदल को ब्लैकमेल करने के आरोप में चौधरी साहब तिहाड़ जेल भेजे गए। इससे पहले जब वो लाइव इंडिया में संपादक हुआ करते थे तो टीआरपी के दबाव में ग़लत ख़बर चलवा कर उन्होंने एक महिला टीचर को भीड़ से पिटवाया और उनके लगभग सारे कपड़े फड़वा डाले थे। महिला टीचर वाले मामले में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर वो खुद को बचा गए लेकिन, जिंदल ब्लैकमेलिंग केस में उन्हें जेल जाना पड़ा था। बाद के दिनों में वो पत्रकार के बजाए सत्ताधारी दल का प्रवक्ता नज़र आने लगे। इसी बीच एनडीटीवी वाले रवीश कुमार ने एक शब्द उछाला गोदी मीडिया। पत्रकारिता के पेशे में दूर कहीं एक छोटी सी जगह पर बेहैसियत सा मैं या मेरे जैसे कई लोग गोदी मीडिया, बिकाऊ मिडिया, सत्ता की चाकरी करती मीडिया, सत्ता से डरी-सहमी मीडिया को जीते-भोगते रहे हैं।
          कोबरा पोस्ट के हालिया स्टिंग ऑपरेशन ने एक बात साफ कर दी कि आप चाहे जो भी अखबार पढ़ते हैं, चाहे जिस किसी न्यूज चैनल को देखते हैं इनमें से ज्यादातर बिकाऊ हैं। टाइम्स ग्रुप से लेकर छोटे-मोटे चैनल तक एजेंडा जर्नलिज्म का सौदा बेनकाब हो चुका है। कोबरा पोस्ट ने न सिर्फ एजेंडा जर्नलिज्म का खुलासा किया है बल्कि इसी के साथ बिकाऊ मीडिया का सच सामने लाकर पत्रकारों को बड़ी राहत दी है। आम तौर पर ये धारणा बनती जा रही थी कि पत्रकार बिकाऊ हो गए हैं। कोबरा पोस्ट ने साफ कर दिया कि पत्रकार तो सिर्फ और सिर्फ नौकरी बजा रहा है। बिके तो मालिकान हैं, बिका तो प्रबंधन है।
    तो फिर मुझे सुधीर चौधरी कम कसूरवार नज़र आते हैं। एक पत्रकार कैसे-कैसे ब्लेकमेलर बन जाता है, एक पत्रकार कितने दबाव में नौकरी कर रहा होता है और पत्रकार एक अदद नौकरी के लिए कितने समझौते करता है ये मीडिया में बैठे हर आदमी को पता है।
   कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन को देखकर अगर टाइम्स नाऊ, टाइम्स ऑफ इंडिया और बीसीयों रीज़नल चैनल के पत्रकारों की अंतरात्मा जाग गई और वो बिके हुए मीडिया हाउस को लात मारकर रोड पर आ गए तो क्या खुद को ईमानदार कहने वाले मीडिया हाउस उनको नौकरी देंगे ?
   जिस देश में चपरासी की नौकरी के लिए इंजीनियर, वकील, पीएचडी और एमबीए डिग्रीधारी लाखों की भीड़ लाइन लगाती हो वहां पत्रकार अपनी नौकरी बचाने की जद्दोजहद ना करे तो क्या हरिश्चंद्र बना फिरे ?
    जिस समाज के लिए एक पत्रकार खतरनाक माफिया और सरकारी महकमे के गठजोड़ से लड़ता है वो समाज कभी किसी पत्रकार के लिए खड़ा हुआ है क्या ?
      मैंने अपराधियों के मारे जाने पर तोड़फोड़ और आगजनी देखी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों पत्रकार नक्सली बताकर जेल भेजे गए, सैकड़ों पत्रकार अपराधी-पुलिस गठजोड़ वाली बंदूकों से मार दिए गए। कभी किसी पत्रकार के लिए समाज को सड़क पर उतरते देखा है क्या ?
    आपके दिमाग़ में इतना ज़हर भरा जा चुका है कि आप एक दंगाई की मामूली बातों में बहक कर अपना ही शहर आग के हवाले करने लगे हैं लेकिन, एक अच्छी अपील आपको अपील नहीं करती।
    तो फिर हर बात के लिए मीडिया को मत कोसिए। कोबरा पोस्ट के स्टिंग ने बड़ी राहत दी है। स्टिंग ने साफ कर दिया है कि मीडिया मालिकों को बस पैसे चाहिए। इसके लिए वो दंगे करवाने को तैयार हैं। सैकड़ों लोगों की हत्या करवा कर, हज़ारों घरों को राख मिलवा कर उन्हें खुशी होगी अगर इसके लिए उन्हें कोई पैसे देता है। वो आपके बच्चों को दंगाई बनाकर उस जंगल में धकेलने को तैयार हैं जहां कहां से छूटी किसकी गोली किसके सीने में धंस जाए ये किसी को पता नहीं होता।
   स्टिंग ऑपरेशन में जिन मीडिया घरानों को आपने बेनकाब होता देखा है क्या आप उनका चैनल देखना, उनका अख़बार पढ़ना बंद करेंगे ? अगर हां, तब तो आपको ये नैतिक अधिकार है कि आप एक पत्रकार से पत्रकारिता की उम्मीद करें। और, अगर नहीं तो फिर आपको ये अधिकार नहीं कि आप किसी को बिकाऊ मीडिया कहें।
    और आख़िरी बात अपने पत्रकार साथियों से। आप सब मुझसे वरिष्ठ हैं। किसी नैतिक दबाव में मत आइए। कोबरा के डंक से बस कुछ अखबार और चैनल बचे हैं। ज़रूरी नहीं कि ये सारे बिकाऊ नहीं हों। और इनमें से जो बिकाऊ नहीं होंगे वो आपकी ईमानदारी से खुश होकर आपको नौकरी नहीं दे देंगे। और जिस राष्ट्र-समाज की वजह से आप नैतिक दबाव महसूस कर रहे हैं न वो आपको एक दिन के लिए भी पूछने नहीं आएगा। ध्यान रहे आप बिकाऊ नहीं हैं। बस इस बात का ध्यान रखिए कि आप खुद किसी को ब्लैकमेल न कीजिए और ना ही झूठी ख़बर चला कर किसी का मान हनन कीजिए। लेकिन नौकरी छोड़कर आप कोई क्रांति नहीं कर पाएंगे। फिलहाल प्रेमचंद की कहानी नमक का दारोगा पढ़िए। कहानी के पात्र ईमानदार दारोगा की जब नौकरी गई तो उसे नमक तस्कर अलोपीदीन की ही नौकरी करनी पड़ी थी। हम पत्रकारों को मालूम होना चाहिए कि हम अलोपीदीन की औलादों की नौकरी कर रहे हैं।

Wednesday, May 23, 2018

तब तो फिरंगी थे अब कौन हैं ?.

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  पत्रकारिता: कल आज और कल  विषय पर लिखते समय बेहद सतर्कता की ज़रूरत है। महात्मा गांधी के चम्पारण पहुंचने से पहले की एक घटना का जिक्र मैं ज़रूरी समझता हूं। शेख गुलाब, प्रजापति मिश्र और राजकुमार शुक्ल ने काफी शोध के बाद चंपारण के किसानों की दुर्दशा पर बड़ी रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट तैयार होने के बाद प्रजापति मिश्र उसे लेकर पटना पहुंचे। उम्मीद थी कि पटना से छपने वाले अखबार या फिर कलकत्ता और दिल्ली से छपने वाले अखबारों में वो रिपोर्ट छपेगी।
           प्रजापति मिश्र पूरी रिपोर्ट लेकर तब के कई संपादकों और संवाददाताओं से मिले लेकिन, किसी ने वो रिपोर्ट छापने की हिम्मत नहीं दिखाई। सबको डर था कि रिपोर्ट छपने से अंग्रेज अधिकारी नाराज हो जाएंगे। बाद में वही रिपोर्ट लेकर प्रजापति मिश्र कानपुर पहुंचे और वहां गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले। गणेश शंकर विद्यार्थी तब प्रताप अखबार निकाल रहे थे। विद्यार्थी जी ने वो पूरी रिपोर्ट कई किस्तों में छापी। ये प्रकरण यहां इसलिए याद कर रहा हूं ताकि पत्रकारिता के मूल चरित्र को ठीक से समझा जा सके। 1917 में भी सरकार की नीतियों के खिलाफ खबर छापने की हिम्मत संपादक नहीं जुटा पाते थे।
        2017 में एक बार फिर ऐसे ही हालात दिख रहे हैं। तब पत्रकारिता के चरित्र को बदलने के लिए महात्मा गांधी और गणेश शंकर विद्यार्थी थे, आज वैसा कोई नहीं है, सिर्फ हम और आप हैं। महात्मा गांधी ने अखबार निकाल कर राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता को नई दिशा दी और देखते-देखते 1920 के बाद अखबार में सरकार की ग़लत नीतियों वाली ख़बरें छपने लगीं।
  आज़ादी के बाद मीडिया का स्वरूप तेजी से बदला। आज़ाद देश में मीडिया ने भी आज़ाद मीडिया को परिभाषित किया। अमेरिका के साथ सेना के लिए हुए जीप सौदे के परतें तब की मीडिया ने उघेड़ कर रख दीं। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को सौदे की जांच करवानी पड़ी।
      इंदिरा गांधी ने 1974 में जब मीडिया पर शिकंजा कसने की कोशिश की तो सरकारी मीडिया को छोड़कर ज्यादातर स्वतंत्र मीडिया ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कई संपादक तो 1974 के आंदोलन की धुरी बने।
        आज हालात ऐसे नहीं हैं। आज का मीडिया मुनाफे का बड़ा बाजार है। आज का मीडिया सत्ता से शक्ति पाना चाहता है। आज का मीडिया खुद सत्ता चाहता है। आज के मीडिया मालिक सरकार से वो सबकुछ हासिल कर लेना चाहते हैं जो वो बाजार से हासिल नहीं कर सकते।
   आज के संपादक कल किस रूप में याद किए जाएंगे? वो फलां, जो फलां सरकार में बड़ी पहुंच रखते थे, जिन्होंने फलां की सरकार के वक्त काफी माल बनाया। कैसे याद किए जाएंगे आज के संपादक ? माना कि आज के तमाम संपादक सत्ता और पूंजीवाद की गोद में नहीं बैठे हैं लेकिन, ये भी मान लीजिए कि सत्ता और पूंजीवाद की गोद से बाहर के पांच संपादकों के नाम आप नहीं बता पाइएगा। मीडिया संस्थानों को सिर्फ अपने मुनाफे की फिक्र है। मालिक के मुनाफे के अंकगणित पर संपादक का मुनाफा टिका है। और इसी मुनाफे के अंकगणित ने संपादकों को बीच बाजार में ला खड़ा किया है। संपादक को बेहतर रिपोर्ट की जरूरत नहीं रह गई है, उसे बस अपने पत्रकारों से कमाई चाहिए।
  हमें एक और बात पर गौर करना होगा। क्या पत्रकार डाकिया है ? जैसे किसी ने कोई बात कही और हमने वही बात दर्शकों, पाठकों तक उसी रूप में पहुंचा दी। ये काम तो डाकिया का है। तो फिर हम किसी सूचना को कैसे लोगों तक पहुंचाएं? क्या अपने हिसाब से हम खबरों को लोगों तक पहुंचाएं ? तो फिर हम सबका जो अलग-अलग हिसाब होगा उसका हिसाब कौन रखेगा ? फिर जो हमारा अपना-अपना हिसाब होगा वो पत्रकारिता के मानकों पर खरा उतरेगा ही इसकी क्या गांरटी है ? पूंजीवाद की गुलामी ज्यादातर संपादकों ने स्वीकार कर ली है और जाति-संप्रदाय का जहर ज्यादातर पत्रकारों ने घोलना शुरू कर दिया है इस बात से किसी को इनकार है क्या ?
 कई सवाल हैं और इन्हीं सवालों में हम पत्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या अब हम सत्ता प्रतिष्ठानों से तमाम ज़रूरी सवाल पूछ रहे हैं। 22 जुलाई 2016 को चेन्नई से उड़ान भरने वाला भारतीय वायु सेना का विमान एन-32 सेना के 29 अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ लापता हो गया। आज तक उस विमान का सुराग नहीं लगाया जा सका है। क्या अब भी ये उम्मीद की जाए कि वायु सेना का हमारे वो 29 जाबांज आज भी सुरक्षित होंगे ? क्या मौजूदा सरकार की जगह कोई दूसरी सरकार होती तो इस मसले पर मीडिया की ऐसी चुप्पी होती ?
     दूसरे लोग चुप हैं तो हम क्यों चुप हैं ? ऐसे कई सवाल हैं, ऐसे कई मसले हैं जो मौजूदा दौर के मीडिया से जवाब मांग रहे हैं। भले ही ये पूरी तरह से सच न हो लेकिन सच के बेहद करीब है कि हम एक बार फिर 1917 वाले दौर में पहुंच गए हैं जब निलहों के अत्याचार की कहानी छापने की हिम्मत बस किसी गणेश शंकर विद्यार्थी में थी.

Friday, May 18, 2018

इसलिए ज़रूरी है कि...

विधायिका ने अपनी गरिमा खुद गिराई है। यूं बात-बात में विधायिका के दायरे में न्यायपालिका के डंडे का चलना उचित नहीं है। ये बेहद कमजोर विधायिका की निशानी है। लेकिन विधायिका को इसके लिए संविधान के दायरे में आना होगा। अलग-अलग राज्यों में राज्यपालों ने अक्सर विधायिका का सम्मान आहत किया है। 1990 के बाद ज्यादातर राजभवनों ने संविधान और संसदीय मर्यादा को छलनी किया है। आपको जब खुद अपने सम्मान का ख्याल नहीं होगा तो फिर दूसरे तो आपका मजाक उड़ाएंगे ही। आप खुद को जब पंचायत में लेकर चले जाएंगे तो सभा आपके दोषों के ढूंढेगी ही। देश और संविधान से अलग जब आप किसी नेता या गिरोह में आस्था रखने लगेंगे तो आदालत के डंडे आपकी पीठ पर पड़ेंगे ही। सभ्य समाज में दरवाजे पर पुलिस आने को भी अपमानजनक माना जाता है। तो फिर सभ्य राजनीति में राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक करार देना भी अपमानजनक माना जाना चाहिए। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल ऐसे फैसले ना लें जो असंवैधानिक हों और भरी पंचायत में उनके फैसले को बदलना पड़े। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल संविधान में आस्था रखते हुए काम करें न कि व्यक्ति विशेष में। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल का चयन करते वक्त लाज-शर्म का ख्याल रखा जाए। एक वक्त था जब देश के लोग राष्ट्रपति और राज्यपाल को लोकतांत्रिक गरिमा का प्रतीक समझते थे। यकीन मानिए, आज के ज्यादातर लोग इन दोनों पदों पर बैठे लोगों को रबर स्टांप मानने लगे हैं। कुछ लोग तो अब इन दोनों पदों को ही ग़ैरज़रूरी बताने लगे हैं। इसलिए ज़रूरी है कि ...सियासत में इतनी अदा रहे, आंखों में पानी रहे..लहजे में हया रहे।

Wednesday, May 16, 2018

बहुमत का छल


नदी धनौती मछरी रेवा, खा ल ई बैकुंठ के मेवा। देशभटक पांड़े के मन में ठीक वैसी ही उथल-पुथल मची है जैसी उथल-पुथल लंगड़ मल्लाह के कठरा में रेवा मछली करती है। धनौती से निकली रेवा जब लंगड़ के छोटे से कठरा में आती है तो छटपटाने लगती है। अंदर ही अंदर छटपटा रहे हैं देशभटक पांड़े। जब से कर्नाटक चुनाव का रिजल्ट आया है इनका माइंड सुन्न हो गया है। कौन करम बाकी रह गया था चुनाव में। हद से ज्यादा नीचे गिरे, झूठ-फरेब सब किया। बाकी रिजल्ट हो गया ले लोट्टा। बहुमत और जनमत का हिसाब लगाते-लगाते देशभटक पांड़े का कपार दुखने लगा है। घर से निकल कर बरवा घाट पहुंचे। देशभटक पांड़े को धनौती की दुर्दशा भी नहीं देखी जा रही। सूखी नदी में धूल उड़ रही है। कहां कभी सालों भर कल-कल करती नदी बहती रहती थी। और कहां आज इसमें धूल उड़ रही है। अब तो मुश्किल से तीन महीने ही पानी रहता है नदी में। बरसात के दिनों में पानी भरता है और बरसात खत्म होने के साथ नदी सूख जाती है। कभी बैकुंठ का मेवा मिलता था इस नदी में और अब तो पोठिया-टेंगरा भी नसीब नहीं। जो कभी मछली बेचा करते थे वो अब मजदूर हो गए और कुछ ताड़ी बेचने लगे।
      देशभटक पांड़े का मन एक बार फिर कर्नाटक पहुंच गया। सबेरे जब शाखा में गए थे तब भी मन वहीं रमा था। समझ में ये बात नहीं आ रही है कि बहुमत का मतलब क्या है। अब कर्नाटक का ही हिसाब लगाइए। भाजपा को मिले हैं 36 फीसदी वोट जबकि कांग्रेस को 38 फीसदी। कायदे से तो बहुमत कांग्रेस के साथ है। तो जनमत कांग्रेस के साथ और जीत भाजपा की। तो मतलब ये कि जनतंत्र का ये ढांचा अब तक लोगों को भ्रमित करता रहा है। ये बहुमत नहीं बहुसीट का ढांचा है। जिसके पास सीट ज्यादा जीत उसी की।
   देशभटक पांड़े को इस बात का संतोष है कि जीत भाजपा की हुई है। लेकिन बहुमत और जनमत वाला गणित उनको परेशान कर रहा है। उनको भुटिया पंडित जी वाली ललकार भी याद आ रही है। तिवारी टोला में एक बार भुटिया पंडित जी ने ताल ठोक कर कहा था कि देश में सिर्फ और सिर्फ अल्पमत की सरकारें बनती रहीं हैं और जनता को धोखा देने के लिए उसे ही बहुमत बताया जाता रहा है। बीसीयों के सामने भुटिया पंडित जी तब ये बात साबित कर दिखाई थी और तब देशभटक पांड़े को चुप रह जाना पड़ा था। शाखा की तमाम ट्रेनिंग धरी की धरी रह गई थी। भ्रम, अफवाह और झूठ पर टिके रहने वाले सारे दांव उस दिन फेल हो गए थे। भुटिया पंडित जी ने जब कहा कि अच्छा बताओ पांड़े पांच लोगों ने अगर चुनाव लड़ा और सौ लोगों ने वोट किया तो फिर बहुमत का अंक कितना होगा। देशभटक पांड़े ने तपाक से कहा था कम से कम इक्यावन। एक पल को लगा कि देशभटक पांड़े ने भुटिया पंडित जी को हरा दिया लेकिन, अगले ही पल पासा पलट गया। भुटिया पंडित जी ने कहा कि पांड़े बाबा इसे अक्ल से समझो। मान लो पांच लोगों ने चुनाव लड़ा और चुनाव में सौ लोगों ने वोट डाला। जीतने वाले को मिले 24 वोट, दूसरे नंबर पर रहे 23 वोट पाने वाले और इसी तरह बाकी तीन को मिले 20, 18 और 15 वोट। अब 23, 20,18 और 15 को जोड़ोगे तो होते हैं 76 वोट। मतलब 76 लोग तो उस आदमी के खिलाफ थे। अब सोचो जिसके पक्ष में मात्र 24 लोग हों और खिलाफ 76 लोग वो भला बहुमत वाला कैसे हो सकता है।
    देशभटक पांड़े को अपने संघी तर्क पर बड़ा भरोसा रहता था। लेकिन, उस दिन उन (कु)तर्कशक्ति ने जवाब दे दिया था। आज एक बार फिर वही स्थिति है।
  दूर कहीं सूरज धनौती की गोद में समाता जा रहा है। धनौती सूख गई है। रेवा के सपने चकनाचूर हो चुके हैं। लंगड़ मल्लाह अब बेहद कमजोर हो गया है। बरवा घाट पर अब कोई नहीं आता। शाम होते ही यहां मरघट छा जाता है। देशभटक पांड़े सोच रहे हैं क्या यही भारत का लोकतंत्र है।   

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