Thursday, June 7, 2018

मुसलमान मुक्त भारत चाहने वालों के लिए

मुसलमान मुक्त भारत की बात करने वालों, आप इस मुल्क के लिए ख़तरनाक हैं. आप आशफाकुल्ला खान की शहादत का अपमान कर रहे हैं. अशफाकउल्लाह ही क्यों आप तो भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की कुर्बानी को भी अपमानित कर रहे हैं. अब्दुल हमीद, मेजर सलमान की शहादत को आप धूल में मिला रहे हैं. खान अब्दुल गफ्फार खान, मौलाना मजहरूल हक़, सैयद अहमद खान के संघर्षों को तिलांजली दे रहे हैं आपलोग. ख़तरनाक हैं आपलोग इस मुल्क के लिए. आपलोग मोहम्मद अली जिन्ना का समर्थक हैं. आप ही जैसे लोगों ने ऐसे हालात बनाए कि देश को बंटना पड़ा. आपलोग विभाजनकारी हैं. किसे हिंदुस्तान से हटाना चाहते हैं आपलोग? एपीजे अब्दुल कलाम की मिट्टी को यहां से हटा कर देशभक्त हो जाएंगे क्या आपलोग? आपलोग दे पाएंगे अशफाक उल्लाह खान जैसी शहादत? अब्दुल हमीद जैसी कुर्बानी देने की हिम्मत है क्या आपमें? बस भड़काऊ बायन दे सकते हैं आपलोग. बयान भी देश की कौमी एकता के खिलाफ. किससे भारत को मुक्त करना चाहते हैं आपलोग? जब हमारा एआर रहमान मां तुझे सलाम पर तान लेता है तो कलेजा दहलने लगता है आपलोगों का. जब हमारा ए आर रहमान वंदे मातरम को ऊंचाइयां देता है तो मिट्टी खिसकने लगती है आप लोगों की. जब हमारा ए आर रहमान कहता है कि भारत हमको जान से प्यारा है तो पाकिस्तानियों की तरह आप जैसों को वो बहुत ही बुरा लगता है. सुनिए, जब हमारे जावेद अख्तर साहब ओ पालन हारे निर्गुण और न्यारे गाते हैं तो पूरे हिंदुस्तान पर सूफी संतों के आशीर्वादों की बारिश होती है. कितने नाम गिनाएं आपको.
तो क्या आपको ए आर रहमान मुक्त भारत चाहिए? आपको चाहिए जावेद अख्तर मुक्त भारत? आपको चाहिए अशफाक उल्ला खान मुक्त भारत? आपको चाहिए अब्दुल हमीद मुक्त भारत? आपको चाहिए मौलाना मजहरुल हक मुक्त भारत?  आपको चाहिए एपीजे अब्दुल कलाम मुक्त भारत? कभी सोचा है आपने कैसा होगा वो भारत जिसमें सिर्फ आप जैसे लोग होंगे? अगर किसी दिन ऐसा कोई मुल्क बन भी गया तो यकीन मानिए वो किसी मुल्क का ईमान नहीं होगा. यकीन मानिए वो हिंदुस्तान नहीं होगा. आपलोग खतरा हैं इस देश के लिए. आपलोगों को तो कैच लपकता हमारा अजहरुद्दीन भी मंजूर नहीं था. आपलोग न तो हिंदुस्तानी कैफ को अपना मानते हैं, न ज़हीर खान को. सच बताऊं, आप जैसों को ये हिंदुस्तान अपना नहीं मानता . ये हिंदुस्तान है. कलाम के लिए जार-जार रोने वाला हिंदुस्तान. रहमान के गानों पर झूमने वाला हिंदुस्तान. अशफाक की शहादत को चूमने वाला हिंदुस्तान.

Thursday, May 31, 2018

मीडिया: गोदी से उतरें तो जाएं कहां ?


2012 के नवंबर महीने में ज़ी न्यूज़ के एंकर सुधीर चौधरी चैनल के दफ्तर से गिरफ्तार कर लिए गए थे। नवीन जिंदल को ब्लैकमेल करने के आरोप में चौधरी साहब तिहाड़ जेल भेजे गए। इससे पहले जब वो लाइव इंडिया में संपादक हुआ करते थे तो टीआरपी के दबाव में ग़लत ख़बर चलवा कर उन्होंने एक महिला टीचर को भीड़ से पिटवाया और उनके लगभग सारे कपड़े फड़वा डाले थे। महिला टीचर वाले मामले में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर वो खुद को बचा गए लेकिन, जिंदल ब्लैकमेलिंग केस में उन्हें जेल जाना पड़ा था। बाद के दिनों में वो पत्रकार के बजाए सत्ताधारी दल का प्रवक्ता नज़र आने लगे। इसी बीच एनडीटीवी वाले रवीश कुमार ने एक शब्द उछाला गोदी मीडिया। पत्रकारिता के पेशे में दूर कहीं एक छोटी सी जगह पर बेहैसियत सा मैं या मेरे जैसे कई लोग गोदी मीडिया, बिकाऊ मिडिया, सत्ता की चाकरी करती मीडिया, सत्ता से डरी-सहमी मीडिया को जीते-भोगते रहे हैं।
          कोबरा पोस्ट के हालिया स्टिंग ऑपरेशन ने एक बात साफ कर दी कि आप चाहे जो भी अखबार पढ़ते हैं, चाहे जिस किसी न्यूज चैनल को देखते हैं इनमें से ज्यादातर बिकाऊ हैं। टाइम्स ग्रुप से लेकर छोटे-मोटे चैनल तक एजेंडा जर्नलिज्म का सौदा बेनकाब हो चुका है। कोबरा पोस्ट ने न सिर्फ एजेंडा जर्नलिज्म का खुलासा किया है बल्कि इसी के साथ बिकाऊ मीडिया का सच सामने लाकर पत्रकारों को बड़ी राहत दी है। आम तौर पर ये धारणा बनती जा रही थी कि पत्रकार बिकाऊ हो गए हैं। कोबरा पोस्ट ने साफ कर दिया कि पत्रकार तो सिर्फ और सिर्फ नौकरी बजा रहा है। बिके तो मालिकान हैं, बिका तो प्रबंधन है।
    तो फिर मुझे सुधीर चौधरी कम कसूरवार नज़र आते हैं। एक पत्रकार कैसे-कैसे ब्लेकमेलर बन जाता है, एक पत्रकार कितने दबाव में नौकरी कर रहा होता है और पत्रकार एक अदद नौकरी के लिए कितने समझौते करता है ये मीडिया में बैठे हर आदमी को पता है।
   कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन को देखकर अगर टाइम्स नाऊ, टाइम्स ऑफ इंडिया और बीसीयों रीज़नल चैनल के पत्रकारों की अंतरात्मा जाग गई और वो बिके हुए मीडिया हाउस को लात मारकर रोड पर आ गए तो क्या खुद को ईमानदार कहने वाले मीडिया हाउस उनको नौकरी देंगे ?
   जिस देश में चपरासी की नौकरी के लिए इंजीनियर, वकील, पीएचडी और एमबीए डिग्रीधारी लाखों की भीड़ लाइन लगाती हो वहां पत्रकार अपनी नौकरी बचाने की जद्दोजहद ना करे तो क्या हरिश्चंद्र बना फिरे ?
    जिस समाज के लिए एक पत्रकार खतरनाक माफिया और सरकारी महकमे के गठजोड़ से लड़ता है वो समाज कभी किसी पत्रकार के लिए खड़ा हुआ है क्या ?
      मैंने अपराधियों के मारे जाने पर तोड़फोड़ और आगजनी देखी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों पत्रकार नक्सली बताकर जेल भेजे गए, सैकड़ों पत्रकार अपराधी-पुलिस गठजोड़ वाली बंदूकों से मार दिए गए। कभी किसी पत्रकार के लिए समाज को सड़क पर उतरते देखा है क्या ?
    आपके दिमाग़ में इतना ज़हर भरा जा चुका है कि आप एक दंगाई की मामूली बातों में बहक कर अपना ही शहर आग के हवाले करने लगे हैं लेकिन, एक अच्छी अपील आपको अपील नहीं करती।
    तो फिर हर बात के लिए मीडिया को मत कोसिए। कोबरा पोस्ट के स्टिंग ने बड़ी राहत दी है। स्टिंग ने साफ कर दिया है कि मीडिया मालिकों को बस पैसे चाहिए। इसके लिए वो दंगे करवाने को तैयार हैं। सैकड़ों लोगों की हत्या करवा कर, हज़ारों घरों को राख मिलवा कर उन्हें खुशी होगी अगर इसके लिए उन्हें कोई पैसे देता है। वो आपके बच्चों को दंगाई बनाकर उस जंगल में धकेलने को तैयार हैं जहां कहां से छूटी किसकी गोली किसके सीने में धंस जाए ये किसी को पता नहीं होता।
   स्टिंग ऑपरेशन में जिन मीडिया घरानों को आपने बेनकाब होता देखा है क्या आप उनका चैनल देखना, उनका अख़बार पढ़ना बंद करेंगे ? अगर हां, तब तो आपको ये नैतिक अधिकार है कि आप एक पत्रकार से पत्रकारिता की उम्मीद करें। और, अगर नहीं तो फिर आपको ये अधिकार नहीं कि आप किसी को बिकाऊ मीडिया कहें।
    और आख़िरी बात अपने पत्रकार साथियों से। आप सब मुझसे वरिष्ठ हैं। किसी नैतिक दबाव में मत आइए। कोबरा के डंक से बस कुछ अखबार और चैनल बचे हैं। ज़रूरी नहीं कि ये सारे बिकाऊ नहीं हों। और इनमें से जो बिकाऊ नहीं होंगे वो आपकी ईमानदारी से खुश होकर आपको नौकरी नहीं दे देंगे। और जिस राष्ट्र-समाज की वजह से आप नैतिक दबाव महसूस कर रहे हैं न वो आपको एक दिन के लिए भी पूछने नहीं आएगा। ध्यान रहे आप बिकाऊ नहीं हैं। बस इस बात का ध्यान रखिए कि आप खुद किसी को ब्लैकमेल न कीजिए और ना ही झूठी ख़बर चला कर किसी का मान हनन कीजिए। लेकिन नौकरी छोड़कर आप कोई क्रांति नहीं कर पाएंगे। फिलहाल प्रेमचंद की कहानी नमक का दारोगा पढ़िए। कहानी के पात्र ईमानदार दारोगा की जब नौकरी गई तो उसे नमक तस्कर अलोपीदीन की ही नौकरी करनी पड़ी थी। हम पत्रकारों को मालूम होना चाहिए कि हम अलोपीदीन की औलादों की नौकरी कर रहे हैं।

Wednesday, May 23, 2018

तब तो फिरंगी थे अब कौन हैं ?.

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  पत्रकारिता: कल आज और कल  विषय पर लिखते समय बेहद सतर्कता की ज़रूरत है। महात्मा गांधी के चम्पारण पहुंचने से पहले की एक घटना का जिक्र मैं ज़रूरी समझता हूं। शेख गुलाब, प्रजापति मिश्र और राजकुमार शुक्ल ने काफी शोध के बाद चंपारण के किसानों की दुर्दशा पर बड़ी रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट तैयार होने के बाद प्रजापति मिश्र उसे लेकर पटना पहुंचे। उम्मीद थी कि पटना से छपने वाले अखबार या फिर कलकत्ता और दिल्ली से छपने वाले अखबारों में वो रिपोर्ट छपेगी।
           प्रजापति मिश्र पूरी रिपोर्ट लेकर तब के कई संपादकों और संवाददाताओं से मिले लेकिन, किसी ने वो रिपोर्ट छापने की हिम्मत नहीं दिखाई। सबको डर था कि रिपोर्ट छपने से अंग्रेज अधिकारी नाराज हो जाएंगे। बाद में वही रिपोर्ट लेकर प्रजापति मिश्र कानपुर पहुंचे और वहां गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले। गणेश शंकर विद्यार्थी तब प्रताप अखबार निकाल रहे थे। विद्यार्थी जी ने वो पूरी रिपोर्ट कई किस्तों में छापी। ये प्रकरण यहां इसलिए याद कर रहा हूं ताकि पत्रकारिता के मूल चरित्र को ठीक से समझा जा सके। 1917 में भी सरकार की नीतियों के खिलाफ खबर छापने की हिम्मत संपादक नहीं जुटा पाते थे।
        2017 में एक बार फिर ऐसे ही हालात दिख रहे हैं। तब पत्रकारिता के चरित्र को बदलने के लिए महात्मा गांधी और गणेश शंकर विद्यार्थी थे, आज वैसा कोई नहीं है, सिर्फ हम और आप हैं। महात्मा गांधी ने अखबार निकाल कर राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता को नई दिशा दी और देखते-देखते 1920 के बाद अखबार में सरकार की ग़लत नीतियों वाली ख़बरें छपने लगीं।
  आज़ादी के बाद मीडिया का स्वरूप तेजी से बदला। आज़ाद देश में मीडिया ने भी आज़ाद मीडिया को परिभाषित किया। अमेरिका के साथ सेना के लिए हुए जीप सौदे के परतें तब की मीडिया ने उघेड़ कर रख दीं। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को सौदे की जांच करवानी पड़ी।
      इंदिरा गांधी ने 1974 में जब मीडिया पर शिकंजा कसने की कोशिश की तो सरकारी मीडिया को छोड़कर ज्यादातर स्वतंत्र मीडिया ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कई संपादक तो 1974 के आंदोलन की धुरी बने।
        आज हालात ऐसे नहीं हैं। आज का मीडिया मुनाफे का बड़ा बाजार है। आज का मीडिया सत्ता से शक्ति पाना चाहता है। आज का मीडिया खुद सत्ता चाहता है। आज के मीडिया मालिक सरकार से वो सबकुछ हासिल कर लेना चाहते हैं जो वो बाजार से हासिल नहीं कर सकते।
   आज के संपादक कल किस रूप में याद किए जाएंगे? वो फलां, जो फलां सरकार में बड़ी पहुंच रखते थे, जिन्होंने फलां की सरकार के वक्त काफी माल बनाया। कैसे याद किए जाएंगे आज के संपादक ? माना कि आज के तमाम संपादक सत्ता और पूंजीवाद की गोद में नहीं बैठे हैं लेकिन, ये भी मान लीजिए कि सत्ता और पूंजीवाद की गोद से बाहर के पांच संपादकों के नाम आप नहीं बता पाइएगा। मीडिया संस्थानों को सिर्फ अपने मुनाफे की फिक्र है। मालिक के मुनाफे के अंकगणित पर संपादक का मुनाफा टिका है। और इसी मुनाफे के अंकगणित ने संपादकों को बीच बाजार में ला खड़ा किया है। संपादक को बेहतर रिपोर्ट की जरूरत नहीं रह गई है, उसे बस अपने पत्रकारों से कमाई चाहिए।
  हमें एक और बात पर गौर करना होगा। क्या पत्रकार डाकिया है ? जैसे किसी ने कोई बात कही और हमने वही बात दर्शकों, पाठकों तक उसी रूप में पहुंचा दी। ये काम तो डाकिया का है। तो फिर हम किसी सूचना को कैसे लोगों तक पहुंचाएं? क्या अपने हिसाब से हम खबरों को लोगों तक पहुंचाएं ? तो फिर हम सबका जो अलग-अलग हिसाब होगा उसका हिसाब कौन रखेगा ? फिर जो हमारा अपना-अपना हिसाब होगा वो पत्रकारिता के मानकों पर खरा उतरेगा ही इसकी क्या गांरटी है ? पूंजीवाद की गुलामी ज्यादातर संपादकों ने स्वीकार कर ली है और जाति-संप्रदाय का जहर ज्यादातर पत्रकारों ने घोलना शुरू कर दिया है इस बात से किसी को इनकार है क्या ?
 कई सवाल हैं और इन्हीं सवालों में हम पत्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या अब हम सत्ता प्रतिष्ठानों से तमाम ज़रूरी सवाल पूछ रहे हैं। 22 जुलाई 2016 को चेन्नई से उड़ान भरने वाला भारतीय वायु सेना का विमान एन-32 सेना के 29 अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ लापता हो गया। आज तक उस विमान का सुराग नहीं लगाया जा सका है। क्या अब भी ये उम्मीद की जाए कि वायु सेना का हमारे वो 29 जाबांज आज भी सुरक्षित होंगे ? क्या मौजूदा सरकार की जगह कोई दूसरी सरकार होती तो इस मसले पर मीडिया की ऐसी चुप्पी होती ?
     दूसरे लोग चुप हैं तो हम क्यों चुप हैं ? ऐसे कई सवाल हैं, ऐसे कई मसले हैं जो मौजूदा दौर के मीडिया से जवाब मांग रहे हैं। भले ही ये पूरी तरह से सच न हो लेकिन सच के बेहद करीब है कि हम एक बार फिर 1917 वाले दौर में पहुंच गए हैं जब निलहों के अत्याचार की कहानी छापने की हिम्मत बस किसी गणेश शंकर विद्यार्थी में थी.

Friday, May 18, 2018

इसलिए ज़रूरी है कि...

विधायिका ने अपनी गरिमा खुद गिराई है। यूं बात-बात में विधायिका के दायरे में न्यायपालिका के डंडे का चलना उचित नहीं है। ये बेहद कमजोर विधायिका की निशानी है। लेकिन विधायिका को इसके लिए संविधान के दायरे में आना होगा। अलग-अलग राज्यों में राज्यपालों ने अक्सर विधायिका का सम्मान आहत किया है। 1990 के बाद ज्यादातर राजभवनों ने संविधान और संसदीय मर्यादा को छलनी किया है। आपको जब खुद अपने सम्मान का ख्याल नहीं होगा तो फिर दूसरे तो आपका मजाक उड़ाएंगे ही। आप खुद को जब पंचायत में लेकर चले जाएंगे तो सभा आपके दोषों के ढूंढेगी ही। देश और संविधान से अलग जब आप किसी नेता या गिरोह में आस्था रखने लगेंगे तो आदालत के डंडे आपकी पीठ पर पड़ेंगे ही। सभ्य समाज में दरवाजे पर पुलिस आने को भी अपमानजनक माना जाता है। तो फिर सभ्य राजनीति में राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक करार देना भी अपमानजनक माना जाना चाहिए। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल ऐसे फैसले ना लें जो असंवैधानिक हों और भरी पंचायत में उनके फैसले को बदलना पड़े। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल संविधान में आस्था रखते हुए काम करें न कि व्यक्ति विशेष में। इसलिए ज़रूरी है कि राज्यपाल का चयन करते वक्त लाज-शर्म का ख्याल रखा जाए। एक वक्त था जब देश के लोग राष्ट्रपति और राज्यपाल को लोकतांत्रिक गरिमा का प्रतीक समझते थे। यकीन मानिए, आज के ज्यादातर लोग इन दोनों पदों पर बैठे लोगों को रबर स्टांप मानने लगे हैं। कुछ लोग तो अब इन दोनों पदों को ही ग़ैरज़रूरी बताने लगे हैं। इसलिए ज़रूरी है कि ...सियासत में इतनी अदा रहे, आंखों में पानी रहे..लहजे में हया रहे।

Wednesday, May 16, 2018

बहुमत का छल


नदी धनौती मछरी रेवा, खा ल ई बैकुंठ के मेवा। देशभटक पांड़े के मन में ठीक वैसी ही उथल-पुथल मची है जैसी उथल-पुथल लंगड़ मल्लाह के कठरा में रेवा मछली करती है। धनौती से निकली रेवा जब लंगड़ के छोटे से कठरा में आती है तो छटपटाने लगती है। अंदर ही अंदर छटपटा रहे हैं देशभटक पांड़े। जब से कर्नाटक चुनाव का रिजल्ट आया है इनका माइंड सुन्न हो गया है। कौन करम बाकी रह गया था चुनाव में। हद से ज्यादा नीचे गिरे, झूठ-फरेब सब किया। बाकी रिजल्ट हो गया ले लोट्टा। बहुमत और जनमत का हिसाब लगाते-लगाते देशभटक पांड़े का कपार दुखने लगा है। घर से निकल कर बरवा घाट पहुंचे। देशभटक पांड़े को धनौती की दुर्दशा भी नहीं देखी जा रही। सूखी नदी में धूल उड़ रही है। कहां कभी सालों भर कल-कल करती नदी बहती रहती थी। और कहां आज इसमें धूल उड़ रही है। अब तो मुश्किल से तीन महीने ही पानी रहता है नदी में। बरसात के दिनों में पानी भरता है और बरसात खत्म होने के साथ नदी सूख जाती है। कभी बैकुंठ का मेवा मिलता था इस नदी में और अब तो पोठिया-टेंगरा भी नसीब नहीं। जो कभी मछली बेचा करते थे वो अब मजदूर हो गए और कुछ ताड़ी बेचने लगे।
      देशभटक पांड़े का मन एक बार फिर कर्नाटक पहुंच गया। सबेरे जब शाखा में गए थे तब भी मन वहीं रमा था। समझ में ये बात नहीं आ रही है कि बहुमत का मतलब क्या है। अब कर्नाटक का ही हिसाब लगाइए। भाजपा को मिले हैं 36 फीसदी वोट जबकि कांग्रेस को 38 फीसदी। कायदे से तो बहुमत कांग्रेस के साथ है। तो जनमत कांग्रेस के साथ और जीत भाजपा की। तो मतलब ये कि जनतंत्र का ये ढांचा अब तक लोगों को भ्रमित करता रहा है। ये बहुमत नहीं बहुसीट का ढांचा है। जिसके पास सीट ज्यादा जीत उसी की।
   देशभटक पांड़े को इस बात का संतोष है कि जीत भाजपा की हुई है। लेकिन बहुमत और जनमत वाला गणित उनको परेशान कर रहा है। उनको भुटिया पंडित जी वाली ललकार भी याद आ रही है। तिवारी टोला में एक बार भुटिया पंडित जी ने ताल ठोक कर कहा था कि देश में सिर्फ और सिर्फ अल्पमत की सरकारें बनती रहीं हैं और जनता को धोखा देने के लिए उसे ही बहुमत बताया जाता रहा है। बीसीयों के सामने भुटिया पंडित जी तब ये बात साबित कर दिखाई थी और तब देशभटक पांड़े को चुप रह जाना पड़ा था। शाखा की तमाम ट्रेनिंग धरी की धरी रह गई थी। भ्रम, अफवाह और झूठ पर टिके रहने वाले सारे दांव उस दिन फेल हो गए थे। भुटिया पंडित जी ने जब कहा कि अच्छा बताओ पांड़े पांच लोगों ने अगर चुनाव लड़ा और सौ लोगों ने वोट किया तो फिर बहुमत का अंक कितना होगा। देशभटक पांड़े ने तपाक से कहा था कम से कम इक्यावन। एक पल को लगा कि देशभटक पांड़े ने भुटिया पंडित जी को हरा दिया लेकिन, अगले ही पल पासा पलट गया। भुटिया पंडित जी ने कहा कि पांड़े बाबा इसे अक्ल से समझो। मान लो पांच लोगों ने चुनाव लड़ा और चुनाव में सौ लोगों ने वोट डाला। जीतने वाले को मिले 24 वोट, दूसरे नंबर पर रहे 23 वोट पाने वाले और इसी तरह बाकी तीन को मिले 20, 18 और 15 वोट। अब 23, 20,18 और 15 को जोड़ोगे तो होते हैं 76 वोट। मतलब 76 लोग तो उस आदमी के खिलाफ थे। अब सोचो जिसके पक्ष में मात्र 24 लोग हों और खिलाफ 76 लोग वो भला बहुमत वाला कैसे हो सकता है।
    देशभटक पांड़े को अपने संघी तर्क पर बड़ा भरोसा रहता था। लेकिन, उस दिन उन (कु)तर्कशक्ति ने जवाब दे दिया था। आज एक बार फिर वही स्थिति है।
  दूर कहीं सूरज धनौती की गोद में समाता जा रहा है। धनौती सूख गई है। रेवा के सपने चकनाचूर हो चुके हैं। लंगड़ मल्लाह अब बेहद कमजोर हो गया है। बरवा घाट पर अब कोई नहीं आता। शाम होते ही यहां मरघट छा जाता है। देशभटक पांड़े सोच रहे हैं क्या यही भारत का लोकतंत्र है।   

Thursday, May 3, 2018

नायक का रोल छोड़ खलनायक बने जिन्ना को महिमामंडित न करें

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के दफ्तर मे मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर खड़ा हुआ विवाद वैसे तो शुद्ध सियासी विवाद है। बावजूद इसके इस विवाद की आड़ में जिन्ना को महिमामंडित करना उचित नहीं होगा। इस बात में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी लेकिन, इस बात में भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि थोड़े ही दिनों बाद जिन्ना अंग्रेजों का पिट्ठू बन गया और आजादी की लड़ाई को बेहद कमजोर कर गया। जिन्ना ने भारत और पाकिस्तान को कभी खत्म नहीं होने वाले ऐसे झगड़े दिए जिसका खामियाजा आज तक दोनों देश भुगत रहे हैं।

   जिस अलीगढ़ मुस्लिम यूनवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर लगी है उसी यूनिवर्सिटी के संस्थापक ने पहली बार देश को टुकड़े करने का नीच विचार पेश किया था। 1867 में ही सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग उठा दी थी। हालांकि तब अंग्रेजों ने उनकी बात को कई तवज्जो नहीं दी और बात आई-गई होती रही। लेकिन, 1920 में एक बड़ी घटना हो गई। इसी साल मोहम्मद अली जिन्ना ने महात्मा गांधी को हिंदुवादी नेता करार देते हुए मुसलमानों को महात्मा गांधी से सतर्क रहने की सलाह दे दी। जिन्ना की इस अपील से आजादी की लड़ाई में बड़ी गफलत पैदा हो गई। जिन्ना की इस अपील के पीछे फिरंगी लार्ड रीडिग का दिमाग काम रहा था। लार्ड रीडिग ने ही आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के मकसद से जिन्ना को इस योजना पर काम करने के लिए तैयार किया था। ये वही लार्ड रीडिग था जिसके हाथों 1925 में जिन्ना ने नाइटहुड की उपाधि ली थी। और आजादी का नायक जिन्ना अब पूरी तरह से देश और इंसानियत के लिए खलनायक बन चुका था।
 रीडिग से उपाधि पाने के बाद जिन्ना खुलकर अंग्रेजों के लिए काम करने लगा था। 1930 में जिन्ना के सहयोगी मोहम्मद इकबाल ने इलाहाबाद में मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की मांग के समर्थन में जलसा किया। 1933 में जिन्ना के मित्र रहमत अली ने अलग देश की मांग के साथ अलग देश का नाम भी सुझाया। इसी साल रहमत अली ने पाकिस्तान नाम के देश के मिर्माण के लिए पर्चे बंटवाए। देश में तनाव बढ़ता जा रहा था। भारतीय समाज आपस में लड़ कर कमजोर होने लगा था।
   इसी बीच 1934 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग का पुनर्गठन किया और पुनर्गठन के मौके पर महात्मा गांधी, कांग्रेस, अब्बुल कलाम आज़ाद और जमात-ए-इस्लामी को मुसलमानों का दुश्मन कह कर संबोधित किया।
   जिन्ना ने समाज और इंसानियत के खिलाफ सबसे घटिया कदम 1937 में उठाया। 1937 में जब कांग्रेस ने जिन्ना के पाकिस्तान विचार को खारिज कर दिया तब जिन्ना आपा खो बैठा और अंग्रेजों के इशारे पर उसने मुसलमानों से गृहयुद्ध की अपील कर दी। जिन्ना की इस घटिया चाल से देश भर में दंगे भड़क गए। जैसे-तैसे दंगों पर काबू पाया ही गया कि फिर 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने प्रस्ताव पारित कर कहा कि लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है और इसके लिए मुसलमानों को आखिरी लड़ाई लड़नी होगी।
   1940 के इस लाहौर अधिवेशन का सबसे अधिक फायदा अंग्रेजों को हुआ। अंग्रेजों ने बड़ी आसानी से देश भर में हिंदु-मुस्लिम दंगों की आग लगा दी। लेकिन इसके ठीक बाद 1942 में आजादी के दीवानों ने ऐसी आग लगाई जिसमें जिन्ना और अंग्रेजों की लगाई आग खुद जल कर राख हो गई। 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन से जिन्ना और अंग्रेज, दोनों बौखला गए। देश को फिर सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिया गया। 1946 में प्रतिनिधि सभा के चुनाव में मुसलमान बहुल इलाकों में मुस्लिम लीग ने बड़ी सफलता हासिल की। चुनाव के नतीजों से कांग्रेस कमजोर पड़ गई और मुस्लिम लीग प्रतिनिधियों ने देश के बंटवारे का प्रस्ताव पारित कर अंग्रेजों की झोली में डाल दिया।
   ऐसे जिन्ना को भारत में आजादी की लड़ाई का नायक नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे जिन्ना को तो पाकिस्तान में भी आजादी की लड़ाई का नायक नहीं माना चाहिए। तो फिर जिन्ना की तस्वीर को किसी यूनिवर्सिटी में सजाने का मतलब ही क्या है ? उस तस्वीर के समर्थन में उतरने का मतलब क्या है ?

Friday, April 13, 2018

अपनी बहन-बेटियों के लिए ही सही अब नागरिक की हैसियत में वापस लौटिए


कठुआ, उन्नाव और समस्तीपुर में हुई बलात्कार के बाद हत्या और बलात्कार की घटनाओं पर मचा शोर थोड़ा कम हुआ है। अब ज़रूरी है कि हम खुद से कुछ सवाल पूछें। सोशल मीडिया पर ये सवाल उठाया गया कि कठुआ में मुस्लिम लड़की की बलात्कार के बाद हत्या की गई तो मीडिया ने बहुत शोर मचाया और समस्तीपुर में हिंदू लड़की की रेप के बाद हत्या पर मीडिया ने कोई शोर नहीं मचाया। इस बेहूदा सवाल से भागना ठीक नहीं होगा। जिम्मेदार लोग फकीर नहीं होते जो सवालों से मुंह छुपाने कि लिए झोला उठाकर भाग जाएं। जिम्मेदार लोगों को जवाब देना होता है। बेहूदगी से भरे इस सवाल का जवाब नहीं दीजिएगा तो बेहूदगी बढ़ती जाएगी। कठुआ और समस्तीपुर की घटनाओं में समानता नहीं है इसलिए दोनों को एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। समस्तीपुर में बच्ची के साथ एक युवक रेप करता है और उसकी हत्या कर देता है। घटना सामने आते ही समाज और प्रशासन दोनों अपना काम करते हैं। जबकि, कठुआ में एक मंदिर में एक लड़की के साथ कई दिनों तक गैंगरेप होता है, पुलिस गैंगरेप करने वालों के बचाती रहती है और फिर अंत में लड़की की हत्या कर शव छुपाने की योजना भी पुलिस ही बनाती है। कहा तो ये भी जा रहा है कि एक पुलिस अधिकारी ने ये तक कहा कि अभी मत मारना मुझे भी मज़े ले लेने दो। क्या समस्तीपुर में भी ऐसा कुछ हुआ था ? नहीं न। तो फिर दोनों घटनाओं को  मीडिया में बराबर स्पेस कैसे मिल जाता ? समस्तीपुर की घटना के बाद क्या किसी मुस्लिम संगठन ने बलात्कारी के पक्ष में रैली निकाली ? नहीं, लेकिन कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ कई दिनों तक मंदिर में गैंगरेप होता रहा, उसकी हत्या की गई और हिंदूवादी संगठन ने बलात्कारियों के पक्ष में रैली की। इस रैली में जय श्री राम के नारे लगे। ऐसा इस देश में पहली बार हुआ जब बलात्कारियों के पक्ष में उन्मादी धार्मिक गोलबंदी करने की कोशिश की गई। हाथ में तिरंगा लेकर, जुबान पर जय श्री राम लेकर बलात्कारियों के पक्ष में भीड़ खड़ी दिखी। इसलिए समस्तीपुर और कठुआ की घटनाओं को आप एक चश्मे से न देखें। कठुआ में बलात्कारियों के समर्थकों के हाथों में लहराता तिरंगा कितना गौरवान्वित हुआ होगा ये तिरंगा ही जाने, बलात्कारी-हत्यारों के जुबान से जय श्री राम के नारे सुन राम कितने फूले समाए होंगे ये राम ही जानें। मेरी समझ में यह तिरंगे का घोर अपना था और राम की मर्यादाओं के साथ बलात्कार था। वैसे पहले भी ये तबका राम के जयकारे उनकी भक्ति में नहीं लगाता रहा है। पहले भी राम के जयकारे सत्ता की भूख में लगते रहे हैं और अब जिस्म की भूख में लगने लगे हैं। इसलिए हर घटना में हिंदू-मुस्लिम करने वाले इस वक्त अपने घर में अपनी मां-बहन के साथ बैठें और जरा उनसे स्त्री देह की गरिमा समझने की कोशिश करें।
   अब बात उन्नाव वाली घटना की। उन्नाव वाली घटना इतनी बड़ी नहीं होती अगर सत्ता-प्रतिष्ठान ने ठीक से काम किया होता। सत्ता-प्रतिष्ठान ने एक आरोपी को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लड़की को खामोश करने की पूरी किशिशें हुईं, लड़की के पिता की हत्या सत्ता-समाज ने की और फिर किस्म-किस्म के बेहूदा तर्क सत्ता-समाज ने गढ़े। डीजीपी ने कहा कि आरोपी विधायक के खिलाफ इतने साक्ष्य नहीं कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सके लेकिन, वहीं डीजीपी ये नहीं बता पाया कि पीड़ित लड़की के पिता के खिलाफ कौन से साक्ष्य थे कि उनको गिरफ्तार कर लिया और फिर पीट-पीट कर मार डाला।   
   आप कोसिए, सबको कोसिए। सरकार को, पुलिस को, राजनेता को कोसते-कोसते अगर आप खुद को भी नहीं कोस रहे हैं तो यकीन मानिए आप ईमानदार नहीं हैं। बलात्कार को हिंदू-मुस्लिम के खांचे में धकेलने वाला समाज बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकता है। बलात्कार के पक्ष में रैलियां करने वाला समाज बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकता है। बलात्कारी नेता के पक्ष में कुतर्क गढ़ने वाली भीड़ बलात्कार भोगने के काबिल ही हो सकती है। बलात्कार के पक्ष में खड़ी राजनैतिक विचारधारा बलात्कारी ही हो सकती है।
     इसलिए ज़रूरी है कि अभी भी आप समर्थक और भक्त की हैसियत से ऊपर उठ कर आम नागरिक की हैसियत में वापस लौटिए, हिंदू-मुस्लिम के सिकुड़े दायरे से बाहर निकलिए और दूसरों की बहन बेटियों कि फिक्र तो दूर की बात, अपनी ही बहन-बेटियों को इन उन्मादियों से बचा लीजिए।   

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