Tuesday, December 6, 2016

वो क़ातिल हैं

सत्ता
वो जो क़ातिल हैं
लाशों पर लाश बिछाते हैं
वो जो वहशी हैं
बस्ती को राख बनाते हैं
वो जो शातिर हैं
दंगाई बिसात बिछाते हैं
वो जो ज़ालिम हैं
अफवाहों के जाल फैलाते हैं
वो टोपी-दाढ़ी, लाठी-डंडों की भीड़ों में
वो राष्ट्र-गाय, धर्म-भजन के नीड़ों में
वो तन कर खड़े हैं आज मुल्क की छाती पर
वो तन के खड़े हैं गांधी-आज़ाद की थाती पर
वो भारत माता के आंचल को फाड़ रहे हैं
वो गोद में मां की संतानों की लाशें डाल रहे हैं
वो मुल्क ही नहीं, ईमान-धर्म का दुश्मन हैं
वो इंसान ही नहीं, भगवान-खुदा का दुश्मन हैं
वो दुश्मन हैं हंसती भारत माता के
वो दुश्मन हैं नस्लों के भाग्य विधाता के
उनको तो किसी दिन लाज-शरम न आएगी
ऐसे भक्तों से भारत मां अकुलाएगी
ये औलाद फिरंगी के, इनको सिंहासन प्यारा है
फूट डालो और राज करो ही इनका प्यारा नारा है

क्रांति गीत

क्रांति गीत
सदियों से दाना माझी तुम्हारा खून नहीं खौला होगा
जब रोटी के बिना पत्नी बीमार हुई होगी तब भी
जब दवाई के बिना हालत बिगड़ी होगी तब भी
जब अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं मिला होगा तब भी
तब लाश ले जाने के लिए जेब में पैसे नहीं थे तब भी
जब लाश के लिए सरकारी गाड़ी नहीं मिली तब भी
जब पत्नी को गठरी में बांधकर उठाया होगा तब भी
दाना माझी इस पूरी प्रक्रिया में तुम ठंडे रहे होगे
दाना माझी तुम्हारा खून नहीं खौला होगा
सदियों से जमी बर्फ यू नहीं पिघला करती
सदियों पुरानी सोच यूं ही नहीं बदला करती
सदियों पुरानी व्यवस्था यूं ही नहीं हिला करती
सदियों से तु्म जैसों को भग्यवादी बनाए रखा गया
सदियों से तुम जैसों को पुनर्जन्म का पाठ पढ़ाया गया
सदियों से तुम जैसों के पूर्वजन्म के पाप गिनाए गए
सदियों से कालाहांडी का किस्सा नहीं बदला होगा
सदियों से दाना माझी तुम्हारा खून नहीं खौला होगा
कंधे तेरे लाश पड़ी थी भारत भाग्य विधाता की
या तो फिर वो लाश पड़ी थी भारत मां जयकारा की
यो तो फिर वो लाश पड़ी थी लोकतंत्र की माई की
या तो फिर वो लाश पड़ी थी संविधान की चौपाई की
काले अंग्रेजों को इसमें भी वोटबैंक मिला होगा
सदियों से दाना माझी तुम्हारा खून नहीं खौला होगा
लोकतंत्र की लाश भी एक दिन ऐसे ही ढोई जाएगी
सत्ता और सियासत किसी गठरी में अकुलाएगी
दाना माझी बाग़ी होकर तेरी मुट्ठी जिस दिन तन जाएगी
तेरी जीवन संगिनी उसी दिन मोक्षधाम को जाएगी

प्रेमपथ

प्रेमपथ
जैसे इलाहाबाद में होता है गंगा-यमुना का मिलन
वैसे मिले थे हम और तुुम कर्मयोग के संगम पर
मिले थे पूरे सैलाब के साथ, प्रवाह के साथ
लेकिन शांत थे हम गंगा-यमुना की तरह ही
फिर टकरातीं रहीं हमारी लहरें, मिलती रहीं धाराएं
कर्मपथ पर ही गढ़ लिया हमने एक प्रेमपथ भी
फिर बेहद व्यस्त दिन भी बीतने लगे थे हंसते-खेलते
और उबाऊ उनींदी रातें भी हो गईं थीं बेहतरीन
रास्ते में आते-जाते कभी हुआ ही नहीं धूप का एहसास
और ना ही जनवरी की रातों में कभी महसूस हुई ठिठरन
एक जोड़ी खाली जेब में एक जोड़ी खाली हाथ
और हंसते-बतियाने के लिए तुम्हारा साथ
बीतने लगे थे जीवन के सबसे खूबसूरत पल
और मिले भी तो थे हम यमुना के किनारे वाले शहर में
उस शहर में जहां हर आदमी दौड़ता है, भागता है
खुद से ही थक-हार कर हांफता है
वहीं मिले थे हम गंगा-यमुना की तरह
और फिर वहीं से बह निकले अलग-अलग दिशाओं के लिए
ठीक वैसे ही जैसे इलाहाबाद से अलग हो जातीं हैं गंगा और यमुना
दूर, एक दूसरे से बहुत दूर, समंदर तक अलग-अलग ही
लेकिन फिर मिलतीं हैं, समंदर में, बादलों में और बारिश के साथ नदियों में
शायद वैसे ही मिलना होगा किसी दिन हमारा भी
बादलों के पार, लहरों के पार, या फिर बूंदों के बीच
किसी कर्मपथ पर ही या फिर किसी प्रेमपथ पर ही

तब बादल बरसे थे

प्रियवर तब बादल बरसे थे
पहले मन में हुमड़ रहे थे
हृदय पटल पर घुमड़ रहे थे
अंखियन सम्मुख अंधेरा था
मीत मिलन को हम तरसे थे
प्रियवर तब बादल बरसे थे
बरसे थे बन करुण वेदना
जागृत करने तरुण चेतना
समृतिवन को सींच-सींच कर
बीते पल की पुनर्याचना
आंखों से झर-झर झरते थे
प्रियवर तब बादल बरसे थे
मह-मह मिट्टी महक रही थी
चह-चह चाहें चहक रही थीं
आहों का अविरल प्रवाह था
साधें सारी धधक रही थीं
पावक में पंछी झुलसे थे
प्रियवर तब बादल बरसे थे

सत्ता की भूख

हर सर पे खून का साया है
हर दर पे कातिल बैठा है
उसकी झक सफेद टोपी_दाढी
यह तिलक लगाए बैठा है
दोनों के हाथ में खंजर है
दोनों की जीभ खून से लथपथ
भोगी दोनो हैं राजपथ के
बिछता इनके आगे जनपथ
ये खून कौम का पीते हैं
खाते हैं नरमांस यही
सत्ता के भूखों के कुत्ते हैं
करते सारे कुकांड यही

तोड़ दो

क्रांति गीत
टूट पाएंगे न पत्थर प्यार से मनुहार से
तोड़ दो इनको अब वज्र के प्रहार से
कुरुक्षेत्र के रण में भीष्म प्रतिज्ञा तोड़ दो
सामने जितने शिखण्डी बांहें उनकी मोड़ दो
अब करो इनसे न तुम न्याय की याचना
पालते अपने हृदय में सत्ता की ये कामना
साध्य तेरे क़ैद हैं ऊंची इस दीवार में
ढाह दो इनकी हवेली वज्र के प्रहार से
ये स्वतंत्र चेतना के शत्रु समान है
ये बुलंदी, तानाशाही देश का अपमान है
बरस सत्तर बीत गए ऐतबार के, इंतजार के
तोड़ दो इनको अब वज्र के प्रहार से

दूध-भात

खीर
चंदा मामा आएगा, दूध-भात लाएगा
चांदी के चम्मच से तुझको खिलाएगा
माई ने कह दिया, गुनगुनाते रहे हम
माड़, भात, नूून खाते रहे हम
माटी के चूल्हे पर तसला चढ़ाती थी
पानी खदकने पर खीर बताती थी
खीर के सपने सजाते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम
माई ने आंचल को कंबल बताया था
माघ के पाला में उसको ओढ़ाया था
साड़ी को गद्दा समझाते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम
आंखों के आंसू वो हमसे छुपाती थी
पानी में नून डाल हमको पिलाती थी
शर्बत समझ जीभ चटखाते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम
माई ने माड़ पिया, भात नहीं खाया
माई ने भात खाया नून नहीं मिलाया
माई का स्वाद जान इतराते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

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