Tuesday, December 6, 2016

तब बादल बरसे थे

प्रियवर तब बादल बरसे थे
पहले मन में हुमड़ रहे थे
हृदय पटल पर घुमड़ रहे थे
अंखियन सम्मुख अंधेरा था
मीत मिलन को हम तरसे थे
प्रियवर तब बादल बरसे थे
बरसे थे बन करुण वेदना
जागृत करने तरुण चेतना
समृतिवन को सींच-सींच कर
बीते पल की पुनर्याचना
आंखों से झर-झर झरते थे
प्रियवर तब बादल बरसे थे
मह-मह मिट्टी महक रही थी
चह-चह चाहें चहक रही थीं
आहों का अविरल प्रवाह था
साधें सारी धधक रही थीं
पावक में पंछी झुलसे थे
प्रियवर तब बादल बरसे थे

सत्ता की भूख

हर सर पे खून का साया है
हर दर पे कातिल बैठा है
उसकी झक सफेद टोपी_दाढी
यह तिलक लगाए बैठा है
दोनों के हाथ में खंजर है
दोनों की जीभ खून से लथपथ
भोगी दोनो हैं राजपथ के
बिछता इनके आगे जनपथ
ये खून कौम का पीते हैं
खाते हैं नरमांस यही
सत्ता के भूखों के कुत्ते हैं
करते सारे कुकांड यही

तोड़ दो

क्रांति गीत
टूट पाएंगे न पत्थर प्यार से मनुहार से
तोड़ दो इनको अब वज्र के प्रहार से
कुरुक्षेत्र के रण में भीष्म प्रतिज्ञा तोड़ दो
सामने जितने शिखण्डी बांहें उनकी मोड़ दो
अब करो इनसे न तुम न्याय की याचना
पालते अपने हृदय में सत्ता की ये कामना
साध्य तेरे क़ैद हैं ऊंची इस दीवार में
ढाह दो इनकी हवेली वज्र के प्रहार से
ये स्वतंत्र चेतना के शत्रु समान है
ये बुलंदी, तानाशाही देश का अपमान है
बरस सत्तर बीत गए ऐतबार के, इंतजार के
तोड़ दो इनको अब वज्र के प्रहार से

दूध-भात

खीर
चंदा मामा आएगा, दूध-भात लाएगा
चांदी के चम्मच से तुझको खिलाएगा
माई ने कह दिया, गुनगुनाते रहे हम
माड़, भात, नूून खाते रहे हम
माटी के चूल्हे पर तसला चढ़ाती थी
पानी खदकने पर खीर बताती थी
खीर के सपने सजाते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम
माई ने आंचल को कंबल बताया था
माघ के पाला में उसको ओढ़ाया था
साड़ी को गद्दा समझाते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम
आंखों के आंसू वो हमसे छुपाती थी
पानी में नून डाल हमको पिलाती थी
शर्बत समझ जीभ चटखाते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम
माई ने माड़ पिया, भात नहीं खाया
माई ने भात खाया नून नहीं मिलाया
माई का स्वाद जान इतराते रहे हम
माड़, भात, नून खाते रहे हम

मीत मेरे

मीत के लिए
मीत मेरे तुमसे खून का रिश्ता तो नहीं
ना ही कोई सामाजिक नाता है
लेकिन न जाने क्यों
जब कभी तुम नाराज हो जाते हो
तबीयत नासाज हो जाती है
यक़ीन मानो दिल का कोई रिश्ता है तुमसे
तब से जब से तुम जुड़े हो मुझसे

Friday, December 2, 2016

सबकुछ स्वाहा

एक टीस है
अबकी बिछड़े तो शायद ही मिल पाएंगे
ये जीवन है व्यापार नहीं
इस पार नहीं, उस पार नहीं
जो डूब गया वो डूब गया
फिर धार नहीं, मंझधार नहीं
फिर यादों के कोनों-कोनों में
हम आएंगे और जाएंगे
अबकी बिछड़े तो शायद ही मिल पाएंगे

जो छोटी-छोटी बातों की गंठरी से गांठ बना बैठे
कुछ निज स्वारथ के चक्कर में फिरते हैं ऐंठे-ऐंठे
कुछ अहंकार का चक्कर है, कुछ मूढ़ मति का दुष्प्रभाव
कुछ खुशफहमी ने मारा तो कुछ समझ फेर का है प्रभाव
यूं तो तिरते-तिरते एक दिन सब रेत फिसल जाएंगे
अबकी बिछड़े तो शायद ही मिल पाएंगे

अबकी का बिछड़ना अलग राह पर चलना होगा
मंजिलें अलग होंगी, करवां बदलना होगा
फिर न कोई सिरा होगा, न छोर मिलेगा कोई
फिर न कोई ख़बर होगी न ओर मिलेगा कोई
अबकी फासले हमारे इस कदर बढ़ जाएंगे
अबकी बिछड़े तो शायद ही मिल पाएंगे
.....असित नाथ तिवारी....

Wednesday, November 16, 2016

ये रुदन काल है

                                                          ये रुदन काल है....
जिस जम्हूरियत में प्रश्नकाल से हुकूमत को परेशानी महसूस होती है..वहां रुदनकाल ही आता है...तो ये रुदनकाल है....इस काल में रोना पड़ता है...राजा को भी, रियाया को भी...रियाया का रोना तबतक रोना भर रहता है जबतक कि इससे हुकूमत की ज़मीन पर असर न हो....लेकिन जैसे ही हुकूमत की ज़मीन गिली होने लगती है...हुक्काम को सिंहासन के धंसने का ख़तरा महसूस होने लगता है...और फिर हुक्काम भी रोने लगता है..वो रोता है... इसलिए रोता है कि जनता खुद रो-धोकर ग़म पी लेना अपना नसीब समझती है..लेकिन वो अपने राजा को रोता नहीं देख सकती... सो राजा के रोते ही जनता भकुआ जाती है...राजा के जयकारे लगते हैं...और धंसते सिंहासन को जनता का सहारा मिल जाता है....तो ये रुदन काल है... मंचों पर बादशाह सलामत की आंखों से बूंदें टपक रहीं हैं...
दिल्ली वाले सुल्तान रो रहे हैं...लखनऊ वाले उस्ताद रो रहे हैं...रो रहे हैं....क्योंकि ये रुदन काल है...इस काल में रोना अपनी कमियों को छुपाने का सबसे बेहतर हथियार है....इस काल में रोना भावुक जनता को भरमाने का सबसे बेहतर औजार है...ये रुदन काल है
इस काल में रोना पड़ता है....वो मां-बाप रो रहे हैं जिनके बच्चों की शादियां हजार-पांच सौ के नोट की चोट से जख्मी हो गईं.....वो बच्चा रो रहा है जिसकी मां हजार-पांच सौ के नोट की चोट से इलाज बिना अस्पताल में दम तोड़ गई...कोई एटीएम की लाइन में रो रहा है, कोई बैंक के बाहर रो रहा है...कोई बच्चे के दूध के लिए रो रहा है...कोई भक्क सफेद कुर्ते के नीचे दबाए गए काले धन के लिए रो रहा है...ये रुदन काल है।

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...