Monday, August 3, 2020

सुशांत की मौत के बाद फर्जी प्राइड का खेल

मराठा और मराठा प्राइड की राजनीति से प्रभावित मुंबई वालों ने बिहारियों को बराबरी का दर्जा दिया ही कब है जो अब दे देंगे! साल दर साल बिहारियों को मारने-पीटने वाले मराठा मानुष भला ये कैसे बर्दाश्त कर लें कि एक बिहारी की संदिग्ध मौत मामले में किसी विषकन्या से पूछताछ हो जाए। बिहार और यूपी वालों को दो कौड़ी का मामूली मजदूर मानने वाली ये मराठा सोच नई तो नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ये बात नहीं जानते हैं। नीतीश कुमार जिस बाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री थे उसी बाजपेयी सरकार को बर्बर ठाकरे का समर्थन हासिल था और उसी बर्बर ठाकरे के लोग मुंबई में बिहारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटते थे। तब नीतीश कुमार को एक बार भी बिहारियों का ख्याल नहीं आता था और एक बार भी वो बर्बर ठाकरे के सामने सिर उठाकर बोलते नहीं देखे गए। नीतीश कुमार 2005 से बिहार का मुख्यमंत्री हैं। उनके कार्यकाल में बीसियों बार मुंबई में बिहारियों पर हमले हुए हैं। बिहारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया है। रेलवे की परीक्षा देने गए छात्रों की पीट-पीट कर हत्या की गई है। इनमें से कितने मामलों की जांच के लिए नीतीश की सरकार ने बिहार पुलिस को मुंबई भेजा है? सच ये है कि दोनों तरफ से झूठी शान का प्रदर्शन हो रहा है। सुशांत की संदिग्ध मौत को नीतीश कुमार बिहारी प्राइड से जोड़ने में सफल होते दिख रहे हैं। ये सारे प्रयास सियासी मतलब साधने के लिए हो रहे हैं। 
 ये बात हुई नीतीश कुमार की और अब बात उद्धव ठाकरे की। बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे भी उसी बर्बर मराठा प्राइड की राजनीति करते हैं जिसकी शुरुआत उनके पिता बर्बर ठाकरे ने की थी। इस राजनीति का मकसद मराठों का भला न तो तब था और ना ही अब है। इस राजनाति का मकसद तब भी दूसरों से नफरत करना था और आज भी वही है। नफरत की इस आग में आदमी अपनी कमियों को भूल जाता है। मतलब, मराठा ये भूल गए हैं कि उनकी बुनियादी ज़रूरतों के लिए सरकार की एक जिम्मेदारी बनती है। वो बस बिहारियों से नफरत करने को मराठा अस्मिता मान बैठे हैं।
     जब तक सुशांत सिंह राजपूत हीरो थे तब तक मराठा प्राइड वाली इस सियासी सोच को उनसे दिक्कत नहीं थी लेकिन, जैसे ही सुशांत के बिहारी होने का सच सामने आया है मराठों की नफरती सोच सामने आ गई। बर्बर ठाकरे की सियासी विरासत संभालने वालों को ये बात खलने लगी कि बिहारी की मौत की जांच बिहार पुलिस करे। फिर वही बर्बर खेल शुरू हो गया है। अपने पिता की दो कौड़ी वाली बर्बर प्राइड पॉलिटिक्स को उद्धव ठाकरे फिर आगे सरकाते दिख रहे हैं। मुझे संदेह है कि उद्धव ठाकरे और उनकी बर्बर पार्टी के लोग एक बार फिर मुंबई में बिहारियों के खिलाफ हिंसा का माहौल खड़ा करेंगे और बिहार पुलिस और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे। 
    इसलिए, बेहतर होगा कि समय रहते महाराष्ट्र के मराठा प्राइड की इस सोच को सकारात्मक दिशा दी जाए। मराठा युवकों को ये बताया जाए कि बर्बर ठाकरे ने अपने सियासी फायदे के लिए मराठा प्राइड का जो आवरण तैयार किया, दरअसल वो प्राइड नहीं बल्कि मराठों को लठैत बनाकर सत्ता को बर्बर परिवार का चाकर बनाए रखने की साजिश है। वक्त रहते ये काम नहीं किया गया तो फिर एक दिन बर्बर ठाकरे के वंशज मराठा प्राइड के नाम पर अलगाववादी सोच को खाद-पानी देने लग जाएंगे। इसलिए ज़रूरी है कि फर्जी प्राइड वाली पॉलिटिक्स, चाहे बिहारी प्राइड के नाम पर चल रहा फर्जीवाड़ा हो, चाहे लंबे अर्से से चला आ रहा मराठा प्राइड वाला फर्जीवाड़ा हो, दोनों की पोल खोली जाए और बर्बर ठाकरे के वंशजों को अलगाववादी ताकत बनने से रोका जाए।

Monday, January 13, 2020

सब धन लुटा के अब जन लुटाने में लग गए

जब तक संभव होता है शहनाई की धुन सिसकियों की आवाज छुपा लेती है लेकिन, सिसकियां जब चीखों में तब्दील हो जाती हैं तो फिर उसे छुपा-दबा लेना संभव नहीं होता। देश की अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी का सच जब तक संभव था संस्थाओं ने छुपाने की पूरी कोशिश की लेकिन, जब अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की सिसकियां चीखने लगीं तो फिर सच्चाई को छुपाए रखना संभव नहीं हो सका और संस्थाओं को मानना पड़ा कि अब सबकुछ तबाह और बर्बाद हो चुका है। जिस बात को कई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी तीन साल पहले से कह रहीं हैं अब उस बात को धीमी आवाज में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्ष अधिकारी, सांख्यिकी विभाग के शीर्ष अधिकारी और नीति आयोग के शीर्ष अधिकारी भी कहने लगे हैं। अब सब ये मानने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है और देश रोजगार देने में अब उतना सक्षम नहीं रहा जितना साल 2011-12 तक था।
   इकोरैप की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2018-19 में बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों ने अपने घरों में औसत के मुकाबले तीस फीसदी कम पैसे भेजे हैं। रिपोर्ट का विस्तृत अध्ययन करने पर पता चलता है कि बिहार और यूपी से दूसरे राज्यों में काम की तलाश में गए इन कामगारों को पहले मुकाबले कम दिन काम मिला। इतना ही नहीं पीछले पांच-छे वर्षों से इनकी मजदूरी में कोई इजाफा नहीं हुआ। किराए के मकानों में रहने वालों इन मजदूरों के मकान का किराया हर साल बढ़ा, खाने-पीने के खर्चे बढ़ती महंगाई की वजह से लगातार बढ़े लेकिन कमाई बढ़ने के बजाए घटती गई।
  इस रिपोर्ट में एक और बेहद महत्व की बात सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में नए रोजगार की संभावना बहुत कम रहेगी। ईपीएफओ के आंकड़ों से अनुमान लगाया गया है कि इस वित्त वर्ष में पंद्रह हजार रुपये तक की तनख्वाह वाली नौकरियों में भारी गिरावट हो सकती है। अनुमान है कि इस वर्ष ऐसी 16 लाख नौकरियां कम हो जाएंगी। ये सिर्फ मासिक पंद्रह हजार वेतन वाली नौकरियां हैं। इससे ऊपर के वेतन वाली नौकरियों को जोड़ दिया जाए तो फिर ये आंकड़ा एक करोड़ के आस-पास पहुंच सकता है। क्योंकि ईपीएफओ के इस आंकड़े में केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों के साथ-साथ अपना रोजगार करने वालों के आंकड़े शामिल नहीं हैं।
   केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों के अवसर तो पहले से ही कम होते जा रहे हैं। एनएसओ का आंकलन बताता है देश की वित्तीय हालत ऐसी नहीं रही कि अब केंद्र सरकार भी पहले की तुलना में नियुक्तियां कर सके। राज्य सरकारों की हालत तो और खस्ता है। दिल्ली को छोड़ दें तो देश के किसी भी राज्य की माली हालत ठीक नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों की ये हालत बताती है कि चालू वित्त वर्ष में सरकारी नौकरियों के अवसरों में भारी कमी देखी जाएगी। ये कमी कम से कम 39 हजार पदों की होगी।
  अब सवाल ये कि रोजगार का यें संकट इतना विकराल हुआ कैसे? जवाब बड़ा सीधा है कि वित्तीय कुब्रंधन की वजह से। मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के जो दूरगामी नतीजे बताए जा रहे थे वो दूरगामी नतीजे ढाई साल में ही सामने आ गए थे और पता चला कि देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बाद अब तो नीति आयोग ने भी मान लिया है कि विकास दर पांच फीसदी से भी नीचे रहेगी। मतलब देश के पास धन नहीं है और जब धन ही नहीं है तो फिर खर्च क्या करेंगे। मतलब न तो विकास का काम होगा और ना ही नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
 इतना ही नहीं, केंद्र सरकार ने अपने खर्चे बहुत बढ़ा लिए। सरकारी खर्चे में हुई बढोत्तरी ने देश के खजाने पर बड़ा असर डाला। देश के कई राज्यों ने भी ऐसा ही किया। आम आदमी की कमाई का बड़ा हिस्सा सरकार चलाने और सरकारी तामझाम में जाता रहा। यूपी सरकार ने तो अपना बहुत बड़ा बजट शहरों के नाम बदलने और ईमारतों के रंग बदलने में खर्च कर डाले। हुआ ये कि सरकारी योजनाओं को चलाने और निर्माण के लिए धन की कमी होती गई। धन की कमी को दूर करने का प्रबंध भी सरकार जब ठीक से नहीं कर पाई तो अप्रत्यक्ष करों में भारी बढ़ोत्तरी की गई। सेस के जरिए लोगों से अतिरिक्त पैसे लिए जाने लगे। सरकार की इस नीति ने महंगाई में आग लगा दी। हालत ये हुई कि आर्थिक विकास के मामले में देश पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश से भी पिछड़ गया।
  पहले तो सरकार और सरकारी संस्थाओं ने पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, हिंदू-मुस्लिम और ना जाने किन-किन शोरों में इस सच्चाई को छुपाए रखा लेकिन जब विश्व बैंक समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान भारत की आर्थिक हालत पर चिंता जताने लगाने और खुद नीति आयोग, भारतीय रिज़र्व बैंक और सांख्यिकी विभाग की हालत चरमराने लगी तो उन्हें खुलकर ये स्वीकार करना पड़ा कि अब देश बर्बादी की कगार पर खड़ा है।
  उम्मीद है कि सरकार अब भी चेतेगी और देश के जीवट नागरियों के हौसले से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशों में जुटेगी। मोदी सरकार का अब तक का अनुभव ये बताता है कि सरकार अड़ियल रवैये से चल रही है और ग़लत फैसलों से हुए नुकसान को छुपाने के लिए देश का ध्यान इधर-उधर भटकाने में भी काफी नुकसान करती रही है। इसलिए ज़रूरी है कि सरकार अपनी गलतियों से सीख ले। भारत के नागरिकों का दिल बड़ा है और देश ने हर उस सरकार की गलतियों को माफ किया है जिस सरकार ने अपनी गलतियां मानी हैं और उन गलतियों को सुधारने की दिशा में काम किया है।            

Thursday, January 2, 2020

फैज के बहाने एक और 'कन्हैया' तलाशती सरकार


साल 2016 में जब सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था के डूबने की शुरुआत हुई और रोजगार का संकट गहरा हुआ तब सरकार ने बड़ी चालाकी से एक गद्दारकी खोज की और देश का सारा ध्यान उस गद्दार की तरफ मोड़ दिया। फिर हुआ ये कि कौआ कान लेकर भागा और लोग कौए के पीछे भागे। तब देश के गृहमंत्री थे राजनाथ सिंह। राजनाथ सिंह ने अपने ट्विटर हैंडल पर जेएनयू के तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गद्दार लिखा और कुछ घंटों बाद ही उसे डिलीट कर दिय़ा। राजनाथ सिंह और राजनाथ सिंह जैसे भाजपा नेता पहले ट्वीट और बाद में डिलीट के सियासी विद्यालय में ही दीक्षित हुए हैं। गोएब्ल्स कहता था कि किसी झूठ को इतना फैला दो कि लोग उसे ही सच मान लें। 2016 में तत्कालीन गृह मंत्री और भाजपा के बड़े नेताओं ने कन्हैया कुमार के मामले में यही किया। खैर राजनाथ सिंह से लेकर अब के गृह मंत्री अमित शाह तक, दिल्ली पुलिस कन्हैया के खिलाफ कोई सबूत नहीं खोज पाई लेकिन, देश की एक बड़ी आबादी बिना किसी ठोस सबूत के कन्हैया को आज भी टुकड़े गैंग का नेता बताती है क्योंकि, प्रचार तंत्र के जरिए सत्ता ने इस झूठ को इतना फैलाय़ा कि लोग इसे ही सच मानने लगे।
  अब, जबकि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से डूब चुकी है, नए रोजगार की संभावना तो दूर जिनके पास रोजगार है उसे बचाना ही मुश्किल हो गया है और बीजेपी के ही सांसद सुब्र्हमण्यम स्वामी ये स्वीकार कर चुके हैं कि हम बर्बादी के तरफ धकेले जा चुके हैं तब, सत्ता को लोगों का ध्यान बांटने के लिए फिर गोएब्ल्स की शरण में जाना पड़ा है। और यही वजह है कि सरकार एक और कन्हैयाकी तलाश में जुट गई है। जेएनयू में सरकार ने काम आसानी कर लिया क्योंकि जेएनयू में शहीद भगत सिंह की विचारधारा वाली राजनीति चलती है जो भाजपा की विभाजनकारी विचारधारा को वहां पनपने नहीं देती। जाहिर है उस विभाजनकारी सोच का वहां जमकर विरोध हुआ और उसी विरोध को सत्ता के तंत्र ने देशद्रोह के नाम से प्रचारित किया। अब फिर आसान टारगेट सेट किया गया है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, ये नाम ही काफी है विभाजनकारियों के लिए। नफरत के लिए धर्म का इस्तेमाल करने वाली राजनीति जामिया नाम से ही काफी काम कर लेगी। और फिर अब यहां कोई कन्हैया कुमार खोजा जाएगा। बिना किसी सबूत के उसे देशद्रोही, गद्दार, टुकड़े-टुकड़े गैंग का सरगना कहा जाएगा। एक बार फिर कौआ कान लेकर भागेगा और कौए के पीछे लोग भागेंगे। सत्ता की शह पर गोएब्ल्स की औलादें आम आदमी को यकीन दिलाने में कामयाब होंगी कि जामिया मिल्लिया देशद्रोही गतिविधियों का अड्डा है। एक झूठ को इतना फैलाया जाएगा कि लोग उसे ही सच मानने लगेंगे। इसलिए ज़रूरी है कि इस वक्त फैज अहमद फैज को याद किया जाए।
    अब, जबकि आईआईटी कानपुर प्रशासन ने साफ कर दिया है कि संस्थान फैज अहमद फैज की किसी रचना की जांच नहीं कर रहा है फिर भी हमें फैज साहब की रचनाधर्मिता पर बहस करनी चाहिए। आईआईटी कानपुर को जा काम सौंपा गया है दरअसल वो वही काम है जिसके जरिए एक नए कन्हैया कुमार की खोज होगी। रही बात संस्थान प्रबंधन के बयान की तो उसपर आंख मूंद कर इसलिए भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि इस दौर में देश के प्रधानमंत्री मंचों से धड़ाधड़ गलत सूचना दे रहे हैं। कई मंत्री लगातार सदन को गलत जानकारी दे रहे हैं तो फिर भला सच का सारा ठेका अकेले आईआईटी कानपुर ही लेकर क्यों घूमे। तो अगर आईआईटी कानपुर फैज साहब की ग़ज़ल में हिंदू विरोध की तलाश कर रहा है तो उसे करने दीजिए। 1979 में तब की पाकिस्तानी हुकूमत ने भी फैज साहब को इस्लाम विरोधी घोषित किया था। तब के पाकिस्तानी तानाशाही समर्थकों ने फैज साहब को गद्दार घोषित कर रखा था। क्योंकि तब पाकिस्तान में मजहब के नाम पर ही सैन्य तानाशाही थोपी गई थी। 1977 में जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान में तख़्ता पलट किया था और 1978 में शरई कानून न मानने वालों को इस्लाम विरोधी करार दिया था। फैज साहब शरई कानून के खिलाफ थे। 1979 में फैज साहब लाजिम है कि हम भी देखेंगेग़ज़ल के जरिए जियाउल हक की तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की। फैज साहब की ये गजल हिंदी और उर्दू की हर जुबान पर चढ़ी। पाकिस्तान में जनरल की तानाशाही के खिलाफ नारा बना लाजिम है कि हम भी देखेंगे। सरहद पार कर ये तराना भारत पहुंचा और फिर भारत के बाद नेपाल। नेपाल की राजशाही के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन के दौरान इसे खूब गाया गया।
  जाहिर है तानाशाही के खिलाफ खड़ी ये रचना किसी भी तानाशाह को पसंद नहीं आएगी इसलिए, ज़रूरी है कि जनतंत्र के पक्ष में खड़ा हर आदमी इसे गुनगुनाता रहे। तय मानिए गोएब्ल्स की औलादें से इस तराने को हिंदू विरोधी प्रचारित करेंगी। आप उनसे बौद्धिकता, नैतिकता की उम्मीद ही ना करें। उनका काम ही है किसी झूठ को इतना फैला देना कि लोग उसे ही सच मान लें।
...असित नाथ तिवारी...फफhW

Monday, December 2, 2019

कंपनी ने अंग्रेजों को देश सौंपा था मोदी जी ये देश कंपनी को सौंप रहे हैं


प्रधानमंत्री मोदी जी, कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है और आपकी सरकार का कामकाज देखकर हमसब इतिहास को वर्तमान बनता देख रहे हैं। भारत में अंग्रेजी राज की शुरुआत ब्रितानी सरकार ने नहीं की थी। पहले आई ईस्ट इंडिया कंपनी। कंपनी ने भारत में व्यापार शुरू किया और फिर धीरे-धीरे पूरे भारत पर कब्जा कर लिया। ज्यादातर भारतीय राजाओं ने कंपनी के सामने घुटने टेक दिए और जिन्होंने नहीं टेके उन्हें भारतीय गद्दारों के सहयोग से या तो दिल्ली के खूनी दरवाज़े पर काट कर लटका दिया गया या फिर उनको दो गज ज़मीं न मिल सकी कूए यार में। तब कंपनी वाले उन्हीं गद्दारों को देशभक्त कहते थे और जो कंपनी की सेना से देश के लिए लड़ रहे थे उन्हें राष्ट्रद्रोही कहा जाता था। 1857 में जब दुनिया ये जान गई कि ईस्ट इंडिया कंपनी दरअसल ब्रितानी सरकार के साम्राज्यवाद का टूल है और भारत पर कंपनी राज के पीछे ब्रातानी हुकूमत है तो फिर परोक्ष रूप से ब्रितानी हुकूमत ने भारत को अपने कब्जे में ले लिया।
ये इतिहास आज फिर खुद को दोहराता दिख रहा है। देश के तमाम सार्वजनिक उपक्रम देश के 4-5 बड़े उद्योगपतियों को आपकी सरकार देती जा रही है। आपकी सरकार ने एयर इंडिया को मुनाफा कमाने वाली दुकान समझ लिया है। और उसे बेचने की तैयारी में है। आपको इसके नतीजे मालूम होंगे। एयर इंडिया के बिकने का मतलब है देश में हवाई सेवा पर पूरी तरह से प्राइवेट सेक्टर का कब्जा होना। मतलब हवाई सेवा पर कंपनी राज। अब ये कंपनी सरकार चाहेगी तो हवाई जहाज उड़ेंगे नहीं चाहेगी तो नहीं उड़ेंगे। कंपनी सरकार कहेगी कि 5 हजार नहीं हम तो 25 हजार किराया लेंगे। लखनऊ वाले अधिक टैक्स देंगे तब ही हम उनके लिए हवाई जहाज उड़ाएंगे, वगैरह-वगैरह। आम आदमी के पास कुछ नहीं होगा। सरकार कहेगी हावाई जहाज तो हमारे हैं ही नहीं तो हम क्या करें।
   यही हाल आप रेलवे का कर रहे हैं। कंपनी सरकार अब ट्रेन भी चलाएगी। आपकी सरकार धीरे-धीरे कंपनी सरकार से रलवे को बेच ही रही है। अब कंपनी सरकार अपने हिसाब से ट्रेनों को चलाएगी। मालदार लोग प्रीमियम में चलेंगे और देश का सामान्य नागरिक कंपनी सरकार के सिपाहियों के कोड़े खाएगा।
    BSNL को भी आपकी सरकार निबटाने में जुट ही गई है। अभी चलती हालत में BSNL को कंपनी सरकार खरीदेगी नहीं। क्योंकि चलती हालत में कीमत ज्यादा लगेगी। तो फिर कंपनी बहादुर ने कहा होगा कि पहले घाटे में धकेल कर इसे बंद करो फिर हमें कबाड के भाव बेच दो। और ऐसे दूरसंचार पर भी कंपनी राज कायम हो जाएगा। फिर कंपनी सरकार कहेगी कि मोबाइल पर फेसबुक चलाने का अलग से चार्ज होगा और ह्वाट्सऐप का अलग। इंटरनेट का रिचार्ज अलग होगा और कॉल टाइम के लिए अलग से रिचार्ज होगा। हम क्या करेंगे ! हम अपनी सरकार से कहने जाएंगे कि देखिए इन लोगों ने तो लूट मचा रखी है तब आप कहेंगे कि हम क्या करें, दूरसंचार तो हमारे हाथ में ही नहीं है।
  अच्छा एक और बात, ये बताइए कि सार्वजनिक बिजली कंपनियों से बिजली खरीदने के पैसे जब आपके पास नहीं हैं तो फिर प्राइवेट कंपनियों से महंगी बिजली खरीदने के पैसे कहां से आ जाते हैं ? देश को जब सार्वजनिक बिजली उत्पादन इकाइयों से सस्ती बिजली मिल सकती है तो फिर प्राइवेट कंपनी की महंगी बिजली लेने को हम मजबूर क्यों हैं ? क्यों देश की तमाम सार्वजनिक बिजली उत्पादन इकाइयों को तबाह किया जा रहा है ?  आपकी सरकार बिजली को पूरी तरह से कंपनी राज के हवाले करने में लगी हुई है।
   यही हाल उच्च शिक्षा है। अंबानी जी की एक अदृश्य यूनिवर्सिटी के लिए आपका पूरा तंत्र देश के नामी-गिरामी उच्च शिक्षण संस्थानों को बदनाम में करने में लगा हुआ है। हैदराबाद यूनिवर्सिटी, जाधवपुर यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, जएनयू जैसे तमाम विश्व विख्यात संस्थान आपके शासनकाल में विवादों का अड्डा बना दिए गए। इनकी साख ख़राब करने के पीछे कुछ तो मकसद होगा ही। फिर कहा जाएगा कि भाई कंपनी बहादुर ये सब भी आप ही ले लो, हमसे नहीं चलने वाले। उसके बाद प्राइमरी एजुकेशन के लिए माहौल बनाना शुरू करेंगे आपके लोग। बाद में प्राइमरी एजुकेशन भी कंपनी राज के हवाले कर देंगे। फिर कंपनी सरकार कहेगी कि अधिक पैसा देने वालों के बच्चों को अच्छा पढ़ाएंगे और कम पैसा देने वालों के बच्चों को थोड़ा-बहुत पढ़ा देंगे। हम अपनी सरकार से शिकायत करेंगे तो सरकार कहेगी कि हम क्या करें, स्कूल-कॉलेज तो हम चलाते ही नहीं, वो तो कंपनी सरकार चलाती है।
   अस्पतालों का भी यही हाल होगा। धीरे-धीरे फिर एक दिन 1857 जैसे हालात होंगे और आप कहेंगे कि लो जी हटाया पर्दा, हमारी तो कोई सरकार ही नहीं थी। सरकार तो कंपनी बहादुर की ही थी हम तो बस ऐसे ही बैठे थे। अब जाने कंपनी सरकार, हम तो झोला उठाकर चले।  

Thursday, November 28, 2019

गांधी: मोदी भी ढो रहे हैं नेहरू-पटेल वाली पापग्रंथि

बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने संसद में वही कहा जो वो सड़कों पर बहुत पहले से कहती रही हैं। वही क्यों, बीजेपी में ऐसे लोग बड़ी तादाद में हैं जिन्हें नाथूराम गोड्से अच्छा लगता है। ये उस हत्यारे के पक्ष में इसलिए खड़े दिखते हैं क्योंकि इन्हें पता है कि नाथूराम मुसलमानों से नफरत करने वाला शख्स था और उसने धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर महात्मा गांधी की हत्या इसलिए की क्योंकि महात्मा गांधी देश विभाजन के बाद कोष के बंटवारे में पूरी ईमानदारी चाहते थे। ईमानदारी से कोष बंटवारे के पक्ष में खड़े गांधी के लिए बहुत शातिराना अंदाज में ये बात फैला दी गई कि देश के विभाजन की वो सबसे बड़ी वजह थे। मतलब ये बात साफ है कि प्रज्ञा ठाकुर या उन जैसे लोगों ने ना तो कभी देश विभाजन के कारणों को ठीक से जानने के लिए गंभीर अध्ययन किया है और ना ही तथ्यों की पड़ताल की कोई कोशिश की है। इस देश में कौआ कान लेकर भागता है और लोग कौआ के पीछे। विभाजन के तथ्यों के साथ भी यही हुआ। प्रज्ञा और प्रज्ञा जैसे लोग कौए के पीछे भाग रहे हैं। मुझे प्रज्ञा ठाकुर से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि, अनपढ़ या अनगढ़ होना कोई अपराध नहीं है। मेरी शिकायत उस जमात से है जो खुद को बुद्धिजीवी कहती है। इस जमात ने वुद्धिजीविता की चादर ओढ़ ली और अज्ञानता के अंधकूप में इतरा रहे लोगों से दूरी बना ली। बुद्धीजीवी जमात की सबसे बड़ी विफलता यही है कि उसने विश्वविद्यालयों की कुछ डिग्रियों को चिंतन का प्रमाण मान लिया।
   प्रज्ञा ठाकुर का लोकसभा में होना अगर किसी को हैरान करता है तो यकीन मानिए वो शख्स किसी मुगालते में जी रहा है। बिहार के सिवान का दुर्दांत अपराधी शहाबुद्दीन, यूपी का दुर्दांत अतीक अहमद और इन जैसे कई लोग इस सदन की गरिमा बढ़ा चुके हैं तो फिर प्रज्ञा ठाकुर से परेशानी क्यों ? रही बात नाथूराम गोडसे और गांधी की तो सच यही है कि इस देश में गांधी वो साइनबोर्ड है जिसे राजनीति की हर दुकान अपने माथे पर उठाए रहती है। मराठी के नाटककार पु ल देशपाण्डेय के एक नाटक में एक पात्र कहता है कि चूंकी हम महात्मा गांधी के रास्ते पर चल नहीं सकते, इसलिए जिस रास्ते पर चलते हैं उसका नाम महात्मा गांधी रोड रख लेते हैं। इस नाटक के इस संवाद से बहुत कुछ साफ होता है। दरअसल मन के चोर और पाप को छुपाने का यह एक तरीका है। हम हर जगह उस चोर और पाप को छुपाने की कोशिश करते रहते हैं और मौका मिलते ही हमारे मान का चोर बाहर निकल आता है। जैसे हमें ये एहसास नहीं होता कि हमारे पांवों के नीचे ज़मीन है जिसपर हमारा पूरा अस्तित्व टिका है। या फिर हमें ये एहसास नहीं होता कि हवा कहीं मौजूद है लेकिन, जब दम फूलता है तब हमें हवा का महत्व समझ में आता है। इस देश में गांधी ऐसी ही ज़रूरत हैं। जब पांवों के नीचे से ज़मीन खीसकती है या फिर जब ऑक्सीजन के बिना दम फूलने लगता है तब हमें गांधी याद आते हैं। गांधी ऐसी ज़रूरत नहीं होते तो 31 जनवरी 1948 को उनके शरीर के साथ हम उनका भी दाह-संस्कार कर चुके होते। गांधी के शरीर की हत्या नाथूराम ने की लेकिन गांधी के सपनों की हत्या तो आज़ादी से पहले की जा चुकी थी। गांधी तो किसी भी सूरत में देश का विभाजन नहीं चाहते थे। जब गांधी ने ये कहा कि देश बांटने से पहले उनके शरीर को दो टुकड़े कर दिए जाएं तब उनकी किसी ने नहीं सुनी। गांधी की हत्या उस दिन भी हुई थी जिस दिन जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना ने गांधी के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए देश के बंटवारे के फैसले पर आखिरी मुहर लगाई थी।
 आज़ादी के ठीक बाद एक बार फिर गांधी की हत्या हुई। अंग्रेजों से आज़ादी लिए बिना ये देश अपने गौरव को हासिल नहीं कर पाएगा इस बात से तो सभी सहमत थे। आज़ादी की अहिंसक लड़ाई में पूरे देश ने गांधी को अपना नेता मान लिया था। लेकिन आज़ादी के बाद चाहे वो जवाहर लाल नेहरू हों या फिर सरदार पटेल या विनोबा भावे, गांधी के साथ कोई खड़ा नहीं था। ये तीनों गांधी को अपना नेता तो मानते थे, गांधी के प्रति पूरी ईमानदारी भी रखते थे लेकिन, गांधी का मार्ग इन्हें स्वीकार नहीं था। गांधी का पश्चिम विरोध नेहरू को पसंद नहीं था। नेहरू मानते थे कि विकास का सूरज पश्चिमी देशों से ही उगेगा। ये मानते हुए नेहरू के मन में गांधी का प्रति पाप था। गांधी की धार्मिकता सरदार पटेल को पसंद नहीं थी। गीता हाथ में लेकर चलने वाले धर्मनिर्पेक्ष गांधी को वो एक रहस्य मानते थे।
  जिस पश्चिम का जो सूरज कभी डूबता नहीं था उसी सूरज को गांधी ने अपनी छवि से ढक लिया और आजादी के बाद नेहरू उसी पश्चिमी सूरज से देश को रौशन करने की दिशा में आगे बढ़े। नेहरू के मन में ये चोर था और इसीलिए वो गांधी से आंखें मिलाने के बजाए उनके पायताने बैठने लगे थे। गांधी ने जिस पूंजी की सत्ता को जन की ताकत से ऊंखाड़ फेंका था उसी पूंजी की सत्ता स्थापित कने की बेचानी सरदार पटेल में थी। इसीलिए वो भी गांधी से नजरें नहीं मिला पाते थे और गांधी के पायताने बैठने लगे थे। मौजूदा सत्ता वर्ग भी वही कर रहा है। गांधी ने जिस घृणा के मदमस्त हाथी को प्रेम की कुटिया में बांधा था बीजेपी उसी हाथी पर सवार है और यही वजह है कि गोडसे का नाम आते ही मन का चोर छुपाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गांधी के पायताने आकर बैठ जाते हैं।
  तो जो चोर नेहरू और पटेल के मन में था वही चोर आज भी हमारे शासक वर्ग के मन में है। कोई नहीं कहता की गांधी का अंतिम संस्कार कर दो। अपनी दुकान से कोई राजनीतिक दल गांधी का साइन बोर्ड उतारना नहीं चाहता। आज़ादी के ठीक बाद से आज तक पग-पग पर गांधी की हत्या करने वालों ने अपने दामन पर लगे खून के छींटे गांधी नाम की चादर से ही छुपाई है। इसलिए प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। मन का चोर मन में छुपाए रखने की कला सबको नहीं आती। प्रज्ञा वो चोर नहीं छुपा पाती हैं।
 हां, देश ये यकीन रखे कि गांधी कोई शरीर भर नहीं है जो किसी गोडसे की गोलियों से मर जाएगा। गांधी वो ज़मीन है जिसपर भारत के पांव टिके हैं और गांधी वो प्राणवायु है जो  भारत के फेफड़ों में जाता है। और भारत वो देश नहीं जो मुंह पर पट्टी, आंखों पर तोबड़े और दिमाग पर ढक्कन लगाकर चलता हो। गांधी ने वही पट्टी, वही तोबड़े, और वही ढक्कन तो हटाया था। एक दिन गांधी का ये देश सफेदपोशों के बदन से वो चादर उतार देगा जिस चादर से गांधी हत्या के दाग़ छुपाए गए हैं। याद रखिए गांधी ने बीसवीं सदी को हिलाया था।

Friday, November 15, 2019

कामरेड के हाथ में भगवा झंडा


तो मुख्तसर बात ये कि चिनगारी जी चिंतित हैं। चिनगारी जी जब चिंतित होते हैं तब अपने मुंह में चिनगारी सुलगा लेते हैं। मतलब वो सिगरेट पीते नहीं हैं फूंकते हैं। तो चिनगारी जी चिंतित हैं और सिगरेट फूंक रहे हैं। चिनगारी जी बिना फिल्टर वाली सिगरेट पीते हैं। वजह एक कि वो सस्ती होती है और वजह दो कि बीड़ी की गंध उन्हें पसंद नहीं।
   बेतिया के मीना बाजार में कम्यूनिस्ट पार्टी के दफ्तर के सामने लहराते लाल झंडे को देखकर चिनगारी जी का दिल बैठा जाता है। लाल झंडा चिनगारी को कब पसंद आने लगा उनको नहीं पता लेकिन लाल झंडा उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। लाल को बिछाया, लाल को ओढ़ा और लाल के साथ ही पलते-बढ़ते चिनगारी जी कब 50 साल पार गए पता ही नहीं चला। आज उसी लाल झंडे की लालिमा मद्धिम पड़ गई है। उदास रंग, उदास ढंग, बेरंग।
      चिनगारी जी ने वो दिन भी देखे हैं जब गांव-गांव लाल परचमम लहराया करता था। चनपटिया और सुगौली सीट पर तो कम्यूनिस्ट पार्टी के सामने लोग चुनाव लड़ने से भी डरते थे। 1977 का समाजवादी तूफान रहा हो या फिर 1992 की सांप्रदायिक आग, पार्टी के झंडे का चटख लाल रंग कायम रहा था। लेकिन आज! आज चिनगारी जी चिंतित हैं। झंडे का रंग उड़ चुका है। गांव-गांव झंडा उठाकर चलने वाला काडर आज भी है, आज भी उसके हाथ में झंडा है लेकिन, झंडे का रंग बदल गया है। आज भी वो मजदूर है लेकिन अब वो मजदूरों के हक की बात नहीं करता। आज भी वो किसान है लेकिन अब वो किसानों की समस्याओं की बात नहीं करता। अब वो दूसरी बात करता है। अब वो संघर्ष की बात नहीं करता, अब वो क्रांति को फिजूल की बात कहने लगा है। अब वो नफरत की बात करने लगा है। अब वो हिंसा की बात करने लगा है। अब वो दंगे-फसाद की बात करने लगा है। चिनगारी जी ने 30 सालों में धीरे-धीरे लाल रंग को रंग खोते हुए देखा है।

        चिनगारी जी चिनगारी क्यों हैं इसके पीछे एक छोटी सी घटना है। दरअसल मीना बाजार में कम्यूनिस्ट पार्टी का जो तीन मंजिला दफ्तर है पहले वो फूस की मामूली झोपड़ी में हुआ करता था। चिनगारी जी तब छोटे थे। उसी दफ्तर में खाना बन रहा था, चिनगारी जी खेल रहे थे। खेलते-खलते चिनगारी जी ने चूल्हे की चिनगारी लकड़ी से उछाल दी और झोपड़ी में आग गई। कहते हैं उसी घटना के बाद उनका नाम चिनगारी पड़ गया। खैर उसके बाद रिक्शा-तांगा, ठेला चलाने वाले मजदूरों के सहयोग से एक-एक ईंट जोड़ी गई तब जाकर ये दफ्तर बन पाया था।

      वो पूरा दौर देखा था चिनगारी जी ने। कैसे सकलदेव बाबू, भोला मियां जैसे लोग रोज़ चंदे का डब्बा लेकर घूमते थे और फिर चवन्नी-अठन्नी इकट्ठा कर शाम को पहुंचते थे। सकलदेव बाबू अपना सारा काम खुद करते थे। कपड़े धोना, बर्तन धोना, अपना खाना बनाना वगैरह। एक ही कमरे में रहना-खाना, पढ़ना-लिखना, लोगों से मिलना-जुलना और फिर पार्टी का दफ्तर चलाना। देर रात तक पढ़ते थे सकलदेव बाबू। किताब को पढ़ते-पढ़ते डायरी में कुछ लिखते रहते थे वो। चिनगारी जी को यही बात आज तक समझ में नहीं आई कि जो बात किताब में लिखी दी गई है वही बात फिर डायरी में क्यों लिखते थे कामरेड सेकरेटरी सकलदेव बाबू। लेकिन समझें कैसे, पढ़ाई की होती तो शायद समझ पाते। कामरेड सेकरेटरी ने बहुत कोशिश की थी चिनगारी जी को पढ़ाने की। लेकिन चिनगारी जी ने ना पढ़ने की जो जी-तोड़ कोशिश की उसके सामने कामरेड सेकरेटरी की कोशिशें छोटी पड़ गईं।
    चिनगारी जी ने जब से दुनिया देखी है तब से मीना बाजार का या दफ्तर देखा है, तब से ही लाल झंडा देख रहे हैं। सकलदेव बाबू ने हर बार समझाया कि किरांती मत बोला करो क्रांति बोलो लेकिन, चिनगारी जी किरांती से मोहब्बत करते थे। गरीबों, मजदूरों, मजलूमों, किसानों, छात्रों की किरांती। उनको पूरा विश्वास है कि किरांती से ही एक दिन पूंजीवाद का नाश होगा और रोटी-रोजगार के लिए भटकती भीड़ को उसका हिस्सा मिलेगा। लेकिन किरांती करेगा कौन?  जो किंराती की ज़मीन तैयार कर रहे थे वो सब तो चले गए और जो तैयार ज़मीन पर बोई फसल काटने वाले हैं उनसे किरांती होगी नहीं। वो मजदूरों की हालत पर भाषण तो घंटों दे सकते हैं लेकिन ना तो वो मजदूरों का मर्म जानते हैं और ना ही मजदूर उनके भाषणों का मतलब समझ पाते हैं। वो किसानों की बदहाली के लिए व्यव्स्था की नीतियों को तो खूब कोस सकते हैं लेकिन ना तो वो किसानों का दर्द महसूस कर सकते हैं और ना ही किसान उनकी दलीलों को समझ पाते हैं। गरीबों पर दिया गया उनका भाषण गरीबों तक पहुंचता नहीं और अगर पहुंच गया तो बुर्जुआ और सर्वहारा जैसे शब्दों का मतलब गरीब समझ ही नहीं पाते। और अव्वल तो ये कि चिनगारी जी भी खुद ये नहीं समझ पा रहे हैं कि ये कौन से कम्यूनिस्ट हैं और किस कैपिटलिस्ट का विरोध कर रहे हैं। आज वाले डिस्टिक सेकरेटरी तो रिक्शा-तांगा वालों से बात तक नहीं करते। किसान-गाड़ीवान से मिलते तक नहीं ये कामरेड। सकलदेव बाबू को किसान, गाड़ीवान, कोचवान, पल्लेदार सब पहचानते थे। सबके थे सकलदेव बाबू। इनको तो गांव से आया पार्टी का कोई काडर भी ना पहचाने। सकलदेव बाबू खेत-खलिहान की बोली बोलते थे और ये एसी वाली ठंडी सांस लेते हैं। किरांती की आग को एसी की ठंडी हवा ने ही तो बुझाई है। 
      चिनगारी जी ने फिर मुंह में चिनगारी फूंकी, लाल झंडे की तरफ देखा और सेकरेटरी साहब के कमरे में दाखिल हुए। दीवार पर टंगे बोर्ड पर चस्पा पुराने अखबार की कटिंग भी बदरंग होते जा रहे हैं। 1934 के भूकंप पीड़ितों की तीमारदारी करते कम्यूनिस्ट कामरेडों की तस्वीरें अब रंग खो चुकी हैं। 1974 के बाढ़ पीड़ितों को रसद पहुंचाते कामरेडों की तस्वीरें अब मिट जाना चाहती हैं। 1974 की तस्वीर, 1974 की बाढ़ और 1974 में आए चिनगारी जी। उसी बाढ़ में पता नहीं कहां किसी कामरेड को मिल गए थे ढाई-तीन साल के चिनगारी जी। अखबार में इश्तेहार छपे, लाउड स्पीकर पर ऐलान हुआ, जिला प्रशासन ने सरकारी भवनों पर पोस्टर लगवाए लेकिन चिनगारी जी को लेने कोई नहीं आया। तब से इसी लाल झंडे के नीचे, फूस वाले दफ्तर में पले-बढ़े चिनगारी जी। चिनगारी जी की आंखों से आंसू झर रहे हैं। आंखों के सामने एक धुंधली सी तस्वीर तैर रही है। तस्वीर! कामरेड के हाथ में दंगाई झंडा लहरा रहा है।

Tuesday, October 29, 2019

कुपुत्र से गंगा मइया को बचइया


तो डुगडुगी बजा दी गई। शाखा में आने वालों को सूचना दे दी गई कि छठ पूजा से पहले गंगा घाटों को साफ-सुथरा कर देना है। इसके लिए बाजाप्ता मीटिंग बुलाई गई है। प्रमोद काका पुराने शाखाई हैं। हाफ पैंट के ज़माने से शाखा जाते रहे हैं। अब, जब शाखा फुलपैंटिया हो गई तो वो भी फुलपैंट पहनने लगे हैं। अंग्रेजी पैंट, अंग्रेजी शर्ट, अंग्रेजी बेल्ट, अंग्रेजी जूते पहनकर स्वदेशी पर लेक्चर देना उनका सबसे प्रिय काम है। शाखा के हर आदेश का पालन अपना परम धरम समझते हैं प्रमोद काका।
    सो शाम को होने वाली मीटिंग के लिए घुटनी बाबा की मठिया वाली झोंपड़ी की सफाई शुरू हो गई है। सबसे पहले प्रमोद काका ने सुरा भरे बर्तनों को खाट के नीचे रखा और चादर से एक पर्दा बनाकर उनको छुपाया। फिर मठिया के अगल-बगल पड़े मुर्गे-बकरों की हड्डियों को इकट्ठा कर दूर ले गए और कुत्तों को आमंत्रित किया। फिर झाड़ू लगाकर निश्चिंत हुए।
  तो मीटिंग स्थल तैयार। प्रमोद काका सोचने लगे। सोचना उनका प्रिय काम है। अक्सर सोचने लगते हैं। और जब सोचते हैं तो फिर कोई दूसरा काम नहीं करते हैं। तो प्रमोद काका सोच रहे हैं कि गंगा की सफाई, गंगा घाटों की सफाई कैसे ? वहां तो बदबू आती है। वहां को कचरा पड़ा रहता है। वहां तो सड़ांध है। प्रमोद काका सोच ही रहे थे कि तभी उनके नथुनों में गांजा का धुआं भर गया। तंद्रा टूटी तो देखा कि घुटनी बाबा चीलम सुलगाए सामने ही बैठे हैं। प्रमोद काका तुरत झोपड़ी से बाहर निकल आए। लेकिन सोच ने साथ नहीं छोड़ा। सोचते-सोचते सोचा कि गंगा की सफाई क्यों। गंगा तो स्वच्छ और निर्मल हो ही गई होगी। 2014 में काशी पहुंचे गंगा पुत्र ने तो प्रण लिया था कि मां गंगा को निर्मल बनाएगा। देश ने उस गंगा पुत्र को अपना राजा बनाया। राजा ने गंगा की सफाई के लिए अलग मंत्रालय बनाया। राजा ने उस मंत्रालय को गंगा सफाई के लिए ढेर सारा धन दिया। राजकोष की अशर्फियां दी गईं। खज़ाना खोल दिया था गंगा पुत्र ने गंगा की सफाई के लिए। तो फिर गंगा तो स्वच्छ और निर्मल होगी ही। भला राजा की मां मैले-कुचले कपड़ों में किसी मलिन बस्ती में रहती है।
   प्रमोद काका के चेहरे पर मुस्कान आ गई। अहा! कैसा दृश्य होगा गंगा घाट का। आहा! कितना निर्मल होगा गंगा का पानी। सुपुत्र पाकर फूली समा रही होंगी गंगा मइया।
   प्रमोद काका के पांव खुद चल पड़े। तेज कदम, और तेज कदम और अब तो दौड़ने लगे प्रमोद काका। सीधे गंगा की तरफ दौड़े जा रहे हैं प्रमोद काका। अहा! कैसा सुंदर दृश्य होगा।
  लेकिन ये क्या ? दूर से ही दुर्गंध! कूड़ा-कचरा, सड़ांध। पानी भी बदबूदार। हे गंगा मइया! जिसका बेटा राजा उसकी ऐसी हालत! लानत...लानत...लानत...ऐसे पुत्र को लानत। कहां गईं खज़ाने की अशर्फियां ? कहां गए वो दावे ? मां तो जार-जार रो रही है। हे मां, कुपुत्र-सुपुत्र, कैसा तेरा पुत्र?
  प्रमोद काका फिर सोचने लगे। द्वापर में भी तो था गंगा पुत्र। तीर के बल अंबा, अंबे, अंबालिका को अगवा किया था गंगा पुत्र ने। गंगा पुत्र ही तो था वो जो चुप्पी साधे अपनी पौत्र वधु का चीरहरण देख रहा था। गंगा पुत्र ही तो था वो जो अन्यायियों-बेईमानों की विशाल कौरवी सेना का नेतृत्व कर रहा था। गंगा पुत्र ही तो था वो जो सत्य को पराजित करने के लिए असत्य की विशाल सेना लेकर कुरुक्षेत्र में डटा खड़ा था। हां, गंगा पुत्र ही था वो। गंगा पुत्र...गंगा पुत्र...गंगा पुत्र...। जब द्वापर युगीन गंगा पुत्र ऐसा था तो फिर कलियुगी गंगा पुत्र कैसा होगा! हे छठी मइया कुपुत्र से गंगा मइया को बचइया। प्रमोद काका रो रहे हैं, गंगा मइया रो रही हैं। गंगा पुत्र राज सिंहासन पर बैठा ठहाके लगा रहा है।  

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...