Tuesday, March 12, 2019

इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी-03


मुहम्मद साहब से पहले अरब किसी देश की शक्ल में नहीं था। कभी-कभार अलग-अलग हिस्सों में छोटी-छोटी बादशाहतें ज़रूर कायम हुईं। छठी शताब्दी तक अरब में इसी किस्म की छोटी बादशाहतें कायम होती रहीं हैं। मक्का और मदीना भी मुहम्मद साहब के वक्त में अलग-अलग कबीलों में बंटे शहर थे। इन कबीलों की कई शाखें होतीं थीं और सैकड़ों घरानों के हजारों परिवार एक कबीले में रहा करते थे। कबीले का हर सदस्य दूसरे सदस्य के लिए हर किस्म की कुर्बानी देता था। कबीले के किसी एक सदस्य के साथ दूसरे कबीले के लोग बदसलूकी करते थे तो उसे पूरे कबीले की बेइज्ज़ती मानी जाती थी और फिर बदले के लिए खून-ख़राबा होता रहता था। कई कबीले तो पीढ़ियों तक एक-दूसरे से जंग लड़ते थे। हर कबीले का एक सरदार होता था जिसे शेख कहते थे। ये शेख उस कबीले का हाकिम, जरनैल और पंडा-पुरोहित हुआ करता था। हर कबीले को लगता था कि उसका कबीला सर्वश्रेष्ठ नस्ल का है और उसके कबीले की मान्यता ही पवित्र है। एक मान्यता पूरे अरब में थी कि अगर किसी का कत्ल हो गया तो उसकी आत्मा चिड़िया बनकर उसके कब्र पर तब तक मंडराती रहती थी जब तक कि उसके कत्ल का बदला कत्ल से ही नहीं ले लिया जाए।


     कबीलों की आपसी लड़ाइयों में जो स्त्री-पुरुष कैद कर लिए जाते थे वो ग़ुलाम बना लिए जाते थे। महिलाओं से अरबों का बर्ताव बेहद अमानवीय था। कई कबीलों में बेटियों को ज़िंदा दफनाने के बाद उत्सव मनाने का रिवाज था। आलम ये था कि किसी की मौत के बाद उसकी बीवी किसी और की मिल्कीयत हो जाती थी। एक पुरुष कई स्त्रियों से और एक स्त्री कई पुरुषों से विवाह कर सकते थे। दो-चार शहरों को छोड़कर सारा अरब खाना-बदोश था। पानी की जरूरत के मुताबिक कबीले जगह बदलते रहते थे। लेकिन अरब के कबीलों में साल के चार महीने शांति के होते थे। इस दौरान आपसी लड़ाइयां बंद हो जाती थीं और कबीलों के पुराने झगड़ों को खत्म करने की कोशिशें भी होती थीं। इसी दौरान अरब के लोग काबा आकर मक्का की यात्रा करते थे। मुहम्मद साहब से पहले ही काबा अरबों का तीर्थ स्थान था।

    इन्हीं परिस्थितियों में इस्लाम का अवतरण हुआ। मान्यता है कि मुहम्मद साहब जब चालीस साल के थे तब रात को उन्हें आवाज़ आई ऐलान कर। मुहम्मद साहब इस आवाज़ के मायने नहीं समझ पाए। एक-एक कर ये आवाज़ तीन बार आई। तीसरी बार आवाज़ सुनकर मुहम्मद साहब घबरा गए और पूछा क्या ऐलान करूं ?’ जवाब मिला—ऐलान कर अपने उसी रब के नाम पर जिसने कायनात बनाई है। जिसने प्रेम से प्रेम का पुतला आदमी बनाया है। ऐलान कर तेरा रब बड़ा ही दयावान है, उसने आदमी को सोचने-समझने की ताक़त दी, आदमी को वो सब बातें सिखाई जो वो नहीं जानता है।फिर एक रात आवाज आई कि जा उठ! और रब्ब का संदेश दुनिया तक पहुंचा।
   मुहम्मद साहब परेशान रहने लगे। धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया। मुहम्मद साहब की बेचैनी बढ़ती गई। उनकी हालत देख उनकी पत्नी ख़दीजा से रहा नहीं गया। ख़दीजा के एक रिश्तेदार थे बरका। बरका यहूदी और ईसाई धर्म के बड़े विद्वान थे। एक दिन मुहम्मद साहब को लेकर खदीजा अपने रिश्तेदार बरका के पास गईं। मुहम्मद साहब ने बरका को सारा हाल सुनाया। बरका ने मुहम्मद साहब को बताया कि वो खुदा के भेजे पैग़ंबर हैं और अब उन्हें वही करना चाहिए जो उनका खुदा उनसे कह रहा है।
  तीन साल तक संदेह और संशय में जीने के बाद मुहम्मद साहब अचानक एक दिन पैग़ंबरी की राह पर निकल पड़े। कहा जाता है कि जिस दिन वो पैग़ंबरी की राह पर निकले उस दिन के पहले वाली रात को उन्हें आवाज़ आई थी कि ऐ चादर में लिपटे हुए, उठ और लोगों को आगाह कर और अपने रब्ब की बड़ाई कर और अपने कपड़ों को साफ कर और अपने मैलेपन से बच और दूसरों की सेवा करने के लिए किसी पर अहसान मत जता और अपने रब्ब के लिए सब्र से काम ले।

     मुहम्मद साहब का इलहाम का ये दावा धर्मों के इतिहास में कोई नई बात नहीं थी।  दुनिया के तमाम धर्मों को स्थापित करने वालों पीरों-पैग़बंरों, वलियों, ऋषियों-महात्माओं ने अपने-अपने तरीक़े से इसका दावा किया है। वेद, तौरेत, इंजील को मानने वाले अरबों-अरब लोग अपने-अपने धर्म ग्रंथों को ईश्वर की रचना ही मानते हैं।

Sunday, March 10, 2019

इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी-02

यहूदियों के बीच ऊंच-नीच का बहुत भेद तो था ही वैज्ञानिक सोच का घोर अभाव था। ईसाइयों के बीच ऊंच-नीच का भेद तो नहीं था लेकिन ईसाइयों के बीच घोर अवैज्ञानिकता थी। तब ईसाइयों के बीच धर्मांधता का दौर था। आलम ये था कि बीमारी की हालत में इलाज करवाना धर्म विरुद्ध माना जाता था। दवाओं से इलाज करवाना पाप माना जाता था। कहा जाता था कि बीमार लोगों को गिरजे के बुतों और पादरियों के पास जाकर दुआएं मांगनी चाहिए। ईसाइयों के बीच झाड़-फूंक और गंडे-तावीज का चलन था। धर्मांधता का जोर इतना था कि दवाओं से इलाज करने वालों को ईसाई सम्राट मौत की सज़ा देते थे। कुस्तुनतुनिया के सम्राट का जोर जहां तक था वहां ईसाई धर्म ग्रंथ के अलावा किसी दूसरी किताब के पढ़ने पर कड़ी सज़ा का प्रावधान था। इसके अलावा ईसाई धर्म में मरियम को लेकर भी विवाद था। कुछ लोग मरियम को ईश्वर की मां मानते थे तो कुछ लोग ईसा की मां। इस विवाद की वजह से ईसाई धर्म के बीच भीषण रक्तपात हुआ। शहर के शहर लाशों से पटने लगे। रोम, कुस्तुनतुनिया और सिकंदरिया के पादरियों के बीच वर्चस्व का ऐसा संघर्ष छिड़ा कि खुद पादरी ही नरसंहार करवाने लगे। ईसाई संतो-महंतों की फौजें तब के सम्राटों की फौजों से मिलकर वर्चस्व की लड़ाई में आम लोगों का खून बहाने लगीं और इसे ही धर्म रक्षा के लिए युद्ध बताने लगीं। यहूदियों और ईसाइयों की धर्मांधता और हिंसा से लोग तंग आ चुके थे। इन परिस्थितियों में मुहम्मद साहब का उदय एक ऐतिहासिक घटना थी।

    मुहम्मद साहब के जन्म से पहले यमन के हरे-भरे इलाकों पर इथियोपिया के बादशाह ने कब्जा कर लिया था। अरब के उत्तर और पश्चिम में रोमी सल्तनत और पूरब में ईरान की बादशाहत थी। हेजाज़ के इलाके को वहां के पुराने वाशिंदों ने अपनी बहादुरी के दम पर बाहरी बादशाहों की हुकूमत से बचा रखा था। इसी इलाके में मक्का शहर है जहां इस्लाम जन्मा और मदीना ही जहां वो पनपा। रेगिस्तान के इलाके तब बेकार हुआ करते थे। हेजाज़, नज़द, हज़रमौत और ओमान ही वो इलाके थे जो खुद को आज़ाद कह सकते थे। मुहम्मद साहब का जन्म जिस ख़ानदान में हुआ उस खानदान को बनी हाशिम कहा जाता था। अपने ज़माने में हाशिम मक्का का हाकिम था और हाशिम की शोहरत बहुत दूर-दूर तक फैली थी। हाशिम के बाद हाशिम के भाई मुत्तलिब और मुत्तलिब के बाद हाशिम के बेटे अब्दुल मुत्तलिब गद्दी पर बैठे। अब्दुल मुत्तलिब के सबसे छोटे बेटे अब्दुल्ला की मौत 25 साल की उम्र में ही हो गई। अब्दुल्ला की मौत के कुछ ही दिनों बाद उनकी बेवा आमिना ने मुहम्मद साहब को जन्म दिया। अब्दुल मुत्तलिब के बड़े बेटे अबु तालिब ने मुहम्मद साहब का पालन-पोषण किया। 10-12 साल की उम्र में ही मुहम्मद साहब को अपने खानदान के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा और तिज़ारती काफिले के साथ सीरिया के फलस्तीन और यरुसलम की कई यात्राएं करनी पड़ी। इन यात्राओं के दौरान मुहम्मद साहब का साबका ईसाई और यहूदियों से हुआ। तब सीरिया एशिया की सबसे सुखी और वैज्ञानिक सोच में सबसे अव्वल देशों में गिना जाता था। सिकंदर के बाद दशकों तक ये देश यूनानियों के कब्जे में रहा था। यूनानियों ने धर्म ग्रंथों के अलावा विज्ञान और दर्शन की पढ़ाई पर जोर दिया। इसी दौरान यहां बौद्ध धर्म ने खूब विस्तार पाया। लेकिन, मुहम्मद साहब के समय कुस्तुनतुनिया पर ईसाई सम्राट का कब्जा हो चुका था और सम्राट थियोडोसियस ने सीरिया में ज्ञान-विज्ञान को अपराध घोषित कर दिया था। थियोडोसियस, बौद्ध धर्म और विज्ञान को पाप मानता था। उसने आदेश दिया था कि जो लोग सिकंदरिया और रोम के ईसाई पोप के बताए मार्ग पर नहीं चलेंगे उनको देश निकाला दे दिया जाएगा। यहूदी रिवाज से ईस्टर का त्यौहार मनाने वाले लोगों को मौत की सज़ा दे दी जाती थी। इसी दौरान ईसाई संत आगस्टाइन ने ये आदेश दिया कि जिन किताबों में धरती को गोल बताया गया है उन्हें जला दिया जाए और उन किताबों को पढ़ने वालों को सज़ा दी जाए। आगस्टाइन ने कहा कि इंजील में धरती को चिपटा लिखा गया है इसलिए धरती को चिपटा मानना ही धर्म है। संत आगस्टाइन और पोप ग्रिगरी के कहने पर रोम के मशहूर पैलेटाइन लाइब्रेरी को आग लगा दी गई और गणित, भूगोल, खगोलशास्त्र और वैद्यकी पढ़ने वालों को देश से निकाल दिया गया। डॉक्टर और दार्शनिकों की खोज-खोज कर हत्या की जाने लगी। हुक्म दिया गया कि बैपतिस्मे के वक्त तीन बार पानी में डुबकी लगा लेना, शहद और दूध मिलाकर पी लेना, कपड़े या जूते पहनते वक्त माथे पर क्रूश का निशान कर लेना और मरियम और इसाई संतों की मूर्तियों के सामने प्रार्थना करना ही सारी बीमारियों का इलाज है। इसके अलावा किसी और विधि से इलाज करवाने वाले और इलाज करने वाले को मौत की सज़ा दी जाए।
   ये बात साफ होती है कि वो सीरिया जो यूनानों के वक्त ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की रौशनी देख चुका था ईसाइयों के वक्त धर्मांधता की मूर्खता देख रहा था। यही सारी बातें मुहम्मद साहब का प्रभावित करने लगीं।


जारी है....

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Thursday, March 7, 2019

इस्लाम: समझिएगा तो नफरत नहीं होगी- 01

मैं नास्तिक हूं और मेरे लिए धार्मिक पुस्तकें आस्था का विषय नहीं हैं बावजूद इसके मैं अलग-अलग धर्मग्रंथों को पढ़ता हूं। मैंने धर्म पर आस्था रखने वाले कई लोगों को धर्मग्रंथ पढ़ते देखा है और धर्म का धंधा करने वालों को पाया है कि उनके पास किसी धर्म की बुनियादी जानकारी नहीं होती। हिंदु धर्मग्रंथ तो पहले से ही घर में मौजूद थे। बाद के दिनों में मैंने इसाई, इस्लाम और सिख धर्मग्रंथ भी ले लिए। पटना वाले गुरमीत सिंह जी ने सूरज प्रकाश दिया और रांची वाले वेसाल आज़म ने कुरान का हिंदी तर्जुमा दिया। IAS अधिकारी रहे तहसीम अहमद जी ने गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति से प्रकाशित पैग़म्बर मुहम्मद क़ुरान और हदीस इस्लामी दर्शनकिताब दी। इस तरह से मेरे पास कुछ और किताबें हो गईं। रामचरित मानस की चौपाइयां तब से पढ़ रहा हूं जब उनके मतलब समझ भी नहीं पाता था। रामायण तब पढ़ी जब मैं 9वीं और 10वीं क्लास में था। बीए फर्स्ट ईयर में था तब पहली बार गीता पढ़ी। फिर एक बार कह दूं मैं नास्तिक हूं। मैं इन किताबों को सिर्फ किताब मानता हूं। लेकिन हाल के दिनों में धर्म मानने वालों के बीच जो धर्मोन्माद दिखा उसने ये साबित किया कि धर्मों का मौजूदा स्वरूप धर्मांधता है। गली-गली घूम रहे टीकाधारियों और दाढ़ीधारियों से आप उनके धर्म की गूढ़ता नहीं जान सकते। इनमें ज्यादातर उस कौए के पीछे भागने वाले लोग हैं जिसके बारे में किसी ने कहा है कि वो कान लेकर भाग रहा है।

   भारत की बहुसंख्यक आबादी इस्लाम को जिस नज़रिए से देखती है वो नज़रिया विकसित किया है भारत के ही कठमुल्लों ने। ये कठमुल्ले वो लोग हैं जो मजहब का म तो नहीं जानते लेकिन खुद को मजहबी ठेकेदार बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि वो लोग जो न धर्मांध हैं और ना ही धर्म की किसी बंदिश को मानते हैं वो धार्मिक आडंबरों को खारिज करते हुए धर्म-मजहब मानने वालों को ये बताएं कि उनके धर्मग्रंथ क्या कहते हैं।
   भारत में इस्लाम बाहर से आया। अरब के देशों में सबसे पहले यहूदी ही धर्म की तरह खड़ा हुआ। उससे पहले वहां अलग-अलग कबीलों में अलग-अलग मान्यताएं थीं लेकिन, वो कबीले किसी एक धर्म का प्रवर्तन नहीं कर पाए। यहूदियों के बाद ईसाई धर्म ने वहां पांव जमाए। यहूदियों, अलग-अलग कबीलों और ईसाइयों के बीच भीषण रक्तपात होते रहते थे। ईसा की पहली सदी में रोम के सम्राट टाइटस ने यहूदियों को फलस्तीन से निकाल दिया। बाद के दिनों में ईसाइयों के आपसी झगड़ों में इतनी हिंसा हुई कि सीरिया (शाम) और दूसरी कई जगहों से उनको निकाला गया। इसी दौरान बड़ी तादाद में ईसाई और यहूदी अरब देशों मे जाकर बसे। अरब की एक बड़ी आबादी इब्राहिम को अपना पूर्वज मानती थी। बाद के दिनों में ये मान्यता यहूदी और ईसाई धर्म में भी स्थापित हो गई कि इब्राहिम ही यहूदियों और ईसाइयों के पूर्वज थे। वो इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल की मूर्तियों की उपासना का वक्त था। बाद में इब्राहिम और इस्माइल के साथ ईसा की मां मरियम की मूर्तियां भी रखी जाने लगीं। इस तरह से एक मिश्रित संस्कृति का विकास शुरू हुआ लेकिन, यही मिश्रण बाद के दिनों में बड़े रक्तपात की वजह बना।  
          यहूदी एक ईश्वर और बहुत सारे अवतारों के अलावा एज़रा को भगवान का बेटा मानते थे। यहूदियों में छुआछूत बहुत ज्यादा थी और दूसरी मान्याताओं को वो नीच समझते थे। वो दूसरे धर्मों को नीच और नापाक मानते थे।
   ईसाई धर्म यहूदी के बाद आया था। ईसाई धर्मावलंबियों का मानना था कि यहूदियों के बीच लकीर की फ़कीरी है और घटिया रस्मों का चलन है। तब ये माना गया कि ईसाई धर्म यहूदी की ही एक शाखा है और यहूदियों के बीच धर्म सुधार आंदोलन चला रहा है। यहूदियों की बीसियों मूर्तियों की जगह ईसाइयों ने त्रिमूर्ति पूजा को तरजीह दी। इन तीन मूर्तियों में ईश्वर, ईसा और उस मानी हुई आत्मा की मूर्ति हुआ करती थी जिसके बारे में मान्यता है कि उसी आत्मा के जरिए ईसा की कुंआरी मां मरियम को गर्भ ठहरा था। कुछ जगहों पर ईश्वर, ईसा और मरियम की त्रिमूर्ति हुआ करती थी। कुछ जगहों पर इन तीन मूर्तियों के अलावा कई संतों और फ़रिश्तों की मूर्तियां भी हुआ करती थीं।
क्रमश:

Sunday, February 10, 2019

मेरे पास बाबूजी की सीख है

मेरा ये दृढ़ विश्वास है कि मेरे बाबूजी स्व.श्यामाकांत तिवारी समाजवादी विचारधारा के बेहद करीब थे। 1989-90 में जब देश मंडल और कमंडल आंदोलनों के जरिए जातीय और सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में था मैं देखता था कि मेरे घर तमाम जाति-धर्म के लोग आते थे और मेरे बाबूजी उनके साथ अलग-अलग गांवों में जाकर एकता-अखंडता की कवायद में जुटे रहते थे। हलांकि तब मेरी उम्र 8-9 साल की थी और मेरे लिए तब समाजवाद या फिर दक्षिणपंथ को समझना बेहद मुश्किल था। लेकिन 1992 में जब बाबरी कांड हुआ या फिर 90 के दशक में बिहार में जब नरसंहारों का सिलसिला शुरू हुआ तब बाबूजी की बढ़ी गतिविधियों के बीच उनसे और उनके सहयोगी-मित्रों से वामपंथ, दक्षिणपंथ और समाजवाद पर थोड़ी समझ विकसित होने लगी। बाबूजी अक्सर डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव के विचारों की चर्चा करते रहते थे। वो चंद्रशेखर और जॉर्ज फर्नांडिस के करीबी थे, उनके ज्यादातर कार्यक्रमों में शामिल होते थे। उन्हीं की वजह से बेहद कम उम्र में मैं चंद्रशेखर और जॉर्ज फर्नांडिस से मिल सका था। 


जब में नौवीं में था तब मैने जयप्रकाश नारायण की लिखी मेरी विचार यात्रा पढ़ी। ये किताब दो भागों में है। तब शायद मैं उसे ठीक से समझ नहीं पाया था इसलिए बारहवीं की परीक्षा खत्म होने के बाद मैंने वो दोनों किताबें दोबारा पढ़ीं। जेपी की लिखी ये किताबें समाजवादी विचारधारा की एक पूरी यात्रा हैं। हलांकि बाद के दिनों में जब आपातकाल की परिस्थितियों को समझने के लिए पढ़ना शुरू किया तो जेपी के प्रति आस्था का भाव खत्म सा होता गया। बावजूद इसके मैं मानता हूं कि समाजवादी सोच के जरिए ही भारतीय समाज को बनाए-बचाए रखा जा सकता है।
समाजवाद को परिभाषित करना मेरे लिए मुश्किल काम है। फिर भी मैं इतना तो मानता ही हूं कि ये सिद्धांत और आंदोलन, दोनों ही है और यह विभिन्न ऐतिहासिक और स्थानीय परिस्थितियों में विभिन्न रूप धारण करता है। मूलत: यह वह आंदोलन है जो उत्पादन के मुख्य साधनों के सामाजीकरण पर आधारित वर्गविहीन समाज स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है और जो मजदूर वर्ग को इसका मुख्य आधार बनाता है, क्योंकि वह इस वर्ग को शोषित वर्ग मानता है जिसका ऐतिहासिक कार्य वर्गव्यवस्था का अंत करना है।
अब भारत के परिपेक्ष्य में इस विचारधारा की एक मूल बात पर आइए। सामाजीकरण पर आधारित वर्गविहीन समाज स्थापित करना प्राचीन भारतीय दर्शन है। दुर्भाग्य से अपने देश में समाजवादी आंदोलनों से खड़े हुए नेताओं ने ही वर्ग और वर्ण व्यवस्था को मजबूती देने का काम किया और जातीय विद्वेश को खाद-पानी उपलब्ध करवाया।
समाजवादी विचारक तो व्यक्तिवाद और प्रतिस्पर्द्धा की जगह आपसी सहयोग पर आधारित समाज की कल्पना करते थे। उन्हें विश्वास था कि मानवीय स्वभाव और समाज का विज्ञान गढ़ कर सामाजिक ताने-बाने को बेहतर रूप दिया जा सकता है। परंतु भारत में समाजवाद सत्ता हासिल करने का जरिया बना और इसके लिए जाति आधारित राजनीतिक व्यवस्था खड़ी की गई। इस राजनीतिक व्यवस्था की काट के तौर पर जो राजनीति सामने आई वो सांप्रदायिक है। दक्षिणपंथी विचारधारा ने जातिवादी संकट से जूझने के लिए ज्यादा खतरनाक तरीके अपनाए और सांप्रदायिक सोच को हिंसक तरीके से समाज के बीच स्थापित किया। दुष्परिणाम ये हुआ कि आज जब हमें मानवीय विकास के अलग-अलग आयामों पर विमर्श करना चाहिए तब हम हिंदू-मुस्लिम और दलित-ठाकुर वाले उस विमर्श में उलझे हैं जो विमर्श हजारों साल पहले दकियानूस समाज को गढ़ रहे थे। मनवीय जीवन के सुधार की तमाम बहसें खत्म कर दी गई हैं, तमाम संभावनाओं को धकेल कर समाज को हजारों साल पीछे धकेला जा रहा है और दुर्भाग्य ये कि दक्षिमपंथियों के साथ-साथ इस काम में कथित समाजवादी भी लगे हुए हैं। इस दौर में मुझे अपने बाबूजी अच्छे लगते हैं। वो इस दुनिया में भले नहीं हैं लेकिन जाने से पहले उन्होंने मुझे ये तो बता ही दिया कि जाति-धर्म की सोच से ज्यादा बड़ी है समानता की सोच, ज्यादा अच्छा है एक-दूसरे को गले लगाना।

Saturday, February 2, 2019

मोहन भागवत को ये दिन देखने ही थे

तो ऐसा पहली बार हुआ जब विश्व हिंदू परिषद के किसी कार्यक्रम में संघ प्रमुख को विरोध का सामना करना पड़ा। ये विरोध पहले ही हो जाना चाहिए था। देर से ही सही लोगों को ये बात समझ आ गई कि संघ परिवार के लिए राम मंदिर का मुद्दा, आस्था का मुद्दा नहीं है। ये बात समझने में देर ज़रूर हुई लेकिन जब लोगों ने समझी तो ठीक से समझी कि संघ परिवार की आस्था बीजेपी की सरकार में है राम में नहीं। कुंभ में आयोजित धर्म संसद में धर्म कहां खड़ा था किसी को पता ही नहीं चला। ऐसा लगा जैसे बीजेपी की दो दिवसीय कार्यशाला हो। लेकिन मज़ेदार ये कि जिन लोगों को राम की आस्था के नाम पर जुटाया गया था वो ये समझ गए कि संघ परिवार का मकसद राम मंदिर के आसरे बीजेपी के लिए माहौल बनाना है। ये संत भी समझ गए थे और यही वजह है कि देश के चारों प्रमुख अखाड़ों ने इस बार वीएचपी के इस धर्म संसद का बहिष्कार किया था। बावजूद इसके वीएचपी ने राम मंदिर के नाम पर धर्म संसद में बड़ी संख्या में लोगों को जुटा लिया। लेकिन इस बार दावं उल्टा पड़ गया। कार्यक्रम के दूसरे दिन जितना समय मोदी सरकार को दोबारा मौका देने वाले प्रवचन को दिया गया उसका चौथाई भर हिस्सा भी राम मंदिर मुद्दे को नहीं दिया गया। फिर क्या था लोग असली खेल समझ गए और धर्म संसद के नाम से चल रही राजनीतिक कार्यशाला के खिलाफ उठ खड़े हुए। 
    संध परिवार और उससे जुड़ी वीएचपी के लिए ये घटना गंभीर चुनौती है। ऐसा पहली बार हुआ है जब संत समाज संघ परिवार के खिलाफ खड़ा हुआ है और ऐसा पहली बार हुआ है जब धर्म संसद के नाम पर चल रही बीजेपी कार्यशाला का अपने ही लोगों ने विरोध किया है। ये भी पहली बार हुआ है कि अब अपने ही लोग राम मंदिर के नाम पर बीजेपी का एजेंडा चलाने का आरोप संघ परिवार पर लगाने लगे हैं। संघ के अपने ही लोगों को ये पता चल गया है कि ये सारी कवायद सिर्फ और सिर्फ बीजेपी की सत्ता के लिए होती रही है और बीजेपी को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए संघ परिवार राम को आगे करता रहा है।
   तो इस बार अपनों ने ही पोल खोल दी। उठ गए राम के पक्ष में और जब राम के पक्ष में खड़े हुए तो स्वभाविक तौर पर संघ के विरोध में दिखे। राम के पक्ष में खड़े हुए तो बीजेपी का विरोध दिखा। राम मंदिर के पक्ष में बोल रहा हर आदमी बीजेपी और संघ परिवार के खिलाफ बोलता दिखा।
   ये तो होना ही था क्योंकि, राम नाम की चादर तान कर कब तक सच पर पर्दा डाले रखा जा सकता था। किसी न किसी दिन तो सच को बाहर आना ही था। सच बाहर आया तो हंगामा हो गया। पर्दा हटते ही पता चल गया कि जिसे धर्म संसद बता रहे थे वो तो असल में बीजेपी की कार्यशाला थी। जहां राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की बात कह कर लोगों को जुटाया गया था वहां तो बीजेपी सरकार के लिए रास्तों के तलाश हो रही थी। बस क्या था मुट्ठियां तन गईं। आस्था के नाम पर वोटबैंक खड़ा करने वाले इस खेल की पोल खुल गई। लेकिन इतने कुछ नहीं होता। अभी बहुत कुछ जानना बाकी है इस खेल के बारे में। अभी भी बहुत कुछ पर्दे के पीछे ही छिपा कर रखा गया है। इसलिए ज़रूरी है कि आप सावधान रहें क्योंकि, पर्द के पीछे खड़े सत्ता भोगियों ने न तो अपने परिवार से कभी पहलू खान दिया है और ना ही चंदन गुप्ता। दंगों में मारा जाना आम आदमी के नसीब का क़िस्सा होता है और सत्ता भोगना नेताओं नसीब का हिस्सा होता है। इसलिए अभी भी बहुत सारे पर्दे हटाने हैं आपलोगों को। सही वक्त है एक-एक कर वो सारे पर्दे नोच डालिए जिनके आसरे राजनीति अपने धतकर्म छुपाती रही है और अपनी साजिशें साकार करती रही है।

Sunday, December 23, 2018

ये कहने में भी डर लगता है कि डर लगता है

सिर पर पांव है कि पांव सिर पर कुछ पता ही नहीं चल रहा है। बस ये दिख रहा है कि प्रमोद काका गिरते-पड़ते दौड़े जा रहे हैं। चेहरे पर खौफ ऐसा जैसे कि मॉब लिंचर पीछे पड़े हों। बस भाग रहे हैं और उनके पीछे है घुटनी बाबा का सांड। घुटनी बाबा ने एक सांड पाल रखा है। पाल क्या रखा है छुट्टा छोड़ रखा है। पाला होता तो तिवारी टोले वाले मठ पर खूंटे से बांध कर रखते। चारा-पानी का इंतजाम करते। लेकिन ये सांड तो छुट्टा घूमता है। रबी की हरी फसलों का भोग लगाकर पहलवान बना फूंफकारता ये सांड प्रमोद काका के पीछे पड़ा है। प्रमोद काका भाग रहे हैं सांड फूंफकार रहा है।
अमवा मझार के इस सांड की चर्चा रामनगर बनकट, अहवर मझरिया, अहवर शेख और जौकटिया समेत आसपास के कई पंचायतों में है। सोमवार, गुरुवार और शुक्रवार को अमवा मझार में बड़ा बाजार लगता है। आसपास के गई पंचायतों के लोग इस बाजार में आते हैं। बाजार आने वाले रास्ते के दोनों तरफ खेत में रबी की फसल है और यही फसल घुटनी बाबा के इस सांड का प्रसाद है। फसली भोग लगाने वाले सांड को कभी-कभार इंसानों से परेशानी होने लगती है। और जब वो परेशान है तो उस इंसान की एक-दो हड्डियों को दो-चार हड्डियों में बदल देता है। लिहाजा बाजार आने-जाने वाले लोग अब झोले के साथ लाठी लेकर भी चलने लगे हैं। लाठी भी तब ही काम आ रही है जब लोग झुंड में हों और लाठी दिखाकर भागने की पूरी क्षमता रखते हों क्योंकि, इस सांड को न तो लाठी मारी जा सकती है और ना ही धेला। नवका टोला वाले जहीर मास्टर ने खेत चरते इस सांड पर धेला चला दिया था तो बड़ा बवाल हो गया था। घुटनी चाचा वाली चीलम मंडली ने इसे हिंदुत्व पर खतरा बता दिया। फिर क्या था घेर लिए गए जहीर मास्टर अपने घर में ही। मार इतनी पड़ी कि इलाके के महान गणितज्ञ राजवंशी पटेल भी उसका हिसाब नहीं कर पाए। दोनों हाथों की हड्डियां टूटी सो अलग। तो फिर इस सांड को मारे कौन।
घुटनी बाबा का ये मरखाहा सांड हिंदू है। हिंदुत्व का प्रतीक है। हिंदू स्वाभिमान का जीता-जागता प्रमाण है। हिंदू अस्मिता की निशानी है। इसपर धेला फेंकते ही इलाके का हिंदुत्व खतरे में आ जाता है। जैसे कि सांड होना ही हिंदू होना हो और हिंदू होने का मतलब मरखाहा सांड होना।
तो घटना ये कि प्रमोद काका भागे जा रहे हैं और सांड उनको भगाए जा रहा है। पीछे से भीड़ चिल्ला रही है। कोई कह रहा है कि सीधे भागो, कोई कह रहा है कि खेत की तरफ भागो। प्रमोद काका पीछे मुड़कर देख रहे हैं और भाग रहे हैं। सांड और काकाजी के बीच की दूरी उतनी ही कम रह गई है कि जितनी भक्त से भगवान की होती है।
लेकिन, प्रमोद काका डर नहीं रहे हैं सिर्फ भाग रहे हैं। डर शब्द तो मुंह से निकाल नहीं सकते वो। रामलोचन बाबा का हश्र वो देख चुके हैं। तीन दिनों पहले ही रामलोचन बाबा ने सांड से डरने वाली बात कही थी। बस क्या था भरी पंचायत ने उन्हें गांव छोड़कर चले जाने को कह दिया। मुखियाजी ने तो साफ कहा था कि डरने की बात कहकर रामलोचन कमकर ने पंचायत को बदनाम कर दिया। पंचायत ने रामलोचन बाबा को आजादी गैंग का सदस्य बताया और कहा कि डर लग रहा है तो दूसरे गांव में जाकर बस जाओ। प्रमोद काका भले ही दो-चार हड्डियां तुड़वा लेंगे लेकिन ये तो कत्तई नहीं कहेंगे कि उन्हें डर लग रहा है।

Wednesday, December 5, 2018

बुलंदशहर हिंसा: योगेश जैसे लोग तो मोहरा भर होते हैं

ये दो तस्वीरें इस दौर की व्याख्या की सबसे सटीक तस्वीरें हो सकतीं हैं। भीड़ के हाथों मारे गए सुबोध सिंह की विधवा का पति के शव पर विलाप और हत्यारी भीड़ का स्वागत करता एक केंद्रीय मंत्री। दोनों तस्वीरें भले ही अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी हैं लेकिन जुड़ी एक ही विचारधारा से हैं। झारखंड के रामगढ़ में झूठी अफवाह फैलाकर भीड़ ने एक मुस्लिम युवक की हत्या की। हत्या का वीडियो वायरल हुआ और पहचान के आधार पर गिरफ्तार लोगों में से 8 लोगों को निचली अदालत ने हत्या का दोषी पाया। ऊपरी अदालत में सरकार की कमजोर पैरवी की वजह से सबको ज़मानत मिल गई। ज़मानत मिलते ही इस हत्यारी भीड़ को केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के आवास पर बुलाया गया और वहां खुद जयंत सिन्हा ने सबके गले में माला डाली। सरकार के मंत्री ने सबके सामने सरकार की मंशा जाहिर कर दी। मतलब ये कि हिंदुवाद के नाम पर हत्या करने वाली हर भीड़ के स्वागत में सरकार बिछी हुई है। इस घटना ने देश के सबसे बड़े सियासी दल बीजेपी की मंशा को भी स्पष्ट कर दिया। पार्टी हर उस शख्स के साथ है जो हिंदुवाद के नाम पर लाशें बिछा रहा है। 


तो अब दूसरी तस्वीर पर गौर कीजिए। ये सुबोध सिंह की पत्नी हैं। इंस्पेक्टर सुबोध सिंह भी हिंदू थे और उनकी पत्नी भी हिंदू हैं। कथित हिंदू धर्म रक्षकों ने बुलंदशहर में हिंदू सुबोध सिंह को मारा और हिंदू महिला को विधवा कर हिंदू बच्चों को अनाथ किया। धार्मिक आतंतवाद का ये बम पिछले चार सालों से बारूद पाते-पाते अब इतना बेलगाम हो गया है कि किसी के भी सिर फट जा रहा है।

बुलंदशहर हिंसा मामले का मुख्य आरोपी योगेश राज भले ही इस घटना का मुख्य आरोपी है लेकिन सच ये है कि योगेश राज तो मोहरा भर है। योगेश जैसे लाखों नवजवानों के दिमाग में इतना जहर भर दिया गया है वो नवजवान बस अब किसी को डंस लेना चाहते हैं। ये जहर भरने वाले कौन हैं ये सबको मालूम है लेकिन, वो कभी मुख्य आरोपी नहीं बनाए जाते।
जिस सुमित की मौत हिंसा के दौरान हुई गोलीबारी में हुई उस सुमित के हाथ में पत्थर जिसने थमाया वो कौन है ये हम सब जानते हैं। वो कौन है जो ड़क्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, टीचर, डीएम, क्लर्क, पत्रकार बन सकने वाले नवजवानों को दंगाई बनाना चाहता है ? वो कौन है जो आम समाज के बच्चों की मौत पर सत्ता की सीढियां चढ़ना चाहता है ? वो कौन है जो पहले आपको बच्चों का मरवाता है और फिर मुआवजे का ढोंग कर आपका शुभचिंतक भी बन जाता है ? वो कौन है जो अपने बच्चों को तो अच्छे स्कूलों में पढ़ाता है लेकिन आपके बच्चों को दंगाई बनाता है ? वौ कौन है...वौ कौन है..वो कौन? जानते तो सब हैं लेकिन बताए कौन ?
इस किस्म के तमाम मामलों की तरह योगेश अब कुछ दिनों के लिए भागा फिरेगा, फिर जेल जाएगा। ट्रायल चलेगा। मुकदमा कमजोर करने के लिए उसके परिजन वैसे ही किसी नेता के पैरों पर गिरेंगे जैसे नेताओं ने उसके दिमाग में जहर भर उसे दंगाई बनाया। फिर वही नेता केस कमजोर करवाने के नाम पर योगेश के परिजनों से रुपये ऐंठेगा। योगेश के बाबूजी खेत गिरवी रखेंगे, माताजी गहने गिरवी रखेंगी और नेताजी कुछ दिनों के लिए कमाई का एक जरिया बना लेंगे। जेल से निकलते-निकलते योगेश इतना तबाह हो चुका होगा फिर वैसे ही किसी नेता के पैरों पर गिरे रहना उसकी मजबूरी हो जाएगी।
क्योंकि योगेश और योगेश जैसे लोग तो मोहरा भर होते हैं।

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...