Friday, February 15, 2013

जग सूना-सूना लागे

                                                       जग सूना-सूना लागे
सर्वोच्च अदालत ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान वीआईपी सुरक्षा के नाम पर चल रहे ताम-झाम पर सवाल खड़े किया है..आम आदमी की फिक्र के साथ.. इस बात पर तेज हो गई है कि वीआईपी सुरक्षा और लाल बत्ती जरूरत हैं य झूठी शान
 सालाना 31 करोड़ रु. का खर्च...ये खर्च वीआईपी सुरक्षा में तैनात जवानों के वेतन मद में होता है.. इसी काम के लिए तकरबीन इतना ही खर्च बाकी मदों में होता है... पंजाब के चंडीगढ़ में पीएम का कारकेड गुजर रहा था..ट्रैफिक रोका गया... एंबुलेंस में पड़े-पड़े एक मरीज की मौत हो गई.. प्रशासन पीएम के स्मूथ मूवमेंट के लिए बेचैन दिखा... एंबुलेंस उसकी फिक्र के दायरे से बाहर था... देश के तमाम राज्यों -शहरों में पीएम-सीएम और वीवीआईपी मूवमेंट के नाम पर यही होता है... अब सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा है कि किस नियम के तहत पुलिस ट्रैफिक रोकती है... अगर सड़कें इतनी खतरनाक हैं तो आम आदमी के लिए भी हैं.. उसकी सुरक्षा के लिए क्या होता है....
-कोर्ट ने वीआईपी सुरक्षा के मानक पर सवाल पूछा है... झूठी शान के लिए लाल बत्ती गाड़ी का इस्तेमाल और सरकारी बॉडीगार्ड की ठसक पर सवाल उठाए हैं.. जिनको जरूरत है उनको सब मिले.. लेकिन वीआईपी की मेम साहिबा, बच्चों और रिश्तेदारों को ये सुविधा क्यों … जनप्रतिनिधि के नाम पर आपराधिक छवि के लोगों को सरकारी हिफाजत क्यों...
कोर्ट ने पूरी जानकारी मांगी है.. किनको सुरक्षा दी गई है.. क्यों दी गई है.. देने का आधार क्या है... और उस पर कितना खर्च आता है... वीआईपी मूवमेंट के दौरान आम आदमी की सुरक्षा में तैनात जवानों को ट्रैफिक रोकने में किस नियम के तहत लगाया जाता है... आम और खास की सुरक्षा में बड़ा फर्क क्यों है... सरकारें आंकड़े जुटा रही हैं.. जवाब खोज रही हैं...हम और आप ये सोच रहे हैं कि आम आदमी से इतना ऊपर क्यों होता है उसका जनप्रतिनिधि


सत्ता-सियासत ने लोकतंत्र की परिभाषा को कब और कैसे बदल दिया पता ही नहीं चला... लोक कब हासिए पर गया.. तंत्र कब सत्ता के इर्द-गिर्द घूमने लगा और सिस्टम कब आम आदमी से दूर हो गया स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं दिखा... और इसी बीच आम आदमी का नुमाइंदा आम से खास हो गया...
सायरन की ऊंची और डरा देने वाली आवाज... धूमती लाल बत्ती... सनसनाती गाड़ियां... डंडे भांजते पुलिस के जवान..चौक-चौराहों पर खड़े अधिकारी से लेकर जवान तक... वायरलेस पर दौड़ते-भागते मैसेज... आगे और पीछे पूरी तरह से खाली सड़क.... और अगल-बगल में पूरी तरह से ठहरा ट्रैफिक... अवाक लोग... परेशान भीड़... ये नजारा आम होता है.. वजह सड़क से गुजर रहा कोई 'खास' होता है
 जिस इलाके से ये काफिला गुजरता है... उधर के ज्यादातर पुलिसकर्मी इसके स्मूथ मूवमेंट के इंतजाम में लग जाते हैं... कुछ पल के लिए आम आदमी इनकी फिक्र के दायरे से बाहर हो जाता है...
लोकतंत्र में लोक कहां है.. तंत्र किसके लिए काम कर रहा है... सर्वोच्च् अदालत ने सवाल पूछा है...जवाब की तैयारी है.. लेकिन इसका हिसाब कौन देगा कि इतने दिनों तक आम आदमी के पैसे का इस्तेमाल इस तरह क्यों हुआ




Wednesday, October 10, 2012

चक्रव्यूह

                            CHAKRAVYUH
बंदूक उतना बड़ा आतंक नहीं है जितना बड़ा आतंक है गरीबों को गरीब बनाए रखना, उनकी जमीन हड़प लेना, उनके अधिकार छीन लेना... चक्रव्यूह सिनेमा का ये संवाद मौजूदा व्यवस्था से उपजी समाज की तल्ख सच्चाई है.. जल.जंगल और जमीन के संघर्षों की रस्म अदायगी से दूर ये फिल्म मुश्किल में घिरे एक बड़े तबके की आवाज है... प्रकाश झा की खासियत सामाजिक जरूरतों, उसके आंतरिक द्वंद और उसके संघर्ष को साफगोई के साथ पर्दे पर उतारना है... चक्रव्यूह को सिर्फ एक नक्सली समस्या से जोड़ना एक बेहतर पटकथा के साथ नाइंसाफी होगी.. समाज, व्यवस्था और इनके ढांचे में मौजूद जंगल को महसूस करते रहना और उस जंगल के खिलाफ आवाज उठाना दोनों अलग बाते हैं.. सभ्य समाज के दायरे में कब, कहां और कैसा जंगल खड़ा हो जाय कहना मुश्किल है.... और फिर इस जंगल के अपने उसूल होते हैं... एक दांव चलता है तो दूसरा जवाबी पैंतरा... प्रकाश झा ने फिल्म की कहानी के जरिए सबकुछ महसूस करवाया है.. दरअसल प्रकाश झा जंगल और जमीन की उपज हैं... बिहार के प. चम्पारण में जन्मे प्रकाश जी ने गरीबी और गरीबी की वजहों को नजदीक से देखा है... शोषण सहते रहना जिनकी नीयति है उनको भी देखा है, महसूस किया है ... और उनको भी जिनकी पीढ़ियां शोषण के बीच मर-खप गईं... लेकिन उनको भी देखा है जो अपने पूर्वजों से अलग राह पर चले... सामंती गुमान के खिलाफ मुट्ठी तान दी.... और तनी मुट्ठी के साथ नक्सली कहलाने लगे... साहब कोई नहीं चाहता घर-बार, बाल-बच्चे छोड़कर इस जंगल में भटकना, उस जंगल में जहां जिंदगी अरना भैंसे और बाघ की लड़ाई के समान है, जिसमें भैंसे को पता तो है कि मरना उसी को है लेकिन वो बाघ से हर पल लड़ने को तैयार रहता है... जहां मौत का वासुकी फन फैलाए खड़ा फुंफकार रहा है.. जिस जंगल का एक ही नियम है, जिसने छुप कर वार किया वह चालाक निकला.... प्रकाश झा बताते हैं कि दरअसल फिल्म किसी के पक्ष में खड़ी नहीं होती.. बस सबकी बात रख देती है... फिल्म का गाना महंगाई की मार से बेहाल आम आदमी के दर्द को ही नहीं उभारता, इस महंगाई की वजहों की पड़ताल भी करता है.. उस नीतियों को भी उभारता है जो नीतियां सत्ता-सियासत ने अपनी और अपने लोगों की सुविधाओं के लिए गढ़ रखी हैं.. दिन गए, बरस गए, यातना गई नहीं, रोटियां गरीबों की सिसकियां बनी रही.. अगर आज भी यही हाल है तो आजादी के मतलब को फिर से समझने की जरूररत है... रोटी अगर आज भी एक सवाल है तो संसदीय लोकतंत्र के दायरे में विकास और उस विकास के खांचे में किसके लिए जगह है ये भी समझने की जरूररत है... चक्रव्यूह सिर्फ एक सिनेमा नहीं है.. कई रंगों के कोलाज के साथ ये भारत की सबसे बड़ी सच्चाई की चलती-फिरती तस्वीर भी है...

Tuesday, December 29, 2009

यही है हमारा होना तो न होने में बुरा क्या था

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हम पिछड़े, क्योंकि जातियों में बिखरे।
जातियां,उपजातियां, और वर्ग सदियों से हमारे साथ हैं, जैसे चस्पा हों हमारी पहचान पर ये। इनसे इतर शायद हम कुछ हो हीं नहीं। हम हैं इसका एक ही प्रमाण है की हमारी एक जाति है। उस जाति में भी हमारा एक वर्ग है। कुल मिलाकर एक कुआं तैयार है कुनबे के रुप में और हमें उसी में रहना है। निकले तो गए। विधर्मी हो गए। अब कोई नहीं पूछेगा। हमारी पूछ गई। इस पूछ ने हमें कैद कर रखा है। जब कैद हों, गुलाम हों तो फिर मुकम्मल प्रगति की बात भी कैसे सोचें, सो सोचना ही छोड़ दिया। अब कुएं में भीड़ बढ़ती गई, भीड़-भाड़ ने कुंठा पैदा की, और कुंठा ने मारपीट। लड़ाई अब जीवन का एक हिस्सा है। कभी खुद के कुएं में भीड़े तो कभी एक कुआं दूसरे से भीड़ा तो कभी कुओं का समूह आपस में लड़े। दुर्गतिको अच्छा मौका मिल गया, उसने हमारी नसों को जकड़ा और हममें समाहित हो गया। विकास को अभी कौन पूछता है। पिछड़े हैं, क्योंकि हम बिखरे हैं। बिखरे रहने में गर्व भी है। हम ब्राम्हण के बेटा हैं, है न गर्व की बात, हम क्षत्रीय हैं, ये भी कम गर्व की बात नहीं, और कन्हैया यदुवंशी थे इतना क्या कम है। सबके पास अपने तर्क हैं, अपना गर्व है, अपना एक कुआं है। अब इस कुएं से कौन निकले, गर्व तो इसी बात का है न कि हम एक कुएं से बाहर कुछ नहीं जानते। मतलब इस कुएं से बाहर हमारा कुछ भी नहीं।
गौर से सोचिए कितने कंगाल हैं हम, दरिद्र , महा दरिद्र, हमारे पास तो कुएं के अलावा कुछ है ही नहीं, और हम इस भ्रम में गर्व पालते रहे कि हम कमाल के हैं। 90 के दशक में लालू ने नारा दिया भूरा बाल साफ करो, मायावती ने कहा तिलक,तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार, बवाल होना था सो हुआ। पर जिन्होंने बवाल किया उन लोगों ने ही बाद में कोयरी चेतना रैली, कुर्मी स्वाभिमान रैली, दलित बचाओ रैली, सवर्णअवर्ण, न जाने कौन-कौन सी रैलियां कीं। हम टूटते गए, बिखरते गए। और आज इतने टुकड़े हो गए कि खुद में ही अपना अक्स ढूंढना मुश्किल हो गया है। अब संयुक्त की ताकत लग कैसे सकती है? सामूहिक प्रयास कैसे हो? और जब सामूहिक भागीदारी ही सिफर हो तो पिछड़ेंगे नहीं तो क्या होगा? सो हम पिछड़ते गए। कुनबे ने कुनबे को खाया, और विनाश ने जश्न मनाया।
चेतना कब आएगी, अगर ये सवाल है, तो लानत है हम पर। चेतना हमारे अंदर है, और उसका इस्तेमाल भी हमें करना है, । हम सब जानते हैं,बस करना नहीं चाहते। आखिर करेंगे कब? क्यों न कर सके अब तक? और नहीं किया अभी तक तो क्यों नहीं कर रहे अब, सवाल ये होने चाहिए।

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...