Wednesday, August 28, 2019

चल झूठे

झोला उठा कर चला जाएगा भोगी
चल झूठे
राज सिंहासन पर बैठा योगी
चल झूठे
चिडिय़ा, पत्ती, फूल और कलियाँ
सब उदास हैं
मुझसे बिछड़ कर वो खुश होगी
चल झूठे

Monday, August 12, 2019

सावरकर को वीर कहना भगत सिंह का अपमान है

महान क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि उनके साथ राजनीतिक बंदी जैसा ही व्यवहार किया जाए और फांसी देने की जगह गोलियों से भून दिया जाए. जबकि हिंदू राष्ट्रवादी सावरकर ने अपील की कि उन्हें छोड़ दिया जाए तो आजीवन क्रांति से किनारा कर लेंगे.
1911 में जब सावरकर को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए अंडमान के कुख्यात सेल्युलर जेल में भेजा गया था, तब सावरकर ने अपनी 50 वर्षों की सज़ा शुरू होने के कुछ महीनों के भीतर ही अंग्रेज़ों के सामने उन्हें जल्दी रिहा करने की याचिका लगायी थी. एक बार फिर 1913 में और 1921 में मुख्यभूमि में स्थानांतरित किये जाने और 1924 में अंततः क़ैदमुक्त किये जाने तक उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने ऐसी अर्जी लगायी. उनकी याचिकाओं की मुख्य पंक्ति थी: मुझे छोड़ दें तो मैं भारत की आज़ादी की लड़ाई को छोड़ दूंगा और उपनिवेशवादी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा.
23 मार्च, 1931 को शहीद भगत सिंह और उनके दो बेहद क़रीबी साथी शहीद राजगुरु और शहीद सुखदेव को ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकार ने फांसी पर लटका दिया था. अपनी शहादत के वक़्त भगत सिंह महज 23 वर्ष के थे. इस तथ्य के बावजूद कि भगत सिंह के सामने उनकी पूरी ज़िंदगी पड़ी हुई थी, उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने क्षमा-याचना करने से इनकार कर दिया, जैसा कि उनके कुछ शुभ-चिंतक और उनके परिवार के सदस्य चाहते थे. अपनी आख़िरी याचिका और वसीयतनामे में उन्होंने यह मांग की थी कि अंग्रेज़ उन पर लगाए गये इस आरोप से न मुकरें कि उन्होंने उपनिवेशवादी शासन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा. उनकी एक और मांग थी कि उन्हें फायरिंग स्क्वाड द्वारा सज़ा-ए-मौत दी जाए, फांसी के द्वारा नहीं. यह दस्तावेज़ भारत के बारे में उनके सपने को भी उजागर करता है, जिसमें मेहनतकश जनता अंग्रेज़ों के ही नहीं, भारतीय ‘परजीवियों’ के अत्याचारों से भी आज़ाद हो.

Friday, August 9, 2019

लोकतंत्र के मुर्दाघर में केवल जय-जयगान चलेगा

.ना टीवी ना अखबार चलेगा लोकतंत्र के मुर्दाघर में केवल जय-जयगान चलेगा....
कश्मीर में पिछले चार दिनों से अखबार नहीं छपे हैं। बाहर से अखबार ले जाने पर रोक लगा दी गई है। टीवी चैनलों का प्रसारण बंद है। मोबाइल और लैंड लाइन फोन तो बंद हैं ही। आप अखबार पर रोक के क्या मायने समझते हैं ? सूचना और संचार पर ऐसी पाबंदी के क्या मायने समझते हैं ? जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के सुरक्षा सलाहकार के विजय कुमार बता रहे हैं कि जुमे की वजह से कर्फ्यू में थोड़ी देरे के लिए सशर्त ढील होगी, फिर कर्फ्यू। सरकार बता रही है घाटी में शांति है। शांति है तो फिर कर्फ्यू क्यों है ? शांति है तो फिर अखबार और न्यूज चैनलों पर रोक क्यों है ? क्या हम दहशत के साये को शांति समझने की भूल कर रहे हैं ? क्या हम बंदूक के साए को लोकतंत्र समझने लगे हैं ? तो फिर ये गोली-बंदूक-सिपाही कितने दिन ? सच कहने की कहो मनाही कितने दिन ? घाटी में अपने ही घरों में कैद ये लोग किस गुनाह की सज़ा भोग रहे हैं ? समस्या सीमा पार पाकिस्तान है। कश्मीर हमारी समस्या नहीं है। समस्या पाकिस्तान से लगातार हो रही घुसपैठ है। कश्मीरी हमारी समस्या नहीं हैं। कश्मीरियों को रिहा कीजिए। सरकारी दहशतगर्दी की हद हो गई। बंद कीजिए ये तमाशा। धारा 370 के दो प्रावधानों को खत्म करने के आपके फैसले के साथ ये देश खड़ा है लेकिन, देश के इस समर्थन को भेड़चाल समझने की भूल मत कीजिए। नागरिक अधिकारों का ऐसा दमन मत कीजिए कि हालात 1975 जैसे हो जाएं और नतीजे 1977 जैसे। अपने ही नागरिकों की आंखों में दहशत देख कर प्रसन्न होना लोकतांत्रिक सरकार की नहीं क्रूर शासक की निशानी होती है। धरती के स्वर्ग ने मुस्कुराना छोड़ दिया है और आप अपने चेहरे पर विजित भाव लेकर घूम रहे हैं। किसको हराया है आपने ? किस पर विजय पाई है आपने ? कश्मीर में शांति और विश्वास बहाल करना सबका काम है। और सरकार की जिम्मेदारी है घाटी में शांति और विश्वास बहाल करना। दहशत के बादलों से अपनी नाकामी मत छुपाइए आप लोग। आपलोग कश्मीर जा क्यों नहीं रहे हैं ? जाइए लोगों को गले लगाइए। हमें आपका दंभ या अहंकार नहीं चाहिए। हमें हमारे कश्मीरियों के चेहरों पर वापस लौटी मुस्कान चाहिए।

Thursday, August 1, 2019

उनके हिस्से का हिंदुत्व ख़तरे में है


गर्मियों में जिस धनौती नदी में अब धूल उड़ने लगी है बरसात में अब वही धनौती फूंफकारती है। अमवा मझार के हाई स्कूल के फील्ड में रोजाना लगने वाली शाखा से लौटते वक्त प्रमोद काका थोड़ी देर के लिए धनौती किनारे खड़े होते हैं। तिवारी टोले वाले चौर का पानी बारी पर धनौती से मिलता है। जाल में गरई, पोठिया और टेंगरा मछलियां खूब फंसती हैं। वैसे तो प्रमोद काका कभी मछली खरीदते नहीं हैं लेकिन रोजाना वहां जाने का फायदा ये होता है कि बाबूलाल दुसाध कभी-कभार उन्हें एक-आध पाव मछली दे दता है। प्रमोद काका के लिए वही दिन सबसे अच्छा होता है जिस दिन बाबूलाल दुसाध उनके हाथ में मछली थमाते हुए कहता है कि लीं तिवारी जी मछरी खाईं। प्रमोद काका की ये खुशी संकट में है। वो शाखा समाप्ती के बाद घर के रास्ते में हैं। बगल में धनौती उफना रही है। सामने कुछ दूरी पर बारी है। वही बारी जहां से न जाने कितनों सालों से वो मुफ्त की मछली बड़े चाव से खा रहे हैं। बड़ा असमंजस है। शाखा में अजय जायसवाल ने बताया कि पटना वाले एक शुक्ला जी असली हिंदु निकले। एकदम हिंदुत्व के शिवाजी। शेर, सवा शेर। दुकान वाले ने मुसलमान के हाथों खाना भेजा तो लेने से इनकार कर दिया। सनातन धर्म की रक्षा के लिए भूखे सो गए। इतना ही नहीं सोए हिंदुओं को जगाने के लिए सोशल मीडिया पर इस बात का प्रचार भी खूब किया।
    प्रमोद काका असमंजस में हैं। मुसलमान के हाथों भेजा गया खाना खा लेने भर से हिंदुत्व खतरे में आ जाता है ! काका का माइंड सुन्न हुआ जा रहा है। वो तो कई बार रोज देवान के घर की बनी रोटी खा चुके हैं। छोटे थे तो रोज देवान उन्हें गोदी में खेलाया करते थे। कई बार अपने हाथों अपने घर की बनी रोटी भी खिलाई है रोज देवान ने। रोज देवान तो मुसलमान थे। प्रमोद काका का धर्म संकट बढ़ता जा रहा है। सिर्फ मुसलमान के हाथों खाना भेजने भर से हिंदु धर्म जब खतरे में आ जाता है तो फिर ये तो कई बार मुसलमान के घर की रोटी मुसलमान के ही हाथों खा चुके हैं। मतलब इनके हिस्से का हिंदुत्व तो बचा ही नहीं है। वो तो कब का मिट गया है। मतलब अब ये हिंदु नहीं रहे। काका का कनफ्यूजन बढ़ता जा रहा है। पैर लड़खड़ाने लगे। धम्म से बैठ गए महुआनी में।
    काका कोई बुद्ध तो हैं नहीं कि तपस्या करने लगते। बरसात में महुआ के पेड़ के नीचे बैठे तो चींटियों ने जहां-तहां शरीर पर रेंगना शुरू कर दिया। बदन झाड़कर उठे तो सामने वही बारी जहां से वो वर्षों से हर बरसात में मछली लाते, पकाते और खाते रहे हैं। हर साल बारी का ठेका  बाबूलाल दुसाध और हातिम अंसारी ही लेते रहते हैं। साझे का ठेका सालों से चला आ रहा है। जाल में फंसी मछलियां हातिम अंसारी निकाल-निकाल कर टोकरी में रखते जाते हैं और बाबूलाल दुसाध सब बेचने के बाद जो थोड़ा बचता है उसी में से थोड़ा प्रमोद काका को दे देते हैं। हाय! मुसलमान के हाथों पकड़ी गई मछली खाते रहे हैं प्रमोद काका। मुसलमान के घर की रोटी भी खाई है प्रमोद काका ने। एक कदम भी नहीं चल पाए कि धम्म से महुआनी में ही गिर पड़े प्रमोद काका। होश आया तो देखा कि बारी पर पुल के किनारे लेटे पड़े हैं। कई लोग उनको घेरे खड़े हैं। बाबूलाल दुसाध सिर की मालिश कर रहे हैं और हातिम अंसारी तलवों की मालिश कर रहे हैं। कोई सीने की मालिश कर रहा है कोई पानी के छींटे मार रहा है। हड़बड़ा कर उठ बैठे प्रमोद काका। थोड़ी देर में सबकुछ ठीक हो गया। बाबूलाल दुसाध ने एक किलो से भी ज्यादा मछली एक उनके गमछे में बांध दी, हातिम अंसारी ने अपनी साइकिल से प्रमोद काका को उनके घर तक पहुंचा दिया। सारा कनफ्यूजन दूर हो गया। न तो हिंदुत्व खतरे में है और ना ही हिंदु खरते में है। खतरे में है तो बस हिंदु-हिंदु जपने वाले नेताओं की कुर्सी।

Sunday, July 28, 2019

डूबता बिहार, कौन जिम्मेदार ?


समूचा उत्तर बिहार हर साल भीषण बाढ़ की चपेट में होता है। सैकड़ों लोग मरते हैं, हजारों कच्चे-पक्के मकान बह जाते हैं या फिर कटाव की वजह से गिर जाते हैं। फसलों की तबाही से लाखों किसान हर साल बर्बाद होते हैं। डूबते-उतराते उत्तर बिहार के लोगों ने इन्हीं हालातों में रचने-बसने की कला सीख ली है। डूबते-उतराते उत्तर बिहार के लोगों को ये समझा दिया गया है कि सालाना तबाही एक प्राकृतिक आपदा है। प्राकृतिक आपदा की समझ विकसित होने के बाद तबाही के गुनहगार राहत-बचाव के सालाना लूट वाले उर्स में शामिल हो जाते हैं। बिहार की इस बर्बादी की मीडिया रिपोर्टिंग भी अज्ञानता के अंधकूप में भटकती दिखती है। न तो तथ्यों की पड़ताल, ना कोई अध्ययन और ना कोई रिसर्च। मीडिया रिपोर्टिंग में बस लफ्जों की बाजीगरी और नाटकीयता का मंचन होता रहता है।

   भागलपुर में मची तबाही के लिए नेपाल और बरसात को कोस रही मीडिया रिपोर्टिंग ये बताने कि लिए काफी है कि टीवी रिपोर्टिंग मर चुकी है। राहत और बचाव की खामियों से आगे न तो रिपोर्टर सोच पा रहा है और ना ही डेस्क पर बैठे लिखाड़ी। ग़म और आंसुओं को कैसे माल बना कर बेचा जाए सारा फोकस इसी पर है। पिछले साल भी सारा फोकस इसी पर था, अगले साल भी सारा फोकस इसी पर रहेगा। बरसात भी हर साल होगी, नेपाल भी वहीं रहेगा जहां वो आज है। इसमें से कुछ भी बदलने वाला नहीं है। सरकार और मीडिया के लिए ये सबसे अच्छी स्थिति है कि बरसात हर साल आती है और पड़ोस में पहाड़ों पर बसा नेपाल है।
   भागलपुर में तबाही भी हर साल आती है। 1950 में ही वैज्ञानिक कपिल भट्टाचार्य ने ये बता दिया था कि बाढ़ से भागलपुर बर्बाद हो जाएगा। तब कपिल भट्टाचार्य को विकास विरोधी वैज्ञानिक बताया गया। तब कपिल भट्टाचार्य की रिपोर्ट पर विचार कर रही सरकार को विकास विरोधी बताया गया। ये वो दौर था जब पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर फरक्का बैराज बनाने का विचार सामने आया था। वैज्ञानिक कपिल शर्मा ने तब इसका विरोध करते हुए कहा था कि फरक्का के कारण बंगाल के मालदा, मुर्शीदाबाद के साथ बिहार के पटना, बरौनी, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया हर साल पानी में डूबेंगे। 1971 में बिहार में अब तक की सबसे बड़ी बाढ़ आई। ये वही साल है जिस साल फरक्का बैराज बन कर तैयार हुआ। फरक्का बैराज बनने का बाद गंगा नदी का बहाव अवरुद्ध हुआ और नदी में गाद बढती गई।
    गंगा बिहार के ठीक मध्य से होकर गुजरती है। यह पश्चिम में बक्सर जिले से राज्य में प्रवेश करती है और भागलपुर तक 445 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई झारखंड और फिर बंगाल में प्रवेश कर जाती है। बिहार की ज्यादातर नदियां गंगा में ही मिलती हैं और गंगा ही उनका पानी बंगाल की खाड़ी तक पहुंचाती है। फरक्का बैराज बनने से पहले गैर बरसाती मौसमों में बिहार में गंगा की औसत गहराई 12-14 मीटर हुआ करती थी जो अब मात्र 6-7 मीटर रह गई है। मतलब गाद भरने से गंगा उथली हो गई है और अब वो सोन, गंडक, बूढ़ी गंडक समेत दर्जनों नदियों का पानी ढो पाने में सक्षम नहीं है।
  2016 में जब बिहार की राजधानी पटना में गंगा की पानी घुसा और पटना और भागलपुर में तकरीबन तीन सौ लोग बाढ़ से मरे तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर फरक्का बैराज हटाने की मांग की। लेकिन तबाही को विकास समझने-समझाने वाली 1950 वाली सोच 2016 में भी मौजूद रही और फरक्का के मसले पर केंद्र सरकार ने विचार तक नहीं किया।
  अब उथली होने के साथ गंगा का स्वभाव भी बदला है। ऐसा लगता है कि बरसात के मौसम में गंगा फरक्का में जाकर ठहर जाती है अंजाम ये होता है कि ये अपनी सहायक नदियों का पानी नहीं खीच पाती है और इसक सहायक नदियां उफना जाती हैं। गंगा की सहायक धाराओं के उफनाने से पूरा उत्तर बिहार डूब जाता है।
  हैरानी है कि तबाही की इस वजह पर कोई चर्चा नहीं हो रही। न तो राज्य की विधानसभा में तबाही की मूल वजह पर कोई चर्चा होती है और ना ही लोकसभा में बिहार के सांसद मूल वजह पर कोई चर्चा कर पाते हैं। मीडिया से तो ऐसी उम्मीद ही अब नहीं की जा सकती। उम्मीद बिहार की उसी जनता से की जा सकती है जो हर साल तबाह और बर्बाद हो रही है। यही जनता एक दिन फरक्का बैराज का अंत लिखेगी।    

Wednesday, May 15, 2019

घोटाला होता रहा और जवान शहीद होते रहे !

शहादत के नाम पर वोट मांगा जाएगा लेकिन सेना को हथियार नहीं दिए जाएंगे। चुनावी गाली-गलौज के बीच शहादत और सेना के सम्मान का जिक्र भी बार-बार हो रहा है। सरकार और सरकारी तंत्र के पास शोर मचाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता बचा भी नहीं है। क्योंकि, शोर नहीं मचा तो सच्ची बातें भी सुनाई देने लगेंगी। कई सच्ची बातों को दबाने वाले इसी शोर के बीच जो हजारों ज़रूरी बातें दब गईं हैं उन्हीं में शामिल है सेना को घटिया गोला-बारूद सप्लाई करने का मामला। सेना ने 15 पेज का एक खत रक्षा मंत्रालय में तैनात रक्षा उत्पाद सचिव अजय कुमार को लिखा है। सेना ने इस खत के जरिए घटिया गोला-बारूद और युद्ध उपकरणों से हो रहे नुकसान का जिक्र किया है और मंत्रालय को चेताया भी है। सेना ने साफ लिखा है कि घटिया गोला-बारूदों और रक्षा उपकरणों के कारण जवानों की जान जा रही है। और मैं ये लिख रहा हूं कि जवानों की जान जाने पर मौजूदा केंद्र सरकार को शहादत वाली सियासत करने का मौका मिल रहा है।

   सेना की चिट्ठी से ये साफ होता है कि केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड में भारी घोटाला हो रहा है और देश को छद्म राष्ट्रवाद के नारों में उलझा कर गड़बड़झाले को दबाया जा रहा है। क्योंकि भारतीय सेना को ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के जरिए ही टैंक, तोप, एयर डिफेंस गन समेत बाकी कई रक्षा उपकरण मिलते हैं। ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के पास गोला-बारूद बनाने की 41 फैक्ट्री हैं। ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड का सालाना टर्न ओवर 19 हजार करोड़ रुपए का है। सालाना 19 हजार करोड़ टर्नओवर वाला ये बोर्ड सेना को घटिया गोला-बारूद सप्लाई कर जवानों की हत्या तो करवा ही रहा है हजारों करोड़ रुपयों का गड़बड़झाला भी कर रहा है। जवानों की शहादत पर राजनीति करने वाली सरकार इस गड़बड़झाले की जांच करवाएगी इसमें संदेह है। लेकिन शहादत वाले सियासी शोर में जो सच दब गया है वो चौकाने वाला है।
   15 पेज के अपने पेपर में सेना ने बेहद चौंकाने वाला सच सामने रखा है। इसमें बताया गया है कि 105 एमएम की इंडियन फील्ड गन, 105 एमएम लाइट फील्ड गन, 130 एमएम एमए1 मीडियम गन, 40 एमएम एल-70 एयर डिफेंस गन और टी-72, टी-90 और अर्जुन टैंक की तोपों के साथ नियमित तौर पर जो दुर्घटनाएं सामने आ रही हैं उसकी वजह घटिया गोला-बारूद हैंइतना ही नहीं करगिल फतह करने वाले बोफोर्स तोप के लिए घटिया गोला-बारूदों की सप्लाई हो रही है। सेना ने जो सबसे ज्यादा चौकाने वाली जानकारी दी है वो देश की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है। सेना ने अपनी चिट्ठी में बताया है कि घटिया गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों की सप्लाई की वजह से सेना ने लॉन्ग रेंज की कुछ फायरिंग रोक दी है।
   देश की सुरक्षा के साथ ये अब तक की सबसे बड़ी लापरवाही है। चुनावी मंचों पर नारों के लिए इस्तेमाल हो रही सेना ही ख़तरे में है। ना तो ढंग का खाना, ना वक्त पर वर्दी-जूतों के पैसे और ना ही दुश्मनों से लड़ने के लिए कारगर गोला-बारूद। क्योंकि राष्ट्रवादी नारों को जवानों की शहादत से ऊर्जा मिलती है।

Monday, May 13, 2019

नियोजित जज भी तो फैसला दे ही देंगे मी लार्ड

तो बेहद चालाकी से ट्रेड यूनियन और कर्मचारी-मजदूर आंदोलनों को खत्म कर सत्ता-समाज ने ठेका-मजदूरी की विवशता खड़ी कर ही दी। इसमें सरकार ठेकेदार होगी और विभागों का कामकाज करने वाले ठेका मजदूर। बिहार में अब स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति होगी ही नहीं। सरकार की दलील है कि स्थायी नियुक्ति होने पर सेवा-शर्त और तबादलों की समस्या बनी रहती है जिससे शिक्षण कार्य बाधित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को सही माना और स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को ही रोक दिया। स्कूल अब ठेके वाले शिक्षक चलाएंगे। सरकार की साजिश और कोर्ट के बे-सिर-पैर वाले फैसले से अधिकारी भी खुश हैं। लेकिन, वो ये नहीं सोच रहे कि कल ऐसी दलीलें उनके लिए भी कोर्ट में रखी जाएंगी क्योंकि, तबादले तो शिक्षा अधिकारी के भी होते हैं और डीएम के भी। डीएम के तबादले से भी कामकाज प्रभावित होता है। और सरकार की दलील मान लें तो फिर स्थायी कलेक्टर की ज़रूरत ही क्या है ? किसी एजेंसी को ठेका दे दीजिए वो टैक्स कलेक्ट कर लेगी। ऐसी दलीलें बाकी सरकारी पदों पर बैठे लोगों के लिए भी दी जा सकती हैं। ये दलील सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए भी दी जानी चाहिए। जरूरत ही क्या है स्थायी जजों की ? निविदा वाले जज भी तो फैसला सुना ही सकते हैं। तो फिर बेहतर यही होगा कि देश की सारी व्यवस्था ठेके पर दे दी जाए। ठेका एजेंसी ठीक से काम ना करे तो फिर दूसरी एजेंसी को काम दे दिया जाए। ऐसी व्यवस्था हो कि राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता करे और राष्ट्रपति देश चलाने की जिम्मेदारी किसी एजेंसी को दे दें। एजेंसी ठीक से काम करे तो फिर उसी को मौका दिया करें और अगर ठीक से काम ना करे तो निविदा के जरिए दूसरी एजेंसी को देश सौंप दिया जाए। जब सबकुछ ठेके पर चल सकता है तो फिर देश भी ठेके पर चल सकता है। इसकी शुरुआत स्कूलों से हो ही गई है अब सुप्रीम कोर्ट के जजों की स्थायी नियुक्ति रद्द कर उन्हीं जजों को निविदा पर तैनात कर इस मुहिम को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...