Thursday, October 26, 2017

प्रधानमंत्री के नाम दूसरा खुला पत्र

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
आदरणीय इसलिए क्योंकि आप देश के प्रधान मंत्री हैं। पूरे देश में आज डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जा रहा है और मैं आपको दूसरा खुला पत्र लिख रहा हूं।
      प्रधानमंत्री जी, 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान आपने जो घोषणापत्र जारी किया था उनमें किए गए कुछ वादों की याद मैंने अपने पहले खुले पत्र के जरिए दिलाई थी। बाकी बचे कुछ और वादों की याद दिलाने के लिए दूसरा खुला पत्र लिख रहा हूं।
           प्रधानमंत्री जी, आपने घोषणा पत्र में देश से वादा किया था कि सरकार बनने के बाद महिलाओं के लिए विधान सभाओं और संसद में 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करेंगे। सर, अब तो आपकी सरकार बने चार साल हो गए उस वादे का क्या हुआ बस ये पूछना था।
   आप अगर भूले न हों तो आपको ये भी याद होगा कि आपने घोषणा पत्र में कहा था कि पुलिस स्टेशनों को महिलाओं के अनुकूल बनाया जाएगा और बड़ी तादाद में महिला सिपाही और अधिकारी बहाल किए जाएंगे।
  सर, बस इतना बता दीजिए कि बड़ी तादाद में नियुक्त हुई ये महिला पुलिस अधिकारी किन थानों में तैनात हैं और बड़ी तादाद में नियुक्त हुई महिला सिपाही आजकल कहां ड्यूटी पर लगाई गईं हैं ? या फिर ये वादा भी जुमला ही था ?
           सर, आपने तब ये भी कहा था कि महिलाओं के विशेष हुनर प्रशिक्षण के लिए कारोबारी प्रशिक्षण पार्क बनवाएंगे। सर बहुत मन हो रहा हो वो वाला पार्क देखने का। मन हो रहा है कि अपने गांव-टोले की महिलाओं को भी वो वाला पार्क दिखा आऊं। बस आप उस पार्क का पता बता दीजिए। देश को भी तो पता चले कि आपने कारोबारी प्रशिक्षण पार्क का नायाब प्रयोग दुनिया के सामने रखा है। या ये भी जुमला ही निकला सर ?
                    सर, महंगाई के खिलाफ जब आपने नारा दिया तो मेरा मन गार्डेन-गार्डेन हो गया था। ऐसा लगा था कि अब हर ख्वाहिश अपनी जेब में। महंगाई का क्या हुआ ये तो आपको पता ही है। लेकिन तब जो वादा आपने किया था उसका क्या हुआ ये पता नहीं चला। आपने कहा था दाम न बढ़ें इसके लिए अलग से कोष की व्यवस्था करेंगे। जमाखोरी, कालाबाजारी रोकने के लिए विशेष अदालतें बनाएंगे।
   सर, अब तक ना उस कोष का पता चला जिससे महंगाई रुकनी थी और ना ही वो अदालतें मिलीं जिनसे कालाबाजारी और जमाखोरी रुकनी थी। मतलब ये वादे भी.....
   सर, ये दूसरा खुला पत्र है। पहले पत्र का जवाब तो अब तक नहीं आया। उम्मीद है कि दूसरे पत्र का जवाब आएगा। नहीं भी आया तो मैं निराश होने वाला नहीं हूं। आप बार-बार कहते हैं कि देश को निराश नहीं होना चाहिए। लिहाजा मैं बिना किसी निराशा के तीसरा खुला पत्र भी लिखूंगा। मैं जानता हूं कि आप दिन-रात देश के लिए काम करते रहते हैं, यात्राएं करते रहते हैं। उम्मीद है बचे हुए इन चंद महीनों में ही आप वो तमाम वादे पूरे कर लेंगे जिनके लिए आपने देश से 60 महीने मांगे थे।


आपके देश का नागरिक
असित नाथ तिवारी


Friday, October 20, 2017

प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र


आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
आदरणीय इसलिए क्योंकि आप देश के प्रधानमंत्री हैं। आपने शायद गौर नहीं किया होगा कि आजकल सोशल मीडिया पर खुला पत्र लिखा जाने लगा है। पहले पंप्लेट के रूप में ये खुले पत्र मिला करते थे। तब से लेकर अब तक मैंने कभी किसी के नाम खुला पत्र नहीं लिखा। पहली बार आपके नाम खुला पत्र लिख रहा हूं। इस लिहाज से आप देश के वैसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिनके नाम मैंने खुला पत्र लिखा। मैंने ये लाइन इसलिए लिखी क्योंकि मुझे बताया गया है कि आप ‘देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री’ वाली लाइन से खुश होते हैं। हलांकि मुझे इस बात पर विश्वास नहीं कि आप इस लाइन से खुश होते होंगे। खैर जो भी होता हो मैं तो आपकी खुशी की कामना करता हूं। इतनी भूमिका के बाद सीधे उन मुद्दों पर आता हूं जिनके लिए ये खुला पत्र लिख रहा हूं।
प्रधानमंत्री जी, आपको याद होगा कि 2014 के आम चुनाव के दौरान डॉ मुरली मनोहर जोशी द्वारा बनाए गए घोषणा पत्र में वो तमाम संशोधन किए गए जो आप और आपके सलाहकार चाहते थे। जब सबकुछ आपके हिसाब से हो गया तब आपने और आपकी टीम ने चुनाव घोषणा पत्र 2014 जारी किया। मैं उसी घोषणा पत्र और उन्हीं घोषणाओं को याद दिलाना चाहता हूं। देश के सामान्य नागरिक के तौर पर ये मेरी जिम्मेदारी भी है कि मैं लोकतांत्रिक सरकार को, जनता के नुमाइंदों को उनके वादे याद दिलाऊं।
प्रधानमंत्री जी, आपकी पार्टी के घोषणा पत्र में, जिसे आपने ही जारी किया था लिखा गया है कि 100 नए शहर बसाएंगे। आपकी सरकार गठन के तकरीबन चार साल होने को हैं और आपने देश से इन कामों के लिए महज 60 महीने मांगे थे जो अगले साल पूरे हो जाएंगे। मैं बस ये जानना चाहता हूं कि नए बसने वाले 100 शहरों में अभी तक कुल कितने शहर बसा लिए गए और उन्हें कहां बसाया गया है ? और बाकी बचे नए शहर क्या अगले एक साल बसा लिए जाएंगे ?
आपने कहा था कि देश के 100 सबसे पिछड़े जिलों को विकसित करके उन्हें अन्य विकसित जिलों के समकक्ष बनाएंगे।
प्रधानमंत्री जी, वो कौन-कौन से जिले हैं जिन्हें विकसित कर लिया गया और कितने जिले बाकी बचे हैं जिन्हें अगले एक साल में आपकी सरकार विकसित कर देगी ?
आपने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि देश भर के गांवों के विकास के लिए ग्रामीण हाट का जाल बिछाएंगे।
सर, देश का नागरिक होने के नाते मैं जानना चाहता हूं कि अब तक देश के कितने गांवों में ग्रामीण हाट का जाल बिछाया गया है ? मेरे गांव और आस-पास के किसी गांव में मुझे ऐसा कोई जाल दिखा नहीं इसलिए ये सवाल पूछ रहा हूं।
प्रधानमंत्री जी, आपने कहा था कि एक व्यापक राष्ट्रीय ऊर्जा नीति बनाएंगे। वो ऊर्जा नीति बन गई क्या ? उस नीति के बनने से देश को क्या मिला ये भी बताते तो अच्छा होता।
प्रधानमंत्री जी, आपने कहा था कि राष्ट्रीय वाई-फाई नेटवर्क खड़ा करेंगे। सर, मुझे तो मोबाइल नेटवर्क ही गिरे-पड़े मिल रहे हैं। ये वाई-फाई वाले खड़े नेटवर्क कहीं मिल नहीं रहे।
प्रधानमंत्री जी, आपने कहा था कृषि उत्पाद वितरण के लिए रेल नेटवर्क बनाएंगे। सर, वो वाला नेटवर्क तो आज तक नहीं मिला बदले में पहले से जो रेल नेटवर्क है वो यमदूतों का काम ज़रूर करने लगा है।
प्रधानमंत्री जी, आपने कहा था कि हर घर को नल के जरिए पानी देंगे। वो नल भी नहीं दिख रहे हैं सर।
ये पहला पत्र है इसलिए बहुत सारी बातें लिखना उचित नहीं लगा। आगे भी आपको पत्र लिखता रहूंगा। मैं जानता हूं कि आप पर काम का बहुत बोझ है। आपको जानने का दावा करने वाले बताते हैं कि आप 16 से 18 घंटे काम करते हैं। जाहिर है काम के इतने दबाव में बहुत सारी बातें याद रखना संभव नहीं होता। इसलिए मैं वक्त-वक्त पर आपको याद दिलाता रहूंगा कि आपने क्या-क्या वादे किए थे। मुझे याद है कि आपने देश से ये तमाम वादे पूरे करने के लिए 60 महीने ही मांगे थे। अब 60 महीने पूरे होने में काफी कम वक्त बचा है। उम्मीद है आप इस बचे वक्त में ही 16-18 घंटे रोज़ाना काम कर के अपने तमाम वादे पूरे करेंगे।
जल्दी ही दूसरा पत्र भी लिखूंगा।
आपके देश का नागरिक
असित नाथ तिवारी

Thursday, October 5, 2017

अमर अपमानित प्रेम

मर नहीं जाता है अपमानित प्रेम
बंट जाता है या फिर कर देता है विद्रोह
बंट जाता है कइयों के बीच
और उस बंटवारे में बचा रहता है
थोड़ा हिस्सा उसका भी 
जिसने अपमानित किया होता है
कभी भी नहीं मरने वाले प्रेम को
या फिर जब वो करता है विद्रोह
तो खुद को लुटाने लगता है
कभी आवारा बादलों की तरह
कभी बेलौस नदियों की तरह
लुटाता है, लुट जाता है
इन दोनों के बीच वो हमेशा शामिल रखता है
उसको, जिसने अपमानित किया होता है
कभी भी नहीं मरने वाले प्रेम को

Monday, September 25, 2017

तेरे जाने के बाद

भरे हुए समंदर सा खालीपन महसूस होता है
जब मुट्ठी से सरक जाती है वक्त की रेत
आंखों के कोरों पर जब दिखता है समंदर
ठीक तब ही गहरी आंखों में दिखता है खालीपन
और जहां खारा होता है समंदर
वहीं पुतलियों पर जम जाती है रेत
और फिर दूर किनारों पर दिखती है तुम्हारी छाया
जैसे दूर कहीं बोलती हो कोयल
या फिर आसमान के एक कोने में हो शुकवा तारा
और फिर वहां तक पहुंचने के लिए
हृदय की उत्ताल लहरें बनतीं हैं ज्वार
लेकिन बिखर जातीं हैं
तुम्हारी बेरुखी के किनारों से टकराकर
ग़ायब हो जातीं हैं ठीक वैसे ही
जैसे आख़िरी बार चमकने के बाद
ग़ायब हो जाता है पुच्छल तारा
फिर एकाएक मोबाइल फोन पर बजने लगता है फिल्मी गाना
'तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही'
गाने के हर एक बोल के साथ गहरा होता जाता है समंदर का खालीपन
भरे मन से एक बार फिर तटों से टकराती हैं हृदय की लहरें
एक बार फिर बिखरता है पुच्छल तारा
.....असित नाथ तिवारी....
S

Sunday, September 17, 2017

इजाजत मांगती है

मोहब्बत फिर इजाजत चाहती है
रवायत से बग़ावत चाहती है
मेरा दिल जो तेरे पहलू में है
उस दिल की हिफाजत चाहती है
हज़ारों ख्वाहिशों को बज्म में पैबंद कर लूंगा
हज़ारों चाहतें अपनी नजरबंद कर लूंगा
तेरी आंखों के समंदर में खुदकुशी कर लूं
ऐसी ही कोई रवायत चाहती है
मोहब्बत फिर इजाजत चाहती है
....असित नाथ तिवारी....

Saturday, July 29, 2017

मक्कार हरिश्चंद्र

जो व्यापमं के घपलेबाज हैं हरिश्चंद्र हैं
देखो चावल घोटाले वाले हरिश्चंद्र हैं
पनामा के टैक्स चोर सब हरिश्चंद्र हैं
चोर-चोर, घपलेबाज सब हरिश्चंद्र हैं
राष्ट्रवाद के ठेकेदार हैं, हरिश्चंद्र हैं
बीसों फर्जी फर्म वाले हरिश्चंद्र हैं
फर्जी डिग्रीधारी सारे हरिश्चंद्र हैं
झूठे और मक्कार आज के हरिश्चंद्र हैं
धर्म ठेकेदार आज के हरिश्चंद्र हैं



Wednesday, July 26, 2017

इस दौर में

इस दौर का सवाल है
बिजली, पानी, रोजगार कहां हैं ?
जवाबदेहों का जवाब है
औरंगजेब अत्याचारी था
हम पूछ रहे हैं
स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाने वालों की कमी क्यों ?
वो बता रहे हैं
बाबर आक्रांता था
वो गूंजते सवालों को टाल रहे हैं
हम टलते सवालों को उठा रहे हैं
उनके टालने का अंदाज
हमारे सवालों को धारदार बना रहा है

ये बजट अहम है क्योंकि हालात बद्तर हैं

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...