Tuesday, December 6, 2016
Friday, December 2, 2016
सबकुछ स्वाहा
अबकी बिछड़े तो शायद
ही मिल पाएंगे
ये जीवन है व्यापार
नहीं
इस पार नहीं, उस पार
नहीं
जो डूब गया वो डूब
गया
फिर धार नहीं,
मंझधार नहीं
फिर यादों के
कोनों-कोनों में
हम आएंगे और जाएंगे
अबकी बिछड़े तो शायद
ही मिल पाएंगे ।
जो छोटी-छोटी बातों
की गंठरी से गांठ बना बैठे
कुछ निज स्वारथ के
चक्कर में फिरते हैं ऐंठे-ऐंठे
कुछ अहंकार का चक्कर
है, कुछ मूढ़ मति का दुष्प्रभाव
कुछ खुशफहमी ने मारा
तो कुछ समझ फेर का है प्रभाव
यूं तो तिरते-तिरते
एक दिन सब रेत फिसल जाएंगे
अबकी बिछड़े तो शायद
ही मिल पाएंगे ।
अबकी का बिछड़ना अलग
राह पर चलना होगा
मंजिलें अलग होंगी,
करवां बदलना होगा
फिर न कोई सिरा
होगा, न छोर मिलेगा कोई
फिर न कोई ख़बर होगी
न ओर मिलेगा कोई
अबकी फासले हमारे इस
कदर बढ़ जाएंगे
अबकी बिछड़े तो शायद
ही मिल पाएंगे ।
.....असित नाथ तिवारी....Wednesday, November 16, 2016
ये रुदन काल है
ये रुदन काल है....
जिस जम्हूरियत में प्रश्नकाल से हुकूमत को परेशानी महसूस होती है..वहां रुदनकाल ही आता है...तो ये रुदनकाल है....इस काल में रोना पड़ता है...राजा को भी, रियाया को भी...रियाया का रोना तबतक रोना भर रहता है जबतक कि इससे हुकूमत की ज़मीन पर असर न हो....लेकिन जैसे ही हुकूमत की ज़मीन गिली होने लगती है...हुक्काम को सिंहासन के धंसने का ख़तरा महसूस होने लगता है...और फिर हुक्काम भी रोने लगता है..वो रोता है... इसलिए रोता है कि जनता खुद रो-धोकर ग़म पी लेना अपना नसीब समझती है..लेकिन वो अपने राजा को रोता नहीं देख सकती... सो राजा के रोते ही जनता भकुआ जाती है...राजा के जयकारे लगते हैं...और धंसते सिंहासन को जनता का सहारा मिल जाता है....तो ये रुदन काल है... मंचों पर बादशाह सलामत की आंखों से बूंदें टपक रहीं हैं...
दिल्ली वाले सुल्तान रो रहे हैं...लखनऊ वाले उस्ताद रो रहे हैं...रो रहे हैं....क्योंकि ये रुदन काल है...इस काल में रोना अपनी कमियों को छुपाने का सबसे बेहतर हथियार है....इस काल में रोना भावुक जनता को भरमाने का सबसे बेहतर औजार है...ये रुदन काल है
इस काल में रोना पड़ता है....वो मां-बाप रो रहे हैं जिनके बच्चों की शादियां हजार-पांच सौ के नोट की चोट से जख्मी हो गईं.....वो बच्चा रो रहा है जिसकी मां हजार-पांच सौ के नोट की चोट से इलाज बिना अस्पताल में दम तोड़ गई...कोई एटीएम की लाइन में रो रहा है, कोई बैंक के बाहर रो रहा है...कोई बच्चे के दूध के लिए रो रहा है...कोई भक्क सफेद कुर्ते के नीचे दबाए गए काले धन के लिए रो रहा है...ये रुदन काल है।
जिस जम्हूरियत में प्रश्नकाल से हुकूमत को परेशानी महसूस होती है..वहां रुदनकाल ही आता है...तो ये रुदनकाल है....इस काल में रोना पड़ता है...राजा को भी, रियाया को भी...रियाया का रोना तबतक रोना भर रहता है जबतक कि इससे हुकूमत की ज़मीन पर असर न हो....लेकिन जैसे ही हुकूमत की ज़मीन गिली होने लगती है...हुक्काम को सिंहासन के धंसने का ख़तरा महसूस होने लगता है...और फिर हुक्काम भी रोने लगता है..वो रोता है... इसलिए रोता है कि जनता खुद रो-धोकर ग़म पी लेना अपना नसीब समझती है..लेकिन वो अपने राजा को रोता नहीं देख सकती... सो राजा के रोते ही जनता भकुआ जाती है...राजा के जयकारे लगते हैं...और धंसते सिंहासन को जनता का सहारा मिल जाता है....तो ये रुदन काल है... मंचों पर बादशाह सलामत की आंखों से बूंदें टपक रहीं हैं...
दिल्ली वाले सुल्तान रो रहे हैं...लखनऊ वाले उस्ताद रो रहे हैं...रो रहे हैं....क्योंकि ये रुदन काल है...इस काल में रोना अपनी कमियों को छुपाने का सबसे बेहतर हथियार है....इस काल में रोना भावुक जनता को भरमाने का सबसे बेहतर औजार है...ये रुदन काल है
इस काल में रोना पड़ता है....वो मां-बाप रो रहे हैं जिनके बच्चों की शादियां हजार-पांच सौ के नोट की चोट से जख्मी हो गईं.....वो बच्चा रो रहा है जिसकी मां हजार-पांच सौ के नोट की चोट से इलाज बिना अस्पताल में दम तोड़ गई...कोई एटीएम की लाइन में रो रहा है, कोई बैंक के बाहर रो रहा है...कोई बच्चे के दूध के लिए रो रहा है...कोई भक्क सफेद कुर्ते के नीचे दबाए गए काले धन के लिए रो रहा है...ये रुदन काल है।
Saturday, October 29, 2016
शास्त्रों से संघ की जंग !
अब शास्त्रों और बीजेपी के खिलाफ होगी संघ परिवार की जंग...
2014 में अन्ना आंदोलन से पैदा हुए माहौल को घर-घर तक पहुंचाने वाले संघ के जिन स्वयं सेवको ने मोदी-मोदी के नारे गढ़े संभव है वही 2019 में मोदी के खिलाफ नारे गढ़ने आपके दरवाज़े पर पहुंचें। ख़बर आपको हैरान करने वाली है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तैयारी इससे आगे की है। संघ ने सिर्फ अपना हाफ पैंट नहीं छोड़ा है, हाफ पैंट के साथ घिसी-पिटी पुरातनपंथी सोच को भी छोड़ने की तैयारी कर ली है। वेद-शास्त्रों के हर्फ-हर्फ को अपना जीवन कहने वाला संघ अब वेद-शास्त्रों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जुटाने लगा है। संघ परिवार ने पानी, मंदिर और श्मशान आंदोलन शुरू करने की योजना बनाई है। संघ परिवार ने साफ कर दिया है कि पानी को लेकर जो जाति विभेद करने वाले शास्त्र हैं उन्हें वो नहीं मानेगा, संघ अब उन शास्त्रों को नहीं मानेगा जो ऊंच-नीच की बात करते हैं। इससे आगे बढ़ते हुए संघ परिवार ने गांव-गांव श्मशान आंदोलन चलाने की तैयारी की है। गांव-गांव अलग-अलग जाति-वर्ग के लोगों के श्मशान हैं। संघ परिवार अब एक ही श्मशान में सवर्ण, पिछड़ा वर्ग और दलित के दाह संस्कार के लिए मुहिम चलाने की तैयारी में है। इतना ही नहीं मुसलमानों के बीच पकड़ मजबूत करने के लिए संघ परिवार ने बड़ी रणनीति बनाई है। ये रणनीति राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबी है और इसी चाशनी में संघी मुस्लिम तैयार किए जाएंगे। फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खुद को एक ग़ैर राजनैतिक संगठन के केंचुल से बाहर निकालने की मुहिम चलाएगा और संभव है की राष्ट्रीय स्वयं संघ नाम से ही सियासी दल चुनावी मैदान में हो और फिर अपने सियासी मकसद के लिए उसे बीजेपी की बिसात पर उलझना नहीं पड़ेगा।
2014 में अन्ना आंदोलन से पैदा हुए माहौल को घर-घर तक पहुंचाने वाले संघ के जिन स्वयं सेवको ने मोदी-मोदी के नारे गढ़े संभव है वही 2019 में मोदी के खिलाफ नारे गढ़ने आपके दरवाज़े पर पहुंचें। ख़बर आपको हैरान करने वाली है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तैयारी इससे आगे की है। संघ ने सिर्फ अपना हाफ पैंट नहीं छोड़ा है, हाफ पैंट के साथ घिसी-पिटी पुरातनपंथी सोच को भी छोड़ने की तैयारी कर ली है। वेद-शास्त्रों के हर्फ-हर्फ को अपना जीवन कहने वाला संघ अब वेद-शास्त्रों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जुटाने लगा है। संघ परिवार ने पानी, मंदिर और श्मशान आंदोलन शुरू करने की योजना बनाई है। संघ परिवार ने साफ कर दिया है कि पानी को लेकर जो जाति विभेद करने वाले शास्त्र हैं उन्हें वो नहीं मानेगा, संघ अब उन शास्त्रों को नहीं मानेगा जो ऊंच-नीच की बात करते हैं। इससे आगे बढ़ते हुए संघ परिवार ने गांव-गांव श्मशान आंदोलन चलाने की तैयारी की है। गांव-गांव अलग-अलग जाति-वर्ग के लोगों के श्मशान हैं। संघ परिवार अब एक ही श्मशान में सवर्ण, पिछड़ा वर्ग और दलित के दाह संस्कार के लिए मुहिम चलाने की तैयारी में है। इतना ही नहीं मुसलमानों के बीच पकड़ मजबूत करने के लिए संघ परिवार ने बड़ी रणनीति बनाई है। ये रणनीति राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबी है और इसी चाशनी में संघी मुस्लिम तैयार किए जाएंगे। फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खुद को एक ग़ैर राजनैतिक संगठन के केंचुल से बाहर निकालने की मुहिम चलाएगा और संभव है की राष्ट्रीय स्वयं संघ नाम से ही सियासी दल चुनावी मैदान में हो और फिर अपने सियासी मकसद के लिए उसे बीजेपी की बिसात पर उलझना नहीं पड़ेगा।
Saturday, October 22, 2016
बायना बांटे ला बेटी मांगी ले...
बायना बांटे ला बेटी मांगी ले.....
बेटी मांगी ले...छठ पर्व के इस पक्ष की
चर्चा उतनी नहीं होती जितनी बाक़ी पक्षों की होती है। भारत जैसे देश में जहां
भ्रूण हत्या बेहद आम है, जहां ज्यादातर परिवारों में आज भी बेटी की परवरिश में
उपेक्षा साफ दिखती है, जहां बेटियों की संख्या लगातार कम हो रही है..वहां एक समाज
ऐसा भी है जो चार दिनों के महान व्रत के दौरान सूर्य से बेटी मांगता है। छठ पूजा
के दैरान गाए जाने वाले गीतों की गहराई में उतरना जरुरी है।
इन्हीं गीतों से सूर्य की आराधना होती है और इन्हीं गीतों में गाया जाता ‘बायना बांटे ला बेटी मांगी ले कि सुन्दर पंडित दामाद’। मतलब हे भगवान सूर्य भागवान हम आपसे बेटी की मांग कर रहे हैं ताकि हम अपने दरवाजे पर बारात बुलाकर (बायना बांटे ला) उसका सम्मान कर सकें। इसी के साथ सुंदर और समझदार दामाद भी मांगा जाता है। जिस देश में बेटे की ख्वाहिश लिए लोग न जाने कितने मंदिर, मजार, तांत्रिक के चक्कर लगाते हैं, कितनी बेटियों की बलि दे देते हैं उसी देश में चार दिनों की उपासना के दौरान बेटी मांगी जाती है। दरअसल बिहारी समाज अपनी संस्कृति में बेटा और बेटी दोनों को बेहद जरुरी मानता है। हालांकी सामाजिक विकृतियों ने यहां भी बेटियों को दोयम दर्जे तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बावजूद इसके ये समाज कन्यादान के बिना खुद को ऋणमुक्त नहीं मानता। कन्यादान के लिए बेटी का होना ज़रुरी है। यहां बेटा अगर घर का गौरव है तो बेटी घर की शोभा और दामाद घर का सम्मान। शादी-विवाह से लेकर ज्यादातर धार्मिक कार्यों में बेटियों, बहनों और बहुओं की महत्वपूर्ण भूमिका वाला ये समाज बेटी के बिना घर को अधूरा समझता है। छठ पर्व में समाहित इस महान धारणा के महत्व को उजागर किए बिना छठ पर्व को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। यहां कुआंरे आंगन की धारणा है। माना जाता है कि जिस आंगन में बेटी की शादी के फेरे नहीं हुए वो आंगन कुआंरा होता है और कुआंरा आंगन शुभ नहीं हो सकता। भाई के घर शुभ आयोजनों में बहन से जुड़ीं रस्में नहीं हुईं तो वो रस्में अधूरी रह जाती हैं। छठ पर्व का ये पक्ष उस तरह से उजागर नहीं किया गया जिस तरह से इसे करना चाहिए था। आंशिक ही सही लेकिन ये पर्व बेटियों को समर्पित है। छठ पर्व का ये पक्ष भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बीमारी का कुछ तो इलाज कर ही सकता है। बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव को कुछ तो कम कर ही सकता है। छठ को बस बिहारी समाज का मत समझिए, छठ एक बड़ी कुरीति के खिलाफ जंग है, एक बुराई के खिलाफ लड़ाई है, छठ हमारी अस्मिता की पूजा है।
इन्हीं गीतों से सूर्य की आराधना होती है और इन्हीं गीतों में गाया जाता ‘बायना बांटे ला बेटी मांगी ले कि सुन्दर पंडित दामाद’। मतलब हे भगवान सूर्य भागवान हम आपसे बेटी की मांग कर रहे हैं ताकि हम अपने दरवाजे पर बारात बुलाकर (बायना बांटे ला) उसका सम्मान कर सकें। इसी के साथ सुंदर और समझदार दामाद भी मांगा जाता है। जिस देश में बेटे की ख्वाहिश लिए लोग न जाने कितने मंदिर, मजार, तांत्रिक के चक्कर लगाते हैं, कितनी बेटियों की बलि दे देते हैं उसी देश में चार दिनों की उपासना के दौरान बेटी मांगी जाती है। दरअसल बिहारी समाज अपनी संस्कृति में बेटा और बेटी दोनों को बेहद जरुरी मानता है। हालांकी सामाजिक विकृतियों ने यहां भी बेटियों को दोयम दर्जे तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बावजूद इसके ये समाज कन्यादान के बिना खुद को ऋणमुक्त नहीं मानता। कन्यादान के लिए बेटी का होना ज़रुरी है। यहां बेटा अगर घर का गौरव है तो बेटी घर की शोभा और दामाद घर का सम्मान। शादी-विवाह से लेकर ज्यादातर धार्मिक कार्यों में बेटियों, बहनों और बहुओं की महत्वपूर्ण भूमिका वाला ये समाज बेटी के बिना घर को अधूरा समझता है। छठ पर्व में समाहित इस महान धारणा के महत्व को उजागर किए बिना छठ पर्व को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। यहां कुआंरे आंगन की धारणा है। माना जाता है कि जिस आंगन में बेटी की शादी के फेरे नहीं हुए वो आंगन कुआंरा होता है और कुआंरा आंगन शुभ नहीं हो सकता। भाई के घर शुभ आयोजनों में बहन से जुड़ीं रस्में नहीं हुईं तो वो रस्में अधूरी रह जाती हैं। छठ पर्व का ये पक्ष उस तरह से उजागर नहीं किया गया जिस तरह से इसे करना चाहिए था। आंशिक ही सही लेकिन ये पर्व बेटियों को समर्पित है। छठ पर्व का ये पक्ष भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बीमारी का कुछ तो इलाज कर ही सकता है। बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव को कुछ तो कम कर ही सकता है। छठ को बस बिहारी समाज का मत समझिए, छठ एक बड़ी कुरीति के खिलाफ जंग है, एक बुराई के खिलाफ लड़ाई है, छठ हमारी अस्मिता की पूजा है।
Wednesday, October 12, 2016
सावधान ....आगे अंधा मोड़ है
जिस देश ने अपने 19 जवानों को ज़िंदा जलते देखा है वो जवाब तो मांगेगा
सावधान ....आगे अंधा मोड़ है
कस्तूरी जब असली हो तो गवाही के लिए साथ में हिरण लेकर घूमने की जरुरत नहीं होती। ये कहावत बेहद पुरानी है और मौजूदा दौर के लिए मौजू भी। राष्ट्रवाद अगर असली होता तो उसके लिए चीखने की ज़रुरत शायद नहीं पड़ती। असली राष्ट्रवाद या देशप्रेम कर्मों से परिलक्षित होता है नारों से नहीं। मौजूदा दौर में मैं देश की बड़ी आबादी को भावनाओं की लहरों पर बहता देख रहा हूं। ये लहर उस आबादी को कहां पहुंचाएगी उसे नहीं मालूम लेकिन जिस दिन किनारे लागाएगी वहां से रास्ता नहीं सूझेगा। देश भावुक हुआ जा रहा है। जवानों की शहादत पर सबको गर्व होना चाहिए। लेकिन क्या हम सिर्फ शहादत पर गर्व करते रहेंगे ? क्या हमारे देशप्रेम को प्रमाणित करने के लिए हमारे जवानों को मरते रहना होगा ? वो मरते रहें और हम उनकी शहादत को लक्षणा-व्यंजना के साथ परोस कर देशभक्त होते रहें ? हमारी सेना महान है, हमारी सेना हमारा गौरव है लिहाजा हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम इस गौरव को बचाए रखें। हम भावुक हुए जा रहे हैं यही ग़लत है। क्या ये चिंता की बात नहीं है कि दो-चार लोग हमारी सेना की कैंप में घुस जाते हैं और हमारे कई जवानों की हत्या कर देते हैं ? घर में घुसकर मारना इसे ही तो कहते हैं। बार-बार पाकिस्तानी सेना (जिसे हमारे यहां आतंकी कहा जाता है) हमारे घर में घुसकर हमें मार रही है और हम भावनाओं की लहरों पर हिचकोले खा रहे हैं। क्या हमें हमारी सेना से ये नहीं पूछना चाहिए कि बताइए आप क्या कर रहे थे पठानकोट में ? पाकिस्तान से आए आतंकी, हाथों में हथियार लहराते पहले एयरबेस तक पहुंचते हैं, फिर आराम से एयरबेस में दाखिल होते हैं, फिर जब वो आपके किचेन में घुसकर आपको मारने लगते हैं तब आपको पता चलता है कि आतंकी हमला हुआ है। क्या हमें ये सवाल नहीं उठाना चाहिए कि कैंप की सुरक्षा में इतनी बड़ी लापरवाही क्यों बरती गई ? किचेन और बेडरूम तक पाकिस्तानी आतंकवादी पहुंचने लगे हैं और हम भावनाओं के ज्वार पर सवार हुए जा रहे हैं।
उरी हमले के बाद तो सवाल और गंभीर होने चाहिए। 19 जवान ज़िंदा जला दिए गए। कहा गया कि रात के अंधेरे में हमला हुआ, जवान सो रहे थे। जो लोग ये तर्क दे रहे हैं उनसे मेरा सवाल है कि क्या हमने ये मान लिया है कि दुश्मन देश पाकिस्तान सिर्फ दिन में हमले करेगा इसलिए हमारी देश की सेना रातों में देश की सुरक्षा तो छोड़िए अपने कैंप की सुरक्षा के लिए भी सतर्क नहीं रहती ? तो क्या ये मान लिया जाए कि अगर रात में हमला हुआ तो फिर हमारे सामने ज़िंदा जलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होगा ? हमें अपनी सेना पर गर्व होना चाहिए लेकिन अगर कहीं चूक हो रही है तो हमें सवाल भी तो उठाने चाहिए।
सवाल तो सर्जिकल स्ट्राइक के दावे पर भी खड़े हो रहे हैं। लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार है कि वो अपनी सरकार से सवाल पूछे और अगर सरकार लोकतांत्रित मूल्यों का सम्मान करने वाली हो तो जवाब भी देती है। कुछ लोग इन सवालों को राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह के खांचे में धकेल रहे हैं। उनसे मेरा सवाल है कि क्या सरकार के दावे ही राष्ट्रवाद हैं ? तो फिर क्यों नहीं मान लिया जाता कि हमने ग़रीबी, बेरोज़गोरी, भुखमरी, अशिक्षा बगैरह पर काबू लिया है। सरकारें तो ये दावे करती ही रही हैं। क्योंकर मीडिया के लोग इन दावों की पोल खोलने लगते हैं ? राष्ट्रवादी होइए और मान लीजिए कि सारी समस्याएं खत्म हो चुकी हैं। तो क्या ये मान कर अपनी हालत पर संतोष कर लिया जाए कि सरकार ही आखिरी सच है, सरकार ही राष्ट्र और सरकार की कही हर बात सिर झुका कर स्वीकार कर लेना ही राष्ट्रवाद है ? जिस देश ने अपने 19 जवानों को ज़िदा जलते हुए देखा है अगर वो देश अपनी सरकार से उसका जवाब नहीं पूछेगा तो क्या वो देश ज़िंदा माना जाएगा ? कहा जा रहा है कि डीजीएमओ ने खुद कहा कि कार्रवाई हुई है। अच्छी बात है, हमें अपने अधिकारियों पर भरोसा करना चाहिए । जब किसी जिले का डीएम कहता है कि बाढ़ से बड़ा नुकसान नहीं हुआ है तब हम न जाने कहां-कहां से नुकसान की तस्वीरें, रोती महिलाओं के आंसू, सिसकियां खोज लाते हैं और फिर जिला प्रशासन और सरकार पर सर्जिकल स्ट्राइक से भी ज्यादा घातक हमला कर देते हैं। तब तो हम अपने अधिकारी पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं करते। हम ज़मीनी हक़ीक़त की पड़ताल करते हैं, ये हमारा काम है, हमारी जिम्मेदारी है, हमें करना चाहिए सो हम करते हैं। तो क्या सर्जिकल स्ट्राइक के दावों की पड़ताल नहीं होनी चाहिए ? सेना के किसी अधिकारी के दावे के बाद देश चुप हो जाए ? तो कल जब कोई सेना का अधिकारी ये कह दे कि भाई ये जो चुनी हुई सरकार है यही पाकिस्तान से मिली हुई है। तो क्या हम मान लेंगे ? कल को वही डीजीएमओ साहब यह कह दें कि देखिए हम सीने पर गोलियां खा रहे हैं और पीएम साहब पाकिस्तान में जाकर बिरयानी खा रहे हैं, जब तक हम इन्हें नहीं हटाएंगे तब तक पाकिस्तान पर कब्जा नहीं होगा। तब क्या हम सेना को लोकतंत्र की हत्या करने की आज़ादी दे देंगे ? इतना भावुक मत होइए। आगे अंधा मोड़ है।
सावधान ....आगे अंधा मोड़ है
कस्तूरी जब असली हो तो गवाही के लिए साथ में हिरण लेकर घूमने की जरुरत नहीं होती। ये कहावत बेहद पुरानी है और मौजूदा दौर के लिए मौजू भी। राष्ट्रवाद अगर असली होता तो उसके लिए चीखने की ज़रुरत शायद नहीं पड़ती। असली राष्ट्रवाद या देशप्रेम कर्मों से परिलक्षित होता है नारों से नहीं। मौजूदा दौर में मैं देश की बड़ी आबादी को भावनाओं की लहरों पर बहता देख रहा हूं। ये लहर उस आबादी को कहां पहुंचाएगी उसे नहीं मालूम लेकिन जिस दिन किनारे लागाएगी वहां से रास्ता नहीं सूझेगा। देश भावुक हुआ जा रहा है। जवानों की शहादत पर सबको गर्व होना चाहिए। लेकिन क्या हम सिर्फ शहादत पर गर्व करते रहेंगे ? क्या हमारे देशप्रेम को प्रमाणित करने के लिए हमारे जवानों को मरते रहना होगा ? वो मरते रहें और हम उनकी शहादत को लक्षणा-व्यंजना के साथ परोस कर देशभक्त होते रहें ? हमारी सेना महान है, हमारी सेना हमारा गौरव है लिहाजा हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम इस गौरव को बचाए रखें। हम भावुक हुए जा रहे हैं यही ग़लत है। क्या ये चिंता की बात नहीं है कि दो-चार लोग हमारी सेना की कैंप में घुस जाते हैं और हमारे कई जवानों की हत्या कर देते हैं ? घर में घुसकर मारना इसे ही तो कहते हैं। बार-बार पाकिस्तानी सेना (जिसे हमारे यहां आतंकी कहा जाता है) हमारे घर में घुसकर हमें मार रही है और हम भावनाओं की लहरों पर हिचकोले खा रहे हैं। क्या हमें हमारी सेना से ये नहीं पूछना चाहिए कि बताइए आप क्या कर रहे थे पठानकोट में ? पाकिस्तान से आए आतंकी, हाथों में हथियार लहराते पहले एयरबेस तक पहुंचते हैं, फिर आराम से एयरबेस में दाखिल होते हैं, फिर जब वो आपके किचेन में घुसकर आपको मारने लगते हैं तब आपको पता चलता है कि आतंकी हमला हुआ है। क्या हमें ये सवाल नहीं उठाना चाहिए कि कैंप की सुरक्षा में इतनी बड़ी लापरवाही क्यों बरती गई ? किचेन और बेडरूम तक पाकिस्तानी आतंकवादी पहुंचने लगे हैं और हम भावनाओं के ज्वार पर सवार हुए जा रहे हैं।
उरी हमले के बाद तो सवाल और गंभीर होने चाहिए। 19 जवान ज़िंदा जला दिए गए। कहा गया कि रात के अंधेरे में हमला हुआ, जवान सो रहे थे। जो लोग ये तर्क दे रहे हैं उनसे मेरा सवाल है कि क्या हमने ये मान लिया है कि दुश्मन देश पाकिस्तान सिर्फ दिन में हमले करेगा इसलिए हमारी देश की सेना रातों में देश की सुरक्षा तो छोड़िए अपने कैंप की सुरक्षा के लिए भी सतर्क नहीं रहती ? तो क्या ये मान लिया जाए कि अगर रात में हमला हुआ तो फिर हमारे सामने ज़िंदा जलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होगा ? हमें अपनी सेना पर गर्व होना चाहिए लेकिन अगर कहीं चूक हो रही है तो हमें सवाल भी तो उठाने चाहिए।
सवाल तो सर्जिकल स्ट्राइक के दावे पर भी खड़े हो रहे हैं। लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार है कि वो अपनी सरकार से सवाल पूछे और अगर सरकार लोकतांत्रित मूल्यों का सम्मान करने वाली हो तो जवाब भी देती है। कुछ लोग इन सवालों को राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह के खांचे में धकेल रहे हैं। उनसे मेरा सवाल है कि क्या सरकार के दावे ही राष्ट्रवाद हैं ? तो फिर क्यों नहीं मान लिया जाता कि हमने ग़रीबी, बेरोज़गोरी, भुखमरी, अशिक्षा बगैरह पर काबू लिया है। सरकारें तो ये दावे करती ही रही हैं। क्योंकर मीडिया के लोग इन दावों की पोल खोलने लगते हैं ? राष्ट्रवादी होइए और मान लीजिए कि सारी समस्याएं खत्म हो चुकी हैं। तो क्या ये मान कर अपनी हालत पर संतोष कर लिया जाए कि सरकार ही आखिरी सच है, सरकार ही राष्ट्र और सरकार की कही हर बात सिर झुका कर स्वीकार कर लेना ही राष्ट्रवाद है ? जिस देश ने अपने 19 जवानों को ज़िदा जलते हुए देखा है अगर वो देश अपनी सरकार से उसका जवाब नहीं पूछेगा तो क्या वो देश ज़िंदा माना जाएगा ? कहा जा रहा है कि डीजीएमओ ने खुद कहा कि कार्रवाई हुई है। अच्छी बात है, हमें अपने अधिकारियों पर भरोसा करना चाहिए । जब किसी जिले का डीएम कहता है कि बाढ़ से बड़ा नुकसान नहीं हुआ है तब हम न जाने कहां-कहां से नुकसान की तस्वीरें, रोती महिलाओं के आंसू, सिसकियां खोज लाते हैं और फिर जिला प्रशासन और सरकार पर सर्जिकल स्ट्राइक से भी ज्यादा घातक हमला कर देते हैं। तब तो हम अपने अधिकारी पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं करते। हम ज़मीनी हक़ीक़त की पड़ताल करते हैं, ये हमारा काम है, हमारी जिम्मेदारी है, हमें करना चाहिए सो हम करते हैं। तो क्या सर्जिकल स्ट्राइक के दावों की पड़ताल नहीं होनी चाहिए ? सेना के किसी अधिकारी के दावे के बाद देश चुप हो जाए ? तो कल जब कोई सेना का अधिकारी ये कह दे कि भाई ये जो चुनी हुई सरकार है यही पाकिस्तान से मिली हुई है। तो क्या हम मान लेंगे ? कल को वही डीजीएमओ साहब यह कह दें कि देखिए हम सीने पर गोलियां खा रहे हैं और पीएम साहब पाकिस्तान में जाकर बिरयानी खा रहे हैं, जब तक हम इन्हें नहीं हटाएंगे तब तक पाकिस्तान पर कब्जा नहीं होगा। तब क्या हम सेना को लोकतंत्र की हत्या करने की आज़ादी दे देंगे ? इतना भावुक मत होइए। आगे अंधा मोड़ है।
Tuesday, October 11, 2016
राष्ट्रवाद नहीं ये बीमारी है
Anxiety disorder मतलब व्यग्रता विकार। ये समस्या भारत में एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है। इसे बढ़ाने में टीवी, अखबार, और सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है। न्यूज एंकर जिस तरह से हिंसा का वातावरण गढ़ रहे हैं, लोगों में नफरत और गुस्सा भर रहे हैं उसके नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं। देशभक्ति किसी को कोसने, गरियाने, धमकाने से नहीं आती। जब भक्ति में नफरत की गुंजाइश ही नहीं है तो फिर किसी से नफरत करते हुए देशभक्त कैसे हुआ जा सकता है । सोशल मीडिया पर व्यग्रता विकार का असर खूब दिख रहा है। खुद को भारतीय संस्कृति से लबरेज मानने वाला कोई शख्स क्या किसी के लिए ये लिख सकता है कि अपने मां-बाप की सुहागरात वाला वीडियो जारी करो ? ये लिखने वाले ऋषि-मुनियों की संस्कृति वाले लोग हो सकते हैं क्या ? ये विवेकानंद के अनुयायी हो सकते हैं क्या ? यही राष्ट्रवाद है क्या ? आप किसी के विचार से असहमत हो सकते हैं लेकिन हमलावर नहीं हो सकते। आप जो सोचते हैं सिर्फ और सिर्फ वही सही है ये सोचना ही मनोविकार के लक्षण हैं। आप जिसे पसंद करते हैं तमाम लोग उसे ही पसंद करें ये सोचना ही मनोविकार है। आपकी विचारधारा के अलावा बाकी तमाम विचारधाराएं खारिज नहीं हो सकतीं। इसीलिए कह रहा हूं सावधान हो जाइए आप देशभक्त नहीं मनोविकार का शिकार हो गए हैं। Anxiety disorder कोई बड़ी समस्या नहीं है लेकिन धीरे-धीरे ये समस्या बड़ी होती जाती है। अभी आप Eustress का शिकार हैं कुछ दिनों बाद Distress का शिकार हो जाइएगा। एक अवस्था तक Distress में रहने वाले लोग Psychotic हो जाते हैं। खुद को संभालिए, आप लोगPersonality Disorder की ओर बढ़ रहे हैं। देश की एक बड़ी आबादी इस खतरे के जद में है। उन्माद से Eustress बढ़ता है। जो लोग उन्माद भड़का रहे हैं दरअसल वो आपको खतरनाक बीमारी दे रहे हैं। आपकी बीमारी से उनके स्वार्थ पूरे होंगे लेकिन आपका नुकसान होगा। आपके अंदर का गुस्सा आपको नुकसान पहुंचाएगा। थोपे जा रहे कथित राष्ट्रवाद के उन्माद में राष्ट्र को बीमार मत बनाइए। संत-फकीरों वाले देश को मां-बहन की गालियों वाला देश बनाने को कोशिश राष्ट्रवाद नहीं पागलपन की निशानी है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि ये बजट देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने ये बात यूं ही नहीं कही है। वर्ल्ड बैंक के अ...
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पत्रकारिता के एक छात्र ने मजेदार सवाल पूछा है। सवाल है ‘ सर, भारत में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या कम नहीं है बावजूद इसके मोदी सबको उल्लू कै...


